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आपराधिक कानून

दण्ड प्रक्रिया संहिता की धारा 126(2)

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 21-Jul-2026

एक्स बनाम वाई  

"इस उपबंध में शपथपत्र के माध्यम से साक्ष्य प्रस्तुत करने की कोई परिकल्पना नहीं है और न ही इसमें ऐसा कोई सक्षम प्रावधान है जो न्यायालय को मौखिक मुख्य-परीक्षा के स्थान पर साक्ष्य शपथपत्र को प्रस्तुत करने का अधिकार देता हो।" 

न्यायमूर्ति वेंकट ज्योतिर्मई प्रताप 

स्रोत: आंध्र प्रदेश उच्च न्यायालय 

चर्चा में क्यों? 

न्यायमूर्ति वेंकट ज्योथिरमाई प्रतापा की एकल न्यायाधीश पीठ नेएक्स बनाम वाई  (2026)के मामले में यह निर्णय दिया कि कुटुंब न्यायालय धारा 125 दण्ड प्रक्रिया संहिता (धारा 144 भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता) के अधीन भरण-पोषण कार्यवाही में शपथपत्र के रूप में मुख्य परीक्षा साक्ष्य स्वीकार नहीं कर सकतेक्योंकि ऐसी प्रक्रिया धारा 126(2) दण्ड प्रक्रिया संहिता (धारा 145(2) भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता) के अधीन अनिवार्य आवश्यकता के विपरीत हैजिसके अनुसार साक्ष्य उस व्यक्ति की उपस्थिति में अभिलिखित किया जाना चाहिये जिससे भरण-पोषण मांगा जा रहा है। 

एक्स बनाम वाई (2026) के मामले की पृष्ठभूमि क्या थी? 

  • कुटुंब न्यायालय ने धारा 125 दण्ड प्रक्रिया संहिता के अधीन कार्यवाही में पत्नी को 30,000 रुपए और अवयस्क पुत्र को 20,000 रुपए मासिक भरण-पोषण देने का आदेश पारित किया था। 
  • इस आदेश पर पहुँचते समयकुटुंब न्यायालय ने पत्नी के मौखिक साक्ष्य को अभिलिखित करने के बजायउसके मुख्य-परीक्षा शपथपत्र पर विश्वास किया था। 
  • पति ने भरण-पोषण आदेश को चुनौती देते हुए पुनरीक्षण याचिका दायर कीजिसमें तर्क दिया गया कि कुटुंब न्यायालय ने धारा 126(2) दण्ड प्रक्रिया संहिता के अधीन अनिवार्य प्रक्रिया का पालन करने के बजाय शपथपत्र के साक्ष्य पर अवैध रूप से कार्रवाई की थी। 
  • उन्होंने आगे तर्क दिया कि कुटुंब न्यायालय ने इस बात पर विचार किये बिना भरण-पोषण प्रदान किया कि पत्नी एक सॉफ्टवेयर पेशेवर के रूप में कार्यरत थीकि उन्होंने अपनी नौकरी से इस्तीफा दे दिया था और उनके पास दी गई राशि का संदाय करने का कोई साधन नहीं थाऔर उनके आयकर रिकॉर्ड प्रस्तुत करने की मांग वाले उनके आवेदन पर विचार नहीं किया गया था। 
  • प्रत्यर्थियों ने पुनरीक्षण का विरोध करते हुए तर्क दिया कि धारा 125 दण्ड प्रक्रिया संहिता के अधीन कार्यवाही अर्ध-सिविल प्रकृति की हैऔर आदेश 18 नियम सिविल प्रक्रिया संहिता के अधीन प्रक्रियाजो शपथपत्र के माध्यम से मुख्य परीक्षा की अनुमति देती हैऐसी कार्यवाही में वैध रूप से अपनाई जा सकती है। 
  • उन्होंने तर्क दिया कि कुटुंब न्यायालय द्वारा अपनाई गई प्रक्रिया में कोई विधिक कमी नहीं थी। 

न्यायालय की क्या टिप्पणियां थीं? 

  • दण्ड प्रक्रिया संहिता की धारा 126(2) की भाषा पर:न्यायालय ने माना कि धारा 126(2) दण्ड प्रक्रिया संहिता (धारा 145(2) भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता) में यह निर्धारित है कि भरण-पोषण कार्यवाही में सभी साक्ष्य उस व्यक्ति की उपस्थिति में लिये जाएंगे जिसके विरुद्ध भरण-पोषण के संदाय का आदेश प्रस्तावित हैयाजब उसकी व्यक्तिगत उपस्थिति से छूट दी गई होतो उसके अधिवक्ता की उपस्थिति में लिये जाएंगे। 
  • उपबंध की अनिवार्य प्रकृति पर:न्यायालय ने माना कि विधायिका ने जानबूझकर धारा 126(2) दण्ड प्रक्रिया संहिता में "shall" अभिव्यक्ति का प्रयोग किया हैजिससे विपक्षी पक्षकार की उपस्थिति में साक्ष्य अभिलिखित करने की आवश्यकता अनिवार्य हो जाती है।  
  • शपथपत्र साक्ष्य पर:न्यायालय ने माना कि धारा 126(2) दण्ड प्रक्रिया संहिता  शपथ पत्रों के माध्यम से साक्ष्य प्रस्तुत करने की परिकल्पना नहीं करती हैऔर इसमें कोई सक्षम प्रावधान नहीं है जो कुटुंब न्यायालय को मौखिक मुख्य परीक्षा को साक्ष्य शपथपत्र से प्रतिस्थापित करने के लिये अधिकृत करता हो। 
  • प्रत्यर्थियों द्वारा आदेश 18 नियम सिविल प्रक्रिया संहिता पर निर्भरता के संबंध में:प्रत्यर्थियों के तर्क को खारिज करते हुएन्यायालय ने माना कि धारा 126(2) दण्ड प्रक्रिया संहिता में स्पष्ट रूप से कहा गया है कि साक्ष्य विपक्षी पक्ष की उपस्थिति में अभिलिखित किया जाना चाहियेऔर इसे धारा 254 दण्ड प्रक्रिया संहिता के साथ सामंजस्यपूर्ण रूप से पढ़ते हुएयह माना कि शपथ पत्र साक्ष्य की अनुमति देने वाली सिविल प्रक्रिया संहिता की प्रक्रिया को इस संबंध में स्पष्ट सांविधिक प्रावधान के अभाव में भरण-पोषण कार्यवाही में शामिल नहीं किया जा सकता है। 
  • कुटुंब न्यायालयों पर दण्ड प्रक्रिया संहिता के अध्याय की प्रयोज्यता के संबंध में:न्यायालय ने पुनः पुष्टि की कि भरण-पोषण दावों का निपटारा करते समय कुटुंब न्यायालय भी दण्ड प्रक्रिया संहिता के अध्याय के अंतर्गत विहित प्रक्रिया का पालन करने के लिये बाध्य हैं। 
  • प्रतिपरीक्षा के दायरे पर:न्यायालय ने माना कि भरण-पोषण की कार्यवाही में प्रतिपरीक्षा केवल भरण-पोषण के दावे से सीधे संबंधित विवाद्यकों तक ही सीमित रहनी चाहियेऔर इसे असंबंधित वैवाहिक विवादों की व्यापक जांच बनने की अनुमति नहीं दी जानी चाहिये 
  • राजनेश बनाम नेहा (2021) के अनुपालन पर:न्यायालय ने पाया कि कुटुंब न्यायालय राजनेश बनाम नेहा (2021) में उच्चतम न्यायालय के निदेशों का अनुपालन सुनिश्चित करने में असफल रहा हैजिसके अनुसार दोनों पक्षकारों को अपनी आयसंपत्तिदेनदारियों और व्यय का प्रकटन करते हुए व्यापक शपथपत्र दाखिल करने होंगे जिससे भरण-पोषण का वस्तुनिष्ठ मूल्यांकन किया जा सके। 
  • अनुपालन न करने के विधिक परिणाम के संबंध में:चूँकि कुटुंब न्यायालय ने इन अनिवार्य प्रकटनों को प्राप्त किये बिना भरण-पोषण का अवधारण किया थाइसलिये न्यायालय ने माना कि इस आधार पर भी निर्णय विधिक रूप से अस्थिर था। 
  • अनुतोष प्रदान करने पर:यह मानते हुए कि दोनों दोष न्याय प्रक्रिया के मूल में थेन्यायालय ने भरण-पोषण आदेश को रद्द अपास्त दिया और मामले को नए सिरे से विचार करने के लिये कुटुंब न्यायालय को वापस भेज दियातथा उसे धारा 126(2) दण्ड प्रक्रिया संहिता (धारा 145(2) भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता) के अनुसार नए सिरे से साक्ष्य अभिलिखित करने और मामले का निपटारा अधिमानतः दो महीने के भीतर करने का निदेश दिया। न्यायालय ने पति को कुटुंब न्यायालय द्वारा दिये गए भरण-पोषण का 50% अंतरिम भरण-पोषण के रूप में तब तक भुगतान करते रहने का निदेश दिया जब तक कि मामले का नए सिरे से निर्णय नहीं हो जाता। 

भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता की धारा 145 क्या है? 

  • उपधारा (1) – प्रादेशिक अधिकारिता: धारा 144 भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता के अधीन कार्यवाही किसी व्यक्ति के विरुद्ध किसी भी जिले में शुरू की जा सकती है जहाँ वह निवास करता हैजहाँ उसकी पत्नी निवास करती हैजहाँ वह अपनी पत्नी के साथ (या अधर्मज बच्चे की माता के साथजैसा भी मामला हो) अंतिम बार निवास करता थाया जहाँ उसका पिता या माता निवास करता है। 
  • उपधारा (2) – साक्ष्य अभिलिखित करने का तरीका: ऐसी कार्यवाही में सभी साक्ष्य उस व्यक्ति की उपस्थिति में लिये जाने चाहिये जिसके विरुद्ध भरण-पोषण आदेश प्रस्तावित किया जाना हैया जहाँ उसकी व्यक्तिगत उपस्थिति से छूट दी गई हैउसके अधिवक्ता की उपस्थिति में लिये जाने चाहियेऔर समन मामलों के लिये विहित तरीके से अभिलिखित किये जाने चाहिये 
  • उपधारा (2) का परंतुक – एकपक्षीय कार्यवाही: यदि मजिस्ट्रेट संतुष्ट हो कि ऐसा व्यक्ति जानबूझकर तामील से बच रहा है या जानबूझकर न्यायालय में उपस्थित होने में उपेक्षा कर रहा हैतो मजिस्ट्रेट मामले की सुनवाई और निर्णय एकपक्षीय कर सकता है। उचित कारण बताए जाने परआदेश की तिथि से तीन माह के भीतर दायर आवेदन परऐसे किसी भी एकपक्षीय आदेश को मजिस्ट्रेट द्वारा उचित समझे जाने वाले प्रावधानों (विपक्षी पक्ष को लागत सहित) के अधीन अपास्त किया जा सकता है। 
  • उपधारा (3) – लागत: न्यायालयधारा 144 भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता के अधीन आवेदनों पर विचार करते समयलागत के संबंध में ऐसा आदेश पारित करने की शक्ति रखता है जो उचित हो।  
  • नोट:भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता की धारा 145 पूर्ववर्ती दण्ड प्रक्रिया संहिता, 1973 की धारा 126 के अनुरूप है और इसमें वही प्रक्रियात्मक सुरक्षा उपाय संरक्षित हैं - साक्ष्य अभिलिखित करने के दौरान प्रत्यर्थी (या उसके अधिवक्ता) की अनिवार्य उपस्थितिऔर जानबूझकर गैर-अनुपालन के लिये एकपक्षीय तंत्र।