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सांविधानिक विधि

न्यायिक जवाबदेही में खामी: यशवंत वर्मा मामला

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 22-Jul-2026

स्रोत:द हिंदू 

परिचय  

आगामी मानसून सत्र में संसदलोकसभा अध्यक्ष द्वारा न्यायाधीश (जांच) अधिनियम, 1968 के अधीन नियुक्त समिति की रिपोर्ट पर विचार करने के लिये तैयार हैजिसे इलाहाबाद और दिल्ली उच्च न्यायालयों के पूर्व न्यायाधीश यशवंत वर्मा के विरुद्ध दुर्व्यवहार के आरोपों के अन्वेषण के लिये नियुक्त किया गया थाजिन्होंने बाद में इस्तीफा दे दिया था।    

  • उनके विरुद्ध आरोप मार्च 2025 में उनके आधिकारिक आवास के एक बाहरी कमरे में आंशिक रूप से जले हुए करेंसी नोटों की खोज से उत्पन्न हुए हैं। 
  • उनकी वर्तमान स्थिति और संसद में लंबित कार्यवाही के भविष्य को लेकर रहस्य बना हुआ है। 

पृष्ठभूमि 

  • अपने इस्तीफे के तीन महीने बाद भीश्री वर्मा का नाम इलाहाबाद उच्च न्यायालय और केंद्र सरकार के न्याय विभाग द्वारा एक कार्यरत न्यायाधीश के रूप में सूचीबद्ध हैजिससे इस बात को लेकर संदेह उत्पन्न हो रहा है कि उनका इस्तीफा प्रभावी हो गया है या अभी भी राष्ट्रपति द्वारा स्वीकृति के अधीन है।    
  • खबरों के मुताबिकश्री वर्मा के अप्रैल, 2026 को इस्तीफे के बादवकालत फिर से शुरू करने पर बार में उनकी स्थिति "सक्रिय" कर दी गई थी। बताया जा रहा है कि इस्तीफे के बाद से एक मौजूदा न्यायाधीश के रूप में उनके कुछ बकाया और लाभ रोक दिये गए हैं। 

स्वेच्छा से इस्तीफा देने की सांविधानिक शक्ति 

  • संविधान में 13 सांविधानिक पदाधिकारियों को "इच्छा अनुसार त्यागपत्र देने का अधिकार" दिया गया हैऔर उनका त्यागपत्र किसी भी प्राधिकारी द्वारा स्वीकार किये जाने के अधीन नहीं है। वे केवल संविधान में निर्दिष्ट प्राधिकारी को संबोधित अपने हस्ताक्षर से लिखित रूप में त्यागपत्र दे सकते हैं। 
  • स्वीकृति की आवश्यकता न होने के कारणस्वेच्छा से इस्तीफा देने की शक्ति इन कार्यालयों की स्वतंत्रता के लिये एक आवश्यक सुरक्षा कवच है - यह पदधारियों को प्रपीड़न में काम करने के लिये मजबूर होने से बचाती है। 
  • जिन पदों पर आसीन व्यक्तियों को यह शक्ति प्राप्त हैवे हैं: राष्ट्रपतिउपराष्ट्रपतिराज्यसभा के उपसभापतिलोकसभा के अध्यक्ष और उपाध्यक्षउच्चतम न्यायालय के न्यायाधीशउच्च न्यायालयों के न्यायाधीशराज्यपालराज्य विधानसभा के अध्यक्ष और उपाध्यक्षराज्य विधान परिषद के अध्यक्ष और उपाध्यक्षऔर लोक सेवा आयोग के सदस्य। 
  • इसके विपरीतसंविधान के अनुच्छेद 101(3)(ख) में स्पष्ट रूप से कहा गया है कि संसद सदस्यों का त्यागपत्र लोकसभा अध्यक्ष या राज्यसभा अध्यक्ष की स्वीकृति के अधीन होगा। अनुच्छेद 190(3)(ख) के अधीनराज्य विधानसभाओं और विधान परिषदों के सदस्यों का त्यागपत्र भी इसी प्रकार अध्यक्ष या राज्यसभा अध्यक्ष की स्वीकृति के अधीन होगा। 
  • भारत संघ बनाम गोपाल चंद्र मिश्रा (1978) के मामलेमें उच्चतम न्यायालय के पाँच न्यायाधीशों की संविधान पीठ नेसर्वसम्मति से उच्चतम न्यायालय और उच्च न्यायालय के न्यायाधीशों के स्वेच्छा से इस्तीफा देने के अधिकार की पुष्टि की। 
    • न्यायमूर्ति एस. मुर्तजा फजल अली ने बहुमत के इस मत से असहमति जताई कि इस्तीफा देने वाला न्यायाधीश भविष्य की कोई तारीख चुन सकता है और उस तारीख से पहले अपना इस्तीफा वापस ले सकता हैलेकिन उन्होंने पीठ के सर्वसम्मत मत को दोहराया कि न्यायाधीशों के इस्तीफे के लिये किसी स्वीकृति की आवश्यकता नहीं है - इस्तीफा स्वतः ही (बिना किसी बाहरी कार्रवाई की आवश्यकता के) प्रभावी हो जाताहै । 
  • 2017 से अब तक कम से कम 12 उच्च न्यायालय के न्यायाधीशों ने इस्तीफा दे दिया है। उच्चतम न्यायालय के एक न्यायाधीशन्यायमूर्ति दलवीर भंडारी ने 2012 में अंतर्राष्ट्रीय न्यायालय में शामिल होने के लिये इस्तीफा दे दिया था। सार्वजनिक रूप से उपलब्ध आंकड़ों से पता चलता है कि इन इस्तीफों को ऊपर वर्णित विधि के अनुपालन में निपटाया गया है। 

श्री वर्मा को वर्तमान न्यायाधीश के रूप में सूचीबद्ध करते रहने की विसंगति 

  • चूँकि श्री वर्मा अप्रैल को न्यायाधीश नहीं रहेइसलिये न्याय विभाग की सूची या इलाहाबाद उच्च न्यायालय की वेबसाइट पर उस तारीख के बाद उन्हें इलाहाबाद उच्च न्यायालय के कार्यरत न्यायाधीश के रूप में वर्णित करना स्पष्ट रूप से गलत है। 
  • किसी ऐसे व्यक्ति का नामजो न्यायाधीश नहीं हैतीन महीने से अधिक समय तक मौजूदा न्यायाधीशों की सूची में बनाए रखने का कोई औचित्य नहीं है। 
  • केंद्रीय न्याय विभाग और इलाहाबाद उच्च न्यायालय के लिये यह उचित होगा कि वे त्रुटि को सुधारें और उनका नाम हटा दें। यह कहना निःसंदेह गलत होगा कि उच्च न्यायालय के न्यायाधीश के रूप में उन्हें कोई वेतन या लाभ प्राप्त हो। 

जांच समिति की रिपोर्ट का भविष्य 

  • समिति की रिपोर्ट श्री वर्मा के इस्तीफे से पहले के आचरण से संबंधित है। इसलियेइस्तीफे का रिपोर्ट को दोनों सदनों के समक्ष प्रस्तुत करने और उसे सार्वजनिक करने पर कोई प्रभाव नहीं पड़ता। वास्तव मेंऐसा करना सांविधिक दायित्त्व है। 
  • जनता को यह जानने का भी वैध अधिकार है कि क्या समिति को सांविधानिक न्यायालय के किसी मौजूदा न्यायाधीश द्वारा किसी प्रकार के साबित दुर्व्यवहार का पता चला है। 
  • यदि रिपोर्ट में श्री वर्मा को आरोपों से निर्दोष पाया जाता हैतो मामला वहीं समाप्त हो जाएगा। 
  • यदि रिपोर्ट में उन्हें दोषी पाया जाता हैतो उनके पद से हटाने की याचिका आगे नहीं बढ़ाई जा सकती। श्री वर्मा ने इस्तीफा दे दिया हैइसलिये वे न्यायाधीश के पद पर नहीं हैं और उन्हें पद से हटाया नहीं जा सकता। 
  • न्यायाधीश (जांच) अधिनियम, 1968 की धारा के अधीनप्रस्ताव के साथ संसद में रिपोर्ट पर चर्चा की जानी है। चूँकि प्रस्ताव समाप्त हो जाता है और उस पर चर्चा नहीं हो सकतीइसलिये अधिनियम के अधीन संसद में रिपोर्ट पर भी चर्चा नहीं हो सकती। 

सांविधानिक संशोधन के पक्ष में तर्क 

  • न्यायाधीश (जांच) अधिनियम, 1968 के अधीन बर्खास्तगी कार्यवाही के माध्यम से न्यायिक जवाबदेही के ढाँचे में एक खामी होने की गंभीर चिंता है। न्यायाधीश संसद द्वारा उनकी बर्खास्तगी के प्रस्ताव पर विचार करने से पहले ही अपनी इच्छा से इस्तीफा दे सकते हैंजिससे पूरी प्रक्रिया रुक जाती है। 
  • इस खामी को दूर करने का सबसे अच्छा तरीका संविधान में संशोधन करना हैन कि संविधान या 1968 के अधिनियम की कार्यकारी या न्यायिक निर्वचन करना। 
  • इस संशोधन में यह प्रावधान हो सकता है कि पद से हटाने की कार्यवाही का सामना कर रहे न्यायाधीश का इस्तीफा कार्यवाही के लंबित रहने के दौरान स्वीकार किया जा सकता है। 
  • न्यायिक स्वतंत्रता की रक्षा के लियेन्यायाधीश का इस्तीफा स्वीकार करने की शक्ति राष्ट्रपति के बजाय भारत के मुख्य न्यायाधीश में निहित होनी चाहिये 
  • यदि संसद न्यायाधीश के इस्तीफे के होते हुए भी जांच समिति द्वारा प्रस्तुत रिपोर्ट पर चर्चा करना चाहती हैतो इस उद्देश्य के लिये अधिनियम में संशोधन किया जाना चाहिये 
  • संविधान या अधिनियम में अनजाने में रह गई खामोशियों की व्याख्या संसद या कार्यपालिका के हितों के अनुरूप करना विधि के शासन के विरुद्ध होगा। 

निष्कर्ष  

यशवंत वर्मा प्रकरण भारत की न्यायिक जवाबदेही व्यवस्था में एक संरचनात्मक खामी को उजागर करता है: न्यायिक स्वतंत्रता की रक्षा के लिये सांविधानिक रूप से संरक्षित "इच्छा अनुसार इस्तीफा देने का अधिकार" का दुरुपयोग दुर्व्यवहार के आरोप लगने पर बर्खास्तगी की कार्यवाही से बचने के लिये भी किया जा सकता है। यद्यपि श्री वर्मा का इस्तीफा स्थापित सांविधानिक विधि के अधीन स्वतः प्रभावी हो गया और इसे रद्द नहीं किया जा सकताफिर भी उन्हें "वर्तमान न्यायाधीश" के रूप में सूचीबद्ध किये जाने की निरंतर विसंगति और परिणामस्वरूप संसद द्वारा जांच समिति की रिपोर्ट पर चर्चा न कर पाने की स्थिति सांविधानिक संशोधन की आवश्यकता को रेखांकित करती है - बर्खास्तगी की कार्यवाही लंबित रहने के दौरान ऐसे इस्तीफे स्वीकार करने का अधिकार भारत के मुख्य न्यायाधीश को दिया जाना चाहियेन कि इस प्रक्रिया को हेराफेरी के लिये खुला छोड़ दिया जाना चाहिये