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आपराधिक कानून

धारा 68 केवल अनिवार्य रूप से अनुप्रमाणित दस्तावेज़ों पर लागू होती है, रजिस्ट्रीकृत विक्रय विलेखों पर नहीं

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 18-Jul-2026

आर. वेरोनिका और अन्य. बनाम रुद्रायणी देवकी (मृतउनके विधिक उत्तराधिकारियों के माध्यम से एस. सथा कुमार एवं अन्य 

"चूँकि विक्रय विलेख को विधि द्वारा सत्यापित कराना अनिवार्य नहीं हैइसलिये भारतीय साक्ष्य अधिनियम की धारा 68 के प्रावधान स्पष्ट रूप से लागू नहीं होते हैं।" 

न्यायमूर्ति जे.बी. परदीवाला और न्यायमूर्ति मनोज मिश्रा 

स्रोत: उच्चतम न्यायालय 

चर्चा में क्यों? 

न्यायमूर्ति जे.बी. परदीवाला और न्यायमूर्ति मनोज मिश्रा की पीठ नेआर. वेरोनिका और अन्य बनाम रुद्रायणी देवकी (मृतउनके विधिक उत्तराधिकारियों एस. सथा कुमार और अन्य (2026) के मामले मेंयह माना कि भारतीय साक्ष्य अधिनियम की धारा 68 के अधीन किसी दस्तावेज़ को साबित करने के लिये अनुप्रमाणक साक्षी की परीक्षा करने की सांविधिक आवश्यकता केवल उन दस्तावेज़ों पर लागू होती है जिन्हें विधि द्वारा अनुप्रमाणित किया जाना आवश्यक हैऔर एक रजिस्ट्रीकृत विक्रय विलेख इस श्रेणी में नहीं आता है। 

आर. वेरोनिका बनाम रुद्रायणी देवकी (2026) के मामले की पृष्ठभूमि क्या थी? 

  • यह विवाद केरल में एक ही भूखंड को लेकर हुए प्रतिस्पर्धी विक्रय दस्तावेज़ों से संबंधित था। 
  • वादी पक्ष ने अपने स्वामित्व को स्थापित करने के लिये 1978 में निष्पादित एक रजिस्ट्रीकृत विक्रय विलेख पर विश्वास कियाजबकि प्रतिवादियों ने इसकी प्रामाणिकता पर विवाद किया और 1996 में निष्पादित एक अन्य विक्रय विलेख पर विश्वास किया। 
  • विचारण न्यायालय ने मौखिक और दस्तावेज़ी साक्ष्यों पर विचार करने के बाद वादी पक्ष के मामले को स्वीकार कर लियाजिसमें 1978 के विक्रय विलेख के अनुप्रमाणक साक्षी में से एक का परिसाक्ष्य भी शामिल था 
  • प्रथम अपील न्यायालय ने अनुप्रमाणक साक्षी के परिसाक्ष्य पर अविश्वास जताते हुए और यह मानते हुए कि 1978 के दस्तावेज़ के निष्पादन को संतोषजनक ढंग से साबित नहीं किया गया थानिर्णय को पलट दिया। 
  • द्वितीय अपील मेंकेरल उच्च न्यायालय ने विचारण न्यायालय के निर्णय को बहाल कर दियायह मानते हुए कि धारा 68 का परंतुक रजिस्ट्रीकृत विक्रय विलेख पर लागू होता है और उपबंध का निर्वचन इस प्रकार किया कि बाद में उच्चतम न्यायालय ने इसे विधिक रूप से अस्थिर पाया। उच्च न्यायालय ने धारा 100 सिविल प्रक्रिया संहिता के अधीन विधि के सारवान् प्रश्नों को तैयार किये बिना ही द्वितीय अपील का निर्णय सुनाया। 

न्यायालय की क्या टिप्पणियां थीं? 

  • उच्च न्यायालय के तर्क के अनुसार:उच्च न्यायालय ने माना था कि धारा 68 का परंतुक किसी अनुप्रमाणक साक्षी की परीक्षा की आवश्यकता को समाप्त करता हैजब तक कि दस्तावेज़ के निष्पादन को "स्पष्ट रूप से अस्वीकार" न किया गया होऔर केवल लिखित कथन में इंकार करना तब तक ऐसा स्पष्ट इंकार नहीं माना जाएगा जब तक कि इसे किसी अलग वाद या कार्यवाही के माध्यम से चुनौती न दी जाए। इस आधार परउच्च न्यायालय ने माना कि किसी अनुप्रमाणक साक्षी के माध्यम से सबूत पर बल देने की कोई आवश्यकता नहीं है। 
  • धारा 68 के दायरे पर:न्यायालय ने माना कि धारा 68 केवल उन दस्तावेज़ों के लिये सबूत का एक विशेष तरीका निर्धारित करती है जिनका अनुप्रमाणन विधि द्वारा अनिवार्य कर दिया गया हैऔर ऐसे दस्तावेज़ों को सामान्यत: साक्ष्य में तब तक स्वीकार नहीं किया जा सकता जब तक कि कम से कम एक अनुप्रमाणक साक्षी की परीक्षा न की जाएबशर्ते कि ऐसा साक्षी जीवित हो और साक्ष्य देने में सक्षम हो। 
  • धारा 68 के परंतुक पर:न्यायालय ने माना कि परंतुकजो रजिस्ट्रीकृत दस्तावेज़ों (वसीयत के अलावा) के लिये इस आवश्यकता से छूट देता हैजब तक कि निष्पादन को विशेष रूप से अस्वीकार नहीं किया जाता हैमुख्य उपबंध से स्वतंत्र रूप से संचालित नहीं हो सकता हैऔर इसलिये अनिवार्य सत्यापन की आवश्यकता वाले दस्तावेज़ों तक ही सीमित रहता है। 
  • विक्रय विलेख और संपत्ति अंतरण अधिनियम की धारा 54 के संबंध में:न्यायालय ने माना कि यद्यपि ₹100 से अधिक मूल्य की मूर्त अचल संपत्ति की विक्रय रजिस्ट्रीकृत विलेख के माध्यम से की जानी चाहियेलेकिन विधि में कहीं भी ऐसे विलेख को अनुप्रमाणित करने की आवश्यकता नहीं हैऔर इसलिये धारा 68 विक्रय विलेख पर लागू नहीं होती है। 
  • परंतुक की उच्च न्यायालय द्वारा की गई गलत व्याख्या पर:न्यायालय ने माना कि उच्च न्यायालय ने "वसीयत न होने वाले किसी भी दस्तावेज़ के निष्पादन" की व्याख्या में रजिस्ट्रीकृत विक्रय विलेख को शामिल करने में त्रुटी की हैऔर इस सिद्धांत को दोहराया कि कोई परंतुक उस मुख्य उपबंध के दायरे को नहीं बढ़ा सकता जिससे वह जुड़ा हुआ है। 
  • धारा 100 सिविल प्रक्रिया संहिता के अधीन प्रक्रियात्मक दोष पर:न्यायालय ने माना कि उच्च न्यायालय ने विधि के किसी सारवान् प्रश्न को तैयार किये बिना द्वितीय अपील का निर्णय करने में घोर त्रुटि की हैऔर मामले को विधि के किसी सारवान् प्रश्न को तैयार करने के बाद पुनर्विचार करने के लिये उच्च न्यायालय को वापस भेज दिया। 

भारतीय साक्ष्य अधिनियम (BSA) की धारा 67 क्या है? 

  • भारतीय साक्ष्य अधिनियम की धारा 67 – ऐसे दस्तावेज़ के निष्पादन का साबित किया जानाजिसका अनुप्रमाणित होना विधि द्वारा अपेक्षित है: 
  • मुख्य उपबंध:यदि किसी दस्तावेज़ का अनुप्रमाणित होना विधि द्वारा अपेक्षित हैतो उसे साक्ष्य के रूप में उपयोग में न लाया जाएगाजब तक कम से कम एक अनुप्रमाणक साक्षीयदि कोई अनुप्रमाणक साक्षी जीवित और न्यायालय की आदेशिका के अध्यधीन हो तथा साक्ष्य देने के योग्य होउसका निष्पादन साबित करने के प्रयोजन से न बुलाया गया हो 
  • परंतु:ऐसे किसी दस्तावेज़ के निष्पादन को साबित करने के लियेजो विल नहीं हैऔर जो भारतीय रजिस्ट्रीकरण अधिनियम, 1908 (1908 का 16) के उपबंधों के अनुसार रजिस्ट्रीकृत हैकिसी अनुप्रमाणक साक्षी को बुलाना आवश्यक न होगाजब तक कि उसके निष्पादन का प्रत्याख्यान उस व्यक्ति द्वारा जिसके द्वारा उसका निष्पादित होना तात्पर्यित है विनिर्दिष्टतः न किया गया हो 
  • पुरानी विधि के अधीन संबंधित उपबंध:भारतीय साक्ष्य अधिनियम, 1872 की धारा 68 के समान।