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आपराधिक कानून
धारा 31 दण्ड प्रक्रिया संहिता/ धारा 25 भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता
« »09-Jul-2026
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रमेश चंद्र बेहरा बनाम उड़ीसा राज्य "जो व्यक्ति प्रौद्योगिकी के उपयोग में दक्ष नहीं हैं, उन्हें मात्र तकनीकी ज्ञान के अभाव के कारण दण्ड का भागी नहीं बनाया जा सकता।" न्यायमूर्ति वी. नरसिंह |
स्रोत: ओडिशा उच्च न्यायालय
चर्चा में क्यों?
उड़ीसा उच्च न्यायालय के न्यायमूर्ति वी. नरसिंह ने रमेश चंद्र बेहरा बनाम उड़ीसा राज्य (2026) के मामले में यह निर्णय दिया कि जहाँ किसी अभियुक्त को एक ही संव्यवहार में किये गए दो या अधिक अपराधों के लिये दोषी ठहराया जाता है, वहाँ विचारण न्यायालय परिणामी दण्ड को निरंतर चलाने का आदेश नहीं दे सकता है, और उसने दण्ड को एक साथ चलाने के लिये संशोधित किया और साथ ही याचिकाकर्त्ता को परिवीक्षा लाभ भी प्रदान किया।
रमेश चंद्र बेहरा बनाम उड़ीसा राज्य (2026) के मामले की पृष्ठभूमि क्या थी?
- 17.03.2023 को, जब पीड़िता घर पर अकेली थी, तब याचिकाकर्त्ता कथित तौर पर उसके घर में घुस गया और उसके साथ बलात्संग करने का प्रयत्न किया।
- पीड़िता की चीख सुनकर उसका पुत्र मौके पर पहुँचा और याचिकाकर्त्ता का विरोध किया, जिसने कथित तौर पर पीड़िता के सिर और पुत्र के हाथ पर चोटें पहुँचाई।
- इसके अलावा यह भी आरोप लगाया गया कि याचिकाकर्त्ता ने पहले पीड़ित को जान से मारने की धमकी दी थी।
- याचिकाकर्त्ता पर भारतीय दण्ड संहिता की धारा 451, 341, 323, 354 और 506 के अधीन मामला दर्ज किया गया था और विचारण न्यायालय ने उसे भारतीय दण्ड संहिता की धारा 451 (अपराध करने के आशय से गृह अतिचार) और भारतीय दण्ड संहिता की धारा 323 (स्वेच्छा से उपहति कारित करना) के अधीन दोषी ठहराया था।
- विचारण न्यायालय ने याचिकाकर्त्ता की अपराधी परिवीक्षा अधिनियम, 1958 के अधीन छोड़े जाने की प्रार्थना को खारिज कर दिया और उसे धारा 451 भारतीय दण्ड संहिता के अधीन एक वर्ष के साधारण कारावास और धारा 323 भारतीय दण्ड संहिता के अधीन छह महीने के साधारण कारावास का दण्ड सुनाया, साथ ही यह निदेश दिया कि दण्ड निरंतर चलेंगे।
- अपील पर, सेशन न्यायालय ने धारा 451 भारतीय दण्ड संहिता के अधीन दण्ड को एक वर्ष से घटाकर छह महीने कर दिया, लेकिन आदेश के शेष भाग में कोई हस्तक्षेप नहीं किया।
- इससे व्यथित होकर याचिकाकर्त्ता ने उड़ीसा उच्च न्यायालय में एक आपराधिक पुनरीक्षण याचिका दायर की, जिसमें मुख्य रूप से अपराधी परिवीक्षा अधिनियम के अधीन लाभ से वंचित किये जाने को चुनौती दी गई थी।
न्यायालय की क्या टिप्पणियां थीं?
- दण्ड के लिये एकल संव्यवहार के नियम पर: न्यायालय ने कहा कि यद्यपि दोषसिद्धि एक ही संव्यवहार से उत्पन्न अपराधों के लिये दर्ज की गई थी, फिर भी विचारण न्यायालय और अपील न्यायालय दोनों ने दण्डों को क्रमिक रूप से चलाने का निदेश दिया था। ओ.एम. चेरियन उर्फ थैंकचन बनाम केरल राज्य और अन्य (2014) के मामले में उच्चतम न्यायालय के निर्णय पर विश्वास करते हुए, न्यायालय ने दोहराया कि जब कोई अभियोग दो या दो से अधिक अपराधों से गठित एक ही संव्यवहार से उत्पन्न होता है, तो दण्डों को एक साथ चलना चाहिये, और ऐसा कोई नियम नहीं है कि क्रमिक दण्ड देना सामान्य नियम हो और एक साथ दण्ड देना अपवाद हो।
- मोहम्मद अख्तर हुसैन के मामले में उच्चतम न्यायालय के निर्णय पर: न्यायालय ने मोहम्मद अख्तर हुसैन बनाम कलेक्टर ऑफ कस्टम्स (1988) के मामले में उच्चतम न्यायालय के निर्णय पर विश्वास किया, जिसमें समवर्ती दण्ड के लिये एकल संव्यवहार नियम निर्धारित किया गया था - कि जहाँ एक ही संव्यवहार दो अधिनियमों के अधीन दो अपराधों का गठन करता है, वहाँ निरंतर दण्ड अनुचित है, तथापि यह नियम वहाँ लागू नहीं होता जहाँ अपराध पृथक् संव्यवहार या भिन्न तथ्यों से उत्पन्न होते हैं।
- दण्ड सुनाते समय कम करने वाले कारकों पर विचार करते हुए: ऑस्कर वाइल्ड के इस कथन का हवाला देते हुए कि "हर संत का एक अतीत होता है और हर पापी का एक भविष्य", न्यायालय ने कहा कि दण्ड सुनाते समय कम करने वाले कारकों पर विचार किया जाना चाहिये। दण्ड प्रक्रिया संहिता की धारा 235(2) और भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता (BNSS) की धारा 258(2) का हवाला देते हुए, जिनमें दण्ड सुनाने से पहले अभियुक्त को सुनवाई का अवसर दिया जाता है, न्यायालय ने इस बात पर बल दिया कि न्यायालयों को यांत्रिक रूप से दण्ड के आदेश पारित नहीं करने चाहिये, अपितु अपराध की परिस्थितियों और किसी भी कम करने वाले कारकों को ध्यान में रखना चाहिये।
- भारतीय दण्ड संहिता की धारा 451 के अधीन अधिरोपित किये गए जुर्माने पर: न्यायालय ने भारतीय दण्ड संहिता की धारा 451 के अधीन अधिरोपित किये गए जुर्माने को अपास्त कर दिया और इसके बजाय निदेश दिया कि यह राशि अपराधी परिवीक्षा अधिनियम की धारा 5 के अधीन पीड़ित को प्रतिकर के रूप में दी जाए।
- अपराधी परिवीक्षा अधिनियम के अधीन लाभ से इंकार के संबंध में: न्यायालय ने आश्चर्य व्यक्त किया कि अधीनस्थ न्यायालयों ने इस मामले को अपराधी परिवीक्षा अधिनियम के उदार प्रावधानों के लिये उपयुक्त नहीं माना। उच्चतम न्यायालय द्वारा चेल्लमल बनाम राज्य (पुलिस निरीक्षक द्वारा प्रतिनिधित्व) मामले में हाल ही में दिये गए अवलोकनों (2025) पर विश्वास करते हुए, न्यायालय ने कहा कि यदि न्यायालय किसी मामले में अपराधी परिवीक्षा अधिनियम लागू करने से इंकार करते हैं तो उन्हें इसके कारण अभिलिखित करना अनिवार्य है।
- अनुतोष मिलने पर: न्यायालय ने दण्ड को क्रमिक के बजाय समवर्ती चलाने के लिये संशोधित किया, अपराधी परिवीक्षा अधिनियम की धारा 4 के अधीन परिवीक्षा का लाभ बढ़ाया और याचिकाकर्त्ता को छह महीने के भीतर 1,000 रुपए का प्रतिकर जमा करने का निदेश दिया।
भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता की धारा 25 क्या है?
भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता की धारा 25 - एक ही विचारण में कई अपराधों के लिये दोषसिद्ध होने के मामलों में दण्डादेश:
- उपधारा (1): जब कोई व्यक्ति एक ही विचारण में दो या अधिक अपराधों के लिये दोषसिद्ध किया जाता है तब, न्यायालय भारतीय न्याय संहिता, 2023 की धारा 9 के उपबंधों के अधीन रहते हुए, उसे ऐसे अपराधों के लिये विहित विभिन्न दण्डों में से उन दण्डों के लिये, जिन्हें देने के लिये ऐसा न्यायालय सक्षम है, दण्डादेश दे सकेगा; और न्यायालय, अपराधों की गंभीरता पर विचार करते हुए, ऐसे दण्डादेश साथ-साथ या क्रमवर्ती रूप से भोगने का आदेश देगा।
- उपधारा (2): दण्डादेशों के क्रमवर्ती होने की दशा में, केवल इस कारण से कि कई अपराधों के लिये संकलित दण्ड उस दण्ड से अधिक है जो वह न्यायालय एक अपराध के लिये दोषसिद्धि पर देने के लिये सक्षम है, न्यायालय के लिये यह आवश्यक नहीं होगा कि अपराधी को उच्चतर न्यायालय के समक्ष विचारण के लिये भेजे; परंतु इसके लिये दो शर्तें हैं:
- (क) किसी भी दशा में, ऐसा व्यक्ति बीस वर्ष से अधिक की अवधि के लिये कारावास के लिये दण्डादिष्ट नहीं किया जाएगा।
- (ख) संकलित दण्ड, उस दण्ड की मात्रा के दुगुने से अधिक नहीं होगा जिसे एक अपराध में देने के लिये वह न्यायालय सक्षम है।
- उपधारा (3): किसी सिद्धदोष व्यक्ति द्वारा अपील के प्रयोजन के लिये, एक दण्डादेश उन क्रमवर्ती दण्डादेशों का योग, जो इस धारा के अधीन उसके विरुद्ध दिये गए है, एक दण्डादेश समझा जाएगा।
- विधायी आधार: भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता की धारा 25 पूर्ववर्ती दण्ड प्रक्रिया संहिता, 1973 की धारा 31 के अनुरूप है और सार रूप में उससे मिलती-जुलती है।