9 मार्च से शुरू हो रहे हमारे ऑल-इन-वन ज्यूडिशियरी फाउंडेशन कोर्स के साथ अपनी ज्यूडिशियरी की तैयारी को मजबूत बनाएं | यह कोर्स अंग्रेज़ी और हिंदी दोनों माध्यमों में उपलब्ध है।   |   आज ही हमारे ज्यूडिशियरी फाउंडेशन कोर्स में एडमिशन लें और अपनी तैयारी को और बेहतर बनाएँ | हिंदी माध्यम बैच: 9 मार्च, सुबह 8 बजे   |   आज ही एडमिशन लें बिहार APO (प्रिलिम्स + मेन्स) कोर्स में और अपने सपनों को दे नई दिशा | ऑफलाइन एवं ऑनलाइन मोड में उपलब्ध | 12 जनवरी 2026  से कक्षाएँ आरंभ   |   ज्यूडिशियरी की तैयारी अब हिंदी माध्यम में! दृष्टि ज्यूडिशियरी का नया बैच 22 जून 2026 से शुरू | आज ही एडमिशन लें | ऑनलाइन व ऑफलाइन दोनों मोड में उपलब्ध |   |   एडमिशन ओपन: UP APO प्रिलिम्स + मेंस कोर्स 2025, बैच 6th October से   |   ज्यूडिशियरी फाउंडेशन कोर्स (प्रयागराज)   |   अपनी सीट आज ही कन्फर्म करें - UP APO प्रिलिम्स कोर्स 2025, बैच 6th October से







होम / करेंट अफेयर्स

सिविल कानून

वरिष्ठ नागरिकों को ऑनलाइन मामलों की जानकारी न रखने पर दण्डित नहीं किया जा सकता

    «
 03-Jul-2026

सुकेश चंद्र साहा एवं अन्य पबनाम रिमल साहा 

"यद्यपि यह सत्य है कि एक वेबसाइट उपलब्ध है जिस पर मुवक्किलों से अपने मामलों के चरणों को सत्यापित करने की अपेक्षा की जाती हैलेकिन इस मामले में वरिष्ठ नागरिकों की तरह तकनीकी रूप से कम जानकार व्यक्तियों को ऐसा न करने के लिए दंडित नहीं किया जा सकता है।"  

न्यायमूर्ति एम.एस. रामचंद्र राव  

स्रोत: त्रिपुरा उच्च न्यायालय 

चर्चा में क्यों? 

त्रिपुरा उच्च न्यायालय के न्यायमूर्ति एम.एस. रामचंद्र राव नेसुकेश चंद्र साहा और अन्य बनाम परिमल साहा (2026) के मामलेमें यह माना कि जो वादी तकनीकी रूप से जानकार नहीं हैं - जैसे कि वरिष्ठ नागरिक - उन्हें न्यायालय की वेबसाइट पर अपने मामले की स्थिति का पता लगाने में विफल रहने के लिये दण्डित नहीं किया जा सकता हैऔर इस आधार पर विचारण न्यायालय द्वारा खारिज की गई एक अपील को बहाल कर दिया। 

इस मामले की पृष्ठभूमि क्या थी? 

  • प्रत्यर्थी-वादी ने वाद की अनुसूची में उल्लिखित संपत्ति में अपने अधिकारस्वामित्व और हित की घोषणा के साथ-साथ कब्जे की वसूली की मांग करते हुए एक वाद दायर किया था। 
  • अपीलकर्त्ता-प्रतिवादीजो वरिष्ठ नागरिक थे (जिनमें से एक के बारे में कहा जाता था कि वह मानसिक रूप से अस्वस्थ था)ने इस बात से इंकार किया कि संपत्ति वादी की माताश्रीमती सौदामिनी साहा की थी। 
  • अपीलकर्त्ताओं के अनुसारयह भूमि सरकारी भूमि थीजिस पर उनके पूर्ववर्तीमनोरंजन साहाऔर एक गोपी रंजन चक्रवर्ती का कब्जा थाऔर एक खतियान ने वादी की माता का नाम बताए बिना उन्हें अवैध कब्जेदार के रूप में अभिलिखित किया था। 
  • अपीलकर्त्ताओं के अधिवक्ता ने 19.12.2022 को विचारण न्यायालय में याचिका दायर करके वाद से अपना नाम वापस ले लियाजिसे 01.02.2023 को मंजूर कर लिया गया। 
  • 20.03.2023 को अपीलकर्त्ताओं के विरुद्ध एकपक्षीय आदेश पारित किया गया थाऔर साक्ष्यों पर विचार करने के बादवाद का निर्णय वादी के पक्ष में एवं उसके हक में डिक्री पारित करते हुए किया गया 
  • अपीलकर्त्ताओं ने एकपक्षीय डिक्री को रद्द करने के लिये सिविल प्रक्रिया संहिता के आदेश नियम 13 के अधीन एक आवेदन दायर कियासाथ ही विलंब की माफी के लिये एक आवेदन भी दायर कियाजिसे विचारण न्यायालय ने इस आधार पर खारिज कर दिया कि यह पहले अपीलकर्त्ता के पुत्र के माध्यम से सिविल प्रक्रिया संहिता के आदेश 32 के अधीन एक साथ आवेदन के बिना दायर किया गया था। 
  • विचारण न्यायालय ने यह भी माना कि आदेश आधिकारिक वेबसाइट पर उपलब्ध थेऔर अपीलकर्त्ताओं का लंबे समय तक अनभिज्ञ रहने का दावा वर्तमान डिजिटल युग में मान्य नहीं हैक्योंकि मुकदमेबाजों से उचित सावधानी बरतने की अपेक्षा की जाती है। 
  • इससे असंतुष्ट होकर अपीलकर्त्ताओं ने त्रिपुरा उच्च न्यायालय में द्वितीय अपील दायर की। 

न्यायालय की क्या टिप्पणियां थीं? 

  • वरिष्ठ नागरिकों और डिजिटल पहुँच के संबंध में:न्यायालय ने पाया कि वाद की सुनवाई के दौरान दोनों अपीलकर्त्ता वरिष्ठ नागरिक थेऔर उनमें से एक पर विकृतचित्त होने का आरोप था। न्यायालय ने कहा कि यद्यपि सामान्यत: मुकदमेबाजों से न्यायालय की वेबसाइटों पर अपने मामलों की प्रगति की जांच करने की अपेक्षा की जाती हैलेकिन वरिष्ठ नागरिकों जैसे तकनीकी रूप से कम जानकार व्यक्तियों को ऐसा न करने पर दण्डित नहीं किया जा सकता है। 
  • अपीलकर्त्ताओं के आचरण के संबंध में:न्यायालय ने पाया कि अपीलकर्त्ता परिस्थितियों के शिकार थेन कि विलंबकारी रणनीतिसद्भावना की कमीया जानबूझकर निष्क्रियता या उपेक्षा के दोषी पक्षकार थेयह देखते हुए कि उनके अधिवक्ता ने उन्हें सूचित किये बिना मामले से अपना नाम वापस ले लिया थाजिससे वे इस बात से अनभिज्ञ रह गए थे कि उन्हें एकपक्षीय घोषित कर दिया गया था। 
  • द्वितीय प्रतिवादी के संबंध में विचारण न्यायालय की त्रुटि पर:न्यायालय ने पाया कि इस तथ्य को नजरअंदाज कर दिया गया कि द्वितीय प्रतिवादी जीवित था और स्वयं आवेदन का एक पक्षकार थाजब विचारण न्यायालय ने आदेश 32 सिविल प्रक्रिया संहिता आवेदन के अभाव में आवेदन को खारिज कर दिया। 
  • विधिक प्रतिनिधियों के लिये विलंब को माफ करने की आवश्यकता पर:न्यायालय ने माना कि जिला न्यायाधीश ने यह मानकर गंभीर त्रुटी की थी कि मृतक द्वितीय प्रतिवादी के विधिक प्रतिनिधियों को प्रतिस्थापन आवेदन दाखिल करने में हुई देरी को माफ करने के लिये परिसीमा अधिनियम की धारा के अधीन आवेदन दाखिल करना आवश्यक थाक्योंकि विधि में ऐसी कोई आवश्यकता नहीं थी। 
  • मामले में निहित दांव और विरोध करने के अवसर से वंचित किये जाने के संबंध में:न्यायालय ने पाया कि यह वाद काफी महत्त्वपूर्ण हैक्योंकि यह अचल संपत्ति पर स्वामित्व की घोषणा और कब्जे की वसूली का दावा हैऔर अपीलकर्त्ताओं को मामले के गुणदोष के आधार पर विरोध करने का एक भी अवसर न देना न्याय का घोर उल्लंघन होगा। 
  • अनुतोष प्रदान किये जाने पर:न्यायालय ने विचारण न्यायालय के समक्ष अपीलकर्त्ताओं द्वारा दायर की गई स्वामित्व अपील को बहाल कर दिया और निदेश दिया कि दोनों पक्षकारों को सुनने के बाद चार महीने के भीतर इस पर गुण-दोष के आधार पर निर्णय लिया जाए। अपील मंजूर कर ली गई। 

सिविल प्रक्रिया संहिता के आदेश नियम 13 क्या है? 

सिविल प्रक्रिया संहिता के आदेश नियम 13 - प्रतिवादी के विरुद्ध एकपक्षीय डिक्री को अपास्त करना: 

  • जिस प्रतिवादी के विरुद्ध एकपक्षीय डिक्री पारित की गई हैवह डिक्री पारित करने वाले न्यायालय में इसे अपास्त करने के लिये आवेदन कर सकता है। 
  • अभियुक्त को न्यायालय को दो आधारों में से किसी एक पर संतुष्ट करना होगा: या तो यह कि समन विधिवत तामील नहीं किया गया थाया यह कि वह पर्याप्त हेतुक से सुनवाई में उपस्थित होने से रोका गया था। 
  • यदि न्यायालय संतुष्ट हो जाता हैतो वह खर्चोंन्यायालय में जमा राशि या अन्य किसी भी प्रकार से उचित समझे जाने वाली शर्तों पर निर्णय को अपास्त कर देगा। 
  • डिक्री को अपास्त करने पर न्यायालय वाद की कार्यवाही के लिये एक दिन निर्धारित करेगा। 
  • जहाँ किसी डिक्री को केवल आवेदक प्रतिवादी के विरुद्ध ही अपास्त नहीं किया जा सकता हैवहाँ उसे सभी या किसी अन्य प्रतिवादियों के विरुद्ध भी अपास्त किया जा सकता है। 
  • यदि प्रतिवादी को सुनवाई की तारीख की सूचना थी और उपस्थित होने के लिये पर्याप्त समय दिया गया थातो कोई भी न्यायालय केवल समन की तामील में अनियमितता के आधार पर एकपक्षीय डिक्री को अपास्त नहीं करेगा। 
  • जहाँ किसी एकपक्षीय डिक्री के विरुद्ध अपील को वापसी के अलावा किसी अन्य आधार पर निपटाया गया होवहाँ उस डिक्री को अपास्त करने के लिये इस नियम के अधीन कोई आवेदन नहीं किया जाएगा। 
  • यह नियम न्यायालय को न्याय के हितों को संतुलित करने और प्रक्रिया के दुरुपयोग को रोकने के लिये विवेकाधीन शक्ति प्रदान करता है।