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सिविल कानून
उच्चतम न्यायालय ने मोटर दुर्घटना दावों में आय का आकलन करने के लिये आयकर रिपोर्ट (ITR) के उपयोग पर दिशानिर्देश जारी किये
« »03-Jul-2026
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रश्मिरेखा त्रिपाठी और अन्य बनाम शाखा प्रबंधक (विधिक दावे), श्रीराम जनरल इंश्योरेंस कंपनी लिमिटेड और अन्य "वार्षिक आय के आकलन के संबंध में वेतनभोगी व्यक्तियों और स्व-रोजगार वाले व्यक्तियों के बीच एक स्पष्ट विभाजन किया जाना चाहिये।" न्यायमूर्ति संजय करोल और न्यायमूर्ति नोंगमेइकापम कोटिस्वर सिंह |
स्रोत: उच्चतम न्यायालय
चर्चा में क्यों?
न्यायमूर्ति संजय करोल और न्यायमूर्ति नोंगमेइकापम कोटिश्वर सिंह की पीठ ने रश्मिरेखा त्रिपाठी और अन्य बनाम शाखा प्रबंधक (विधिक दावे), श्रीराम जनरल इंश्योरेंस कंपनी लिमिटेड और अन्य (2026) के मामले में मोटर दुर्घटना प्रतिकर के दावों के निर्धारण के लिये मृतक की वार्षिक आय की गणना के तरीके में एकरूपता लाने के लिये दिशानिर्देश निर्धारित किये, जिसमें वेतनभोगी कर्मचारियों और स्व-नियोजित व्यक्तियों के आयकर विवरण के उपचार के बीच अंतर किया गया।
इस मामले की पृष्ठभूमि क्या थी?
- उच्चतम न्यायालय के समक्ष दायर अपीलों का यह समूह मोटर यान अधिनियम, 1988 के अधीन तीन अलग-अलग मोटर दुर्घटना मुआवजे के दावों से संबंधित है, जहाँ मुख्य विवाद प्रतिकर की गणना के लिये मृतक व्यक्तियों की वार्षिक आय का आकलन करने की उचित विधि से संबंधित था।
- तीनों ही मामलों में मृतक स्व-रोजगार वाले व्यक्ति थे जिनकी आय आयकर रिटर्न (ITR) में दर्ज थी।
- मोटर दुर्घटना दावा अधिकरणों (MACTs) और संबंधित उच्च न्यायालयों ने वार्षिक आय निर्धारित करने के लिये अलग-अलग तरीके अपनाए थे - कुछ नवीनतम आयकर रिटर्न पर निर्भर थे, जबकि अन्य दो या अधिक वर्षों के रिटर्न का औसत निकालते थे - जिसके परिणामस्वरूप मामलों में प्रतिकर के पंचाटों में असंगति आई।
- इस मुद्दे की बार-बार होने वाली प्रकृति और देश भर के अधिकरणों द्वारा अपनाए गए भिन्न-भिन्न दृष्टिकोणों को ध्यान में रखते हुए, उच्चतम न्यायालय ने निर्धारण के लिये निम्नलिखित प्रश्न निर्धारित किया: क्या मोटर यान अधिनियम, 1988 के अधीन किसी मृतक व्यक्ति या दावेदार की वार्षिक आय का आकलन करने के लिये पिछले वर्ष का आयकर विवरण (ITR) उपयुक्त है, या पिछले दो/तीन वर्षों के आयकर विवरणों का औसत ध्यान में रखा जाना चाहिये।
- इस मामले में वरिष्ठ अधिवक्ता जे.आर. मिधा और अधिवक्ता सलिल पॉल को एमिकस क्यूरी (न्यायालय का मित्र) नियुक्त किया गया था।
न्यायालय की क्या टिप्पणियां थीं?
- विभाजन की आवश्यकता पर: न्यायालय ने माना कि वेतनभोगी और स्व-रोजगार वाले व्यक्तियों पर एक समान पद्धति लागू नहीं की जा सकती है, और एमिकस क्यूरी के सुझाव से सहमत हुआ कि दोनों श्रेणियों पर अलग-अलग विचार लागू होने चाहिये।
- वेतनभोगी कर्मचारियों के संबंध में: न्यायालय ने पाया कि नवीनतम आयकर रिपोर्ट में सामान्यत: पदोन्नति, वेतन वृद्धि और दुर्घटना से ठीक पहले का प्रचलित वेतन दर्शाया जाता है, और पूर्ववर्ती मूल्यांकन वर्ष की आयकर रिपोर्ट से सामान्यत: आय क्षमता का सबसे सटीक आकलन प्राप्त होता है। न्यायालय ने स्पष्ट किया कि यदि मृतक या दावेदार ने दुर्घटना से पहले पदोन्नत पद पर एक वर्ष पूरा नहीं किया था, या ऐसी अवधि के लिये आयकर रिपोर्ट दाखिल नहीं की थी, तो अधिकरण को पदोन्नति पत्र और अन्य सहायक वित्तीय विवरणों का संदर्भ लेना होगा।
- स्वरोजगार व्यक्तियों के संबंध में: न्यायालय ने माना कि "नवीनतम आयकर विवरण" पद्धति स्वरोजगार व्यक्तियों के लिये उपयुक्त नहीं हो सकती है, क्योंकि बाजार की स्थितियों, व्यावसायिक चक्रों और निवेश के रुझानों के कारण उनकी आय में अक्सर उतार-चढ़ाव होता रहता है। न्यायालय ने निदेश दिया कि पिछले तीन वर्षों तक के आयकर विवरणों में निर्दिष्ट आय का औसत वार्षिक आय निर्धारण के लिये संदर्भ बिंदु माना जाए।
- स्व-रोजगार व्यक्तियों के लिये आसपास की परिस्थितियों के संबंध में: न्यायालय ने कहा कि ऐसे परिदृश्यों में जहाँ केवल एक या दो आयकर रिटर्न दाखिल किये गए हों, या जहाँ आय में काफी उतार-चढ़ाव हो, वहाँ निम्नलिखित आसपास की परिस्थितियों को भी ध्यान में रखा जाना चाहिये:
- व्यवसाय की प्रकृति, जिसमें उसका भौगोलिक स्थान और श्रेणी शामिल है;
- व्यवसाय की विकास दर और मृत्यु का व्यवसाय पर पड़ने वाला प्रभाव;
- व्यवसाय की संभावित वृद्धि, क्योंकि कुछ व्यवसाय शुरुआत में पूंजी-प्रधान होते हैं और केवल बड़े पैमाने पर या भविष्य में ही लाभदायक बनते हैं;
- नकारात्मक आय, क्योंकि कुछ व्यवसायों को शुरुआती वर्षों में नुकसान उठाना पड़ सकता है जो उनकी वास्तविक वित्तीय स्थिति को प्रतिबिंबित नहीं करता है; और
- व्यवसाय से संबंधित कोई अन्य प्रासंगिक कारक।
- मामले के निपटारे पर: ऊपर वर्णित विधि को लागू करते हुए, न्यायालय ने तीनों अपीलों में दिये गए प्रतिकर में संशोधन किया।
सुसंगत सांविधिक ढाँचा क्या है?
मोटर यान अधिनियम, 1988:
- मोटर यान अधिनियम, 1939 के स्थान पर, यह अधिनियम 1 जुलाई 1989 को लागू हुआ।
- इस अधिनियम में चालकों/कंडक्टरों के लाइसेंस, मोटर वाहनों के रजिस्ट्रीकरण, परमिट के माध्यम से मोटर वाहनों के नियंत्रण, राज्य परिवहन उपक्रमों से संबंधित विशेष प्रावधान, यातायात विनियमन, बीमा, दायित्त्व, अपराध और दण्ड आदि के संबंध में विस्तृत विधायी प्रावधान दिये गए हैं।
मोटर यान (संशोधन) अधिनियम, 2019:
- यह अधिनियम 1 सितंबर 2019 से प्रभावी हुआ।
- यह अधिनियम गोल्डन आवर को किसी आघातजन्य चोट के बाद एक घंटे तक की उस अवधि के रूप में परिभाषित करता है, जिसके दौरान शीघ्र चिकित्सा देखरेख के माध्यम से मृत्यु को रोकने की संभावना सबसे अधिक होती है।
- यह अधिनियम हिट एंड रन मामलों में न्यूनतम प्रतिकर को निम्नानुसार बढ़ाता है:
- मृत्यु होने की स्थिति में, 25,000 रुपए से लेकर दो लाख रुप तएक का प्रतिकर दिया जा सकता है।
- गंभीर क्षति की स्थिति में, 12,500 रुपए से लेकर 50,000 रुपए तक का प्रतिकर दिया जा सकता है।
- इसके अधीन केंद्र सरकार को मोटर यान दुर्घटना कोष गठित करने की आवश्यकता है, जिससे भारत में सभी सड़क उपयोगकर्त्ताओं को अनिवार्य बीमा कवर प्रदान किया जा सके।
- यह केंद्र सरकार को उन मोटर यानों को वापस मंगाने का आदेश देने की अनुमति देता है यदि वाहन में कोई खराबी पर्यावरण, चालक या अन्य सड़क उपयोगकर्त्ताओं को नुकसान पहुँचा सकती है।
- इसमें केंद्र सरकार द्वारा अधिसूचना के माध्यम से गठित किये जाने वाले राष्ट्रीय सड़क सुरक्षा बोर्ड का प्रावधान है।
- इस अधिनियम में एग्रीगेटरों को डिजिटल मध्यस्थों या बाज़ार स्थानों के रूप में परिभाषित किया गया है जिनका उपयोग यात्री परिवहन उद्देश्यों (टैक्सी सेवाओं) के लिये चालक से जुड़ने के लिये कर सकते हैं। इन एग्रीगेटरों को राज्य द्वारा लाइसेंस जारी किये जाएंगे।
- इस अधिनियम के अधीन कई अपराधों के लिये दण्ड बढ़ाया गया है। उदाहरण के लिये, शराब या नशीली दवाओं के प्रभाव में गाड़ी चलाने पर अधिकतम जुर्माना 2,000 रुपए से बढ़ाकर 10,000 रुपए कर दिया गया है।
केंद्रीय मोटर यान नियम, 2022:
- ये नियम 1 अप्रैल 2022 से लागू हो गए हैं।
- नए नियम दिल्ली उच्च न्यायालय द्वारा 8 जनवरी 2021 को राजेश त्यागी बनाम जयबीर सिंह के मामले में दिये गए निर्णय में तैयार की गई योजना पर आधारित हैं।
- उपर्युक्त नियमों में मोटर दुर्घटना दावों की शीघ्र अन्वेषण और निर्णय के लिये एक नई प्रक्रिया निर्धारित की गई है।
- इन नियमों के अधीन सभी मोटर दुर्घटना दावों के अन्वेषण और निपटारे के लिये छह महीने से एक वर्ष की समय सीमा निर्धारित की गई है।
- उन्होंने मोटर दुर्घटना प्रतिकर के विधिशास्त्र में क्रांति ला दी है क्योंकि दावेदारों को दुर्घटना के एक वर्ष के भीतर प्रतिकर मिल जाएगा।