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आपराधिक कानून

दण्ड प्रक्रिया संहिता की धारा 465

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 02-Jul-2026

चंद्रिकाबेन किशोर दफड़ा बनाम गुजरात राज्य एवं अन्य 

"विधि का सुस्थापित सिद्धांत यह है कि यदि किसी न्यायालय द्वारा किसी अपराध का संज्ञान गलत धारा के अंतर्गत ले लिया जाता हैतो ऐसी त्रुटि वस्तुतः एक उपचार योग्य दोष हैबशर्ते कि उस न्यायालय को उन अन्य धाराओं के अंतर्गत भी अपराध का संज्ञान लेने की विधिक अधिकारिता प्राप्त हो।" 

न्यायमूर्ति संजय करोल और न्यायमूर्ति नोंगमेइकापम कोटिस्वर सिंह 

स्रोत: उच्चतम न्यायालय 

चर्चा में क्यों? 

न्यायमूर्ति संजय करोल और न्यायमूर्ति नोंगमेइकापम कोटिश्वर सिंह की पीठ नेचंद्रिकाबेन किशोर दफड़ा बनाम गुजरात राज्य और अन्य (2026) के मामलेमें यह निर्णय दिया कि किसी मजिस्ट्रेट द्वारा गलत सांविधिक प्रावधान के अधीन संज्ञान लेने की त्रुटी मात्र एक अनियमितता है जिसेदण्ड प्रक्रिया संहिता की धारा 465 (भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता की धारा 511)के अधीन सुधारा जा सकता हैबशर्ते कि मजिस्ट्रेट के पास सही प्रावधान के अधीन संज्ञान लेने की अधिकारिता हो। 

चंद्रिकाबेन किशोर दफड़ा बनाम गुजरात राज्य और अन्य (2026) के मामले की पृष्ठभूमि क्या थी? 

  • अपीलकर्त्ता ने 2015 के भुज नगर निकाय चुनाव में पार्षद का चुनाव जीता था। 
  • यह आरोप लगाया गया था कि अपीलकर्त्ता ने गुजरात नगरपालिका (चुनाव संचालन) नियम, 1994 के नियम 7क के अधीन दायर चुनावी शपथपत्र में अपने पति के स्वामित्व वाली चार कृषि संपत्तियों का प्रकटीकरण नहीं किया था। 
  • भारतीय दण्ड संहिता की धारा 192, 193 और 196 के साथ-साथ लोक प्रतिनिधित्व अधिनियम, 1951 की धारा 125क के अधीन अपराध किये जाने का आरोप लगाते हुए एक निजी परिवाद दर्ज किया गया था 
  • यद्यपिमजिस्ट्रेट ने केवल लोक प्रतिनिधित्व अधिनियम की धारा 125क के अधीन संज्ञान लिया और अपीलकर्त्ता को समन जारी किया। 
  • अपीलकर्त्ता ने संज्ञान आदेश को रद्द करने की मांग करते हुए गुजरात उच्च न्यायालय का रुख कियालेकिन उच्च न्यायालय ने हस्तक्षेप करने से इंकार कर दिया। 
  • उच्चतम न्यायालय के समक्षअपीलकर्त्ता ने तर्क दिया कि मजिस्ट्रेट ने लोक प्रतिनिधित्व अधिनियम के अधीन संज्ञान लेने में त्रुटी कीक्योंकि यह अधिनियम संसद और राज्य विधानमंडलों के निर्वाचन से संबंधित विवादों को नियंत्रित करता है और नगरपालिका चुनावों तक विस्तारित नहीं होता है। 

न्यायालय की क्या टिप्पणियां थीं? 

  • लोक प्रतिनिधित्व अधिनियम लागू करने में त्रुटि के संबंध में:न्यायालय ने अपीलकर्त्ता से सहमति व्यक्त की कि मजिस्ट्रेट ने लोक प्रतिनिधित्व अधिनियम की धारा 125क के अधीन संज्ञान लेने में त्रुटी की थीक्योंकि उक्त अधिनियम नगरपालिकाओं के लिये आयोजित चुनावों पर लागू नहीं होता है।  
  • दोष के निवारण के संबंध में:न्यायालय ने माना कि यद्यपि मजिस्ट्रेट ने गलत सांविधिक प्रावधान का प्रयोग कियालेकिन इससे पूरी कार्यवाही शून्य नहीं हो जातीक्योंकि मजिस्ट्रेट के पास अन्य प्रावधानों (भारतीय दण्ड संहिता की धारा 192, 193 और 196) के अधीन संज्ञान लेने की शक्ति बरकरार रहती हैजो परिवाद का भी भाग थे। 
  • धारा 465 दण्ड प्रक्रिया संहिता के दायरे पर:न्यायालय ने दोहराया कि संज्ञान किसी अपराध का लिया जाता हैन कि किसी विशेष सांविधिक प्रावधान काऔर लागू दण्डात्मक धारा का उल्लेख करने में त्रुटि कार्यवाही को अमान्य नहीं करती जब तक कि इसके परिणामस्वरूप न्याय में विफलता न हो। 
  • वर्तमान मामले में धारा 465 दण्ड पक्रिया संहिता की प्रयोज्यता के संबंध में:यह देखते हुए कि निजी परिवादकर्त्ता ने भारतीय दण्ड संहिता के प्रावधानों का भी सहारा लिया थान्यायालय ने माना कि विचारण न्यायाधीश द्वारा उन प्रावधानों के अधीन संज्ञान न लेना धारा 465 दण्ड प्रक्रिया संहिता द्वारा संरक्षित एक अनियमितता थीऔर अपीलकर्त्ता के इस तर्क पर राज्य की दलील से सहमत होते हुए कि त्रुटि अधिकारिता संबंधी थी और मामले की जड़ तक जाती थी। 
  • अनुतोष मिलने पर:मामले को संबंधित मजिस्ट्रेट के पास पुनः संज्ञान लेने और विधि के अनुसार कार्यवाही करने के लिये वापस भेज दिया गया। 
  • निर्णय के सीमित दायरे के संबंध में:न्यायालय ने स्पष्ट किया कि उसने मामले की खूबियों पर कोई राय व्यक्त नहीं की हैऔर चर्चा संज्ञान आदेश की उपयुक्तता का निर्णय करने तक ही सीमित थी। 

भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता की धारा 511 क्या है? 

भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता की धारा 511 – निष्कर्षया दण्डादेश कब गलती, लोप या अनियमितता के कारण उलटने योग्य होगा 

  • (पूर्ववर्ती दण्ड प्रक्रिया संहिता की धारा 465 के अनुरूप) 
  • भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता, 2023 की धारा 511 यह उपबंधित करती है कि सक्षम अधिकारिता वाले न्यायालय द्वारा पारित किसी निष्कर्षदण्डादेश अथवा आदेश को केवल इस आधार पर कि कार्यवाही में कोई त्रुटिलोप अथवा अनियमितता हुई हैअपीलीयपुष्टिकरण अथवा पुनरीक्षण न्यायालय द्वारा उलटापरिवर्तित या संशोधित नहीं किया जाएगा 
  • उपधारा (1) के अंतर्गत आने वाली त्रुटिलोप या अनियमितता निम्नलिखित में हो सकती है: परिवादसमनवारण्टउद्घोषणाआदेशनिर्णय या अन्य कार्यवाहीविचारण से पहले या उसके दौरानसंहिता के अंतर्गत कोई जांच या अन्य कार्यवाहीया अभियोजन के लिये कोई मंजूरी। 
  • इस प्रकार का उलटफेर या परिवर्तन तब तक वर्जित है जब तक कि न्यायालय की यह राय न हो कि त्रुटिलोप या अनियमितता वास्तव में न्याय की विफलता का कारण बनी है। 
  • उपधारा (2) "न्याय की विफलता" निर्धारित करने के लिये परीक्षण निर्धारित करती है – न्यायालय को इस बात पर विचार करना होगा कि त्रुटिलोप या अनियमितता पर आक्षेप कार्यवाही के प्रथम प्रक्रम में उठाई जा सकती थी और उठाई जानी चाहिये थी। 
  • इस प्रकार यह उपबंध इस सिद्धांत को दर्शाता है कि प्रक्रियात्मक चूकेंजिनसे किसी पक्षकार को वास्तविक रूप से कोई नुकसान नहीं होता हैन्याय के मूल तत्त्व को विफल करने की अनुमति नहीं दी जानी चाहिये 
  • यह सामान्य कार्यवाही में अनियमितताओं और अभियोजन के लिये मंजूरी में खामियों दोनों पर लागू होता हैऔर दोनों को "न्याय की विफलता" के समान मानक के अधीन माना जाता है। 

नोट:भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता की धारा 511 सारतः दण्ड प्रक्रिया संहिता, 1973 की धारा 465 के समान हैभाषा या दायरे में कोई महत्त्वपूर्ण परिवर्तन नहीं हुआ है - केवल नई संहिता के अधीन पुनः क्रमांकन किया गया है।