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सिविल कानून

करार की तारीख से ही तत्परता और इच्छाशक्ति साबित करनी होगी

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 24-Jun-2026

मोहम्मद खलील (मृतविधिक प्रतिनिधि और अन्य बनाम जयम्मा 

"तत्परता और 'इच्छुकताके दोहरे सांविधिक आदेश को ध्यान में रखते हुएअपीलकर्त्ता न केवल अपनी तत्परता और इच्छुकता को प्रदर्शित करने में असफल रहेअपितु वे न्यायालय में शीघ्रता से पहुँचने में भी असफल रहेजो उन्हें विनिर्दिष्ट पालन का न्यायसंगत अनुतोष प्रदान करने से वंचित करता है। 

न्यायमूर्ति प्रशांत कुमार मिश्रा और न्यायमूर्ति एन.वी. अंजारिया 

स्रोत: उच्चतम न्यायालय 

चर्चा में क्यों? 

मोहम्मद खलील (मृतविधिक प्रतिनिधि और अन्य बनाम जयम्मा (2026)के मामले में न्यायमूर्ति प्रशांत कुमार मिश्रा और न्यायमूर्ति एन.वी. अंजारी की पीठ नेकर्नाटक उच्च न्यायालय द्वारा विनिर्दिष्ट पालन के लिये विचारण न्यायालय के निर्णय को पलटने को चुनौती देने वाली अपील को खारिज कर दियायह मानते हुए कि वादी सुसंगत तिथि से विक्रय के करार का पालन करने के लिये निरंतर तत्परता और इच्छाशक्ति स्थापित करने में असफल रहा था। 

  • न्यायालय ने आगे कहा कि न्यायालय में याचिका दायर करने में अस्पष्ट विलंबभले ही वह निर्धारित परिसीमा के भीतर होविनिर्दिष्ट पालन की विवेकाधीन अनुतोष प्रदान करते समय एक सुसंगत विचारणीय बिंदु है। 

मोहम्मद खलील (मृतविधिक प्रतिनिधि और अन्य बनाम जयम्मा (2026) के मामले की पृष्ठभूमि क्या थी? 

  • यह विवाद 20 दिसंबर, 1990 को अपीलकर्त्ता और प्रत्यर्थी के बीच मैसूर में एक खाली भूखंड के संबंध में लाख रुपए के कुल विक्रय मूल्य पर निष्पादित विक्रय करार से उत्पन्न हुआ। करार पर हस्ताक्षर के समय 25,000 रुपए की अग्रिम राशि का भुगतान किया गया थाऔर शेष 2.75 लाख रुपए का भुगतान रजिस्ट्रीकरण के समय किया जाना था। 
  • करार में संव्यवहार को पूरा करने के लिये चार महीने की अवधि निर्धारित की गई थी। 
  • प्रतिवादी ने करार को रद्द कर दियाजिसके बाद वादी ने दिसंबर 1993 मेंकरार को रद्द करने के लगभग दो वर्ष और नौ महीने बादविनिर्दिष्ट पालन के लिये एक वाद संस्थित किया। 
  • विचारण न्यायालय ने वर्ष 2002 में वाद के पक्ष में डिक्री पारित की थी। तथापिकर्नाटक उच्च न्यायालय ने वर्ष 2009 में उक्त डिक्री को पलटते हुए यह अभिधारित किया कि वादी अपने संविदात्मक दायित्वों के निर्वहन हेतु निरंतर तत्परता एवं इच्छुकता सिद्ध करने में विफल रहा है। उच्च न्यायालय के इस निर्णय एवं आदेश को उच्चतम न्यायालय के समक्ष चुनौती दी गई 
  • उच्चतम न्यायालय के समक्षअपीलकर्त्ताओं ने यह तर्क दिया कि उनके पास संव्यवहार पूरा करने के लिये पर्याप्त वित्तीय क्षमता थीऔर उन्होंने 70,000 रुपए मूल्य की चार सावधि जमा रसीदों (FDRs) का हवाला दियाजिनका कुल योग 2.80 लाख रुपए था। 

न्यायालय की क्या टिप्पणियां थीं? 

  • सुसंगत अवधि के संदर्भ में वित्तीय तत्परता साबित करने के संबंध में: 
    न्यायालय ने माना कि यद्यपि वादी के लिये न्यायालय में प्रतिफल राशि भौतिक रूप से जमा करना आवश्यक नहीं थाफिर भी सुसंगत समय पर (अर्थात् करार की तिथि से लेकर वाद दायर करने की तिथि तक) पर्याप्त धनराशि की उपलब्धता दर्शाने के लिये विश्वसनीय और स्वीकार्य साक्ष्य प्रस्तुत किये जाने चाहिये। न्यायालय ने पाया कि ऐसा कोई प्रमाण नहीं था जिससे यह सिद्ध हो कि वादी के पास करार पर हस्ताक्षर के समयपालन के लिये निर्धारित चार महीने की अवधि के भीतरया यहाँ तक कि 1993 में वाद दायर करने के समय भी शेष विक्रय राशि उपलब्ध थी। 
  • वित्तीय क्षमता के सबूत के रूप में सावधि जमा रसीदों (FDRs) की अस्वीकृति पर: 
    न्यायालय ने पाया कि अपीलकर्त्ताओं द्वारा प्रस्तुत किये गए चार FDRs 4 अक्टूबर, 1999, 22 नवंबर, 1999, 3 अप्रैल, 2001 और 23 अगस्त, 2001 को जारी किये गए थे - ये सभी 20 दिसंबर, 1993 को वाद संस्थित किये जाने के कई वर्षों बाद बनाए गए थे। इसलिये न्यायालय ने माना कि ये FDRs संबंधित अवधि के दौरान अपीलकर्त्ताओं की वित्तीय तत्परता को स्थापित नहीं कर सकते। 
  • वाद दायर करने में विलंब के संबंध में: 
    न्यायालय ने माना कि प्रतिवादी द्वारा करार को रद्द करने के बाद वाद दायर करने में लगभग दो वर्ष नौ महीने की अस्पष्ट देरी स्वयं वादी की संविदा के अपने भाग को निभाने की निरंतर तत्परता और इच्छा की कमी को दर्शाती है। न्यायालय ने कहा कि यद्यपि परिसीमा अवधि के भीतर दायर किया गया वाद वर्जित नहीं हैफिर भी बिना स्पष्टीकरण के विलंबविनिर्दिष्ट पालन का न्यायसंगत और विवेकाधीन अनुतोष प्रदान करते समय एक सुसंगत विचारणीय बिंदु बना रहता हैऔर ऐसा आचरण वादी को उक्त अनुतोष से वंचित कर देता है। 

विनिर्दिष्ट पालन क्या है? 

  • विनिर्दिष्ट पालन न्यायालय द्वारा पक्षकारों के बीच संविदात्मक प्रतिबद्धताओं को बनाए रखने के लिये प्रदान किया गया एक न्यायसंगत उपचार  है। 
  • क्षतिपूर्ति के दावे के विपरीतजिसमें संविदात्मक शर्तों के गैर-अनुपालन के लिये प्रतिकर की मांग शामिल होती हैविनिर्दिष्ट पालन एक ऐसे उपचार के रूप में कार्य करता है जो पक्षकारों के बीच सहमत शर्तों को लागू करता है। 
  • यह विनिर्दिष्ट अनुतोष अधिनियम, 1963 (SRA) द्वारा शासित है। 
  • विनिर्दिष्ट अनुतोष अधिनियम की धारा 10संविदाओं के विनिर्दिष्ट पालन से संबंधित है। इसमें कहा गया है कि: 
    • किसी संविदा का विनिर्दिष्ट पालन न्यायालय द्वारा धारा 11 की उपधारा (2), धारा 14 और धारा 16 में निहित उपबंधों के अधीन लागू किया जाएगा।  
  • उच्चतम न्यायालय नेकट्टा सुजाता रेड्डी बनाम सिद्दामसेट्टी इंफ्रा प्रोजेक्ट्स (पी.) लिमिटेड (2023) के मामलेमें यह माना कि विनिर्दिष्ट पालन का अनुतोष केवल तभी दिया जा सकता है जब ऐसे अनुतोष का दावा करने वाला पक्षकार संविदा के अधीन अपने दायित्त्वों को पूरा करने के लिये अपनी तत्परता और इच्छाशक्ति दिखाता है। 

विनिर्दिष्ट पालन से संबंधित महत्वपूर्ण निर्णय क्या हैं? 

  • परम पूज्य आचार्य स्वामी गणेशदासजी बनाम सीताराम अपार (1996): 
    • उच्चतम न्यायालय ने 'तत्परताऔर 'इच्छाशक्तिके बीच अंतर स्पष्ट किया। 
    • 'तत्परतासे तात्पर्य वादी की वित्तीय क्षमता और संविदा को पूरा करने की योग्यता से हैजबकि 'इच्छाशक्तिका संबंध वादी के आचरण और संविदात्मक दायित्त्वों को पूरा करने के आशय से है। 
  • मान कौर बनाम हरतार सिंह संघा (2010): 
    • उच्चतम न्यायालय ने यह अभिनिर्धारित किया कि यदि प्रतिवादी ने संविदा का भंग किया हैतब भी वादी विनिर्दिष्ट पालन के लिये डिक्री प्राप्त नहीं कर सकता है यदि वादी संविदात्मक दायित्त्वों के अपने भाग को पूरा करने के लिये निरंतर तत्परता और इच्छाशक्ति को साबित करने में असफल रहता है। 
  • सारदामणि कंदप्पन बनाम एस. राजलक्ष्मी (2011): 
    • उच्चतम न्यायालय ने कहा कि रियल एस्टेट की कीमतों में भारी वृद्धि के साथयदि क्रेता विक्रेता की ओर से उचित कारण बताए बिना संदाय में विलंब करता है तो विनिर्दिष्ट पालन प्रदान करना अनुचित हो जाता है। 
    • ऐसे मामलों में न्यायालयों को अधिक गहन जांच-पड़ताल करने की आवश्यकता होती है। 
  • राजेश कुमार बनाम आनंद कुमार (2024): 
    • इस निर्णय में पावर ऑफ अटॉर्नी धारक द्वारा दिये गए परिसाक्ष्य के साक्ष्य मूल्य से संबंधित मुद्दे पर विचार किया गया। 
    • न्यायालय ने निर्णय दिया कि पावर ऑफ अटॉर्नी धारक किसी पक्षकार की ओर से साक्षी नहीं बन सकता और संविदा को पूरा करने के लिये उस पक्षकार की तत्परता और इच्छाशक्ति को साबित करने के लिये साक्ष्य नहीं दे सकता।