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दंड विधि
विद्युताघात से हुई मृत्यु के लिये विद्युत वितरण कंपनी पूर्णतः उत्तरदायी है
«18-Jun-2026
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गुजरात एनर्जी ट्रांसमिशन कंपनी लिमिटेड बनाम नानीबा विधवा गेमरसिंह रूपसिंह सोढ़ा और अन्य "घटना को रोकने के लिये सभी तारों को इन्सुलेट करके रखना अपीलकर्त्ता - गेटको का दायित्त्व है। यदि कोई घटना घटती है, तो पूर्ण दायित्त्व का सिद्धांत लागू होगा।" न्यायमूर्ति जे.सी. दोशी |
स्रोत: गुजरात उच्च न्यायालय
चर्चा में क्यों?
गुजरात उच्च न्यायालय के न्यायमूर्ति जे.सी. दोशी की एकल पीठ ने गुजरात एनर्जी ट्रांसमिशन कंपनी लिमिटेड बनाम नानीबा विधवा गेमरसिंह रूपसिंह सोढ़ा और अन्य (2026) के मामले में अपील खारिज करते हुए निर्णय दिया कि खतरनाक पदार्थ के संचरण का व्यवसाय करने वाली बिजली कंपनी किसी जीवित तार के आकस्मिक संपर्क से मारे गए व्यक्ति को प्रतिकर देने के लिये पूर्णतः उत्तरदायी है और मृतक पर उपेक्षा का आरोप लगाकर अपनी प्रतिरक्षा नहीं कर सकती है।
गुजरात एनर्जी ट्रांसमिशन कंपनी लिमिटेड बनाम नानीबा विधवा गेमरसिंह रूपसिंह सोढ़ा और अन्य (2026) के मामले की पृष्ठभूमि क्या थी?
- GETCO ने विचारण न्यायालय द्वारा 31.1.2012 को पारित एक निर्णय और डिक्री को चुनौती दी थी, जिसमें उसे गेमरसिंह सोढ़ा की मृत्यु के प्रतिकर के रूप में 9,40,000 रुपए के साथ-साथ वाद दायर करने की तारीख से वसूली तक 9% वार्षिक ब्याज का भुगतान करने का निदेश दिया गया था।
- मृतक, जो एक मालधारी (पशुपालक) के रूप में काम करता था, अपनी भेड़-बकरियों के साथ एक इलाके से गुजर रहा था, तभी वह एक खुले ट्यूबवेल के पास पहुँचा। तेज हवा के कारण, वह एक पेड़ की शाखाओं से गुजर रही 66 KV बिजली की लाइन के संपर्क में आ गया और उसे करंट लग गया, जिसके परिणामस्वरूप उसकी मृत्यु हो गई।
- GETCO ने उच्च न्यायालय के समक्ष यह तर्क दिया कि विचारण न्यायालय ने उस पर दायित्त्व थोपने में त्रुटी की है, यह कहते हुए कि दुर्घटना मृतक की अपनी उपेक्षा के कारण हुई थी और यदि उसने उचित सावधानी बरती होती तो इस दुर्घटना को टाला जा सकता था।
न्यायालय की क्या टिप्पणियां थीं?
पूर्ण दायित्त्व के सिद्धांत पर:
- न्यायालय ने निर्णय दिया कि जब किसी विद्युत लाइन के माध्यम से संचारित ऊर्जा किसी ऐसे व्यक्ति को क्षति पहुँचाती है या उसकी मृत्यु का कारण बनती है जो अनजाने में इसके संपर्क में आता है, तो पीड़ित को प्रतिकर देने का प्राथमिक दायित्त्व पूर्ण दायित्त्व के सिद्धांत के अनुसार बिजली कंपनी का होता है। न्यायालय ने कहा कि तारों के माध्यम से संचारित बिजली संभावित रूप से खतरनाक होती है, और बिजली कंपनी का यह कर्त्तव्य है कि वह इसके रिसाव को रोकने या यह सुनिश्चित करने के लिये सभी सुरक्षा उपाय करे कि तार मनुष्यों को जोखिम में न डालें।
कठोर दायित्त्व और उपेक्षा के बीच अंतर पर:
- न्यायालय ने स्पष्ट किया कि इस प्रकार के दायित्त्व का आधार क्रियाकलाप की प्रकृति में निहित पूर्वानुमानित जोखिम है। इस प्रकार का दायित्त्व, जिसे विधि में "कठोर दायित्त्व" कहा जाता है, अवधारणात्मक रूप से उपेक्षा से उत्पन्न दोष-आधारित दायित्त्व से भिन्न है। जबकि उपेक्षा यह मानती है कि उचित सावधानियों के माध्यम से पूर्वानुमानित नुकसान से बचा जा सकता था, कठोर और पूर्ण दायित्त्व दोष के सबूत या किसी प्रतिरक्षा की उपलब्धता पर निर्भर नहीं करता है।
एम.सी. मेहता बनाम भारत संघ मामले पर निर्भरता के संबंध में:
- न्यायालय ने एम.सी. मेहता बनाम भारत संघ (1987) के मामले में उच्चतम न्यायालय के निर्णय पर विश्वास किया, जिसमें रायलैंड्स बनाम फ्लेचर (1868) में निर्धारित कठोर दायित्त्व के सिद्धांत को विस्तारित किया गया और खतरनाक क्रियाकलापों में लगे उद्यमों के लिये बिना किसी अपवाद के पूर्ण दायित्त्व के स्तर तक ले जाया गया।
खतरनाक पदार्थों का कारोबार करने वाली कंपनी के रूप में GETCO की स्थिति पर:
- न्यायालय ने पाया कि बिजली की बिक्री और संचरण के व्यवसाय में संलग्न होने के कारण, जो कि एक खतरनाक उत्पाद है, GETCO's सह-उपेक्षा की प्रतिरक्षा करके दायित्त्व से बच नहीं सकता। न्यायालय ने यह माना कि परस्पर विरोधी दलीलों के गुण-दोषों में जाए बिना, GETCO द्वारा खतरनाक पदार्थ का व्यापार करना ही पूर्ण दायित्त्व के सिद्धांत को आकर्षित करता है, जिसके अधीन उसे अपने क्रियकलाप के कारण हुई मृत्यु के लिये प्रतिकर देना अनिवार्य है।
- इन सिद्धांतों को लागू करते हुए, न्यायालय ने GETCO की अपील को खारिज कर दिया और विचारण न्यायालय द्वारा दिए गए प्रतिकर के निर्णय को बरकरार रखा।
कठोर दायित्त्व और पूर्ण दायित्त्व क्या हैं?
बारे में:
- अपकृत्य संबंधी विधि में सामान्यत: उपेक्षा का सबूत आवश्यक होता है, लेकिन कुछ स्वाभाविक रूप से खतरनाक क्रियाकलाप त्रुटी की परवाह किये बिना दायित्त्व को आकर्षित करती हैं।
- इस संबंध में दो सिद्धांत लागू होते हैं: कठोर दायित्त्व और पूर्ण दायित्त्व।
कठोर दायित्त्व – उत्पत्ति:
- इस सिद्धांत की उत्पत्ति रायलैंड्स बनाम फ्लेचर (1868) के मामले में हुई, जहाँ एक मिल स्वामी के जलाशय का पानी पुरानी खदान की सुरंगों से रिसकर पास की कोयले की खदान में भर गया था।
- न्यायमूर्ति ब्लैकबर्न ने कहा कि जो कोई भी अपनी भूमि पर ऐसी कोई चीज लाता है जिससे यदि वह निकल जाए तो नुकसान होने की संभावना है, उसे, उसे अपने जोखिम पर रखना होगा और उसके निकलने के स्वाभाविक परिणामों के लिये वह उत्तरदायी होगा।
- यद्योई शुरू में इसे "पूर्ण दायित्त्व" कहा गया था, लेकिन विनफील्ड ने बाद में इसे "कठोर दायित्त्व" नाम दिया क्योंकि इस नियम में अपवाद थे।
आवश्यक तत्त्व:
- दो शर्तें पूरी होनी चाहिये: खतरनाक पदार्थ प्रतिवादी की भूमि से निकलकर उनके नियंत्रण से बाहर चला जाए (भोपाल गैस त्रासदी इसका उदाहरण है, जहाँ मिथाइल आइसोसाइनेट कारखाने के परिसर से बाहर लीक हो गया था), और भूमि का उपयोग अप्राकृतिक तरीके से किया जाए, जिसका अर्थ है एक असामान्य क्रियाकलाप जो सामान्य या सामुदायिक लाभ के उपयोग से परे विशेष खतरा उत्पन्न करता है (जैसा कि रिकार्ड्स बनाम लोथियन में स्पष्ट किया गया है )।
- उदाहरणों में विस्फोटक, भारी मात्रा में गैस और बिजली, और हानिकारक धुएं शामिल हैं। "गैर-प्राकृतिक" क्या माना जाएगा, यह संदर्भ पर निर्भर करता है, जैसा कि भारतीय न्यायालयों ने कृषि मामलों जैसे काना राम अखुल बनाम सतीधर चटर्जी में स्वीकार किया है। दायित्त्व प्रतिवादी द्वारा नियुक्त स्वतंत्र ठेकेदारों द्वारा किये गए नुकसान तक भी विस्तारित होता है, जैसा कि रायलैंड्स और टी.सी. बालकृष्णन मेनन बनाम टी.आ.र सुब्रमण्यम के मामलों में कहा गया है।
कठोर दायित्त्व के विरुद्ध प्रतिरक्षा:
- अपने नाम के होते हुए भी, कठोर दायित्त्व कई प्रतिरक्षाओं को स्वीकार करता है: वादी का व्यतिक्रम, वादी की सहमति (volenti non fit injuria), सामान्य लाभ (कारस्टेयर्स बनाम टायलर), किसी अजनबी का कृत्य, दैवीय कृत्य (निकोल्स बनाम मार्सलैंड), और सांविधिक अधिकार (मद्रास रेलवे कंपनी बनाम कार्वेटेनाग्राम के जमींदार)।
पूर्ण दायित्त्व – एम.सी. मेहता बनाम भारत संघ (1987):
- 1985 में श्रीराम फूड्स की दिल्ली स्थित फैक्ट्री से ओलियम गैस के रिसाव के बाद, उच्चतम न्यायालय ने मुख्य न्यायाधीश भगवती के माध्यम से यह निर्णय दिया कि 19वीं सदी का रायलैंड्स नियम आधुनिक औद्योगिक खतरों के लिये अपर्याप्त है।
- इसने एक कठोर "पूर्ण दायित्त्व" मानक विकसित किया: खतरनाक या स्वाभाविक रूप से जोखिम भरे क्रियाकलापों में संलग्न उद्यमों का समुदाय के प्रति नुकसान को रोकने का एक पूर्ण, गैर-हस्तांतरणीय कर्त्तव्य है, जिसमें कोई अपवाद उपलब्ध नहीं है।
कठोर दायित्त्व और पूर्ण दायित्त्व के बीच तुलना:
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पहलू |
कठोर दायित्त्व |
पूर्ण दायित्त्व |
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अपवाद |
कुछ अपवादों एवं प्रतिरक्षाओं की अनुमति होती है, जैसे—दैवीय कृत्य, तृतीय पक्ष के कृत्य आदि। |
कोई अपवाद या प्रतिरक्षा उपलब्ध नहीं होती; प्रत्येक परिस्थिति में दायित्व पूर्ण एवं निरपेक्ष होता है। |
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संपत्ति से पलायन |
हानि उत्पन्न करने के लिए यह आवश्यक है कि खतरनाक पदार्थ भूमि अथवा परिसर से बाहर निकलकर (Escape) क्षति पहुँचाए। |
पदार्थ के परिसर से बाहर निकलने की कोई आवश्यकता नहीं है; परिसर के भीतर अथवा बाहर, दोनों स्थितियों में हुई हानि पर यह सिद्धांत लागू होता है। |
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प्रयोग का क्षेत्र |
भूमि के ऐसे सभी अप्राकृतिक उपयोगों पर लागू होता है जिनमें खतरनाक क्रियाकलाप सम्मिलित हों। |
केवल जोखिमपूर्ण (Hazardous) अथवा स्वभावतः खतरनाक क्रियाकलापों पर लागू होता है। |
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क्षतिपूर्ति की मात्रा |
क्षतिपूर्ति सामान्यतः हुई हानि की सीमा एवं प्रकृति के अनुपात में निर्धारित की जाती है। |
क्षतिपूर्ति का निर्धारण केवल हुई हानि के आधार पर नहीं, अपितु संबंधित उपक्रम (Enterprise) की आर्थिक क्षमता एवं संसाधनों को ध्यान में रखकर किया जाता है। |