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सांविधानिक विधि

आठवाँ वेतन आयोग — वेतन आयोगों में सुधार का एक अवसर

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 16-Jun-2026

स्रोत:द हिंदू 

परिचय 

भारत में आठवें केंद्रीय वेतन आयोग (CPC) की स्थापना की ओर बढ़ते हुएसार्वजनिक चर्चा मुख्य रूप से परिचित विषयोंजैसे कि उपयुक्तता कारकवेतन संशोधन और बकाया राशि पर केंद्रित रही है। यद्यपिबड़ा प्रश्न यह नहीं है कि पारिश्रमिक में कितनी वृद्धि होनी चाहियेअपितु यह है कि लोक सेवकों के वेतनभत्तों एवं पेंशन के निर्धारण हेतु विद्यमान ढाँचा क्या अब भी सुसंगतन्यायसंगत तथा राजकोषीय दृष्टि से टिकाऊ बना हुआ है। यह केवल एक प्रशासनिक विषय नहीं हैअपितु राज्य द्वारा वेतनभत्तों तथा पेंशन की संरचना निर्धारित करने का तरीका उसकी व्यापक संस्थागत प्राथमिकताओं को प्रतिबिंबित करता है तथा शासन-व्यवस्था के प्रति जनता के विश्वास और आस्था को भी प्रत्यक्ष रूप से प्रभावित करता है।  

वेतन आयोग (Pay Commission) क्या होता है? 

  • वेतन आयोग केंद्र सरकार के कर्मचारियों के वेतनमानभत्तों तथा अन्य सेवा-लाभों का मूल्यांकन करता है। यह मुद्रास्फीति (Inflation) तथा उसके पारिश्रमिक एवं जीवन-यापन की लागत पर पड़ने वाले प्रभाव को ध्यान में रखते हुए वेतन संरचना की समीक्षा करता है 
  • केंद्र सरकार के कर्मचारियों एवं पेंशनभोगियों को न्यायोचित पारिश्रमिक सुनिश्चित करने तथा उनके वेतन एवं पेंशन में संशोधन हेतु वित्त मंत्रालय के व्यय विभाग के अधीन प्रत्येक दस वर्ष में एक नए वेतन आयोग का गठन किया जाता है। सामान्यतः इसकी अध्यक्षता उच्चतम न्यायालय के सेवानिवृत्त न्यायाधीश द्वारा की जाती है 
  • वेतन आयोग की सिफारिशों को प्राय: सरकारी स्वामित्व वाली संस्थाएँ भी अपना लेती हैं। 
  • 1947 से लेकर अब तकभारत सरकार ने सात वेतन आयोगों की स्थापना की हैजिनमें से 7वाँ वेतन आयोग (2016-2026) न्यायमूर्ति अशोक कुमार माथुर की अध्यक्षता में कार्यरत रहा और जिसके परिणामस्वरूप वित्तीय वर्ष 2016-17 में सरकारी व्यय में लाख करोड़ रुपए की वृद्धि हुई। 
  • आठवें वेतन आयोग से यह अपेक्षा की जा रही है कि वह मुद्रास्फीति के प्रभाव को संतुलित करने हेतु कर्मचारियों और पेंशनभोगियों के लिए महँगाई भत्ता (DA) तथा महँगाई राहत (DR) के पुनर्निर्धारण संबंधी सूत्रों का सुझाव देगा। DA में संशोधन का निर्धारण सामान्यतः श्रम ब्यूरो (Labour Bureau) द्वारा प्रतिमाह जारी किये जाने वाले औद्योगिक श्रमिकों के उपभोक्ता मूल्य सूचकांक (CPI-IW) के आधार पर किया जाता है 

भारत के वेतन आयोग मॉडल में क्या कमियां है? 

  • वेतन आयोग वेतन संशोधन अभ्यासों से आगे बढ़कर अंतर-सेवा समानता और दीर्घकालिक राजकोषीय प्रतिबद्धताओं को आकार देने वाले निकाय बन गए हैंफिर भी वे संकीर्णसमयबद्ध निकाय बने हुए हैं जो काफी हद तक स्वयं सेवाओं के प्रतिनिधित्व पर निर्भर करते हैंऔर सेवाओं के बीच जोखिमउत्तरदायित्त्व या कैरियर प्रगति की तुलना करने के लिये कोई सामान्य ढाँचा नहीं है। 
  • यह अंतर सिविल सेवाओं और सशस्त्र बलों के बीच सबसे अधिक स्पष्ट हैजिनकी कैरियर संरचनाएं और सेवानिवृत्ति समयसीमाएँ बिल्कुल अलग हैंजिसके परिणामस्वरूप अक्सर स्पष्ट आधार के बिना समानता प्राप्त करने का प्रयास किया जाता है। संबंधित चिंताओं में वरिष्ठ पदों के लिये अनुभव की आवश्यकताओं में कमीकठिनाई भत्ते के आकलन के लिये असंगत ढाँचा और गैर-कार्यात्मक उन्नयन (NFU) शामिल हैंजो भूमिकाजवाबदेही और वेतन के बीच संबंध को कमजोर करता है। 

पेंशन प्रणाली चुनौतियां क्यों पेश करती है? 

  • भारत में कई पेंशन प्रणालियाँ प्रचलित हैंजिनमें पारंपरिक परिभाषित-लाभ योजनाएँनए प्रवेशकों के लिये अंशदायी योजनाएँ और निर्वाचित प्रतिनिधियों के लिये अलग व्यवस्थाएँ शामिल हैं। RBI की राज्य वित्त रिपोर्ट (2023) के अनुसारवेतनपेंशन और ब्याज भुगतान राज्य व्यय का एक बड़ा हिस्सा खर्च करते हैंजिससे राजकोषीय स्थिरता और अंतर-पीढ़ीगत समानता को लेकर चिंताएँ बढ़ जाती हैं। 
  • कार्यपालिकाविधायिका और न्यायपालिका के लिये वेतन ढाँचे भी अलग-अलगसांविधानिक रूप से भिन्न प्रक्रियाओं के माध्यम से विकसित होते हैंजिससे असंगतताएं उत्पन्न होती हैं जो पारदर्शिता को कम कर सकती हैंजिस पर अंततः जनता का विश्वास निर्भर करता है। 

नई पारिश्रमिक संरचना कैसी होनी चाहिये? 

  • विश्व के अनेक देशों ने सार्वजनिक क्षेत्र के कर्मचारियों के पारिश्रमिक की समीक्षा के लिए निरंतर एवं संस्थागत तंत्र (continuous and institutionalised mechanisms) को अपनाया है। ऐसे तंत्र स्वतंत्र प्राधिकरणोंस्पष्ट रूप से निर्धारित मानकों (benchmarks) तथा समय-समय पर होने वाली नियमित समीक्षाओं पर आधारित होते हैंन कि लंबे अंतराल के पश्चात् किये जाने वाले व्यापक वेतन पुनरीक्षणों पर। इस परिप्रेक्ष्य में यह विचारणीय है कि भारत में प्रत्येक दस वर्ष के अंतराल पर गठित किये जाने वाले वेतन आयोग-आधारित मॉडल की पुनर्समीक्षा की जाए तथा उसके स्थान पर अधिक गतिशीलपारदर्शीन्यायसंगत एवं राजकोषीय रूप से टिकाऊ पारिश्रमिक निर्धारण व्यवस्था विकसित की जाए 
  • एक अधिक टिकाऊ ढाँचाचाहे वह राष्ट्रीय पारिश्रमिक प्राधिकरण हो या कोई विशेष लोक सेवा निकायउत्तरदायित्त्वअनुभव और कठिनाई के आकलन के लिये सामान्य सिद्धांत स्थापित करके सार्वजनिक क्षेत्र के वेतन में अधिक स्थिरता ला सकता हैजबकि विभिन्न सेवाओं और राज्यों के लिये लचीलापन बनाए रख सकता है। 
  • इस प्रकार के किसी भी सुधार को भारत की संघीय संरचना का सम्मान करना चाहियेजिसमें राज्यों को कार्यान्वयन पर स्वायत्तता बनाए रखते हुए पारदर्शितातुलनीयता और राजकोषीय अनुशासन के व्यापक ढाँचे के भीतर काम करना चाहियेजिससे सांविधानिक स्वतंत्रता को प्रभावित किये बिना विश्वसनीयता और जन विश्वास दोनों को मजबूत किया जा सके। 

निष्कर्ष 

लोक सेवकों का पारिश्रमिक केवल वेतन एवं पेंशन तक सीमित विषय नहीं हैअपितु यह राज्य और नागरिक के मध्य स्थापित व्यापक संबंध का एक महत्त्वपूर्ण घटक है। एक लोकतांत्रिक शासन-व्यवस्था में पारिश्रमिक संरचना न केवल राजकोषीय दृष्टि से टिकाऊ  होनी चाहियेअपितु ऐसी भी होनी चाहिये जिसे जनता के समक्ष पारदर्शी एवं तर्कसंगत रूप से स्पष्ट किया जा सके। आठवाँ वेतन आयोग केवल वेतन एवं पेंशन के आवधिक पुनरीक्षण का अवसर नहीं हैअपितु यह सार्वजनिक पारिश्रमिक व्यवस्था से संबंधित इन गहन संरचनात्मक प्रश्नों पर विचार करने का भी महत्त्वपूर्ण अवसर प्रदान करता है। इस अवसर का किस सीमा तक सार्थक एवं प्रभावी उपयोग किया जाता हैयह आने वाले वर्षों में संस्थागत शासन-व्यवस्था  के प्रति जन-विश्वाससार्वजनिक आस्था तथा प्रशासनिक विश्वसनीयता को महत्त्वपूर्ण रूप से प्रभावित कर सकता है