9 मार्च से शुरू हो रहे हमारे ऑल-इन-वन ज्यूडिशियरी फाउंडेशन कोर्स के साथ अपनी ज्यूडिशियरी की तैयारी को मजबूत बनाएं | यह कोर्स अंग्रेज़ी और हिंदी दोनों माध्यमों में उपलब्ध है।   |   आज ही हमारे ज्यूडिशियरी फाउंडेशन कोर्स में एडमिशन लें और अपनी तैयारी को और बेहतर बनाएँ | हिंदी माध्यम बैच: 9 मार्च, सुबह 8 बजे   |   आज ही एडमिशन लें बिहार APO (प्रिलिम्स + मेन्स) कोर्स में और अपने सपनों को दे नई दिशा | ऑफलाइन एवं ऑनलाइन मोड में उपलब्ध | 12 जनवरी 2026  से कक्षाएँ आरंभ   |   ज्यूडिशियरी की तैयारी अब हिंदी माध्यम में! दृष्टि ज्यूडिशियरी का नया बैच 22 जून 2026 से शुरू | आज ही एडमिशन लें | ऑनलाइन व ऑफलाइन दोनों मोड में उपलब्ध |   |   एडमिशन ओपन: UP APO प्रिलिम्स + मेंस कोर्स 2025, बैच 6th October से   |   ज्यूडिशियरी फाउंडेशन कोर्स (प्रयागराज)   |   अपनी सीट आज ही कन्फर्म करें - UP APO प्रिलिम्स कोर्स 2025, बैच 6th October से







होम / करेंट अफेयर्स

सिविल कानून

लोकायुक्त विशेष पुलिस स्थापन (SPE) को सूचना का अधिकार अधिनियम के अधीन खुफिया या सुरक्षा निकाय होने के कारण छूट नहीं दी गई है

    «    »
 16-Jun-2026

विशेष पुलिस स्थापन बनाम कामता प्रसाद मिश्रा एवं अन्य 

"विशेष पुलिस स्थापन (SPE) को 'खुफिया और सुरक्षासंगठन नहीं कहा जा सकता है।" 

न्यायमूर्ति जे.के. माहेश्वरी और न्यायमूर्ति अतुल एस. चंदुरकर 

स्रोत: उच्चतम न्यायालय 

चर्चा में क्यों? 

भारत के उच्चतम न्यायालय के न्यायमूर्ति जे.के. माहेश्वरी और न्यायमूर्ति अतुल एस. चंदुरकर की पीठ ने मध्य प्रदेश उच्च न्यायालय के उस निदेश को बरकरार रखा है जिसमें लोकायुक्त संगठन के विशेष पुलिस स्थापन (SPE) को सूचना के अधिकार अधिनियम, 2005 के अधीन मांगी गई जानकारी का प्रकटन करने का निदेश दिया गया था। 

  • न्यायालय ने साथ ही 2011 की राज्य सरकार की अधिसूचना को रद्द कर दियाजिसमें विशेष पुलिस स्थापन (SPE) को सूचना के अधिकार व्यवस्था से छूट देने का दावा किया गया थायह मानते हुए कि विशेष पुलिस स्थापन खुफिया या सुरक्षा कार्य नहीं करता है और इसलिये अधिनियम की धारा 24(4) के अधीन छूट का दावा नहीं कर सकता है। 

स्पेशल पुलिस एस्टैब्लिशमेंट बनाम कामता प्रसाद मिश्रा और अन्य (2026) के मामले की पृष्ठभूमि क्या थी? 

  • कटनी में तैनात टाउन इंस्पेक्टर कामता प्रसाद मिश्रा 2017 में SPE द्वारा उनके खिलाफ दर्ज किये गए भ्रष्टाचार के एक मामले में फंस गए थे। 
  • राज्य सरकार ने 2020 में उनके अभियोजन के लिये मंजूरी दी थी। इसके बादमिश्रा ने मंजूरी आदेश और संबंधित संसूचना के पीछे की निर्णय लेने की प्रक्रिया के बारे में जानकारी मांगने के लिये एक RTI आवेदन दायर किया। 
  • अधिकारियों ने उनके अनुरोध को अस्वीकार कर दियाऔर राज्य सूचना आयोग ने सूचना का अधिकार अधिनियम की धारा 8(1)(ज) का हवाला देते हुए अस्वीकृति को बरकरार रखाजो अन्वेषण या अभियोजन की प्रक्रिया में बाधा डालने की संभावना वाली जानकारी के प्रकटीकरण को छूट देता है। 
  • इसके बाद मिश्रा ने मध्य प्रदेश उच्च न्यायालय का रुख कियाजिसने इस आधार पर उनके पक्ष में निर्णय दिया कि अन्वेषण पहले ही पूर्ण हो चूका था और आरोप पत्र दायर किया जा चुका थाऔर अधिकारियों को अनुरोधित जानकारी उपलब्ध कराने का निदेश दिया। 
  • SPE ने इस निदेश को उच्चतम न्यायालय के समक्ष चुनौती दीजिसमें मध्य प्रदेश सामान्य प्रशासन विभाग द्वारा 25 अगस्त, 2011 को सूचना का अधिकार अधिनियम की धारा 24(4) के अधीन जारी अधिसूचना पर विश्वास किया गया थाजिसमें SPE और राज्य आर्थिक अपराध अन्वेषण ब्यूरो दोनों को अधिनियम के दायरे से बाहर करने की मांग की गई थी। 

न्यायालय की क्या टिप्पणियां थीं? 

  • धारा 24(4) के दायरे पर:न्यायालय ने माना कि सूचना का अधिकार अधिनियम की धारा 24(4) अधिनियम के प्रकटीकरण दायित्त्वों से छूट केवल उन संगठनों को देती है जो वास्तव में राज्य सरकार द्वारा स्थापित "खुफिया और सुरक्षा संगठनों" के रूप में कार्य करते हैंऔर यह छूट सामान्य अन्वेषण या विधि प्रवर्तन कार्यों को करने वाले निकायों तक विस्तारित नहीं की जा सकती है। 
  • SPE के कार्यों की प्रकृति पर:लोकायुक्त और SPE को नियंत्रित करने वाले सांविधिक ढाँचे का अन्वेषण करते हुएपीठ ने पाया कि SPE की अधिकारिता भ्रष्टाचार निवारण अधिनियम के अधीन भ्रष्टाचार से संबंधित अपराधों और लोक सेवकों से जुड़े दण्ड संहिता के कुछ अपराधों के अन्वेषण तक ही सीमित है। न्यायालय ने माना कि ये कार्य जांच प्रकृति के हैं और धारा 24(4) के अधीन परिकल्पित खुफिया जानकारी जुटाने या सुरक्षा अभियानों के अंतर्गत नहीं आते हैं।  
  • 2011 की अधिसूचना की वैधता पर:न्यायालय ने माना कि 2011 की अधिसूचनाजहाँ तक ​​इसने विशेष पुलिस स्थापन (SPE) को सूचना का अधिकार अधिनियम से अपवर्जित किया हैमूल अधिनियम के अधीन प्रदत्त अधिकार का उल्लंघन करती है और इसलिये अमान्य है। अधिसूचना को विधायिका द्वारा निर्धारित सीमा से परे सांविधिक छूट का विस्तार करने का एक अनुचित प्रयास पाया गया। 
  • अपने निर्णय के सीमित दायरे के संबंध में:न्यायालय ने स्पष्ट किया कि उसने अधिसूचना का अन्वेषण केवल विशेष पुलिस स्थापन (SPE) से संबंधित संदर्भ में किया थाऔर राज्य आर्थिक अपराध अन्वेषण ब्यूरो के संबंध में इसकी वैधता पर कोई निर्णय नहीं दिया था। अधिसूचना को उस निकाय के संबंध में प्रभावी माना गया। 
  • अपील के निपटारे पर:विशेष पुलिस स्थापन (SPE) की अपील को खारिज करते हुएन्यायालय ने मिश्रा द्वारा मांगी गई जानकारी प्रदान करने के उच्च न्यायालय के निदेश को बरकरार रखाउच्च न्यायालय के इस तर्क में कोई खामी नहीं पाई कि अन्वेषण पूर्ण होने और आरोप पत्र दाखिल होने से धारा 8(1)(ज) के अधीन जानकारी को रोकने का कोई औचित्य नहीं रह गया है। 

सूचना अधिकार अधिनियम, 2005 की धारा 24(4) क्या है? 

धारा 24 – अधिनियम कुछ संगठनों पर लागू नहीं होगा 

  • उपधारा (1): अधिनियम द्वितीय अनुसूची में निर्दिष्ट खुफिया एवं सुरक्षा संगठनों पर लागू नहीं होता हैजो केंद्र सरकार द्वारा स्थापित संगठन हैंऔर न ही ऐसे संगठनों द्वारा केंद्र सरकार को दी गई किसी सूचना पर लागू होता है। 
  • उपधारा (1) का प्रथम परंतुक: यह अपवर्जन भ्रष्टाचार या मानवाधिकार उल्लंघन के आरोपों से संबंधित जानकारी पर लागू नहीं होताऐसी जानकारी प्रकट करने योग्य बनी रहती है। 
  • उपधारा (1) का द्वितीय परंतुक: जहाँ मानवाधिकार उल्लंघन के आरोपों के संबंध में सूचना मांगी जाती हैवह केवल केंद्रीय सूचना आयोग की स्वीकृति के बाद ही प्रदान की जा सकती हैऔर धारा के अधीन विहित समय सीमा के होते हुए भीअनुरोध के पैंतालीस दिनों के भीतर उपलब्ध कराई जानी चाहिये 
  • उपधारा (2): केंद्र सरकार आधिकारिक राजपत्र में अधिसूचना द्वारा द्वितीय अनुसूची में अपने द्वारा स्थापित किसी खुफिया या सुरक्षा संगठन को जोड़कर या हटाकर संशोधन कर सकती हैऐसा जोड़ या हटाना अधिसूचना के प्रकाशन पर प्रभावी होगा। 
  • उपधारा (3): उपधारा (2) के अंतर्गत जारी की गई प्रत्येक अधिसूचना संसद के प्रत्येक सदन के समक्ष रखी जाएगी। 
  • उपधारा (4): अधिनियम राज्य सरकार द्वारा स्थापित खुफिया और सुरक्षा संगठनों पर भी लागू नहीं होता हैजहाँ वह सरकार आधिकारिक राजपत्र में अधिसूचना द्वारा ऐसे संगठनों को निर्दिष्ट करती है। 
  • उपधारा (4) का प्रथम परंतुक: केंद्रीय अपवर्जन की तरहभ्रष्टाचार या मानवाधिकार उल्लंघन के आरोपों से संबंधित जानकारी प्रकटीकरण से बाहर नहीं रखी गई है। 
  • उपधारा (4) का द्वितीय परंतुक: मानवाधिकार उल्लंघन के आरोपों के संबंध में मांगी गई जानकारी केवल राज्य सूचना आयोग की मंजूरी के बादअनुरोध के पैंतालीस दिनों के भीतर जारी की जा सकती हैधारा के होते हुए भी 
  • उपधारा (5): उपधारा (4) के अंतर्गत जारी की गई प्रत्येक अधिसूचना राज्य विधानमंडल के समक्ष रखी जाएगी। 

लोकायुक्त – मुख्य बिंदु 

  • अर्थ:लोकायुक्त भारतीय संसदीय लोकपाल हैजिसकी स्थापना व्यक्तिगत राज्य सरकारों द्वारा और उनके लिये की जाती हैजो लोक सेवकों के विरुद्ध शिकायतों और आरोपों का अन्वेषण करने के लिये एक भ्रष्टाचार विरोधी प्राधिकरण के रूप में कार्य करता है। 
  • मूल: 
    • इसकी जड़ें स्कैंडिनेवियाई देशों में प्रचलित लोकपाल प्रणाली में निहित हैं। 
    • प्रशासनिक सुधार आयोग (1966-70) ने केंद्र में लोकपाल और राज्यों में लोकायुक्तों के सृजन की सिफारिश की थी। 
    • लोकपाल एवं लोकायुक्त अधिनियम, 2013 के पारित होने से पहले ही कई राज्यों ने लोकायुक्त विधि लागू कर दी थीमहाराष्ट्र ऐसा करने वाला प्रथम राज्य थाजिसने 1971 में अपने लोकायुक्त की स्थापना की थी। 
  • नियुक्ति: 
    • लोकायुक्त और उपलोकायुक्त की नियुक्ति राज्य के राज्यपाल द्वारा की जाती है। 
    • अधिकांश राज्यों में राज्यपाल नियुक्ति से पहले राज्य उच्च न्यायालय के मुख्य न्यायाधीश और राज्य विधानसभा में विपक्ष के नेता से परामर्श करते हैं। 
  • कार्यकाल: 
    • सामान्यत: यह अवधि वर्ष या 65 वर्ष की आयु तक निर्धारित की जाती हैजो भी पहले हो। 
    • दूसरे कार्यकाल के लिये पुनर्नियुक्ति की कोई पात्रता नहीं है। 
  • प्रमुख मुद्दे: 
    • एकसमान विधि का अभाव:लोकपाल और लोकायुक्त अधिनियम, 2013 में लोकायुक्त पर केवल एक ही धारा हैजो राज्यों को एक वर्ष के भीतर अपने स्वयं के लोकायुक्त विधि पारित करने का निदेश देता हैबिना संरचनाशक्तियों या कार्यप्रणाली को निर्धारित कियेइन पहलुओं पर राज्यों को पूर्ण स्वायत्तता प्राप्त है। 
    • मामलों के निस्तारण में विलंब:शिकायतों की जांच तथा उनके अंतिम निस्तारण की प्रक्रिया प्रायः विलंबग्रस्त रहती हैजिससे शिकायत निवारण की प्रभावशीलता प्रभावित होती है 
    • राज्य सरकार पर निर्भरता:वित्तीय संसाधनों एवं आधारभूत संरचना के लिए राज्य सरकार पर निर्भरता लोकायुक्त संस्था की स्वतंत्रता को प्रभावित कर सकती है तथा इसके कार्यों में बाह्य हस्तक्षेप की संभावना उत्पन्न कर सकती है