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सांविधानिक विधि

बलात्कार मामले में दोषमुक्ति के होते हुए भी उच्चतम न्यायालय ने डीएनए परीक्षण की अनुमति प्रदान की

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 10-Jun-2026

सी. बनाम ए. और अन्य 

"निजता के अधिकार के संबंध मेंहम इस मामले में सी.पी. की निजता और ए. की उस प्रश्न के समाधान की इच्छा के बीच संतुलन बनाने का प्रयास कर रहे हैं जो उसके जीवन पर सदैव एक बड़ा प्रश्न रहा है। उसने बचपन से ही अपनी माता को यह दावा करते देखा है कि सी.पी. ही पिता हैलेकिन अधिकारियों ने निरंतर इसके विपरीत निष्कर्ष निकाले हैं।" 

न्यायमूर्ति संजय करोल और न्यायमूर्ति नोंगमेइकापम कोटिस्वर सिंह 

स्रोत: उच्चतम न्यायालय 

चर्चा में क्यों? 

भारत के उच्चतम न्यायालय के न्यायमूर्ति संजय करोल और न्यायमूर्ति नोंगमेइकापम कोटिश्वर सिंह की खंडपीठ ने सी. बनाम ए. और अन्य (2026) के मामले में निर्णय दिया कि भारतीय दण्ड संहिता की धारा 376 के अधीन किसी आपराधिक मामले में पूर्व में दोषमुक्ति होने से सिविल न्यायालय को जैविक पितृत्व का निर्धारण करने के लिये डीएनए परीक्षण का निदेश देने से नहीं रोका जा सकता है। 

  • न्यायालय ने विचारण न्यायालय और छत्तीसगढ़ उच्च न्यायालय के समवर्ती आदेशों की पुष्टि करते हुए अपीलकर्त्ता को डीएनए प्रोफाइलिंग कराने का निदेश दियायह मानते हुए कि जहाँ कोई अन्य साक्ष्य प्रश्न का निश्चायक रूप से समाधान नहीं कर सकता हैवहाँ पितृत्व का वैज्ञानिक निर्धारण अपरिहार्य है। 

सी. बनाम ए. और अन्य (2026) के मामले की पृष्ठभूमि क्या थी? 

  • इस विवाद की शुरुआत 1999 में हुई थी। पहले प्रत्यर्थीजिसका जन्म सितंबर 1999 में हुआ थाने अपीलकर्त्ता का जैविक पुत्र होने का दावा किया और कहा कि उसका जन्म अपीलकर्त्ता और उसकी माता के बीच संबंध से हुआ था। अपीलकर्त्ता ने शुरू से ही पितृत्व से इंकार किया। 
  • प्रथम प्रत्यर्थी की माता के परिवाद पर अपीलकर्त्ता के विरुद्ध भारतीय दण्ड संहिता की धारा 376 के अधीन आपराधिक मामला दर्ज किया गया था। उस कार्यवाही में अपीलकर्त्ता को दोषमुक्त कर दिया गया था। पितृत्व पर अंतिम निर्णय के बिना ही भरण-पोषण संबंधी पृथक् वाद का भी समापन हो गया। 
  • बालिग होने के बादप्रथम प्रत्यर्थी ने जैविक पितृत्व की घोषणा और परिणामस्वरूप अपीलकर्त्ता की संपत्ति में हिस्सेदारी की मांग करते हुए एक सिविल वाद दायर किया। वाद की सुनवाई के दौरानविचारण न्यायालय ने डीएनए परीक्षण का निदेश दिया। छत्तीसगढ़ उच्च न्यायालय ने इस आदेश की पुष्टि कीजिसके बाद अपीलकर्त्ता ने उच्चतम न्यायालय का रुख किया।  

न्यायालय की क्या टिप्पणियां थीं? 

  • पूर्व आपराधिक दोषमुक्ति के प्रभाव पर:न्यायालय ने माना कि आपराधिक मामले में दोषमुक्ति का अर्थ केवल यह सिद्ध करना है कि अभियोजन पक्ष आरोप को संदेह से परे साबित करने में असफल रहा। इसका यह अर्थ नहीं है कि पक्षकारों के बीच कोई जैविक संबंध नहीं है। आपराधिक कार्यवाही में सबूत का मानक सिविल पितृत्व विवाद की जांच से भिन्न होता हैऔर पहले मामले में दोषमुक्ति से दूसरे मामले में दोषमुक्ति की संभावना समाप्त नहीं हो जाती। 
  • प्रत्यर्थी के अपने माता-पिता के बारे में जानने के अधिकार पर:न्यायालय ने स्वीकार किया कि प्रथम प्रत्यर्थी ने अपना पूरा जीवन अपने माता-पिता के बारे में विरोधाभासी दावों के बीच बिताया है। न्यायालय ने कहा कि यदि यह प्रश्न अनसुलझा रहता हैतो उसे उन विधिक अधिकारों से वंचित किया जा सकता है - जिनमें विरासत के अधिकार भी शामिल हैं - जो उसे अपीलकर्त्ता का जैविक पुत्र पाए जाने पर वैध रूप से प्राप्त होंगे। 
  • निजता के अधिकारों में संतुलन स्थापित करने के संबंध में:न्यायालय ने अपीलकर्त्ता के निजता के अधिकार को स्वीकार कियालेकिन यह माना कि इसे प्रथम प्रत्यर्थी के जैविक पहचान स्थापित करने के अधिकार और उससे प्राप्त विधिक अधिकारों के साथ संतुलित किया जाना चाहिये। न्यायालय ने यह भी पाया कि अभिलेख में ऐसा कुछ भी नहीं है जिससे यह संकेत मिले कि सुसंगत अवधि के दौरान प्रथम प्रत्यर्थी की माता का अपीलकर्त्ता के अलावा किसी अन्य पुरुष के साथ संबंध थाजिससे विवाद के निश्चायक समाधान के लिये डीएनए परीक्षण आवश्यक हो जाता है। 
  • वैज्ञानिक साक्ष्य की आवश्यकता पर:न्यायालय ने पाया कि पितृत्व विवादों में वैज्ञानिक साक्ष्य तब अपरिहार्य हो जाता है जब कोई अन्य साक्ष्य जैविक पितृत्व को निश्चायक रूप से निर्धारित नहीं कर सकता। ऐसी परिस्थितियों मेंडीएनए परीक्षण का निदेश देना अधिकारों का उल्लंघन नहीं अपितु न्याय के हित में एक उचित उपाय है।  

डीएनए परीक्षण क्या है? 

बारे में: 

  • डीएनए (डीऑक्सीराइबोन्यूक्लिक एसिड) परीक्षण एक वैज्ञानिक विधि है जो जैविक संबंधोंविशेष रूप से पितृत्व और मातृत्व का निर्धारण करने के लिये आनुवंशिक सामग्री का विश्लेषण करती है। 
  • डीएनए परीक्षण में व्यक्तियों के बीच आनुवंशिक चिह्नों की तुलना करके जैविक संबंध स्थापित किये जाते हैंऔर पितृत्व के मामलों में इसकी सटीकता 99% से अधिक होती है। 
  • यह परीक्षण रक्तलारबालों के रोम या गाल के स्वाब सहित विभिन्न नमूनों का उपयोग करके किया जा सकता है। 

डीएनए परीक्षण के प्रकार: 

  • पितृत्व परीक्षण:इससे बच्चे के जैविक पिता का पता चलता है। 
  • मातृत्व परीक्षण:जैविक माता की पहचान स्थापित करता है (दुर्लभ मामलों में)। 
  • रिश्तेदारी परीक्षण:रिश्तेदारों के बीच संबंधों का निर्धारण करता है। 
  • पहचान परीक्षण:आपराधिक अन्वेषण और सामूहिक आपदाओं में उपयोग किया जाता है। 

भारत में न्यायालयों को साक्ष्य की खोज और प्रस्तुति का आदेश देने की सामान्य शक्तियों के अंतर्गत पितृत्व संबंधी सिविल वादों में डीएनए परीक्षण का निदेश देने का अधिकार है। सुसंगात्व विधिक ढाँचा इस प्रकार है: 

भारतीय साक्ष्य अधिनियम, 1872 की धारा 112 (भारतीय साक्ष्य अधिनियम (BSA) की धारा 116): 

  • वैध विवाह के दौरान जन्म होने से धर्मजता की एक निश्चायक उपधारणा प्राप्त होती है। 
  • इस उपधारणा का खंडन केवल गर्भाधान की अवधि के दौरान पक्षकारों के बीच आपसी पहुँच न होने के सबूत द्वारा ही किया जा सकता है। 
  • न्यायालय ने यह माना है कि डीएनए साक्ष्य का आदेश तब दिया जा सकता है जब इस उपधारणा का खंडन करने की मांग की जा रही हो या जब कोई विवाह अस्तित्व में न हो और पितृत्व विवादित हो। 

डीएनए परीक्षण पर न्यायिक स्थिति: 

मापदण्ड 

विधिक स्थिति 

डीएनए परीक्षण का निर्देश देने की न्यायालय की शक्ति 

सिविल प्रक्रिया एवं साक्ष्य संबंधी शक्तियों के अंतर्गत न्यायालय की यह शक्ति मान्य एवं मान्यता प्राप्त है। 

आपराधिक दोषमुक्ति का प्रभाव 

आपराधिक मामले में दोषमुक्ति पितृत्व के सिविल निर्धारण पर कोई प्रतिबंध नहीं लगाती। 

सबूत का मानदण्ड 

पितृत्व संबंधी वादों में ‘संभावनाओं के प्राबल्य’ (Balance of Probabilities) का सिविल मानदण्ड लागू होता है। 

निजता का अधिकार 

निजता के अधिकार का संतुलन बच्चे के अपने पितृत्व को जानने तथा वैधानिक अधिकारों का दावा करने के अधिकार के साथ स्थापित किया जाना आवश्यक है। 

डीएनए परीक्षण कराने से इंकार का प्रभाव 

इससे इंकार करने वाले पक्षकार के विरुद्ध प्रतिकूल निष्कर्ष निकल सकता है।