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आपराधिक कानून
अंतिम दिन शाम 5 बजे के बाद ई-फाइलिंग करने पर अभियुक्त को व्यतिकारी जमानत का अधिकार मिल जाता है
«03-Jun-2026
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अबू बकर सिद्दीकी और अन्य बनाम केरल राज्य और अन्य "परिसीमा की संगणना के उद्देश्य से, शाम 5:00 बजे तक प्राप्त इलेक्ट्रॉनिक फाइलिंग को उसी दिन दायर किया गया माना जाएगा। यद्यपि कोई पक्षकार शाम 5:00 बजे के बाद भी इलेक्ट्रॉनिक रूप से वाद दायर कर सकता है, परिसीमा के उद्देश्य से ऐसी फाइलिंग को अगले कार्य दिवस पर ही दायर किया गया माना जाएगा।" न्यायमूर्ति कौसर एडप्पागथ |
स्रोत: केरल उच्च न्यायालय
चर्चा में क्यों?
केरल उच्च न्यायालय के न्यायमूर्ति डॉ. कौसर एडप्पागथ ने अबू बकर सिद्दीकी और अन्य बनाम केरल राज्य और अन्य (2026) के मामले में यह निर्णय दिया कि यदि पुलिस द्वारा अंतिम रिपोर्ट विहित सांविधिक अवधि के अंतिम दिन शाम 5 बजे के बाद ई-फाइल की जाती है, तो अभियुक्त व्यतिकारी जमानत का हकदार होगा। न्यायालय ने तर्क दिया कि न्यायालयों के लिये इलेक्ट्रॉनिक फाइलिंग नियम (केरल), 2021 के अधीन, शाम 5 बजे के बाद की गई ई-फाइलिंग को अगले कार्य दिवस पर दाखिल किया गया माना जाता है, जिसका अर्थ है कि अंतिम रिपोर्ट को सांविधिक अवधि के बाद दाखिल किया गया माना जाएगा।
अबू बकर सिद्दीकी और अन्य बनाम केरल राज्य और अन्य (2026) के मामले की पृष्ठभूमि क्या थी?
- याचिकाकर्त्ताओं को 30.12.2025 को गिरफ्तार किया गया था और उन स्वापक औषधि एवं मनःप्रभावी पदार्थ अधिनियम (NDPS Act) की धारा 22(ख) के अधीन अपराधों का आरोप लगाया गया था - जिसमें अधिकतम 10 वर्ष के कारावास के दण्ड का उपबंध है - क्योंकि उन पर व्यक्तिगत प्रयोग और विक्रय के लिये रखे गए 4.22 ग्राम MDMA को अपने कब्जे में रखने का आरोप था।
- पुलिस द्वारा अंतिम रिपोर्ट 28.02.2026 को शाम 6:02 बजे इलेक्ट्रॉनिक रूप से दाखिल की गई थी – अर्थात् रिमांड की तारीख से 60वें दिन शाम 5 बजे के बाद - और इसकी भौतिक प्रति 02.03.2026 को ही विचारण न्यायालय को भेजी गई थी।
- याचिकाकर्त्ताओं ने जमानत याचिका दायर करते हुए तर्क दिया कि चूँकि ई-फाइलिंग 60वें दिन शाम 5 बजे के बाद की गई थी, इसलिये इसे इलेक्ट्रॉनिक फाइलिंग नियमों के अधीन अगले कार्य दिवस पर दायर माना जाएगा, इस प्रकार यह सांविधिक अवधि से परे हो जाएगा और उन्हें भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता की धारा 187(3) के अधीन व्यतिकारी जमानत का हकदार बनाएगा।
न्यायालय की क्या टिप्पणियां थीं?
- शाम 5 बजे के बाद ई-फाइलिंग के प्रभाव पर: न्यायालय ने माना कि न्यायालयों के लिये इलेक्ट्रॉनिक फाइलिंग नियम (केरल), 2021 के नियम 13(1) और 13(2) तथा आपराधिक अभ्यास नियमों के नियम 4 और 5 को एक साथ पढ़ने से यह स्पष्ट होता है कि परिसीमा की संगणना के उद्देश्य से, शाम 5 बजे तक प्राप्त इलेक्ट्रॉनिक फाइलिंग को उसी दिन दायर किया गया माना जाता है, जबकि शाम 5 बजे के बाद की गई फाइलिंग को अगले कार्यदिवस पर ही दायर किया गया माना जाता है। चूँकि अंतिम रिपोर्ट 60वें दिन शाम 6:02 बजे ई-फाइल की गई थी, इसलिये इसे 61वें दिन – सांविधिक अवधि से परे - दायर किया गया माना गया, जिससे याचिकाकर्त्ताओं को जमानत का अधिकार प्राप्त हुआ।
- लागू सांविधिक अवधि — 60 दिन या 90 दिन: न्यायालय ने अभियोजन पक्ष के इस तर्क को खारिज कर दिया कि लागू अवधि 90 दिन थी, क्योंकि अपराध में 10 वर्ष तक के कारावास का प्रावधान था। भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता की धारा 187(3)(i) और इसके पूर्ववर्ती दण्ड प्रक्रिया संहिता की धारा 167(2) के उपबंध का निर्वचन करते हुए न्यायालय ने माना कि 90 दिन की अवधि केवल वहीं लागू होती है जहाँ अपराध में मृत्युदण्ड, आजीवन कारावास या कम से कम 10 वर्ष का कारावास का उपबंध हो। ऐसे अपराध जिनमें 10 वर्ष तक का कारावास हो सकता है लेकिन न्यूनतम सीमा निर्धारित नहीं है, वे 60 दिन की अवधि के अंतर्गत आते हैं।
- इस अंतर के पीछे का तर्क: न्यायालय ने स्पष्ट किया कि 60 दिन और 90 दिन की अवधियों के बीच का अंतर इस बात को दर्शाता है कि गंभीर अपराधों के लिये अधिक व्यापक अन्वेषण की आवश्यकता होती है। लंबी अवधि जांच एजेंसी को असम्यक् दबाव के बिना पर्याप्त साक्ष्य जुटाने में सक्षम बनाती है, जबकि 10 वर्ष तक के दण्ड वाले अपराधों में तुलनात्मक रूप से सरल जांच की संभावना होती है। यह वर्गीकरण अभियुक्त की स्वतंत्रता और प्रभावी विधि प्रवर्तन में राज्य के हित के बीच संतुलन बनाने का प्रयास करती है।
- दण्ड प्रक्रिया संहिता (CrPC) और भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता (BNSS) के बीच सामंजस्य पर: न्यायालय ने स्पष्ट किया कि दण्ड प्रक्रिया संहिता की धारा 167(2) के परंतुक (क)(i) और भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता (BNSS) की धारा 187(3)(i) मूलतः समान हैं, केवल शब्दावली में मामूली परिवर्तन हैं। 60 दिन और 90 दिन की समयसीमा यथावत है, जो समान मूल तर्क के प्रति विधायी प्रतिबद्धता को दर्शाती है, और यह सिद्धांत कि जमानत न देने पर व्यतिकारी जमानत के अपराध की गंभीरता से जुड़ा होता है, अपरिवर्तित है।
- स्वापक औषधि एवं मनःप्रभावी पदार्थ अधिनियम (NDPS Act) की धारा 22(ख) के अधीन अधिकतम 10 वर्ष का दण्ड और जुर्माना विहित है, लेकिन न्यूनतम अवधि का कोई उपबंध नहीं है। इसलिये न्यायालय ने 60 दिन की अवधि को लागू माना। चूँकि अंतिम रिपोर्ट 60वें दिन शाम 5 बजे के बाद ई-फाइल की गई थी, इसलिये इसे सांविधिक अवधि के बाद दाखिल माना गया और याचिकाकर्त्ता तदनुसार सांविधिक जमानत के हकदार थे। जमानत याचिका शर्तों के अधीन मंजूर कर ली गई।
व्यतिकारी जमानत (डिफॉल्ट बेल) क्या है?
भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता की धारा 187— व्यतिकारी जमानत (डिफॉल्ट बेल)
- अन्वेषण अभिकरण द्वारा विहित सांविधिक अवधि के भीतर आरोप पत्र दाखिल करने में असफल रहने पर डिफॉल्ट जमानत (जिसे सांविधिक जमानत, बाध्यकारी जमानत या छोड़ने का अविभाज्य अधिकार भी कहा जाता है) प्रदान की जाती है।
- इस प्रक्रम पर, न्यायालय साक्ष्यों का मूल्यांकन नहीं करता है और न ही अपराध की गंभीरता या भागने के जोखिम पर विचार करता है - अभियोजन की समय सीमा की समाप्ति ही एकमात्र निर्णायक कारक है।
सांविधिक स्थिति:
- भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता की धारा 187 ने 1 जुलाई 2024 से धारा 167 दण्ड प्रक्रिया संहिता का स्थान ले लिया, जब भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता लागू हुआ था।
- यह भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता (पुलिस को सूचना और अन्वेषण करने की शक्तियां) के अध्याय 12के अंतर्गत आता है।
- विधि व्यवसायियों की कार्यप्रणाली मुख्यतः निम्नलिखित दो उपधाराओं द्वारा संचालित होती है:
- धारा 187(2): यह विस्तृत वैधानिक अवधि के भीतर पुलिस अभिरक्षा को अधिकतम 15 दिनों तक सीमित करती है।
- धारा 187(3): 60 और 90 दिनों की आरोप-पत्र दाखिल करने की समय सीमा निर्धारित करती है; इनमें से किसी भी समय-सीमा का पालन न होने पर 'व्यतिकारी जमानत' (default bail) मिल जाती है।
60 बनाम 90 दिन:
- 60 दिन की अवधि उन अपराधों पर लागू होती है जिनके लिये 10 वर्ष तक का दण्ड हो सकता है (न्यूनतम 10 वर्ष की कोई सीमा नहीं है); यदि पहली रिमांड के 60 दिनों के भीतर आरोप पत्र दाखिल नहीं किया जाता है तो जमानत राशि बकाया हो जाती है; 15 दिनों की पुलिस अभिरक्षा का उपयोग पहले 40 दिनों के भीतर किया जाना चाहिये।
- 90 दिन की अवधि उन अपराधों पर लागू होती है जिनके लिये मृत्युदण्ड, आजीवन कारावास या कम से कम 10 वर्ष के दण्ड का प्रावधान है; यदि पहली रिमांड के 90 दिनों के भीतर आरोप पत्र दाखिल नहीं किया जाता है तो जमानत रद्द हो जाती है; पहले 60 दिनों के भीतर 15 दिनों की पुलिस अभिरक्षा का उपयोग करना अनिवार्य है।
- 60/90 दिन का विभाजन एक जानबूझकर किया गया विधायी समायोजन है, जिसमें अपराध की गंभीरता को उस समय के एक संकेतक के रूप में माना जाता है जिसकी अन्वेषणकर्त्ताओं को यथोचित रूप से आवश्यकता होती है।
भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता के अधीन वितरित “अभिरक्षा (Spread-Within) व्यवस्था":
- पूर्ववर्ती दण्ड प्रक्रिया संहिता, 1973 (CrPC) के अधीन, 15 दिन की पुलिस अभिरक्षा की अवधि का लाभ एक ही बार में लगातार लेना अनिवार्य था।
- भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता, 2023 (BNSS) ने अब इस 15-दिवसीय अभिरक्षा को खंडों में विभाजित करने की अनुमति देता है — कुछ दिन अभी, कुछ दिन बाद — बशर्ते कि:
- कुल अभिरक्षा 15 दिनों से अधिक नहीं होगी; और
- सभी खंड पहले 40 दिनों (60-दिन के अपराधों के लिये) या पहले 60 दिनों (90-दिन के अपराधों के लिये) के भीतर आते हैं।
- इससे अन्वेषणकर्त्ताओं द्वारा अभिरक्षा के अनुरोधों की योजना बनाने और प्रतिरक्षा पक्ष के अधिवक्ता द्वारा उनके विरुद्ध तर्क देने के तरीके में बदलाव आता है।