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सिविल कानून
सरोगेसी अधिनियम के अधीन जमे हुए भ्रूणों को आयु संबंधी प्रतिबंधों से छूट प्राप्त है
«14-Jul-2026
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अंशु शुक्ला और अन्य बनाम भारत संघ, स्वास्थ्य एवं परिवार कल्याण मंत्रालय विभाग "इस अधिनियम के अधीन आयु प्रतिबंध का कठोर अनुप्रयोग प्रजनन स्वायत्तता के मौलिक अधिकार का उल्लंघन करता है, जिसे भारत के संविधान के अनुच्छेद 21 के अधीन व्यक्तिगत स्वतंत्रता के एक भाग के रूप में मान्यता प्राप्त है।" न्यायमूर्ति शेखर बी. सराफ और न्यायमूर्ति अबधेश कुमार चौधरी |
स्रोत: इलाहाबाद उच्च न्यायालय
चर्चा में क्यों?
इलाहाबाद उच्च न्यायालय की एक खंडपीठ, जिसमें न्यायमूर्ति शेखर बी. सराफ और न्यायमूर्ति अब्देश कुमार चौधरी शामिल थे, ने अंशु शुक्ला और अन्य बनाम भारत संघ (2026) में निर्णय दिया कि जिन दंपतियों ने सरोगेसी (विनियमन) अधिनियम, 2021 के लागू होने से पहले सरोगेसी प्रक्रिया शुरू कर दी थी, वे अधिनियम की धारा 4(iii)(v)(ग)(I) के अधीन विहित सांविधिक आयु सीमा से अधिक होते हुए भी सरोगेसी के साथ आगे बढ़ सकते हैं।
अंशु शुक्ला और अन्य बनाम भारत संघ (2026) के मामले की पृष्ठभूमि क्या थी?
- याचिकाकर्त्ता, जो 17 वर्ष से अधिक समय से विवाहित एक दंपति हैं, व्यापक प्रजनन उपचार कराते हुए भी स्वाभाविक रूप से गर्भधारण करने में असमर्थ थे।
- उन्होंने कई IVF प्रक्रियाएं करवाईं, लेकिन निरंतर भ्रूण स्थानांतरण से प्राकृतिक गर्भाधान में सफलता नहीं मिली।
- चिकित्सकीय सलाह पर, उनकी नाजुक चिकित्सा स्थिति को देखते हुए, उन्हें सरोगेसी का विकल्प चुनने के लिये कहा गया और उन्होंने उच्च न्यायालय का रुख किया।
- दंपति ने सरोगेसी अधिनियम की धारा 2(द) के अधीन "इच्छुक दंपति" के रूप में अर्हता प्राप्त करने का दावा किया।
- यद्यपि, पत्नी की आयु 50 वर्ष से थोड़ी अधिक थी, इसलिये वह अधिनियम की धारा 4(iii)(v)(ग)(I) के अधीन निर्धारित आयु सीमा से अधिक हो गई, जिससे वह सरोगेसी का लाभ उठाने के लिये अपात्र हो गई।
- यह प्रस्तुत किया गया कि दंपति ने 18 जुलाई, 2015 को तीन भ्रूणों को संरक्षित किया था, जो कि सरोगेसी अधिनियम के 25 जनवरी, 2022 को लागू होने से काफी पहले की बात है।
- याचिकाकर्त्ताओं ने तापस कुमार मल्लिक बनाम भारत संघ (2026) में दिल्ली उच्च न्यायालय के आदेश, शोभिनी माला बनाम भारत संघ (2026) में पंजाब और हरियाणा उच्च न्यायालय के आदेश और अरुण मुथुवेल बनाम भारत संघ (2025) में उच्चतम न्यायालय के निर्णय पर विश्वास किया।
न्यायालय की क्या टिप्पणियां थीं?
- प्रजनन स्वायत्तता और अनुच्छेद 21 पर: पीठ ने माना कि धारा 4(iii)(v)(ग)(I) के अधीन आयु प्रतिबंध का कठोर अनुप्रयोग भारत के संविधान के अनुच्छेद 21 के अधीन व्यक्तिगत स्वतंत्रता के एक भाग के रूप में मान्यता प्राप्त प्रजनन स्वायत्तता के मौलिक अधिकार का उल्लंघन करता है।
- सरोगेसी प्रक्रिया कब शुरू मानी जाती है: अरुण मुथुवेल (उपरोक्त) पर विश्वास करते हुए, न्यायालय ने दोहराया कि आयु पात्रता निर्धारित करने के सीमित उद्देश्य के लिये, सरोगेसी प्रक्रिया उस क्षण शुरू होती है जब इच्छुक दंपत्ति गैमीट निकालने और फर्टिलाइज़ेशन की प्रक्रिया पूरा कर लेते हैं और भ्रूण को सरोगेट माता में स्थानांतरित करने के स्पष्ट आशय से फ्रीज कर देते हैं।
- आयु सीमा के भूतलक्षी रूप से लागू न होने पर: न्यायालय ने माना कि दंपति का सरोगेसी का अधिकार उस समय के प्रचलित विधि के अधीन उनके भ्रूणों को फ्रीज किये जाने पर ही स्पष्ट हो गया था, जब कोई आयु सीमा विद्यमान नहीं थी, और 2021 अधिनियम के अधीन आयु प्रतिबंध को इस अधिकार को समाप्त करने के लिये भूतलक्षी रूप से लागू नहीं किया जा सकता है।
- भूतलक्षी प्रभाव न होने के सांविधानिक आधार पर: पीठ ने आगे इस बात पर बल दिया कि जहाँ भ्रूण निर्माण के चरण में कोई सांविधिक आयु प्रतिबंध विद्यमान नहीं था, वहाँ नियमों को भूतलक्षी रूप से लागू करने की अनुमति नहीं दी जा सकती, क्योंकि ऐसा करने से अनुच्छेद 21 के अधीन इच्छुक दंपत्ति के पितृत्व के सांविधानिक अधिकार का उल्लंघन होगा।
- अनुतोष प्रदान करने पर: उच्चतम न्यायालय के निर्णय को लागू करते हुए, पीठ ने निष्कर्ष निकाला कि धारा 4(iii)(v)(ग)(I) के अधीन सांविधिक आयु सीमा याचिकाकर्त्ताओं के विरुद्ध कायम नहीं रखी जा सकती है और दंपति को परोपकारी सरोगेसी प्रक्रिया के साथ आगे बढ़ने की अनुमति दी।
सरोगेसी क्या है?
- परिचय: सरोगेसी एक ऐसी व्यवस्था है जिसमें एक महिला (सरोगेट) किसी अन्य व्यक्ति या दंपत्ति (इच्छुक माता-पिता) की ओर से बच्चे को गर्भ धारण करने और जन्म देने के लिये सहमत होती है। सरोगेट, जिसे जेस्टेशनल कैरियर भी कहा जाता है, वह महिला होती है जो इच्छित माता-पिता के लिये गर्भधारण करती है, बच्चे को पालती है और उसे जन्म देती है।
- परोपकारी सरोगेसी: इसमें गर्भावस्था के दौरान चिकित्सा खर्च और बीमा कवरेज के अलावा सरोगेट माता को कोई मौद्रिक प्रतिकर नहीं दिया जाता है।
- वाणिज्यिक सरोगेसी: इसमें मौद्रिक लाभ या पुरस्कार (नकद या वस्तु के रूप में) के लिये की जाने वाली सरोगेसी या संबंधित प्रक्रियाएं शामिल हैं, जो बुनियादी चिकित्सा खर्चों और बीमा कवरेज से अधिक होती हैं।
सरोगेसी (विनियमन) अधिनियम, 2021 क्या है?
- पात्र व्यक्ति: 35 से 45 वर्ष की आयु की विधवा या तलाकशुदा महिला, या एक दंपत्ति (विधिक रूप से विवाहित महिला और पुरुष के रूप में परिभाषित), सरोगेसी का लाभ उठा सकते हैं यदि उन्हें कोई ऐसी चिकित्सीय स्थिति है जिसके कारण यह विकल्प आवश्यक हो।
- इच्छुक दंपत्ति की पात्रता: इच्छुक दंपत्ति का विधिक रूप से विवाहित भारतीय पुरुष और महिला होना आवश्यक है; पुरुष की आयु 26-55 वर्ष और महिला की आयु 25-50 वर्ष के बीच होनी चाहिये, और दोनों में से किसी का भी पहले से कोई जैविक, दत्तक लिया हुआ या सरोगेट बच्चा नहीं होना चाहिये।
- व्यावसायिक सरोगेसी पर प्रतिबंध: यह अधिनियम व्यावसायिक सरोगेसी पर प्रतिबंध लगाता है, जिसके लिये 10 वर्ष तक का कारावास और 10 लाख रुपए तक का जुर्माना हो सकता है।
- केवल परोपकारी सरोगेसी की अनुमति: विधि केवल परोपकारी सरोगेसी की अनुमति देती है, जिसमें पैसों का लेन-देन नहीं होता है और सरोगेट माता का इच्छुक दंपत्ति से आनुवंशिक संबंध होना आवश्यक है।