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सिविल कानून

संदिग्ध परिस्थितियों में सत्यापन का सबूत वसीयत की प्रामाणिकता का सबूत नहीं होता

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 08-Jul-2026

सरदारी लाल बनाम बिशन दास एवं अन्य 

"न्यायिक निर्णयों ने 'संदिग्ध परिस्थितियोंवाक्यांश को अनिश्चित बना दिया है।" 

न्यायमूर्ति मनोज मिश्रा और न्यायमूर्ति के.वी. विश्वनाथन 

स्रोत: उच्चतम न्यायालय 

चर्चा में क्यों? 

न्यायमूर्ति मनोज मिश्रा और न्यायमूर्ति के.वी. विश्वनाथन की पीठ नेसरदारी लाल बनाम बिशन दास और अन्य (2026) के मामलेमें यह निर्णय दिया कि जहाँ वसीयत संदिग्ध परिस्थितियों से घिरी होवहाँ किसी साक्षी की मात्र परीक्षा वसीयत की प्रामाणिकता का सबूत नहीं होता हैऔर हिमाचल प्रदेश उच्च न्यायालय के उस निर्णय को अपास्त कर दिया जिसने 1974 की विवादित वसीयत को बरकरार रखा था। 

सरदारी लाल बनाम बिशन दास और अन्य (2026) के मामले की पृष्ठभूमि क्या थी? 

  • छज्जू राम की विधवा भाम्बो देवी ने अपने दिवंगत पति की संपत्तियों पर स्वामित्व और कब्जे का दावा करते हुए एक वाद संस्थित कियाजिसमें उन्होंने कहा कि उनके पति की मृत्यु निर्वसीयत हुई थी और वह उनकी एकमात्र क्लास I की उत्तराधिकारी थीं। 
  • प्रतिवादियों ने नवंबर, 1974 की एक रजिस्ट्रीकृत वसीयत पर विश्वास कियाजिसके अधीन वसीयतकर्ताएक निरक्षर कृषक जो केवल दस्तावेज़ों पर अंगूठे का निशान लगा सकता थाने कथित तौर पर अपनी संपूर्ण चल और अचल संपत्ति उन्हें सौंप दी थी। 
  • प्रतिवादियों ने दावा किया कि वसीयतकर्ता ने उनके पक्ष में वसीयत इसलिये निष्पादित की क्योंकि उन्होंने उसकी देखरेख की थी। 
  • विचारण न्यायालय और प्रथम अपील न्यायालय ने वसीयत के निष्पादन से संबंधित कई संदिग्ध परिस्थितियों को पाते हुए उसे खारिज कर दिया। 
  • द्वितीय अपील मेंउच्च न्यायालय ने इन समवर्ती निष्कर्षों को पलट दिया और वसीयत को बरकरार रखते हुए कहा कि एक बार साक्षी द्वारा विधिवत सत्यापन साबित हो जाने के बादवसीयत का निष्पादन साबित हो जाता हैविशेष रूप से चूँकि यह एक रजिस्ट्रीकृत दस्तावेज़ था। 
  • पीड़ित विधवा के विधिक प्रतिनिधि ने उच्चतम न्यायालय का रुख किया। 

न्यायालय की क्या टिप्पणियां थीं? 

  • वसीयत को साबित करने के वास्तविक दायरे पर:न्यायालय ने माना कि वसीयत को साबित करना केवल वसीयतकर्ता के हस्ताक्षर और उत्तराधिकार अधिनियम की धारा 63 के अधीन उसके सत्यापन को स्थापित करने की प्रक्रिया नहीं है। यह न्यायालय की अंतरात्मा को संतुष्ट करने की प्रक्रिया है कि वसीयतकर्ता ने अपनी स्वतंत्र इच्छा सेवसीयत की विषयवस्तु से अवगत होते हुए और उसके प्रावधानों की प्रकृति और प्रभाव को समझते हुए उस पर हस्ताक्षर किये थे। 
  • संदेह की स्थिति में वसीयत प्रस्तुतकर्ता के दायित्त्व के संबंध में:न्यायालय ने माना कि जहाँ वसीयत के निष्पादन के आसपास संदिग्ध परिस्थितियाँ होंवहाँ वसीयत प्रस्तुतकर्ता को उन परिस्थितियों की व्याख्या करनी होगी और दस्तावेज़ को वास्तविक माने जाने से पहले इसके निष्पादन के संबंध में सभी उचित संदेहों को दूर करना होगा। 
  • "संदिग्ध परिस्थितियों" के संबंध में:न्यायालय ने पाया कि न्यायिक निर्णयों में इस वाक्यांश को जानबूझकर खुला रखा गया है जिससे ऐसी किसी भी परिस्थिति को शामिल किया जा सके जिससे यह संदेह उत्पन्न हो कि क्या वसीयत वास्तव में वसीयतकर्ता की स्वतंत्र इच्छा को दर्शाती हैतथापि यह मात्र कल्पना या संशयपूर्ण मन पर लागू नहीं होता। उदाहरण के तौर परसंदिग्ध या अस्पष्ट हस्ताक्षरवसीयतकर्ता की कमजोर या अनिश्चित मानसिक स्थितिसंपत्ति का अनुचित बंटवाराविधिक वारिसों (विशेषकर आश्रितों) का अनुचित बहिष्कारऔर वसीयत बनाने में लाभार्थी की सक्रिय या प्रमुख भूमिका जैसी परिस्थितियाँ इसमें शामिल हैं। 
  • इस मामले में विशिष्ट संदेहों के संबंध में:न्यायालय ने पाया कि प्रतिवादी कई वैध संदेहों को दूर करने में असफल रहेअर्थात्: 
    • वसीयत में वसीयतकर्ता की पत्नीजो उसकी एकमात्र क्लास की उत्तराधिकारी थीको पूरी तरह से बाहर कर दिया गया थाजबकि पूरी संपत्ति उन लोगों को सौंप दी गई थी जो करीबी रिश्तेदार भी नहीं थे। 
    • लाभार्थियों को वसीयतकर्ता के भतीजे के रूप में वर्णित किया गया थातथापि साक्ष्य में ऐसा कोई संबंध स्थापित नहीं हुआ था। 
    • रजिस्ट्रीकृत वसीयत के पीछे अनधिकृत परिवर्तन विद्यमान थेजहाँ रजिस्ट्रीकरण पृष्ठांकन में "लक्ष्मी कांत" नाम को कई स्थानों पर काट दिया गया था और उसकी जगह "छज्जू" लिख दिया गया थाबिना उप-पंजीयक के आद्याक्षर या प्रमाणीकरण के। 
  • साक्षी की परीक्षा की भूमिका पर:न्यायालय ने माना कि साक्षी की परीक्षा केवल एक औपचारिक प्रक्रिया नहीं है। वसीयत की प्रामाणिकता और सत्यता से संबंधित संदिग्ध परिस्थितियों को दूर करने का दायित्त्व प्रस्तुतकर्ता पर ही बना रहता हैभले ही सत्यापन साबित हो चुका हो। 
  • अनुतोष दिये जाने पर:न्यायालय ने अपील मंजूर कर लीप्रथम अपील न्यायालय और विचारण न्यायालय के निर्णयों को बहाल कर दियाविधवा को वाद संपत्ति का स्वामी घोषित कर दिया और विवादित वसीयत को खारिज कर दिया। 

भारतीय उत्तराधिकार अधिनियम, 1925 की धारा 63 क्या है? 

धारा 63 – विशेषाधिकाररहित वसीयतों का निष्पादन: 

यह नियम युद्ध/अभियान में तैनात सैनिकइसी प्रकार के किसी कार्य में लगे वायुसैनिक या समुद्री नाविक के सिवाय सभी वसीयतकर्ताओं पर लागू होता है। ऐसे वसीयतकर्ताओं को अपनी वसीयत निम्नानुसार बनानी होगी: 

  • हस्ताक्षर की आवश्यकता:वसीयतकर्ता को स्वयं वसीयत पर हस्ताक्षर या अपना चिह्न लगाना होगाया अपनी उपस्थिति में और अपने निर्देशानुसार किसी अन्य व्यक्ति से हस्ताक्षर करवाना होगा। 
  • हस्ताक्षर का स्थान:हस्ताक्षर या चिह्न (चाहे वसीयतकर्ता का हो या उसकी ओर से हस्ताक्षर करने वाले व्यक्ति का) इस प्रकार स्थित होना चाहिये जिससे यह स्पष्ट हो कि इसका उद्देश्य दस्तावेज़ को वसीयत के रूप में प्रभावी बनाना था। 
  • गवाहों द्वारा सत्यापन:वसीयत को दो या दो से अधिक साक्षियों द्वारा सत्यापित किया जाना चाहियेजिनमें से प्रत्येक ने या तो: (i) वसीयतकर्ता को हस्ताक्षर करते या अपना चिह्न लगाते हुए देखा होया (ii) किसी अन्य व्यक्ति को वसीयतकर्ता की उपस्थिति में और उसके निर्देश पर वसीयत पर हस्ताक्षर करते हुए देखा होया (iii) वसीयतकर्ता से अपने हस्ताक्षर/चिह्न या दूसरे व्यक्ति के हस्ताक्षर की व्यक्तिगत स्वीकृति प्राप्त की हो। 
  • गवाह के हस्ताक्षर:प्रत्येक गवाह को वसीयतकर्ता की उपस्थिति में वसीयत पर हस्ताक्षर करना होगालेकिन सभी गवाहों का एक ही समय पर उपस्थित होना आवश्यक नहीं है। 
  • कोई विहित प्रपत्र नहीं:विधि द्वारा सत्यापन के लिये किसी विशेष प्रपत्र की आवश्यकता नहीं है।