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आपराधिक कानून

रिश्वत स्वीकार करते समय मात्र उपस्थिति आपराधिक षड्यंत्र साबित करने के लिये अपर्याप्त है

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 30-Jun-2026

उत्तर प्रदेश राज्य बनाम ए.के. गाबा आदि 

"षड्यंत्र का अनुमान मात्र संदेह या व्यक्तियों के पारस्परिक संबंध के आधार पर नहीं लगाया जा सकता है और इसके लिये ठोस सबूत होने चाहिये जो अभियुक्तों के बीच विचारों की समानता को दर्शाते हों।" 

न्यायमूर्ति पंकज मिथल और न्यायमूर्ति प्रसन्ना बी. वराले 

स्रोत: उच्चतम न्यायालय 

चर्चा में क्यों? 

भारत के उच्चतम न्यायालय के न्यायमूर्ति पंकज मिथल और न्यायमूर्ति प्रसन्ना बी. वराले की खंडपीठ नेउत्तर प्रदेश राज्य बनाम एके गाबा आदि (2026)के मामले मेंतीन केंद्रीय उत्पाद शुल्क निरीक्षकों को दोषमुक्त करने वाले इलाहाबाद उच्च न्यायालय के निर्णय के विरुद्ध राज्य की अपील को खारिज कर दियायह मानते हुए कि रिश्वत स्वीकार किये जाने के समय उनकी मात्र उपस्थिति अपने आप में आपराधिक षड्यंत्र को स्थापित नहीं कर सकती है। 

उत्तर प्रदेश राज्य बनाम ए.के. गाबा आदि (2026) के मामले की पृष्ठभूमि क्या थी? 

  • यह मामला 1995 में CBI द्वारा किये गए एक जाल (ट्रैप) से जुड़ा हैजिसमें केंद्रीय उत्पाद शुल्क अधीक्षक आर.के. श्रीवास्तव ने कथित तौर पर एक कारखाने से जब्त किये गए दस्तावेज़ों को लौटाने के बदले में 80,000 रुपए की अवैध रिश्वत की मांग की थी। 
  • अभियोजन पक्ष ने आरोप लगाया कि इंस्पेक्टर ए.के. गाबाआलोक गुप्ता और दुष्यंत कुमार इस षड्यंत्र का भाग थेमुख्य रूप से इस आधार पर कि वे कथित तौर पर रिश्वत की मांग या स्वीकृति के दौरान मौजूद थे। 
  • विचारण न्यायालय ने अभियुक्त को आपराधिक षड्यंत्र और भ्रष्टाचार निवारण अधिनियम के अधीन अपराधों के लिये दोषसिद्ध ठहराया। 
  • अपील परइलाहाबाद उच्च न्यायालय ने दोषसिद्धि को पलट दियायह पाते हुए कि अभियोजन पक्ष मांगस्वीकृति और षड्यंत्र को साबित करने में असफल रहा था। 
  • उत्तर प्रदेश राज्य ने इस दोषमुक्ति के निर्णय को उच्चतम न्यायालय में चुनौती दी। 

न्यायालय की क्या टिप्पणियां थीं? 

  • आपराधिक षड्यंत्र के अनुमान पर:न्यायालय ने माना कि केवल संदेह या व्यक्तियों के पारस्परिक संबंध के आधार पर षड्यंत्र का अनुमान नहीं लगाया जा सकताऔर इसके लिये ठोस सबूत होने चाहिये जो अभियुक्तों के बीच पूर्व सहमति दर्शाते हों। न्यायालय ने स्पष्ट किया कि किसी अवैध कृत्य में लिप्त होने या अवैध साधनों द्वारा किसी वैध कृत्य को करने की जानकारी होना षड्यंत्र को सिद्ध करने के लिये आवश्यक हैऔर अपराध तभी पूर्ण होता है जब अभियुक्तों के बीच आपसी सहमति हो। 
  • ठोस साक्ष्यों के अभाव में:पीठ ने पाया किसंबंधित अवधि के दौरान कुछ स्थानों पर प्रत्यर्थियों की उपस्थिति का आरोप लगाने के अलावाअभियोजन पक्ष प्रत्यर्थियों और मुख्य अभियुक्त आर.के. श्रीवास्तव के बीच पूर्व करार या मिलीभगत को इंगित करने वाला कोई ठोस साक्ष्य प्रस्तुत करने में असफल रहा है। 
  • मुख्य अभियुक्त केवल एक अभियुक्त तक सीमित होने के संबंध में:न्यायालय ने पाया कि अभियोजन पक्ष के अपने मामले के अनुसार भीमांग का मुख्य आरोप केवल आर.के. श्रीवास्तव के विरुद्ध थाऔर यह दिखाने के लिये कोई स्वतंत्र सामग्री अभिलेख पर नहीं लाई गई कि प्रत्यर्थियों ने मांग में सक्रिय रूप से भाग लिया या अपेक्षित आपराधिक आशय को साझा किया। 
  • षड्यंत्र स्थापित करने के मानक पर:स्टेट (एनसीटी ऑफ दिल्ली) बनाम नवजोत संधू, (2005)पर भरोसा करते हुए , न्यायालय ने दोहराया कि षड्यंत्र का आरोप स्थापित करने के लिए अभियुक्तों के बीच षड्यंत्र रचने के लिए आपसी सहमति के संतोषजनक साक्ष्य की आवश्यकता होती हैजिसके बाद इसे प्रभावी बनाने वाले कार्य किए गएएक ऐसा मानक जिसे अभियोजन पक्ष पूरा करने में विफल रहा। 
  • इलेक्ट्रॉनिक साक्ष्य को छिपाने के संबंध में:न्यायालय ने माना कि अभियोजन पक्ष द्वारा रिश्वत की मांग को कथित रूप से रिकॉर्ड करने वाली टेप रिकॉर्डिंग को प्रस्तुत करने में विफलताटोमासो ब्रूनो बनाम उत्तर प्रदेश राज्य के मामले पर विश्वास करते हुएउसके विरुद्ध प्रतिकूल निष्कर्ष निकालने को उचित ठहराती है। 
  • मांग साबित करने में विफलता:चूँकि अभियोजन पक्ष प्रत्यर्थियों के विरुद्ध मांग के तथ्य को स्थापित करने में असफल रहाइसलिये भ्रष्टाचार निवारण अधिनियम की धारा के अधीन और साथ ही आपराधिक षड्यंत्र के लिये उनकी दोषमुक्ति को वैध माना गया। 

आपराधिक षड्यंत्र क्या है? 

बारे में: 

  • भारतीय न्याय संहिता, 2023 की धारा 61 आपराधिक षड्यंत्र को परिभाषित करती है और उसके लिये दण्ड निर्धारित करती हैजिसमें भारतीय दण्ड संहिता, 1860 की पूर्ववर्ती धारा 120क (परिभाषा) और 120 (दण्ड) को एक ही उपबंध में समेकित किया गया है। 

परिभाषा [धारा 61(1)]: 

  • आपराधिक षड्यंत्र तब उत्पन्न होता है जब दो या दो से अधिक व्यक्ति एक सामान्य उद्देश्य से सहमत होकर कोई अवैध कार्य करने या करवाने के लियेया किसी ऐसे कार्य को करने के लिये सहमत होते हैं जो अवैध नहीं हैलेकिन अवैध साधनों द्वारा किया जाता है। 
  • इस प्रकार के करार को आपराधिक षड्यंत्र माना जाता है। 
  • परंतुकपरंतु किसी अपराध को करने की सहमति के सिवाय कोई सहमति आपराधिक षड्यंत्र तब तक न होगीजब तक कि सहमति के अलावा कोई कार्य उसके अनुसरण में उस सहमति के एक अधिक पक्षकारों द्वारा नहीं कर दिया जाता 
  • स्पष्टीकरण: यह तत्वहीन है कि अवैध कार्य ऐसी सहमति का चरम उद्देश्य है या उस उद्देश्य का आनुषंगिक मात्र है 

दण्ड [धारा 61(2)]: 

  • गंभीर अपराध करने का षड्यंत्र:यदि कोई व्यक्ति मृत्युआजीवन कारावास या दो वर्ष या उससे अधिक अवधि के कठिन कारावास से दण्डनीय अपराध करने के आपराधिक षड्यंत्र में शरीक होगायदि ऐसे षड्यंत्र के दण्ड के लिये इस संहिता में कोई अभिव्यक्त उपबंध नहीं हैतो वह उसी प्रकार दण्डित किया जाएगामानो उसने ऐसे अपराध का दुष्प्रेरण किया था 
  • अन्य अपराध करने का षड्यंत्र:पूर्वोक्त रूप से दण्डनीय अपराध को करने के आपराधिक षड्यंत्र से भिन्न किसी आपराधिक षड्यंत्र में शरीक होगावह दोनों में से किसी भाँति के कारावास सेजिसकी अवधि छह मास से अधिक की नहीं होगीया जुर्माने सेया दोनों सेदण्डित किया जाएगा 

भारतीय न्याय संहिता की धारा 61 और भारतीय दण्ड संहिता की धारा 120-120ख के बीच अंतर: 

पहलू 

भारतीय दण्ड संहिता की धाराएँ 120-120 

भारतीय न्याय संहिता की धारा 61 

संरचना 

दो पृथक धाराओं में विभाजित—धारा 120 में परिभाषा तथा धारा 120ख में दण्ड का उपबंध 

एक ही धारा में समेकित—धारा 61(1) में परिभाषा तथा धारा 61(2) में दण्ड का उपबंध 

सामान्य उद्देश्य 

"कोई कार्य करने अथवा करवाने के लिये सहमत होना" शब्दों का प्रयोग किया गया हैकिंतु "सामान्य उद्देश्यशब्दावली का स्पष्ट उल्लेख नहीं है। 

स्पष्ट रूप से "सामान्य उद्देश्य से सहमत होनाकोई कार्य करने अथवा करवाने के लियेशब्दों का प्रयोग किया गया है। 

परिभाषा के अवयव 

अवर्णित क्रमांकित अंगों (1) और (2) के रूप में सूचीबद्ध 

अक्षरों से चिह्नित खंडों के रूप में सूचीबद्ध (क) "एक अवैध कार्य" और (ख) "एक ऐसा कार्य जो अवैध साधनों द्वारा अवैध नहीं है।" 

परंतुक (स्पष्ट कार्य की आवश्यकता) 

धारा 120 के परंतुक में यह उपबंध है कि केवल करार पर्याप्त नहीं होगाकरार के अतिरिक्त कोई कार्य किया जाना आवश्यक होगासिवाय उस स्थिति के जब करार स्वयं किसी अपराध को करने के लिये हो। 

यही सिद्धांत मूलतः धारा 61(1) में यथावत बनाए रखा गया है।  

स्पष्टीकरण 

धारा 120क के अंतर्गत यह स्पष्ट किया गया है कि अवैध कृत्य का अंतिम उद्देश्य होना या आकस्मिक उद्देश्य होना अप्रासंगिक है। 

धारा 61(1) के अंतर्गत मूल रूप से बरकरार रखा गया।  

गंभीर अपराधों के लिये दण्ड  

धारा 120(1) के अनुसारजहाँ षड्यंत्र ऐसा अपराध करने के लिये हो जो मृत्युदण्डआजीवन कारावास अथवा दो वर्ष या उससे अधिक के कठोर कारावास से दण्डनीय होवहाँ अभियुक्त को उसी प्रकार दण्डित किया जाएगा जैसे उसने उस अपराध का दुष्प्रेरण किया हो।  

धारा 61(2)(में यही व्यवस्था यथावत रखी गई हैकिंतु "आजीवन कारावासशब्दों का स्पष्ट उल्लेख किया गया है। 

अन्य आपराधिक षड्यंत्रों के लिये दण्ड 

धारा 120ख (2) के अनुसारछः माह तक का किसी भी प्रकार का कारावासअथवा जुर्मानाअथवा दोनों का उपबंध है। 

धारा 61(2)(में भी यही दण्ड व्यवस्था यथावत बनाए रखी गई है। 

पूर्व निर्णयों की निरंतरता 

भारतीय दंड संहिता के अधीन विकसित न्यायिक व्याख्याएँजैसे राज्य (राष्ट्रीय राजधानी क्षेत्र दिल्ली) बनाम नवजोत संधू) लागू थीं। 

यह उपबंध अभी भी लागू रहेगाक्योंकि इसके मूल तत्त्व में कोई परिवर्तन नहीं हुआ है।