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आपराधिक कानून

अपराधिता की ओर स्पष्ट रूप से संकेत करने वाली परिस्थितियों की संपूर्ण श्रृंखला के बिना केवल ‘अंतिम बार साथ देखे जाने’ का सिद्धांत दोषसिद्धि का आधार नहीं बन सकता

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 22-Jun-2026

लक्ष्मीकांत उर्फ ​​पप्पू (मृतऔर अन्य बनाम उत्तर प्रदेश राज्य 

"जिन परिस्थितियों से दोष सिद्ध करने का निष्कर्ष निकाला जाना हैउन्हें ठोस और दृढ़ रूप से स्थापित किया जाना चाहिये और वे परिस्थितियाँ निश्चित रूप से केवल अभियुक्त के दोष की ओर ही इंगित करनी चाहिये।" 

न्यायमूर्ति रजनीश कुमार और न्यायमूर्ति बबीता रानी 

स्रोत: इलाहाबाद उच्च न्यायालय 

चर्चा में क्यों? 

इलाहाबाद उच्च न्यायालय के न्यायमूर्ति रजनीश कुमार और न्यायमूर्ति बबीता रानी की खंडपीठ नेलक्ष्मीकांत उर्फ ​​पप्पू (मृतऔर अन्य बनाम उत्तर प्रदेश राज्य (2026)के मामले में 36 वर्षों के कारावास के बाद एक हत्या के दोषी को दोषमुक्त कर दियायह मानते हुए कि "अंतिम बार साथ देखे जाने" के साक्ष्य के आधार पर दोषसिद्धि को तब तक बरकरार नहीं रखा जा सकता जब तक कि अभियोजन पक्ष के साक्षी पक्षद्रोही न हो जाएंएकमात्र अंतिम बार साथ देखे जाने वाले साक्षी जीवित अपीलकर्त्ता की पहचान करने में विफल रहेकथित अवसर अफवाह पर आधारित होऔर परिस्थितियों की कड़ी पूरी तरह से अपूर्ण हो। 

  • न्यायालय ने आगे समपहरण की गई मोटरसाइकिल को रिहा करने का निदेश दियायह पाते हुए कि धारा 452 दण्ड प्रक्रिया संहिता (भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता की धारा 498) के अधीन समपहरण की कार्यवाही आगे नहीं बढ़ सकती है जहाँ बरामदगी साक्षी की परीक्षा नहीं की गई थी और वाहन का स्वामी न तो अभियुक्त था और न ही साक्षी था। 

लक्ष्मीकांत उर्फ ​​पप्पू (मृतऔर अन्य बनाम उत्तर प्रदेश राज्य (2026) के मामले की पृष्ठभूमि क्या थी? 

  • 2 नवंबर, 1986 को लगभग 17 वर्षीय दीपक कुमारजिला हरदोई के कस्बा शाहबाद के मोहल्ला दिलेरगंज से लापता हो गया। उसे लक्ष्मीकांत उर्फ ​​पप्पूजो नत्थू लाल का पुत्र था और जिसके घर में वह बिजली के सामान की दुकान चलाता थाके साथ एक राजदूत मोटरसाइकिल पर जाते हुए देखा गया था। मृतक और लक्ष्मीकांत की विवाहित बहन के बीच कथित अवैध संबंध की अफवाहों को लापता होने का कारण बताया गया। 
  • अगली सुबहशाहजहाँपुर के जमौर पुलिया के पास एक अज्ञात शव मिलाजिस पर गोली के निशान थे। मृतक के पिता ने उसकी पहचान दीपक कुमार के रूप में की। अपीलकर्त्ता सुनील कुमार के एक रिश्तेदार के घर से एक राजदूत मोटरसाइकिल बरामद की गई। 
  • 3 नवंबर, 1986 को शाहबाद पुलिस थानेजिला हरदोई में धारा 364 भारतीय दण्ड संहिता के अधीन चेक प्रथम सूचना रिपोर्ट (FIR) दर्ज की गई। अन्वेषण के बादचार अभियुक्तों - लक्ष्मीकांत उर्फ ​​पप्पूसुनील कुमारश्रीकांत और नत्थू लाल के विरुद्ध धारा 364, 302 और 120- भारतीय दण्ड संहिता के अधीन आरोप पत्र दायर किया गया। 
  • हरदोई के सेशन न्यायाधीश ने 4 मार्च, 1989 को दिये गए निर्णय में नत्थू लाल और श्रीकांत को दोषमुक्त कर दियालेकिन लक्ष्मीकांत उर्फ ​​पप्पू और सुनील कुमार को भारतीय दण्ड संहिता की धारा 302 और धारा 34 के अधीन दोषसिद्ध ठहराते हुए प्रत्येक को आजीवन कारावास और 5,000 रुपए का जुर्माना सुनाया। मोटरसाइकिल को राज्य के पक्ष में समपहृत करने का आदेश दिया गया।  
  • दोनों दोषियों ने आपराधिक अपीलें दायर कीं। अपील की सुनवाई के दौरान लक्ष्मीकांत उर्फ ​​पप्पू की मृत्यु हो गई; 15 फरवरी, 2024 के आदेश द्वारा उनकी अपील निरस्त कर दी गई। अपील केवल सुनील कुमार की ओर से ही जारी रही। मोटरसाइकिल के मालिक पुट्टू लाल त्रिवेदी ने समपहृत आदेश को चुनौती देते हुए एक अलग दाण्डिक अपील दायर की। 

न्यायालय की क्या टिप्पणियां थीं? 

  • अंतिम बार साथ देखे जाने के साक्ष्य के आधार पर:साक्षी संख्या 1 (PW-1), एकमात्र अंतिम बार साथ देखे जाने का साक्षीजीवित अपीलकर्त्ता सुनील कुमार का नाम या पहचान नहीं बता सकाजिससे सुनील कुमार की दोषसिद्धि के लिये उसका परिसाक्ष्य पूरी तरह से अप्रासंगिक हो गया। अभियोजन पक्ष ने सुशील कुमार सिंहएकमात्र स्वतंत्र साक्षीजिसने कथित तौर पर मोटरसाइकिल नंबर की पहचान की थीउसकी परीक्षा न होने का कोई कारण नहीं बताया 
  • संबंधित साक्षी के परिसाक्ष्य पर:मृतक की चाची, PW-4 के परिसाक्ष्य को अत्यधिक अविश्वसनीय मानते हुए खारिज कर दिया गया - न्यायालय ने यह देखते हुए कि हत्या करने के सामान्य आशय वाले व्यक्ति वैकल्पिक मार्ग उपलब्ध होने पर किसी परिचित के घर के सामने से बार-बार नहीं गुजरेंगे। 
  • पक्षद्रोही साक्षियों के संबंध में:अभियोजन पक्ष के प्रमुख साक्षी, PW-5 और PW-6, पक्षद्रोही हो गए। PW-6 ने स्पष्ट रूप से कहा कि धारा 161 दण्ड प्रक्रिया संहिता के अधीन उनका कथन भय और पुलिस के दुर्व्यपदेशन के अधीन अभिलिखित किया गया था। न्यायालय ने माना कि ऐसे कथनों को ठोस साक्ष्य के रूप में प्रयोग नहीं किया जा सकता हैऔर परिणामस्वरूप मृत्युकालिक कथन का तर्क विफल हो गया। 
  • हेतुक के संबंध में:जिन प्रेम पत्रों पर विश्वास किया गया थाउन्हें निश्चित रूप से उनके कथित लेखक से नहीं जोड़ा जा सकाऔर न्यायालय ने माना कि अफवाह हेतुक के सबूत का विकल्प नहीं हो सकती। 
  • पंचशील परीक्षण पर:शरद बिरधीचंद सरदा बनाम महाराष्ट्र राज्यऔरचेतन बनाम कर्नाटक राज्यके मामलों से पाँच स्वर्णिम सिद्धांतों को लागू करते हुएन्यायालय ने परिस्थितियों की श्रृंखला को गंभीर रूप से अपूर्ण पायाक्योंकि अभियोजन पक्ष अभियुक्त के अपराध के अलावा हर परिकल्पना को खारिज करने में असफल रहा था। 
  • दण्ड प्रक्रिया संहिता की धारा 452 (भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता की धारा 498) के अधीन ज़ब्ती के संबंध में:न्यायालय ने माना कि समपहरण तब तक मान्य नहीं हो सकता जब तक बरामदगी के साक्षी की परीक्षा न की गई होवाहन वापस करने से इंकार करने का कोई कारण अभिलिखित न किया गया होऔर स्वामी न तो अभियुक्त हो और न ही मामले में साक्षी हो। न्यायालय ने मोटरसाइकिल को अपीलकर्त्ता-स्वामी को सौंपने का निदेश दिया। 

"आखिरी बार साथ देखे जाने" का सिद्धांत क्या है? 

अवधारणा और अर्थ: 

  • "आखिरी बार साथ देखे जाने" का सिद्धांत आपराधिक विधिशास्त्र में प्रयुक्त परिस्थितिजन्य साक्ष्य का एक सिद्धांत है। यह तब लागू होता है जब दो व्यक्तियों को एक साथ जीवित देखा जाता हैऔर थोड़े समय बादएक व्यक्ति मृत पाया जाता है जबकि दूसरा जीवित रहता है। 
  • उनके आखिरी बार एक साथ देखे जाने और शव मिलने के बीच का समय अंतराल जितना कम होगाजीवित व्यक्ति द्वारा मृत्यु का कारण बनने की संभावना उतनी ही प्रबल होगी। 
  • यह धारणा इस तर्क पर आधारित है कि एक संक्षिप्त अंतराल किसी तीसरे पक्षकार द्वारा अपराध किये जाने की संभावना को खारिज कर देता है। 

साक्ष्य की प्रकृति: 

  • अंतिम बार साथ देखे जाने का साक्ष्य गौण और परिस्थितिजन्य प्रकृति का होता है। इसका प्रयोग मुख्यतः प्रत्यक्ष साक्ष्य या चश्मदीदों के अभाव में किया जाता है। 
  • यह सिद्धांत अपने आप में दोष सिद्ध करने के निष्कर्ष पर नहीं पहुँचता - इसे सहायक परिस्थितियों की एक श्रृंखला द्वारा समर्थित होना चाहिये जो मिलकर साक्ष्य पहेली को पूरा करती हैं। 
  • यदि श्रृंखला की एक भी कड़ी गायब या टूटी हुई हैतो अभियुक्त को संदेह का लाभ पाने का अधिकार है। 

सबूत का भार: 

  • सामान्य आपराधिक विधि के अधीनअभियोजन पक्ष को उचित संदेह से परे अपराध साबित करना होता हैऔर अभियुक्त को निर्दोष माना जाता है। 
  • तथापि, 'आखिरी बार साथ देखे जानेका सिद्धांत सबूत का भार अभियुक्त पर डाल देता है। 
  • एक बार जब अभियोजन पक्ष यह साबित कर देता है कि मृतक के साथ आखिरी बार देखा गया व्यक्ति अभियुक्त ही थातो परिस्थितियों को स्पष्ट करने का उत्तरदायित्त्व अभियुक्त का हो जाता है। 

प्रयोज्यता: 

  • यह सिद्धांत मुख्य रूप से हत्याव्यपहरण और बलात्संग जैसे गंभीर अपराधों में लागू होता हैजहाँ प्राय: प्रत्यक्ष साक्ष्य उपलब्ध नहीं होते हैं। 

न्यायिक निर्वचन: 

  • न्यायालयों ने इस सिद्धांत को मामले-दर-मामले के आधार पर सावधानीपूर्वक लागू किया है।जसवंत गिर बनाम पंजाब (2005) के मामले में, उच्चतम न्यायालय ने अभियुक्त को दोषमुक्त कर दिया क्योंकि मृतक के वाहन में सवार होने और शव मिलने के बीच का समय अंतराल पर्याप्त रूप से कम नहीं थाऔर अन्य परिस्थितिजन्य साक्ष्य एक पूर्ण कड़ी बनाने में असफल रहे। 
  • इसके विपरीतमहाराष्ट्र राज्य बनाम सुरेश (1998) केमामले मेंअभियुक्त को चार वर्ष की बच्ची के बलात्संग और हत्या के लिये दोषसिद्ध ठहराया गया था क्योंकि अंतिम बार देखे जाने के साक्ष्य की पुष्टि अन्य परिस्थितियों से हुई थी। 
  • इसी प्रकार, राजेंद्र प्रल्हादराव वासनिक बनाम महाराष्ट्र राज्य (2012के मामले में, तीन वर्षीय बच्ची के बलात्संग और हत्या के लिये दोषसिद्धि इसलिये हुई क्योंकि अभियुक्त को आखिरी बार बच्ची के साथ देखा गया था और साक्ष्यों की समग्रता ने अपराध को साबित कर दिया था। 
  • माधो सिंह बनाम राजस्थान राज्य (2003) केमामले मेंन्यायालय ने निर्णय दिया कि हत्या के सबूत के बिना भीउचित परिस्थितियों में अंतिम बार एक साथ देखे जाने के आधार पर दोषसिद्धि की अनुमति है।