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सिविल कानून

बिना पूर्व सूचना के एकपक्षीय आदेश देना प्रक्रिया का घोर दुरुपयोग है

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 19-Jun-2026

वीरेंद्र सिंह बनाम भूपेंद्र सिंह राणावत 

"इस न्यायालय की यह राय है कि विवादित आदेश विधि की प्रक्रिया का घोर दुरुपयोग है।" 

न्यायमूर्ति संजीत पुरोहित 

स्रोत: राजस्थान उच्च न्यायालय 

चर्चा में क्यों? 

राजस्थान उच्च न्यायालय के न्यायमूर्ति संजीत पुरोहित की एकल पीठ ने वीरेंद्र सिंह बनाम भूपेंद्र सिंह राणावत (2026)के मामले मेंराजस्व बोर्ड (BoR) द्वारा संबंधित पक्षकारों को बिना सूचना दिये और अधिकारिता से बाहर जाकर पारित आदेश को रद्द कर दिया। न्यायालय ने माना कि ऐसा आचरण विधि का घोर दुरुपयोग है और मामले को नए सिरे से सुनवाई के लिये वापस भेज दिया। 

वीरेंद्र सिंह बनाम भूपेंद्र सिंह राणावत (2026) के मामले की पृष्ठभूमि क्या थी? 

  • याचिकाकर्त्ता वीरेंद्र सिंह ने अतिरिक्त कलेक्टरजायल के समक्ष खातेदारी अधिकारों की घोषणा और स्थायी व्यादेश के लिये एक वाद दायर किया था। 
  • एक प्रत्यर्थीजो मूल रूप से वाद का पक्षकार नहीं थाने राजस्व बोर्ड के समक्ष उन कार्यवाही के विरुद्ध पुनरीक्षण याचिका दायर की जिसमें उसकी कोई औपचारिक भागीदारी नहीं थी। 
  • राजस्व बोर्ड ने मूल पक्षकारों को नोटिस जारी किये बिना और परिसीमा अधिनियम की धारा के अधीन विलंब की माफी के लिये लंबित आवेदन पर निर्णय लिये बिनापुनरीक्षण याचिका स्वीकार किये जाने के दिन ही एक आदेश पारित कर दिया। 
  • बोर्ड ने विचारण न्यायालय को प्रत्यर्थी को पक्षकार बनाने का निदेश दियातथापि प्रत्यर्थी ने कभी भी प्रथम दृष्ट्या न्यायालय के समक्ष पक्षकार बनने के लिये कोई आवेदन दाखिल नहीं किया था। 
  • इससे व्यथित होकर याचिकाकर्त्ता ने राजस्व बोर्ड द्वारा पारित दिनांक 20.04.2026 के आदेश को चुनौती देते हुए राजस्थान उच्च न्यायालय का रुख किया। 

न्यायालय की क्या टिप्पणियां थीं? 

  • प्राकृतिक न्याय के उल्लंघन पर:न्यायालय ने माना कि राजस्व बोर्ड ने मूल पक्ष कारों को सूचना दिये बिना आदेश पारित करके audi alteram partem  (दूसरे पक्ष को भी सुनने का) सिद्धांत की पूर्ण अवहेलना की है। 
  • अधिकारिता के उल्लंघन पर:न्यायालय ने पाया कि बोर्ड ने विचारण न्यायालय को ऐसे पक्षकार को पक्षकार बनाने का निदेश देकरजिसने पक्षकार बनने के लिये आवेदन भी दाखिल नहीं किया थाअपनी पर्यवेक्षी अधिकार सीमा का उल्लंघन किया और पुनरीक्षण याचिका में की गई प्रार्थना से आगे बढ़ गया। 
  • बोर्ड के आचरण पर:न्यायालय ने टिप्पणी की कि जिस तरीके से विवादित आदेश पारित किया गया था वह विधि के स्थापित और मूलभूत सिद्धांतों के विरुद्ध थाऔर आदेश को न्यायिक औचित्य का उल्लंघन करने वाली विधि की प्रक्रिया का घोर दुरुपयोग करार दिया। 
  • प्रशासनिक जवाबदेही के संबंध में:न्यायालय ने राजस्व बोर्ड के अध्यक्ष को मामले को किसी अन्य पीठ को सौंपने का निदेश दियाजिससे यह सुनिश्चित किया जा सके कि कार्यवाही पिछली त्रुटियों की छाया से मुक्त होकर जारी रहे। 

एकपक्षीय आदेश क्या होता है? 

बारे में: 

  • एकपक्षीय आदेश एकअस्थायीया अंतिम विधिक निर्णय होता है जो न्यायालय द्वारा केवल एक पक्षकार के तर्कों के आधार परदूसरे पक्षकार को सूचित किये बिना या उसकी उपस्थिति अनिवार्य किये बिना दिया जाता है। लैटिन भाषा से व्युत्पन्नइसका मूल अर्थ है "एक पक्षकार से"। 

सिविल प्रक्रिया संहिता के आदेश नियम 13 - प्रतिवादी के विरुद्ध एकपक्षीय डिक्री को अपास्त करना: 

  • जिस प्रतिवादी के विरुद्ध एकपक्षीय डिक्री पारित की गई हैवह डिक्री पारित करने वाले न्यायालय में इसे अपास्त करने के लिये आवेदन कर सकता है। 
  • अभियुक्त को न्यायालय को दो आधारों में से किसी एक पर संतुष्ट करना होगा: कि समन विधिवत तामील नहीं किया गया थाया कि वह पर्याप्त हेतुक से सुनवाई में उपस्थित होने से रोका गया था। 
  • यदि न्यायालय संतुष्ट हो जाता हैतो वह खर्चोंन्यायालय में भुगतान या अन्य किसी भी प्रकार से उचित शर्तों पर डिक्री को अपास्त कर देगा। 
  • डिक्री को अपास्त करने पर न्यायालय वाद की कार्यवाही के लिये एक दिन निर्धारित करेगा। 
  • जहाँ किसी डिक्री को केवल आवेदक प्रतिवादी के विरुद्ध ही अपास्त नहीं किया जा सकता हैवहाँ उसे सभी या किसी अन्य प्रतिवादियों के विरुद्ध भी अपास्त किया जा सकता है। 
  • यदि प्रतिवादी को सुनवाई की तारीख की सूचना थी और उपस्थित होने के लिए पर्याप्त समय दिया गया थातो कोई भी न्यायालय केवल समन की तामील में अनियमितता के आधार पर एकतरफा डिक्री को रद्द नहीं करेगा। 
  • जहाँ किसी एकपक्षीय डिक्री के विरुद्ध अपील को वापसी के अलावा किसी अन्य आधार पर निपटाया गया होवहाँ उस डिक्री को अपास्त करने के लिये इस नियम के अधीन कोई आवेदन नहीं किया जाएगा। 
  • यह नियम न्यायालय को न्याय के हितों को संतुलित करने और प्रक्रिया के दुरुपयोग को रोकने के लिये विवेकाधीन शक्ति प्रदान करता है।