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सांविधानिक विधि
उच्चतम न्यायालय ने कृत्रिम बुद्धिमत्ता संबंधी नियमों का मसौदा तैयार किया: न्यायिक परिणामों पर मानवीय पर्यवेक्षण
«12-Jun-2026
स्रोत: द हिंदू
परिचय
भारत के उच्चतम न्यायालय की AI समिति ने 'न्यायालयों में कृत्रिम बुद्धिमत्ता (AI) के उपयोग के लिये विनियम, 2026' का प्रारंभिक मसौदा जारी किया, जिसे 3 जून, 2026 को सार्वजनिक किया गया। मसौदा विनियमों में न्यायिक निर्णयों के अवधारण में AI के उपयोग पर रोक लगाई गई है, अनिवार्य मानवीय पर्यवेक्षण के बिना AI-सहायता प्राप्त शास्ति पर प्रतिबंध लगाया गया है, और किसी भी न्यायालय प्रक्रिया में "अपारदर्शी" या "अस्पष्ट" AI प्रणालियों के उपयोग की अनुमति नहीं दी गई है। ये विनियम न्यायालयों द्वारा AI-जनित सामग्री पर अंधाधुंध निर्भरता को लेकर बढ़ती चिंताओं के बीच आए हैं, जिसमें निर्णय सुनाना भी शामिल है।
पृष्ठभूमि
- मार्च 2026 में, न्यायमूर्ति पी.एस. नरसिम्हा की अध्यक्षता वाली उच्चतम न्यायालय की एक पीठ ने AI की सहायता से तैयार किये गए ऐसे निर्णयों पर विश्वास करने के लिये फटकार लगाई, जिनका असल में कोई अस्तित्व ही नहीं था।
- पीठ ने पाया कि इस प्रकार का विश्वास करना केवल निर्णय लेने में त्रुटि नहीं थी, अपितु न्यायिक कदाचार के समान था। इस घटना ने भारतीय न्यायालयों में कृत्रिम बुद्धिमत्ता को अपनाने को नियंत्रित करने वाले एक संरचित नियामक ढाँचे की आवश्यकता को उजागर किया।
- यह मसौदा न्यायमूर्ति पी.एस. नरसिम्हा की अध्यक्षता वाली समिति द्वारा तैयार किया गया है, जिसमें न्यायमूर्ति संजीव सचदेवा, राजा विजयराघवन वी., अनूप चिटकारा और सूरज गोविंदराज शामिल हैं। हितधारकों और आम जनता से 20 जून, 2026 की समय सीमा से पहले अपनी टिप्पणियां और सुझाव प्रस्तुत करने का अनुरोध किया गया है।
मसौदा विनियमों के प्रमुख प्रावधान
केवल सहायक क्षमता:
- मसौदा विनियमों में स्पष्ट रूप से कहा गया है कि न्यायालय प्रक्रियाओं में उपयोग किये जाने वाले AI सिस्टम को "केवल सहायक क्षमता में कार्य करना चाहिये" और "मानवीय निर्णय और न्यायिक अधिकार के प्रति पूरी तरह से अधीन" रहना चाहिये।
- इन विनियमों में न्यायिक कार्यवाही के किसी भी प्रक्रम में AI को निर्णय लेने वाले के रूप में परिकल्पित नहीं किया गया है।
जोखिम स्कोरिंग और प्रोफाइलिंग पर प्रतिबंध:
- इस मसौदे में न्यायालय प्रक्रियाओं में "जोखिम मूल्यांकन" के लिये AI सिस्टम के उपयोग पर स्पष्ट रूप से रोक लगाई गई है।
- इसमें भागने के जोखिम का आकलन करना, अपराध दोहराने की संभावना का अनुमान लगाना, जमानत की पात्रता का मूल्यांकन करना और पक्षकारों या साक्षियों की विश्वसनीयता निर्धारित करना शामिल है। AI सिस्टम को किसी भी आधार पर पक्षकारों या साक्षियों की प्रोफाइलिंग करने से भी प्रतिबंधित किया गया है।
उच्च जोखिम वाले अनुप्रयोगों के लिये बढ़ी हुई सुरक्षा व्यवस्था:
- ऐसे आवेदन जिनमें व्यक्तिगत स्वतंत्रता, किसी व्यक्ति के किसी भी वैध अधिकार या न्यायिक परिणामों की अखंडता के लिये उच्च स्तर का जोखिम शामिल होता है, उन पर तदनुसार उच्चतर सुरक्षा उपाय लागू होते हैं।
- इनमें मानव भागीदारी की अनिवार्य आवश्यकताएँ और स्वतंत्र पर्यवेक्षण तंत्र शामिल हैं।
निगरानी पर प्रतिबंध:
- इस मसौदे में अधिकारियों को न्यायिक अधिकारियों, अधिवक्ताओं, वादियों और न्यायालय के अन्य हितधारकों की निगरानी या निरंतर निगरानी के लिये AI का उपयोग करने से प्रतिबंधित किया गया है, सिवाय उन मामलों के जिन्हें लागू विधि द्वारा विशेष रूप से अधिकृत किया गया हो।
डेटा संरक्षण और पूर्वाग्रह-विरोधी दायित्त्व:
- कृत्रिम बुद्धिमत्ता प्रणालियों के माध्यम से व्यक्तिगत डेटा के प्रसंस्करण को डिजिटल व्यक्तिगत डेटा संरक्षण अधिनियम, 2023 द्वारा नियंत्रित किया जाएगा।
- इन विनियमों में यह भी अनिवार्य किया गया है कि AI सिस्टम मूलवंश, धर्म, जाति, लिंग, निर्योग्यता, भाषा, आर्थिक स्थिति या संविधान के अधीन प्रतिषिद्ध किसी अन्य आधार पर पूर्वाग्रह को कायम नहीं रख सकते, बढ़ा नहीं सकते या उत्पन्न नहीं कर सकते।
अनुमत उपयोग:
- इस मसौदे में प्रशासनिक और रसद संबंधी न्यायालय कार्यों के लिये AI के उपयोग की अनुमति दी गई है - जिसमें वाद प्रबंधन, मुकदमों की सूची तैयार करना, सुनवाई का समय निर्धारित करना, कार्यवाही का प्रतिलेखन और निर्णयों का अनुवाद शामिल है - बशर्ते कि ये उपयोग न्यायिक विवेकाधिकार का अतिक्रमण न करें।
डिजिटल पहुँच और समावेशन:
- इन विनियमों में कृत्रिम बुद्धिमत्ता (AI) की सहायता से चलने वाली न्यायिक प्रणालियों द्वारा डिजिटल विभाजन को और अधिक बढ़ाने के विरुद्ध चेतावनी दी गई है। इनमें यह निदेश दिया गया है कि ऐसी प्रणालियाँ सभी हितधारकों के लिये सुलभ बनी रहें, जिनमें ग्रामीण, आर्थिक रूप से पिछड़े या भाषाई विविधता वाले समुदायों के लोग भी शामिल हैं।
प्रस्तावित शीर्ष निकाय
न्यायपालिका में AI के उपयोग की निगरानी करने और मानक निर्धारण एवं नीति विकास को दिशा देने के लिये, मसौदे में उच्चतम न्यायालय स्तर पर एक पूर्णकालिक सर्वोच्च निकाय के गठन का प्रस्ताव है। इसके प्रस्तावित गठन में भारत के मुख्य न्यायाधीश द्वारा मनोनीत दो उच्चतम न्यायालय के न्यायाधीश (जिनमें से एक पदेन अध्यक्ष के रूप में कार्य करेगा), दो उच्च न्यायालय के मुख्य न्यायाधीश और दो उच्च न्यायालय के न्यायाधीश, राष्ट्रीय महत्त्व के एक संस्थान का प्रतिनिधि, इलेक्ट्रॉनिक्स एवं सूचना प्रौद्योगिकी मंत्रालय से संयुक्त सचिव स्तर का एक अधिकारी, एक वित्त विशेषज्ञ, एक साइबर सुरक्षा विशेषज्ञ, प्रौद्योगिकी एवं डेटा गोपनीयता विधि में विशेषज्ञता रखने वाले अधिवक्ता और भोपाल स्थित राष्ट्रीय न्यायिक अकादमी में AI क्षेत्र के प्रमुख प्रोफेसर शामिल हैं। मुख्य न्यायाधीश की पूर्व अनुमति से अनुसंधान या शैक्षणिक संस्थानों के अतिरिक्त विशेषज्ञों को भी शामिल किया जा सकता है।
निष्कर्ष
कृत्रिम बुद्धिमत्ता (AI) संबंधी नियमों का मसौदा AI उपकरणों पर न्यायिक संप्रभुता के सिद्धांत को संस्थागत रूप देने की दिशा में एक महत्त्वपूर्ण कदम है। AI को प्रशासनिक सहायता और निर्णय लेने वाली संस्था के रूप में स्पष्ट रूप से परिभाषित करते हुए, उच्चतम न्यायालय की समिति ने यह संकेत दिया है कि तकनीकी दक्षता निष्पक्ष सुनवाई, व्यक्तिगत स्वतंत्रता और न्यायिक जवाबदेही की सांविधानिक गारंटी की कीमत पर नहीं आ सकती। एक बार अंतिम रूप दिये जाने के बाद, इस ढाँचे का भारत में हर स्तर पर न्यायालयों द्वारा AI प्रणालियों को अपनाने और उपयोग करने के तरीके पर दूरगामी प्रभाव पड़ेगा।