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सिविल कानून
उच्चतम न्यायालय ने जमानत नामंजूर करते हुए कहा कि सूचना का अधिकार सक्रियता एक नया व्यवसाय है
« »15-Jun-2026
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रमेश कुमार बहल बनाम पंजाब राज्य "सूचना का अधिकार कार्यकर्त्ता अब एक नए व्यवसाय का रूप ले चुके हैं। केंद्र सरकार ने धनराशि आवंटित कर दी है; सड़क निर्माण का कार्य वह स्वयं सुनिश्चित करेगी। आप कोई प्राधिकृत व्यक्ति नहीं हैं। स्वयंभू सूचना का अधिकार कार्यकर्त्ता!" न्यायमूर्ति संदीप मेहता और न्यायमूर्ति विजय बिश्नोई |
स्रोत: उच्चतम न्यायालय
चर्चा में क्यों?
भारत के उच्चतम न्यायालय के न्यायमूर्ति संदीप मेहता और न्यायमूर्ति विजय बिश्नोई की खंडपीठ ने रमेश कुमार बहल बनाम पंजाब राज्य (2026) के मामले में, सरकारी सड़क निर्माण कार्य में बाधा डालने, एक पर्यवेक्षक अधिकारी पर हमला करने और साइट पर काम कर रहे मजदूरों के विरुद्ध जाति आधारित अपमानजनक टिप्पणी करने के अभियुक्त एक RTI कार्यकर्त्ता की अग्रिम जमानत याचिका खारिज कर दी।
- न्यायालय ने पंजाब और हरियाणा उच्च न्यायालय के अग्रिम जमानत याचिका खारिज करने के आदेश को बरकरार रखते हुए, वैध सरकारी कार्यों में बाधा डालने वाले तथाकथित RTI कार्यकर्त्ताओं के आचरण पर मौखिक टिप्पणी की।
रमेश कुमार बहल बनाम पंजाब राज्य (2026) के मामले की पृष्ठभूमि क्या थी?
- याचिकाकर्त्ता रमेश कुमार बहल, जो एक RTI कार्यकर्त्ता हैं, ने एक अन्य अभियुक्त के साथ मिलकर कथित तौर पर परिवादकर्त्ता, जो एक लोक सेवक हैं, की देखरेख में चल रहे सड़क निर्माण कार्य में बाधा डाली।
- याचिकाकर्त्ता और उसके सह-अभियुक्तों पर परिवादकर्त्ता और कार्यस्थल पर मौजूद मजदूरों को धमकाने का आरोप है। यह भी आरोप है कि याचिकाकर्त्ता ने परिवादकर्त्ता को लात मारी जबकि अन्य अभियुक्तों ने उसे घूंसे मारे। इसके अतिरिक्त, कार्यस्थल पर मजदूरों के विरुद्ध जाति आधारित अपमानजनक टिप्पणियां की गईं।
- इसके बाद याचिकाकर्त्ता के विरुद्ध भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता (BNSS), 2023 की धारा 304(2), 132, 221, 121(1), 351(2), और 351(3) के साथ-साथ भारतीय न्याय संहिता, 2023 की धारा 3(5) और 121(2) और अनुसूचित जाति एवं अनुसूचित जनजाति (अत्याचार निवारण) अधिनियम, 1989 की धारा 3(1) के अधीन प्रथम सूचना रिपोर्ट (FIR) दर्ज की गई।
- पंजाब और हरियाणा उच्च न्यायालय ने अग्रिम जमानत याचिका खारिज कर दी, यह मानते हुए कि प्रथम सूचना रिपोर्ट में लगाए गए आरोप सरकारी कामकाज में बाधा डालने में प्रत्यक्ष और स्पष्ट संलिप्तता को दर्शाते हैं। याचिकाकर्त्ता ने इस आदेश को चुनौती देते हुए उच्चतम न्यायालय का रुख किया।
न्यायालय की क्या टिप्पणियां थीं?
- RTI कार्यकर्त्ताओं के आचरण पर: न्यायालय ने तथाकथित RTI कार्यकर्त्ताओं की भूमिका पर तीखे मौखिक टिप्पणी करते हुए प्रश्न उठाए, जो बिना किसी विधिक अधिकार के स्वयं को सरकारी कार्यों का निगरानीकर्त्ता बताते हैं। न्यायमूर्ति मेहता ने टिप्पणी की कि RTI सक्रियता एक नया व्यवसाय बन गया है, और याचिकाकर्त्ता को वैध सरकारी वित्त पोषित निर्माण कार्य में हस्तक्षेप करने का कोई अधिकार नहीं है।
- सरकारी कार्यों की निगरानी करने के अधिकार पर: न्यायमूर्ति बिश्नोई ने प्रश्न उठाया कि याचिकाकर्त्ता किस आधार पर सड़क निर्माण की प्रगति की निगरानी कर रहा है, यह देखते हुए कि याचिकाकर्त्ता कोई उच्चतर या पर्यवेक्षी प्राधिकरण नहीं है जो परियोजना के निष्पादन में हस्तक्षेप करने का हकदार हो।
- उच्च न्यायालय के आदेश पर: न्यायालय को पंजाब और हरियाणा उच्च न्यायालय के उस आदेश में हस्तक्षेप करने का कोई आधार नहीं मिला, जिसमें यह निष्कर्ष निकाला गया था कि प्रथम सूचना रिपोर्ट से लोक सेवक द्वारा आधिकारिक कर्त्तव्यों के निर्वहन में बाधा डालने में अभियुक्तों की प्रत्यक्ष और विशिष्ट संलिप्तता का पता चलता है। तदनुसार, विशेष अनुमति याचिका खारिज कर दी गई।
सूचना का अधिकार (RTI) अधिनियम, 2005 क्या है?
बारे में:
- सूचना का अधिकार अधिनियम, 2005 के अधीन नागरिकों द्वारा सरकार से संबंधित जानकारी के लिये किये गए अनुरोधों का समय पर जवाब देना अनिवार्य है।
- इसका मूल उद्देश्य नागरिकों को सशक्त बनाना, सरकारी कामकाज में पारदर्शिता और जवाबदेही को बढ़ावा देना, भ्रष्टाचार पर अंकुश लगाना और लोकतंत्र को वास्तविक अर्थों में लोगों के लिये कारगर बनाना है।
मुख्य उपबंध:
- सूचना का अधिकार (धारा 3): अधिनियम के प्रावधानों के अधीन रहते हुए, सभी नागरिकों को सूचना का अधिकार है।
- लोक प्राधिकरणों के दायित्त्व (धारा 4): लोक प्राधिकरणों को अभिलेखों का रखरखाव और सूचीकरण करना होगा, उन्हें उचित समय के भीतर कम्प्यूटरीकृत करना होगा, अधिनियमित होने के 120 दिनों के भीतर संगठनात्मक विवरण प्रकाशित करना होगा, और प्रभावित व्यक्तियों को प्रशासनिक या अर्ध-न्यायिक निर्णयों के कारण प्रदान करने होंगे।
- लोक सूचना अधिकारी (धारा 5): प्रत्येक लोक प्राधिकरण को केंद्रीय या राज्य लोक सूचना अधिकारियों को नामित करना होगा; उप-विभागीय या उप-जिला स्तर पर सहायक PIO को नामित किया जाएगा।
- सूचना के लिये अनुरोध (धारा 6): अनुरोध लिखित रूप में, इलेक्ट्रॉनिक रूप से या मौखिक रूप से किया जा सकता है; आवेदकों को सूचना मांगने के कारण बताने की आवश्यकता नहीं है।
- अनुरोध का निपटान (धारा 7): सूचना 30 दिनों के भीतर प्रदान की जानी चाहिये; यदि यह जीवन या स्वतंत्रता से संबंधित है, तो 48 घंटों के भीतर; फीस ली जा सकती है।
- छूट (धारा 8): राष्ट्रीय सुरक्षा, व्यावसायिक निजता और व्यक्तिगत निजता सहित कई आधारों पर प्रकटीकरण से इंकार किया जा सकता है; हालाँकि, छूट के बावजूद लोक हित में प्रकटीकरण संभव है।
- अस्वीकृति और पृथक्करणीयता (धारा 9-10): कॉपीराइट का उल्लंघन करने वाले अनुरोधों को अस्वीकार किया जा सकता है; जहाँ छूट प्राप्त जानकारी पृथक्करणीय है, वहाँ रिकॉर्ड के शेष भाग तक पहुँच प्रदान की जानी चाहिये।
- तृतीय पक्षकार को सूचना (धारा 11): तृतीय पक्षकारों से संबंधित या उनके द्वारा प्रदत्त सूचना के प्रबंधन के लिये एक विहित प्रक्रिया निर्धारित की गई है।
- सूचना आयोग (धारा 12-17): केंद्रीय और राज्य सूचना आयोगों का गठन किया जाता है; सूचना आयुक्तों की नियुक्ति, कार्यकाल, वेतन और हटाने के प्रावधान हैं।
- आयोगों की शक्तियां (धारा 18): आयोग परिवादों की जांच कर सकते हैं और सिविल न्यायालय की शक्तियों का प्रयोग कर सकते हैं।
- अपीलें (धारा 19): प्रथम और द्वितीय अपील तंत्र प्रदान किये गए हैं; सूचना आयोगों के निर्णय बाध्यकारी हैं।
- शास्ति (धारा 20): अनुचित इंकार, विलंब या बाधा डालने पर PIO पर शास्ति अधिरोपित की जा सकती है; निरंतर उल्लंघन के लिये अनुशासनात्मक कार्रवाई की जा सकती है।