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आपराधिक कानून

आधिकारिक गोपनीयता अधिनियम अभियुक्तों को आरोपपत्र संबंधी दस्तावेज़ उपलब्ध कराने में बाधक नहीं है

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 06-Jun-2026

वी.के. सिंह बनाम केंद्रीय अन्वेषण ब्यूरो और अन्य 

"केवल इस आधार पर अपीलकर्त्ताओं को दस्तावेज़ों की आपूर्ति से इंकार नहीं किया जा सकता है कि उनके विरुद्ध शासकीय गुप्त बात के प्रावधानों को लागू किया गया है।" 

न्यायमूर्ति जे.के. माहेश्वरी और अतुल एस. चंदुरकर 

स्रोत: उच्चतम न्यायालय 

चर्चा में क्यों? 

भारत के उच्चतम न्यायालय के न्यायमूर्ति जे.के. माहेश्वरी और अतुल एस. चंदुरकर की पीठ नेवी.के. सिंह बनाम केंद्रीय जांच ब्यूरो एवं अन्य (2026)के मामले में यह निर्णय दिया कि शासकीय गुप्त बात अधिनियम, 1923 (OSA) के अधीन अभियुक्त व्यक्ति को आरोपपत्र में उल्लिखित दस्तावेज़ों की प्रतियाँ केवल इस आधार पर देने से इंकार नहीं किया जा सकता कि उनकी आपूर्ति देश की सुरक्षा और संप्रभुता को खतरे में डाल सकती है। दिल्ली उच्च न्यायालय के उस आदेश को अपास्त करते हुएजिसमें अभियुक्त को केवल दस्तावेज़ों के निरीक्षण तक सीमित कर दिया गया थान्यायालय ने CBI को निदेश दिया कि वह अभियुक्त केधारा 207 दण्ड प्रक्रिया संहिता (भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता की धारा 230) के अधीन दायर आवेदन में उल्लिखित सभी दस्तावेज़ों की टाइप की हुई प्रतियाँ दो महीने के भीतर उपलब्ध कराए। 

वी.के. सिंह बनाम केंद्रीय अन्वेषण ब्यूरो और अन्य (2026) के मामले की पृष्ठभूमि क्या थी? 

  • अपीलकर्त्ता वी.के. सिंहजो भारतीय सेना के सेवानिवृत्त मेजर जनरल और नवंबर 2000 से जून 2004 तक कैबिनेट सचिवालय (R&AW) में पूर्व संयुक्त सचिव थेपर शासकीय गुप्त बात अधिनियम, 1923 की धारा और तथा भारतीय दण्ड संहिता, 1860 की धारा 409 और 120ख के अधीन मामला दर्ज किया गया था। 
  • अभियोजन पक्ष ने आरोप लगाया कि अपीलकर्त्ता ने "भारत की बाहरी खुफिया जानकारी - अनुसंधान और विश्लेषण विंग (RAW) के रहस्य" नामक एक पुस्तक प्रकाशित की थीजिसमें सेना के बारे में वर्गीकृत जानकारी का प्रकटन किया गया था और राज्य के गुप्त मामलों को आम जनता और विदेशी देशों के लिये सुलभ बनाया गया थाजिससे भारत की सुरक्षा और संप्रभुता खतरे में पड़ गई थी। 
  • CBI ने आरोपपत्र दाखिल किया और विचारण न्यायालय से अनुरोध किया कि आरोपपत्र में शामिल सभी गोपनीय दस्तावेज़ों को सीलबंद लिफाफे में रखा जाए। 
  • विचारण न्यायालय ने संज्ञान लिया और उसके बाद धारा 207 दण्ड प्रक्रिया संहिता के अधीन दायर आवेदन के अनुसार अभियुक्त को दस्तावेज़ उपलब्ध कराने का निदेश दिया। 
  • इस निदेश से असंतुष्ट होकर अभियोजन पक्ष ने दिल्ली उच्च न्यायालय में अपील कीजिसने विचारण न्यायालय के आदेश में संशोधन किया और अभियुक्त को दस्तावेज़ों की प्रतियाँ प्राप्त करने के बजाय केवल विचारण न्यायालय के पास विद्यमान दस्तावेज़ों का निरीक्षण करने की अनुमति दी। 
  • अपीलकर्त्ता ने उच्च न्यायालय के आदेश को उच्चतम न्यायालय में चुनौती दीयह तर्क देते हुए कि शासकीय गुप्त बात अधिनियम का आह्वान करने से अभियुक्त का आरोपपत्र का भाग बनने वाले दस्तावेज़ों की प्रतियाँ प्राप्त करने का अधिकार समाप्त नहीं हो जाता है। 

न्यायालय की क्या टिप्पणियां थीं? 

  • दण्ड प्रक्रिया संहिता की धारा 207 के अधीन अभियुक्त के दस्तावेज़ों के अधिकार पर:न्यायालय ने माना कि यह स्थापित विधि है कि अभियुक्त को आरोपपत्र के दस्तावेज़ों तक पहुँच से वंचित नहीं किया जा सकता हैजिनमें सामान्य डायरी के दस्तावेज़ भी शामिल हैंयदि ऐसे दस्तावेज़ सद्भावना से प्राप्त किए गए होंअभियोजन पक्ष के मामले से संबंधित होंऔर लोक अभियोजक द्वारा न्याय और निष्पक्ष विचारण के हित में उनका प्रकटन आवश्यक समझा जाता हो। ऐसे दस्तावेज़ों को रोकना अभियुक्त के निष्पक्ष विचारण के अधिकार को गंभीर रूप से प्रभावित कर सकता है।  
  • शासकीय गुप्त बात अधिनियम के लागू होने के प्रभाव पर:न्यायालय ने स्पष्ट रूप से कहा कि किसी अभियुक्त के विरुद्ध शासकीय गुप्त बात अधिनियम के प्रावधानों का मात्र प्रयोगआरोपपत्र में उल्लिखित दस्तावेज़ों की आपूर्ति से इंकार करने का आधार नहीं हो सकता। शासकीय गुप्त बात अधिनियम देश के आपराधिक विधि के अंतर्गत अभियुक्त के सांविधिक अधिकार का उल्लंघन नहीं करता। 
  • शासकीय गुप्त बात अधिनियम की धारा 14 के अधीन CBI की दलील पर:न्यायालय ने CBI के इस तर्क को खारिज कर दिया कि दस्तावेज़ों की आपूर्ति से देश के सुरक्षा हितों को खतरा होगाइसे केवल एक आशंका करार दिया जो अभियुक्त के सांविधिक अधिकार को कम या समाप्त नहीं कर सकती।पश्चिम बंगाल के विधिक मामलों के अधीक्षक एवं सलाहकार बनाम सत्येन भौमिक एवं अन्य (1981)के मामले पर विश्वास करते हुए न्यायालय ने कहा कि यदि अभियुक्त को संबंधित दस्तावेज़ उपलब्ध नहीं कराए जाते हैंतो उसके लिये अपने अधिवक्ता को प्रभावी ढंग से निदेश देना और अभियोजन पक्ष के साक्षियों से प्रतिरक्षा करना असंभव हो जाता है। 
  • शासकीय गुप्त बात अधिनियम की धारा के अधीन सुरक्षा उपायों की पर्याप्तता पर:न्यायालय ने पाया कि शासकीय गुप्त बात अधिनियम की धारा के अधीन पर्याप्त सुरक्षा उपाय पहले से ही मौजूद हैंजिसके अनुसार किसी भी व्यक्ति – अधिवक्ता सहित - द्वारा न्यायालय के बाहर कार्यवाही के दौरान प्राप्त संवेदनशील जानकारी का प्रकटन करना अपराध है। यह प्रावधान स्वयं ही गोपनीय सामग्री के किसी भी प्रकार के रिसाव को रोकने का काम करता है। 
  • जारी निर्देशों पर:न्यायालय ने CBI को निर्देश दिया कि वह अपीलकर्त्ता के धारा 207 दण्ड प्रक्रिया संहिता के अधीन दायर आवेदन में उल्लिखित दस्तावेज़ों की टाइप की हुई प्रतियाँ दो महीने के भीतर उपलब्ध कराए। न्यायालय ने यह भी निदेश दिया कि यदि आवश्यक हो तो विचारण न्यायालय द्वारा कार्यवाही के दौरान ऐसे दस्तावेज़ों का निरीक्षण करने की अनुमति दी जाए। 

भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता की धारा 230 क्या है? 

बारे में: 

  • भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता, 2023 (BNSS) की धारा 230, दण्ड प्रक्रिया संहिता, 1973 (CrPC) की धारा 207 का उत्तराधिकारी उपबंध है। 
  • इसमें पुलिस रिपोर्ट के आधार पर दर्ज किये गए मामलों में अभियुक्त और पीड़ित (यदि किसी अधिवक्ता द्वारा प्रतिनिधित्व किया जा रहा हो) को पुलिस रिपोर्ट और साथ में संलग्न दस्तावेज़ों की प्रतियाँ नि:शुल्क और निर्धारित समय सीमा के भीतर उपलब्ध कराने का प्रावधान है। 
  • यह एक मूलभूत उपबंध है जो निष्पक्ष विचारण की सांविधानिक प्रत्याभूति को प्रभावी बनाता है। 

मुख्य उपबंध: 

  • दस्तावेज़ उपलब्ध कराने की समय सीमा: मजिस्ट्रेट को अभियुक्त के न्यायालय में पेश होने या उपस्थित होने की तारीख से चौदह दिनों के भीतर बिना किसी विलंब के दस्तावेज़ उपलब्ध कराना अनिवार्य है। यह विशिष्ट समय सीमा भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता के अधीन एक महत्त्वपूर्ण संशोधन हैजो धारा 207 दण्ड प्रक्रिया संहिता में विउद्यमान नहीं था। 
  • उपलब्ध कराए जाने वाले दस्तावेज़: निम्नलिखित दस्तावेज़ अभियुक्त और पीड़ित (यदि किसी अधिवक्ता द्वारा प्रतिनिधित्व किया जा रहा हो) को नि:शुल्क उपलब्ध कराए जाने चाहिये: पुलिस रिपोर्टधारा 173 भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता के अधीन दर्ज प्रथम सूचना रिपोर्टउन सभी व्यक्तियों के कथन जो अभियोजन पक्ष साक्षियों के रूप में पेश करना चाहता हैधारा 180(3) भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता के अधीन अभिलिखित किये गए हैंजिसमें वह भाग शामिल नहीं है जिसके लिये पुलिस अधिकारी ने धारा 193(7) भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता के अधीन छूट मांगी हैधारा 183 भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता के अधीन अभिलिखित संस्वीकृति और कथनयदि कोई होऔर कोई अन्य दस्तावेज़ या सुसंगत अंश जो धारा 193(6) भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता के अधीन पुलिस रिपोर्ट के साथ मजिस्ट्रेट को भेजा गया हो। 
  • प्रथम परंतुक - बहिष्कृत कथनों का आंशिक प्रकटीकरण: जहाँ किसी पुलिस अधिकारी ने किसी साक्षी के कथन के किसी भाग को बहिष्कृत करने की मांग की हैवहाँ मजिस्ट्रेट उस भाग का अवलोकन करने और बहिष्करण के लिये दिये गए कारणों पर विचार करने के बाद यह निदेश दे सकता है कि उस भाग की प्रति या उसके ऐसे भाग की प्रतिजिसे मजिस्ट्रेट उचित समझेफिर भी अभियुक्त को उपलब्ध कराई जाए। 
  • दूसरा परंतुक – विशाल दस्तावेज़: यदि मजिस्ट्रेट संतुष्ट है कि कोई दस्तावेज़ विशाल हैतो वह भौतिक प्रति उपलब्ध कराने के बजायइलेक्ट्रॉनिक माध्यम से प्रतियाँ उपलब्ध करा सकता है या निदेश दे सकता है कि अभियुक्त और पीड़ित को केवल व्यक्तिगत रूप से या किसी अधिवक्ता के माध्यम से न्यायालय में दस्तावेज़ का निरीक्षण करने की अनुमति दी जाएगी। 
  • तीसरा परंतुक - इलेक्ट्रॉनिक आपूर्ति: इलेक्ट्रॉनिक रूप में दस्तावेज़ों की आपूर्ति को स्पष्ट रूप से वैध माना जाता है और इस धारा के प्रयोजनों के लिये इसे विधिवत प्रस्तुत किया गया माना जाएगा। 
  • पीड़ित को शामिल करना — दण्ड प्रक्रिया संहिता से प्रमुख अंतर: दण्ड प्रक्रिया संहिता की धारा 207 के विपरीतजिसमें केवल अभियुक्त को ही दस्तावेज़ों की आपूर्ति अनिवार्य थीभारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता की धारा 230 पीड़ित को भी इन दस्तावेज़ों की प्रतियाँ प्राप्त करने का अधिकार देती हैबशर्ते पीड़ित का प्रतिनिधित्व एक अधिवक्ता द्वारा किया जा रहा हो। यह भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता के पीड़ित-केंद्रित न्याय पर व्यापक बल को दर्शाता है। 

शासकीय गुप्त बात अधिनियम, 1923 क्या है? 

बारे में: 

  • शासकीय गुप्त बात अधिनियम, 1923 (OSA) औपनिवेशिक काल का एक विधान है जिसकी उत्पत्ति भारतीय शासकीय गुप्त बात अधिनियम, 1889 से हुई हैजिसे मुख्य रूप से प्रेस की असहमति को दबाने के लिये लागू किया गया था। लॉर्ड कर्ज़न के नेतृत्व में 1904 में इसे और अधिक कठोर बनाया गया और अंततः 1923 में इसे संशोधित और समेकित करके इसके वर्तमान स्वरूप में लाया गया। यह जासूसीगोपनीय सूचना और संवेदनशील राजकीय रहस्यों के अनधिकृत प्रकटीकरण को नियंत्रित करने वाला भारत का प्राथमिक विधि है। 

उद्देश्य एवं प्रयोज्यता: 

  • शासकीय गुप्त बात अधिनियम का उद्देश्य जासूसी और गोपनीय एवं संवेदनशील सूचनाओं के अनधिकृत प्रकटीकरण को रोकना हैजिससे भारत की संप्रभुताक्षेत्रीय अखंडता और रणनीतिक हितों की रक्षा हो सकेविशेष रूप से विदेशी खतरों से। यह अधिनियम सभी भारतीय नागरिकों पर लागू होता हैजिनमें सरकारी अधिकारी भी शामिल हैंचाहे वे भारत में कार्यरत हों या विदेश मेंऔर गैर-नागरिकों पर भी लागू होता है यदि वे जासूसी क्रियाकलापों में संलिप्त पाए जाते हैं। 

मुख्य उपबंध: 

  • धारा 3 — जासूसी और राष्ट्रीय सुरक्षा के विरुद्ध कृत्य: यह धारा जासूसी और राज्य की सुरक्षा के लिये हानिकारक क्रियाकलापों को अपराध घोषित करती हैजिसमें संवेदनशील दस्तावेज़ों का कब्ज़ा और गुप्त कोड या वर्गीकृत जानकारी को अनधिकृत व्यक्तियों के साथ साझा करना शामिल है। इसके लिये अधिकतम चौदह वर्ष तक की कारावास के दण्ड का उपबंध है। 
  • धारा 5 — अनधिकृत प्रकटीकरण और कब्ज़ा: यह धारा आधिकारिक दस्तावेज़ों या सूचनाओं के अनधिकृत प्रकटीकरणकब्ज़ेप्रतिधारण या उन्हें वापस न करने पर दण्ड का प्रावधान करती है। इसमें वे व्यक्ति भी शामिल हैं जो जानबूझकर ऐसी गोपनीय जानकारी प्राप्त करते हैंजिससे प्रकटीकरणकर्ता और प्राप्तकर्ता दोनों अधिनियम के अंतर्गत उत्तरदायी ठहराए जाते हैं। 
  • धारा 10 - जासूसों को शरण देना: यह धारा उन व्यक्तियों को शरण देने या छिपाने के अपराध से संबंधित है जिनके बारे में यह ज्ञात हो या उचित रूप से संदेह हो कि वे जासूसी या राज्य की सुरक्षा के लिये हानिकारक अन्य क्रियाकलापों में संलग्न हैं।