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सिविल कानून
सिविल प्रक्रिया संहिता का आदेश 12 नियम 6
« »12-May-2026
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"किसी स्वीकृति के आधार पर, चाहे वह अभिवचनों में निहित हो या कहीं और, आदेश 12, नियम 6 सिविल प्रक्रिया संहिता के अंतर्गत कोई डिक्री पारित की जा सकती है। ऐसी स्वीकृति लिखित या मौखिक भी हो सकती है। स्वीकृति के लिये कोई विशेष प्ररूप आवश्यक नहीं है।" न्यायमूर्ति जे.बी. परदीवाला और न्यायमूर्ति उज्ज्वल भुइयां |
स्रोत: उच्चतम न्यायालय
चर्चा में क्यों?
भारत के उच्चतम न्यायालय की एक खंडपीठ, जिसमें न्यायमूर्ति जे.बी. परदीवाला और न्यायमूर्ति उज्ज्वल भुइयां शामिल थे, ने शेख अबेदीन बनाम इकबाल अहमद और अन्य (2026) के मामले में, एक प्रतिवादी द्वारा दायर विशेष अनुमति याचिका को खारिज कर दिया, जिसे आपराधिक कार्यवाही में उसके द्वारा की गई स्वीकृति के आधार पर वाद परिसर खाली करने का निदेश दिया गया था, जिसमें उसने स्वीकार किया था कि वह वादी के अधीन केवल एक कार्यवाहक के रूप में संपत्ति पर कब्जा कर रहा था।
- न्यायालय ने विचारण न्यायालय, प्रथम अपीलीय न्यायालय और उच्च न्यायालय के समवर्ती निष्कर्षों को बरकरार रखा और पुष्टि की कि सिविल प्रक्रिया संहिता, 1908 (CPC) के आदेश 12 नियम 6 के अधीन स्वीकृति पर दिया गया निर्णय, अभवचनों के बाहर की गई स्वीकृतियों पर आधारित हो सकता है, जिसमें आपराधिक कार्यवाही में की गई स्वीकृति भी शामिल हैं, बशर्ते कि ऐसी स्वीकृति स्पष्ट और असंदिग्ध हों।
शेख अबेदीन बनाम इकबाल अहमद और अन्य (2026) के मामले की पृष्ठभूमि क्या थी?
- यह मामला अनिवार्य व्यादेश के लिये दायर एक सिविल वाद से उत्पन्न हुआ, जिसमें वादी-प्रत्यर्थी ने प्रतिवादी-अपीलकर्त्ता को विवादित परिसर से बेदखल करने की मांग की थी।
- अपीलकर्त्ता द्वारा दायर किये गए परिवाद में, जिसके परिणामस्वरूप प्रथम सूचना रिपोर्ट (FIR) दर्ज की गई, अपीलकर्त्ता ने स्वीकार किया था कि वह प्रत्यर्थी के स्वामित्व वाली विवादित संपत्ति का कार्यवाहक था।
- विचारण न्यायालय ने इस स्वीकृति पर विश्वास करते हुए सिविल प्रक्रिया संहिता के आदेश 12 नियम 6 के अधीन वाद का निर्णय दिया और अपीलकर्त्ता को वाद संपत्ति खाली करने का निदेश दिया।
- विचारण न्यायालय की डिक्री प्रथम अपीलीय न्यायालय और उसके बाद उच्च न्यायालय के समक्ष अपरिवर्तित रही। दोनों न्यायालयों के एकमत निर्णयों से असंतुष्ट होकर अपीलकर्त्ता ने उच्चतम न्यायालय का रुख किया।
- उच्चतम न्यायालय के समक्ष, अपीलकर्त्ता ने तर्क दिया कि आपराधिक कार्यवाही में की गई स्वीकृति सिविल कार्यवाही में उसके विरुद्ध आदेश 12 नियम 6 सिविल प्रक्रिया संहिता के अधीन निर्णय पारित करने का आधार नहीं बन सकती, क्योंकि ऐसी स्वीकृति सिविल वाद के अभिवचनों के बाहर की जाती है।
न्यायालय की क्या टिप्पणियां थीं?
- सिविल प्रक्रिया संहिता के आदेश 12 नियम 6 के दायरे पर: न्यायालय ने माना कि यह उपबंध न्यायालय को केवल अभिवचन में की गई स्वीकृतियों तक सीमित नहीं करता है। सिविल प्रक्रिया संहिता के आदेश 12 नियम 6 के अधीन डिक्री किसी भी स्वीकृति के आधार पर पारित की जा सकती है, चाहे वह अभिवचन में हो या कहीं और – चाहे लिखित हो या मौखिक – और इसके लिये स्वीकृति का कोई विशेष प्ररूप आवश्यक नहीं है।
- आवश्यक स्वीकृति की प्रकृति पर: उत्तम सिंह दुग्गल एंड कंपनी लिमिटेड बनाम यूनाइटेड बैंक ऑफ इंडिया, (2000) 7 एस.सी.सी. 120 पर विश्वास करते हुए न्यायालय ने दोहराया कि जिस स्वीकृति के आधार पर निर्णय मांगा जा रहा है, वह स्पष्ट और असंदिग्ध होनी चाहिये। ऐसी स्वीकृति वाद में संपूर्ण दावे से संबंधित हो सकती है या दावे के किसी भाग से भी संबंधित हो सकती है, जिसके संबंध में एक पृथक् डिक्री पारित की जा सकती है।
- सिविल प्रक्रिया संहिता के आदेश 12 नियम 6 के उद्देश्य पर: न्यायालय ने पाया कि इस उपबंध का उद्देश्य पक्षकार को सुसंगत स्वीकृति की सीमा तक शीघ्र न्याय प्राप्त करने में सक्षम बनाना है, जिसके लिये वह दूसरे पक्षकार की स्वयं की स्वीकृति के अनुसार हकदार है। यह उपबंध एक प्रक्रियात्मक तंत्र है, जिसके द्वारा मामले का शीघ्र निपटारा किया जा सकता है, यदि प्रतिवादी की स्वयं की स्वीकृति पूर्ण विचारण को अनावश्यक बना देती है।
- मामले के तथ्यों पर: न्यायालय ने पाया कि अपीलकर्त्ता ने आपराधिक परिवाद में स्पष्ट रूप से स्वीकार किया था कि वह प्रत्यर्थी के स्वामित्व वाली विवादित संपत्ति का कार्यवाहक था। यह स्पष्ट और असंदिग्ध स्वीकृति, अधीनस्थ न्यायालयों द्वारा अनिवार्य व्यादेश की डिक्री पारित करने के लिये उचित आधार था, जिसमें बेदखली का निदेश दिया गया था। उच्चतम न्यायालय को इन सर्वसम्मत निर्णयों में हस्तक्षेप करने का कोई आधार नहीं मिला।
सिविल प्रक्रिया संहिता के आदेश 12 नियम 6 में क्या कहा गया है?
सिविल प्रक्रिया संहिता का आदेश 12 नियम 6— स्वीकृतियों के आधार पर निर्णय
मूल उपबंध:
- उप-नियम (1): न्यायालय किसी भी पक्षकार द्वारा आवेदन पर या स्वतः संज्ञान से, पक्षकारों के बीच अन्य प्रश्नों के अवधारण की प्रतीक्षा किये बिना, वाद के किसी भी प्रक्रम में, मौखिक या लिखित रूप से, अभिवचनों में या अन्यथा किये गए तथ्यों की स्वीकृतियों पर आदेश दे सकता है या निर्णय दे सकता है।
- उप-नियम (2): जहाँ उप-नियम (1) के अंतर्गत निर्णय सुनाया जाता है, वहाँ तदनुसार निर्णय की तिथि अंकित करते हुए एक डिक्री तैयार की जाएगी।
प्रमुख विशेषताएँ:
- स्वीकृति स्पष्ट या विवक्षित, लिखित या मौखिक हो सकती है, जो वाद सस्थित करने से पहले, दायर करने के बाद या कार्यवाही के लंबित रहने के दौरान की जा सकती है।
- न्यायालय की शक्ति विवेकाधीन है - आदेश पारित करते समय वह ऐसी स्वीकृतियों को ध्यान में रखेगा।
- स्वीकृति केवल विधिक अभिवचनों तक ही सीमित नहीं होनी चाहिये - यह विधिक अभिवचनों के बाहर भी की जा सकती है, अर्थात् न्यायालय के समक्ष अभिलिखित किसी भी दस्तावेज़ या कथन में।
- दो पृथक् डिक्री पारित की जा सकती हैं: एक स्वीकृत दावे के लिये और दूसरा अस्वीकृत या विवादित दावे के लिये।
- इस नियम के अधीन जारी की गई डिक्री प्रारंभिक या अंतिम हो सकती है।
1976 के संशोधन का प्रभाव:
- संशोधन से पूर्व, नियम 6 के अधीन किसी पक्षकार के आवेदन पर ही स्वीकृति के आधार पर निर्णय लेने की अनुमति थी।
- संशोधन के पश्चात्, न्यायालय स्वतः संज्ञान लेकर भी कार्रवाई कर सकता है।
- स्वीकृति अब आदेश 6 नियम 1 और 4 तक ही सीमित नहीं हैं - वे सामान्य रूप से लागू होती हैं।
महत्त्वपूर्ण न्यायिक घोषणाएँ:
- उत्तम सिंह दुग्गल एंड कंपनी लिमिटेड बनाम यूनाइटेड बैंक ऑफ इंडिया (2000): जहाँ दावा स्वीकार कर लिया जाता है, वहाँ न्यायालय को स्वीकृत दावे पर निर्णय देने और डिक्री पारित करने का अधिकार होता है। आदेश 12 नियम 6 के दायरे को संकुचित नहीं किया जाना चाहिये जहाँ एक पक्षकार विरोधी पक्षकार की स्पष्ट स्वीकृति के आधार पर सफलता का हकदार हो।
- आई.टी.डी.सी. लिमिटेड बनाम चंदर पाल सूद एंड सन (2000): नियम 6 न्यायालय को बहुत व्यापक विवेकाधिकार प्रदान करता है। "अन्यथा" शब्द का अर्थ है कि न्यायालय न केवल अभिवचनों पर अपितु अभिवचनों से बहार दिये गए कथनों पर भी निर्णय दे सकता है - जिसमें न्यायालय में अभिलिखित कोई भी दस्तावेज़ या कथन शामिल है।