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सिविल कानून
सिविल प्रक्रिया संहिता का आदेश 12 नियम 6
« »10-Jun-2026
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पुष्पा एवं अन्य बनाम दयावती और अन्य "स्वीकृति पर दिया गया निर्णय उस सामान्य नियम का अपवाद है कि सिविल विवादों का निपटारा पक्षकारों को साक्ष्य प्रस्तुत करने का पूरा अवसर दिये जाने के बाद ही किया जाना चाहिये, क्योंकि सिविल प्रक्रिया संहिता के आदेश 12 नियम 6 के अधीन दिया गया आदेश विचारण से इंकार करता है और इसलिये इस उपबंध को सावधानी से और केवल उन मामलों में लागू किया जाना चाहिये जहाँ स्वीकृति बिल्कुल स्पष्ट, निश्चित और बिना शर्त हो।" न्यायमूर्ति संजय करोल और न्यायमूर्ति विपुल एम. पंचोली |
स्रोत: उच्चतम न्यायालय
चर्चा में क्यों?
भारत के उच्चतम न्यायालय के न्यायमूर्ति संजय करोल और न्यायमूर्ति विपुल एम. पंचोली की खंडपीठ ने पुष्पा एवं अन्य बनाम दयावती एवं अन्य (2026) के मामले में यह निर्णय दिया कि सिविल प्रक्रिया संहिता, 1908 के आदेश 12 नियम 6 के अधीन डिक्री तभी पारित की जा सकती है जब स्वीकृति बिल्कुल स्पष्ट, निश्चित और बिना शर्त हो। न्यायालय ने आगे कहा कि अभिवचनों को समग्र रूप से पढ़ा जाना चाहिये और उनका खंडित अर्थ नहीं निकाला जा सकता है, और धारा 115 सिविल प्रक्रिया संहिता के अधीन पुनरीक्षण अधिकारिता का प्रयोग करने वाला उच्च न्यायालय केवल इसलिये अपना निर्वचन प्रतिस्थापित नहीं कर सकता क्योंकि कोई अन्य दृष्टिकोण संभव है।
पुष्पा एवं अन्य बनाम दयावती एवं अन्य (2026) के मामले की पृष्ठभूमि क्या थी?
- यह विवाद एक हिंदू परिवार के संयुक्त स्वामित्व वाली कृषि संपत्ति की विक्रय से प्राप्त आय के वितरण से संबंधित मामले से उत्पन्न हुआ था।
- यह संपत्ति लगभग 15.31 करोड़ रुपए में बेची गई, और छह सह-स्वामियों में से प्रत्येक को 1/6 अंश मिला, जो लगभग 2.55 करोड़ रुपए प्रत्येक के समान है।
- अपने लिखित कथन में, प्रत्यर्थी संख्या 3 ने कहा कि पारिवारिक समझौते के अधीन, प्रत्येक पक्षकार को विक्रय से प्राप्त राशि में से ₹3 करोड़ मिले थे।
- इस कथन को स्वीकृति मानते हुए, प्रत्यर्थी-वादी ने आदेश 12 नियम 6 सिविल प्रक्रिया संहिता के अधीन ₹44,79,167/- की वसूली के लिये एक आवेदन दायर किया - यह वह राशि है जिससे प्रत्यर्थी संख्या 3 द्वारा प्राप्त ₹3 करोड़ की राशि उसके वैध 1/6 अंश ₹2,55,20,833/- से कथित तौर पर अधिक थी।
- जिला न्यायालय ने आवेदन को खारिज कर दिया, यह मानते हुए कि विवाद के लिये पूर्ण विचारण की आवश्यकता है और पहले से विरचित विवाद्यकों का निर्णय केवल साक्ष्यों के मूल्यांकन के आधार पर ही किया जा सकता है।
- दिल्ली उच्च न्यायालय में सिविल पुनरीक्षण याचिका पर, आदेश को पलट दिया गया और प्रत्यर्थी संख्या 3 के विरुद्ध ₹44,79,167/- का डिक्री आदेश पारित किया गया, वाद की तारीख से 6% प्रति वर्ष की दर से ब्याज सहित, अदा किया गया। प्रत्यर्थी संख्या 3 के विधिक वारिसों ने उच्च न्यायालय के इस निर्णय को उच्चतम न्यायालय में चुनौती दी।
न्यायालय की क्या टिप्पणियां थीं?
- सिविल प्रक्रिया संहिता के आदेश 12 नियम 6 के अधीन स्वीकृति की प्रकृति पर: न्यायालय ने माना कि पक्षकार द्वारा अभिवचन में दिया गया प्रत्येक कथन स्वतः ही सिविल प्रक्रिया संहिता के आदेश 12 नियम 6 के अधीन डिक्री का आधार नहीं बन सकता। स्वीकृति स्पष्ट, असंदिग्ध, बिना शर्त और असंदिग्ध होनी चाहिये। कथनों में विसंगतियों का मात्र उल्लेख स्वीकृति नहीं माना जाएगा, जहाँ विवादित तथ्यात्मक परिस्थितियाँ विद्यमान हों जिनके लिये पूर्ण विचारण में निर्णय की आवश्यकता हो।
- वाद के अभिवचनों को समग्र रूप से पढ़ने पर: न्यायालय ने इस बात पर बल दिया कि अभिवचनों को टुकड़ों में नहीं पढ़ा जा सकता और उन्हें समग्र रूप से समझा जाना चाहिये। उच्च न्यायालय ने प्रत्यर्थी संख्या 3 के लिखित कथन के एक भाग को अलग करके और उसे दायित्त्व की स्पष्ट स्वीकृति मानकर त्रुटी की, विशेषकर तब जब प्रत्यर्थी संख्या 3 ने अभिवचनों में कहीं भी प्रत्यर्थी के प्रति किसी भी दायित्त्व को स्वीकार नहीं किया था।
- पुनरीक्षण अधिकारिता के दायरे पर: न्यायालय ने माना कि धारा 115 सिविल प्रक्रिया संहिता के अंतर्गत पुनरीक्षण अधिकारिता सीमित है और इसका प्रयोग केवल तभी किया जा सकता है जब अधिकारिता संबंधी त्रुटि या महत्त्वपूर्ण अनियमितता सिद्ध हो। उच्च न्यायालय केवल इसलिये कि कोई वैकल्पिक दृष्टिकोण संभव है, अभिवचनों में अपने निर्वचन को प्रतिस्थापित नहीं कर सकता। वर्तमान मामले में उच्च न्यायालय द्वारा पुनरीक्षण अधिकारिता का प्रयोग अनुचित और अत्यधिक पाया गया।
- संक्षेप में बताए गए विधिक सिद्धांतों के आधार पर: न्यायालय ने आदेश 12 नियम 6 सिविल प्रक्रिया संहिता के अधीन स्वीकृति संबंधी निर्णय को नियंत्रित करने वाले निम्नलिखित सिद्धांत निर्धारित किये।
- स्वीकृति पर दिया गया निर्णय उस सामान्य नियम का अपवाद है जिसके अनुसार सिविल विवादों का निपटारा पक्षकारों को साक्ष्य प्रस्तुत करने का पूर्ण अवसर प्रदान करने के बाद ही किया जाना चाहिये। चूँकि इससे विचारण का अधिकार समाप्त हो जाता है, इसलिये इस उपबंध का प्रयोग सावधानीपूर्वक किया जाना चाहिये।
- स्वीकृति बिल्कुल स्पष्ट, निश्चित और बिना शर्त होनी चाहिये। अस्पष्ट या संदिग्ध कथन प्रक्रिया संहिता के आदेश 12 नियम 6 के अधीन डिक्री को मान्य नहीं बना सकता।
- तथ्यों से संबंधित विवादित प्रश्नों का निर्णय स्वीकृति के आधार पर निर्णय के माध्यम से नहीं किया जा सकता है और साक्ष्यों के मूल्यांकन के आधार पर विचारण के दौरान ही उनका निर्णय किया जाना चाहिये।
- अभिवचन की कार्यवाही को समग्र रूप से पढ़ा जाना चाहिये; किसी भी भाग को अलग करके स्वतंत्र रूप से व्याख्यायित नहीं किया जा सकता है जिससे किसी पक्षकार पर दायित्त्व निर्धारित किया जा सके।
- तदनुसार, अपील मंजूर कर ली गई। उच्च न्यायालय का आदेश अपास्त कर दिया गया और जिला न्यायालय का विवाद के निपटारे के लिये विचारण का आदेश बहाल कर दिया गया।
सिविल प्रक्रिया संहिता के आदेश 12 नियम 6 में क्या कहा गया है?
सिविल प्रक्रिया संहिता का आदेश 12 नियम 6— स्वीकृतियों पर निर्णय
मुख्य उपबंध:
- उप-नियम (1): न्यायालय किसी भी पक्षकार द्वारा अभिवचनों पर या स्वतः संज्ञान से, पक्षकारों के बीच अन्य प्रश्नों के निर्धारण की प्रतीक्षा किये बिना, वाद के किसी भी प्रक्रम में, मौखिक या लिखित रूप से, अभिवचनों में या अन्यथा किये गए तथ्यों की स्वीकृतियों पर आदेश दे सकता है या निर्णय दे सकता है।
- उप-नियम (2): जहाँ उप-नियम (1) के अंतर्गत निर्णय सुनाया जाता है, वहाँ तदनुसार निर्णय की तिथि अंकित करते हुए एक डिक्री तैयार की जाएगी।
प्रमुख विशेषताएँ:
- स्वीकृति अभिव्यक्त या विवक्षित, लिखित या मौखिक हो सकती है, जो वाद दायर करने से पूर्व, दायर करने के पश्चात् या कार्यवाही के लंबित रहने के दौरान की जा सकती है।
- न्यायालय की शक्ति विवेकाधीन है - आदेश पारित करते समय वह ऐसी स्वीकृतियों को ध्यान में रखेगा।
- स्वीकृति केवल विधिक अभिवचनों तक ही सीमित नहीं होनी चाहिये- यह विधिक अभिवचनों के बाहर भी की जा सकती है, अर्थात् न्यायालय के समक्ष अभिलिखित किसी भी दस्तावेज़ या कथन में।
- दो पृथक् आदेश पारित किये जा सकते हैं: एक स्वीकृत दावे के लिये और दूसरा अस्वीकृत या विवादित दावे के लिये।
- इस नियम के अधीन जारी किया गया आदेश प्रारंभिक या अंतिम हो सकता है।
1976 के संशोधन का प्रभाव:
- संशोधन से पूर्व, नियम 6 के अधीन किसी पक्षकार के आवेदन पर ही स्वीकृति के आधार पर निर्णय लेने की अनुमति थी।
- संशोधन के पश्चात्, न्यायालय स्वतः संज्ञान लेकर भी कार्रवाई कर सकता है।
- स्वीकृति अब आदेश 6 नियम 1 और 4 तक ही सीमित नहीं हैं - वे सामान्य रूप से लागू होती हैं।
महत्त्वपूर्ण न्यायिक घोषणाएँ:
- उत्तम सिंह दुग्गल एंड कंपनी लिमिटेड बनाम यूनाइटेड बैंक ऑफ इंडिया (2000): जहाँ दावा स्वीकार कर लिया जाता है, वहाँ न्यायालय को स्वीकृत दावे पर निर्णय देने और डिक्री पारित करने का अधिकार होता है। आदेश 12 नियम 6 के दायरे को संकुचित नहीं किया जाना चाहिये जहाँ एक पक्षकार विरोधी पक्ष की स्पष्ट स्वीकृति के आधार पर सफलता का हकदार हो।
- आई.टी.डी.सी. लिमिटेड बनाम चंदर पाल सूद एंड सन (2000): नियम 6 न्यायालय को बहुत व्यापक विवेकाधिकार प्रदान करता है। "अन्यथा" शब्द का अर्थ है कि न्यायालय न केवल अभिवचनों पर अपितु अभिवचनों से इतर दिये गए कथनों पर भी निर्णय दे सकता है - जिसमें न्यायालय में अभिलिखित कोई भी दस्तावेज़ या कथन शामिल है।