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सिविल कानून
उच्चतम न्यायालय ने नाबालिग बलात्कार पीड़िताओं के लिये गर्भसमापन की समय-सीमा समाप्त करने की मांग की
«06-May-2026
स्रोत: द हिंदू
परिचय
भारत के उच्चतम न्यायालय ने एक महत्त्वपूर्ण निर्णय में केंद्र सरकार को गर्भ का चिकित्सीय समापन अधिनियम, 1971 (MTP Act) में संशोधन करने का निदेश दिया है जिससे अवयस्क बलात्संग पीड़ितों के मामलों में अवांछित गर्भावस्था को समाप्त करने की समय सीमा को हटाया जा सके। भारत के मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत और न्यायमूर्ति जॉयमाल्य बागची की पीठ ने ये टिप्पणियां तब कीं जब उन्होंने सरकार द्वारा दायर एक उपचारात्मक याचिका को खारिज कर दिया। यह याचिका उच्चतम न्यायालय के उस पूर्व निर्णय के विरुद्ध थी जिसमें 15 वर्षीय बलात्संग पीड़िता को 30 सप्ताह के गर्भ को समाप्त करने की अनुमति दी गई थी।
- न्यायालय ने निर्णय दिया कि पीड़िता के लिये सबसे अच्छा क्या है, यह तय करने में राज्य और डॉक्टरों की कोई भूमिका नहीं है - यह निर्णय पूरी तरह से पीड़िता और उसके माता-पिता का है।
सरकार ने उपचारात्मक याचिका क्यों दायर की?
- केंद्र सरकार ने उच्चतम न्यायालय के उस पूर्व आदेश के विरुद्ध उपचारात्मक याचिका दायर की थी, जिसमें बलात्संग की पीड़िता 15 वर्षीय युवती को 30 सप्ताह की गर्भावस्था को समाप्त करने की अनुमति दी गई थी - जो कि विधि द्वारा निर्धारित 24 सप्ताह की सांविधिक सीमा से कहीं अधिक है।
- अतिरिक्त सॉलिसिटर-जनरल ऐश्वर्या भाटी, AIIMS के विशेषज्ञों के साथ, किशोरी और भ्रूण दोनों के स्वास्थ्य और कल्याण के आधार पर गर्भपात का विरोध करते हुए न्यायालय के समक्ष पेश हुईं।
- एक विशेषज्ञ डॉक्टर ने न्यायालय के समक्ष यह तर्क दिया कि इस मामले को "भ्रूण-बच्चे (बलात्संग पीड़िता) का विवाद्यक" मानना गलत है, अपितु इसे "बच्चे-बच्चे का विवाद्यक" कहना चाहिये।
- यद्यपि, न्यायालय ने यह माना कि बलात्संग पीड़िता के लिये सबसे अच्छा क्या है, यह तय करना राज्य या डॉक्टरों का काम नहीं है।
- न्यायमूर्ति बागची ने टिप्पणी की कि ऐसे मामलों में पुनर्विलोकन याचिका दायर करने का राज्य को कोई अधिकार नहीं है - यह विकल्प नागरिकों का है, और AIIMS चिकित्सकीय रूप से उस विकल्प को लागू करने के लिये कर्त्तव्यबद्ध है।
- तदनुसार उपचारात्मक याचिका खारिज कर दी गई।
उच्चतम न्यायालय ने क्या अवलोकन किया?
- न्यायालय ने स्पष्ट रूप से कहा कि गर्भावस्था को समाप्त करने का निर्णय पीड़ित के माता-पिता और स्वयं पीड़ित पर निर्भर होना चाहिये - न कि चिकित्सा कर्मियों या राज्य पर।
- मुख्य न्यायाधीश कांत ने कहा कि 15 वर्षीय लड़की पहले ही बलात्संग के गंभीर आघात से गुजर चुकी थी और उसे बच्चे को गर्भ धारण करने और जन्म देने के लिये मजबूर नहीं किया जा सकता था।
- मुख्य न्यायाधीश ने टिप्पणी की कि बच्ची के साथ हुए इस दुर्व्यवहार को उसके जीवन भर के लिये एक स्थायी घाव के रूप में उसके साथ रहने की अनुमति नहीं दी जा सकती।
- न्यायालय ने इस बात पर बल दिया कि विधि क्षणिक भावनाओं के आगे नहीं झुक सकती और उसे पीड़ित के पूरे जीवन को ध्यान में रखना होगा - "यदि विधि को निर्दयी होना आवश्यक है, तो उसे ऐसा ही होना पड़ेगा।"
- पीठ ने स्पष्ट किया कि राज्य और डॉक्टर चिकित्सा प्रक्रिया और उसके परिणामों पर जानकारीपूर्ण चर्चा के माध्यम से माता-पिता और बच्चों का मार्गदर्शन कर सकते हैं, लेकिन अंतिम निर्णय परिवार और पीड़ित व्यक्ति पर निर्भर करता है।
न्यायालय ने किन विधायी परिवर्तनों की मांग की?
- मुख्य न्यायाधीश कांत ने केंद्र सरकार से अवयस्क के साथ बलात्संग से उत्पन्न अवांछित गर्भधारण को समाप्त करने पर किसी भी समय सीमा को हटाने के लिये विधि में संशोधन करने का आह्वान किया।
- न्यायालय ने आगे निदेश दिया कि न केवल गर्भ का चिकित्सीय समापन अधिनियम में अपितु दण्ड संहिता में भी संशोधन किया जाए, जिससे ऐसे मामलों में एक सप्ताह के भीतर विचारण पूरा करना अनिवार्य हो जाए।
- न्यायालय ने यह भी टिप्पणी की कि ऐसे मामलों में आरोपी की संपूर्ण संपत्ति पीड़ित को दी जानी चाहिये।
गर्भ का चिकित्सीय समापन अधिनियम क्या है?
बारे में:
- यह वह ऐतिहासिक विधि है जिसने भारत में गर्भपात सेवाओं तक पहुँच को वैध और विनियमित किया।
- यह अधिनियम शांतिलाल शाह समिति (1964) की सिफारिशों के आधार पर असुरक्षित और अवैध गर्भपात के कारण होने वाली उच्च मातृ मृत्यु दर को कम करने के लिये बनाया गया था।
1971 अधिनियम के प्रमुख उपबंध:
- मूल 1971 के अधिनियम में कुछ विशिष्ट परिस्थितियों में रजिस्ट्रीकृत चिकित्सक द्वारा निर्दिष्ट परिस्थितियों में गर्भसमापन की अनुमति प्रदान की गई थी:
- समय सीमा: गर्भावस्था को 20 सप्ताह तक समाप्त किया जा सकता था।
- गर्भपात की शर्तें: गर्भवती महिला के जीवन की रक्षा हेतु, बलात्कार या अनाचार (incest) के मामलों में, गर्भनिरोधक की विफलता (केवल विवाहित महिलाओं के लिए) आदि।
2021 का संशोधन:
- गर्भावस्था की सीमा में वृद्धि: विशेष श्रेणियों की महिलाओं (जिनमें बलात्संग पीड़ित महिलाएँ, अनाचार की शिकार महिलाएँ, अवयस्क महिलाएँ और दिव्यांग महिलाएँ शामिल हैं) के लिये गर्भपात की ऊपरी सीमा 20 सप्ताह से बढ़ाकर 24 सप्ताह कर दी गई है।
- अविवाहित महिलाओं को शामिल करना: गर्भनिरोधक की विफलता से संबंधित प्रावधान को अविवाहित महिलाओं तक विस्तारित किया गया, जिससे यह सुनिश्चित हो सके कि उन्हें विवाहित महिलाओं के समान ही सुरक्षित गर्भपात कराने का विधिक अधिकार प्राप्त है।
- भ्रूण संबंधी असामान्यताओं की कोई सीमा नहीं: यदि कोई मेडिकल बोर्ड भ्रूण में महत्त्वपूर्ण असामान्यताओं का निदान करता है, तो गर्भावस्था को 24 सप्ताह के बाद भी समाप्त किया जा सकता है।
- डॉक्टर की राय की आवश्यकता: अधिनियम के अनुसार, 20 सप्ताह तक के गर्भपात के लिये एक डॉक्टर की राय और 20 से 24 सप्ताह के बीच के गर्भपात के लिये दो डॉक्टरों की राय आवश्यक है।
महत्त्व:
- गर्भपात को एक महत्त्वपूर्ण स्वास्थ्य सेवा आवश्यकता के रूप में मान्यता देकर और यह सुनिश्चित करके कि प्रक्रियाएँ योग्य चिकित्सकों द्वारा की जाती हैं, गर्भ का चिकित्सीय समापन अधिनियम, 1971 महिलाओं की स्वायत्तता और सुरक्षित चिकित्सा स्थितियों को प्राथमिकता देता है।
निष्कर्ष
उच्चतम न्यायालय द्वारा सरकार की उपचारात्मक याचिका को खारिज करना और विधायी सुधार की मांग करना, अवयस्क बलात्संग पीड़ितों के अधिकारों पर एक निर्णायक न्यायिक कथन है। यह मानते हुए कि न तो राज्य और न ही चिकित्सा संस्थान पीड़ित और उसके परिवार की पसंद को नजरअंदाज कर सकते हैं, और ऐसे मामलों के लिये सांविधिक समय सीमा को हटाने का निदेश देकर, न्यायालय ने इस बात पर बल दिया है कि विधि को प्रक्रियात्मक या गर्भकालीन सीमाओं के बजाय पीड़ित की दीर्घकालिक गरिमा और कल्याण को प्राथमिकता देनी चाहिये। अब इन टिप्पणियों को सांविधिक रूप देने का उत्तरदायित्त्व संसद पर है।