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पारिवारिक कानून

चाचा-ससुर अपनी भतीजी के पति को 'घर दामाद के रूप में दत्तक नहीं ले सकता

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 10-Jul-2026

बेजला ओरांव बनाम काली दास ओरांव एवं अन्य 

"प्रचलित प्रथागत विधि के अंतर्गत कहीं भी यह स्थापित नहीं है कि कोई चाचा-ससुर अपनी भतीजी के पति को अपना घरदामद (गृहस्थ) के रूप में दत्तक ग्रहण कर सकता है।" 

न्यायमूर्ति संजय करोल और न्यायमूर्ति नोंगमेइकापम कोटिस्वर सिंह 

स्रोत: उच्चतम न्यायालय 

चर्चा में क्यों? 

न्यायमूर्ति संजय करोल और न्यायमूर्ति नोंगमेइकापम कोटिश्वर सिंह की पीठ नेबेजला ओरांव बनाम काली दास ओरांव और अन्य (2026) के मामले मेंनिर्णय दिया कि ओरांव प्रथागत विधि के अधीन एक चाचा ससुर अपनी भतीजी के पति को घर दामाद के रूप में वैध रूप से सम्मिलित नहीं कर सकता हैऔर इस प्रकार की व्यवस्था को बरकरार रखने वाले तीन अधीनस्थ न्यायालयों के एकमत निष्कर्षों को अपास्त कर दिया। 

बेजला ओरांव बनाम काली दास ओरांव और अन्य (2026) के मामले की पृष्ठभूमि क्या थी? 

  • यह विवाद सुखु ओरांव की पैतृक संपत्ति से संबंधित थाजिनके तीन पुत्र थे - धुंगरूलेदुरा और भौला। 
  • लेदुरा की कोई संतान नहीं थीजबकि भौला अपनी पुत्री बुधैन को छोड़कर चली गईं। 
  • वादी बेजला ओरांवजो धुंगरू का पुत्र हैने दावा किया कि निकटतम पुरुष वंशज होने के नातेलेदुरा और भौला की मृत्यु के बाद उसे संपत्ति विरासत में मिली। 
  • प्रतिवादियों ने यह तर्क दिया कि बुधैन के पति पुनाई को लेदुरा द्वारा घर दामाद के रूप में स्वीकार किया गया था और इसलिये वह संपत्ति के उत्तराधिकार का हकदार थाजिसके लिये उन्होंने 27 फरवरी, 1975 के एक दस्तावेज़ पर विश्वास कियाजिसे विभाजन विलेख के रूप में वर्णित किया गया था। 
  • विचारण न्यायालय ने घर दामाद व्यवस्था की वैधता के संबंध में प्रतिवादियों के अभिवचन को स्वीकार करने के बाद मुकदवादमे को खारिज कर दियाऔर प्रथम अपील न्यायालय ने डिक्री की पुष्टि की। 
  • झारखंड उच्च न्यायालय ने इस तथ्य पर एक महत्त्वपूर्ण विधिक प्रश्न तैयार करने के बावजूद द्वितीय अपील को खारिज कर दिया कि क्या ओरांव प्रथागत विधि के अधीन एक चाचा ससुर को घरदमद रखने का अधिकार है। 
  • इससे व्यथित होकर वादी ने उच्चतम न्यायालय का रुख किया। 

न्यायालय की क्या टिप्पणियां थीं? 

  • वादी के तर्क पर:वादी ने तर्क दिया कि अधीनस्थ न्यायालयों ने घर दामाद व्यवस्था को बरकरार रखने में त्रुटी की हैजबकि अभिलेख में ऐसी कोई प्रथा विद्यमान नहीं है जो चाचा ससुर द्वारा इस प्रकार के उत्तराधिकार की अनुमति देती होऔर लेदुरा और भौला की मृत्यु के बादकेवल वहीनिकटतम पुरुष संबंधी होने के नातेसंपत्ति का उत्तराधिकारी बनने का हकदार है। 
  • प्रथा को स्थापित करने में विफलता के संबंध में:न्यायालय ने वादी के तर्क में बल पाया और यह माना कि प्रतिवादी यह साबित करने में असफल रहे हैं कि कथित घर दामाद व्यवस्था लागू प्रथा की आवश्यकताओं को पूरा करती है। 
  • घर दामाद की प्रथा के दायरे पर:यद्यपि ओरांव प्रथागत विधि में घर दामाद प्रथा का अस्तित्व विवाद में नहीं थान्यायालय ने इस बात पर बल दिया कि वर्तमान मामले के तथ्य उस प्रथा के अंतर्गत नहीं आते हैं। 
  • घर दामाद को कौन नियुक्त कर सकता है:एस.सी. रॉय की प्रामाणिक कृति, 'छोटानागपुर का उरांवपर विश्वास करते हुएन्यायालय ने कहा कि घर दामाद को उत्तराधिकार अधिकार तभी प्राप्त हो सकते हैं जब उसे अंतिम पुरुष स्वामी या उसकी विधवा द्वारा घर में दत्तक लिया गया हो। वर्तमान मामले मेंपुनाई को कथित तौर पर लेदुरा द्वारा नियुक्त किया गया थाजो बुधैन का केवल चाचा थान कि उसका पिता। 
  • उत्तराधिकार के अधिकार के संबंध में:न्यायालय ने यह माना कि अंतिम पुरुष स्वामी या उसकी विधवाया भूस्वामी से प्रत्यक्ष रूप से संबंधित किसी अन्य पुरुष उत्तराधिकारी द्वारा वैध रूप से स्थापित घर दामाद के अभाव मेंनिकटतम सगोत्र को संपत्ति में अधिकार प्राप्त होगा। तदनुसारअधीनस्थ न्यायालयों के निर्णय अपास्त कर दिये गए और वादी के पक्ष डिक्री दी गई 
  • अनुतोष प्राप्त होने पर:अपील मंजूर कर ली गईऔर संपत्ति निकटतम पुरुष वंशज होने के नाते वादी को अंतरित कर दी गई। 

ओरांव जनजाति में घर दामाद की प्रथा क्या है? 

घर दामाद ओरांव प्रथागत विधि के अधीन: 

  • घर दामाद से तात्पर्य उस दामाद से है जो पत्नी के परिवार में रहता है और पुरुष उत्तराधिकारियों की अनुपस्थिति में उनके परिवार में शामिल हो जाता हैऔर प्रथा के अनुसार पारिवारिक संपत्ति में उत्तराधिकार के अधिकार प्राप्त कर सकता है। 
  • घर दामाद को उत्तराधिकार के अधिकार तभी प्राप्त होते हैं जब उसे संपत्ति के अंतिम पुरुष स्वामी द्वारा या उसकी अनुपस्थिति में उसकी विधवा द्वारा परिवार में दत्तक लिया गया हो। 
  • किसी नातेदारजैसे कि चाचाजो अंतिम पुरुष स्वामी या उसकी विधवा न होद्वारा पदस्थापन इस प्रथा की आवश्यकताओं को पूरा नहीं करता है और इस प्रकार पदस्थापित व्यक्ति को उत्तराधिकार अधिकार प्रदान नहीं करता है। 
  • वैध रूप से नियुक्त घर दामाद या भूस्वामी से सीधे संबंधित किसी अन्य पुरुष उत्तराधिकारी की अनुपस्थिति मेंसंपत्ति पर उत्तराधिकार का अधिकार परिवार के निकटतम पुरुष संबंधी को प्राप्त होता है। 

हिंदू विधि के अधीन दत्तक ग्रहण क्या है? 

अधिनियम – हिंदू दत्तक तथा भरण-पोषण अधिनियम, 1956 (HAMA) 

बारे में: 

  • हिंदू दत्तक तथा भरण-पोषण अधिनियम विधेयक के भाग के रूप में दत्तक ग्रहण संबंधी हिंदू विधि को संहिताबद्ध और एकरूपीकरण करने के लिये 1956 में हिंदू दत्तक तथा भरण-पोषण अधिनियम लागू किया गया था।  
  • यह संसद द्वारा पारित दत्तक ग्रहण के विषय पर पहला अधिनियम है। 
  • यह भारतीय क्षेत्र में रहने वाले हिंदुओं पर और भारत में निवास करने वाले हिंदुओं पर भी लागू होता हैभले ही वे भारत से बाहर रह रहे हों। भारतीय क्षेत्र के बाहर इसका कोई प्रभाव नहीं है। 
  • दत्तक ग्रहण काअर्थ है वह प्रक्रिया जिसके द्वारा एक बालक अपने जैविक माता-पिता से स्थायी रूप से पृथक् हो जाता है और दत्तक ग्रहण करने वाले माता-पिता का वैध बालक बन जाता हैजिसके साथ उसे सभी संबंधित अधिकारविशेषाधिकार और उत्तरदायित्त्व प्राप्त होते हैं। 

धारा 6 – विधिमान्य दत्तक संबंधी अपेक्षाएं: 

  • दत्तक लेने वाले व्यक्ति के पास दत्तक लेने का सामर्थ्य और अधिकार होना चाहिये 
  • दत्तक देने वाला व्यक्ति में देने का सामर्थ्य होना चाहिये 
  • जिस बालक को दत्तक लिया जा रहा हैवह दत्तक लिये जाने के योग्य होना चाहिये 
  • दत्तक ग्रहण अधिनियम के अधीन विहित अन्य सभी शर्तों के अनुरूप होना चाहिये 

धारा 7 – हिंदू पुरुष की दत्तक लेने की सामर्थ्य: 

  • उसका बालिग और मानसिक रूप से स्वस्थचित्त होना अनिवार्य है। 
  • वैध दत्तक ग्रहण के लिये पत्नी की सम्मति अनिवार्य हैऐसी सम्मति के बिना दत्तक ग्रहण शून्य है। 
  • पुत्री को दत्तक लेने के मामले मेंआवेदक की आयु लड़की से कम से कम 21 वर्ष होनी चाहिये 
  • कृष्णा चंद्र साहू बनाम प्रदीप दास (1982) - उड़ीसा उच्च न्यायालय ने निर्णय दिया कि वैध दत्तक ग्रहण के लिये पत्नी की सम्मति अनिवार्य है। 

धारा 8 – हिंदू नारी की दत्तक लेने की सामर्थ्य: 

  • आवेदक की आयु विधिक रूप से मान्य होनी चाहिये और वह स्वस्थ चित्त होना चाहिये 
  • महिला अविवाहित होनी चाहियेया यदि विवाहित हैतो पति की पूर्ण सहमति होनी चाहिये 
  • यदि पति विकृत चित्त हैउसने संसार का त्याग कर दिया हैवह हिंदू नहीं रहा हैया विवाह भंग हो गया हैतो उसकी सहमति की आवश्यकता नहीं है। 
  • यदि आप किसी पुत्र को दत्तक ले रहे हैंतो माता-पिता की आयु लड़के से कम से कम 21 वर्ष अधिक होनी चाहिये 

धारा 9 – दत्तक देने के लिये सक्षम व्यक्ति: 

  • पिता कोजीवित होने पर बच्चे को दत्तक देने का अधिकार हैलेकिन वह माता की सम्मति के बिना ऐसा नहीं कर सकताजब तक कि माता ने संसार का त्याग न कर दिया होहिंदू धर्म छोड़ दिया होया किसी सक्षम न्यायालय द्वारा उसे विकृत चित्त घोषित न कर दिया गया हो। 
  • माता – यदि पिता की मृत्यु हो गई होउसने संसार का त्याग कर दिया होवह हिंदू न रहा होया किसी सक्षम न्यायालय द्वारा उसे विकृत चित्त घोषित कर दिया गया होतो वह बच्चे को दत्तक दे सकती है। 
  • संरक्षक – यदि दोनों माता-पिता की मृत्यु हो गई होमाता-पिता का पता न होया बच्चे को छोड़ दिया गया होतो संरक्षक न्यायालय की पूर्व अनुमति से बच्चे को दत्तक दे सकता हैपरंतु न्यायालय इस बात से संतुष्ट हो कि दत्तक लेना बच्चे के कल्याण के लिये है। 
  • प्रफुल्ला बाला मुखर्जी बनाम सतीश चंद्र मुखर्जी (1998) - यह अभिनिर्धारित किया गया कि वैध दत्तक लेने के लिये यह आवश्यक है कि दत्तक लेने वाला व्यक्ति विधिक रूप से दत्तक लेने में सक्षम होदेने वाला व्यक्ति विधिक रूप से दत्तक देने में सक्षम होऔर बच्चा विधिक रूप से दत्तक लिये जाने में सक्षम होतीनों शर्तें एक साथ पूरी होनी चाहिये 

धारा 10 – किसे दत्तक लिया जा सकता है: 

  • बच्चा हिंदू होना चाहिये 
  • बच्चे को पहले दत्तक नहीं लिया गया होना चाहिये 
  • बच्चे का विवाह न होना अनिवार्य हैजब तक कि कोई अन्य प्रथा इसकी अनुमति न देती हो। 
  • बच्चे की आयु 15 वर्ष से कम होनी चाहियेजब तक कि कोई अन्य प्रथा इसकी अनुमति न देती हो। 

धारा 16 – दत्तक ग्रहण का रजिस्ट्रीकरण: 

  • इसमें दस्तावेज़ रजिस्ट्रार के पास दत्तक ग्रहण का रजिस्ट्रीकरण कराने का उपबंध है। 
  • दोनों पक्षकारों द्वारा हस्ताक्षरित एक रजिस्ट्रीकृत दस्तावेज़ दत्तक लेने के साक्ष्य के रूप में कार्य करता हैतथापि यह निश्चायक सबूत नहीं है। 

धारा 17 – दत्तक ग्रहण में संदायों पर प्रतिषेध: 

  • यह धारा किसी बालक को दत्तक देने या दत्तक ग्रहण करने के प्रतिफलस्वरूप धनराशि अथवा किसी अन्य प्रकार का पारितोषिक देने या लेने पर प्रतिषेध लगाती हैजिससे बाल तस्करीबाल श्रमवेश्यावृत्तिचोरी तथा संपत्ति संबंधी अनुचित लाभ प्राप्त करने हेतु बालकों के दुरुपयोग जैसी प्रवृत्तियों पर प्रभावी नियंत्रण किया जा सके 
  • इस उपबंध का उल्लंघन करने पर छह माह तक के कारावासअथवा जुर्मानाअथवा दोनों से दण्डित किये जाने का प्रावधान है 

दत्तक ग्रहण की अपरिवर्तनीयता: 

  • वैध रूप से दत्तक लेने की प्रक्रिया को दत्तक माता-पिता द्वारा रद्द नहीं किया जा सकता है। 
  • एक बार दत्तक लेने की प्रक्रिया विधिवत पूरी हो जाने के बाददत्तक लिये गए बच्चे को दत्तक लेने को अस्वीकार करने और अपने जैविक परिवार में वापस लौटने का कोई अधिकार नहीं होता है। 

वैध दत्तक ग्रहण के प्रभाव: 

  • दत्तक लिया हुआ बच्चा दत्तक लेने वाले माता-पिता का स्वाभाविक रूप से जन्मा बच्चा माना जाता है। 
  • दत्तक ग्रहण की तिथि से जैविक परिवार के साथ सभी संबंध समाप्त हो जाते हैं। 
  • दत्तक ग्रहण से पहले जिस व्यक्ति से विवाह करना संभव नहीं थाउस व्यक्ति से विवाह करने से बच्चा अभी भी वंचित है। 
  • दत्तक ग्रहण से पहले ही बच्चे के नाम पर निहित संपत्तिसंबंधित दायित्त्वों के अधीन रहते हुएबच्चे के नाम पर ही निहित रहती है। 
  • दत्तक ग्रहण किया गया बच्चा दत्तक परिवार के किसी भी सदस्य को दत्तक ग्रहण से पहले से ही उनके नाम पर मौजूद किसी भी संपत्ति से वंचित नहीं करता है।