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आपराधिक कानून

कुत्ते को कृष्ण के वस्त्र पहनाना धारा 298 भारतीय न्याय संहिता के अधीन अपराध नहीं है

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 04-Jul-2026

रंजन्नी गौर बनाम पंजाब राज्य और अन्य 

"सांविधानिक सहिष्णुता को उस अतिसंवेदनशीलता पर प्रधानता दी जानी चाहिये जो निर्दोष कृत्यों को अपवित्रता के रूप में व्याख्यायित करने की ओर ले जाती है।" 

न्यायमूर्ति सुभाष मेहला 

स्रोत: पंजाब और हरियाणा उच्च न्यायालय 

चर्चा में क्यों? 

पंजाब और हरियाणा उच्च न्यायालय के न्यायमूर्ति सुभाष मेहला नेरंजन्नी गौर बनाम पंजाब राज्य और अन्य (2026) के मामलेमेंएक महिला के विरुद्ध अपने पालतू कुत्ते को भगवान कृष्ण के रूप में कपड़े पहनाकर धार्मिक भावनाओं को कथित रूप से ठेस पहुँचाने के आरोप में दर्ज प्रथम सूचना रिपोर्ट (FIR) को रद्द कर दियायह मानते हुए कि यह कृत्य भारतीय न्याय संहिता (BNS), 2023 की धारा 298 के अंतर्गत नहीं आता है। 

रंजन्नी गौर बनाम पंजाब राज्य और अन्य (2026) के मामले की पृष्ठभूमि क्या थी? 

  • याचिकाकर्त्ताजो एक बैंक मैनेजर हैंने जन्माष्टमी के अवसर पर अपने पालतू कुत्ते की एक तस्वीर व्हाट्सएप स्टेटस पर साझा की थीजिसमें कुत्ता भगवान कृष्ण से संबंधित वेशभूषा में सजा हुआ था। 
  • शिवसेना से संबद्ध एक स्थानीय युवा नेता ने परिवाद दर्ज करायाजिसमें आरोप लगाया गया कि इस कृत्य ने हिंदू समुदाय का अपमान किया है और यह धारा 298 भारतीय न्याय संहिता के अधीन अपवित्रता का अपराध है। 
  • याचिकाकर्त्ता ने तर्क दिया कि यह कृत्य उसके पालतू जानवर के प्रति स्नेह की एक निजी अभिव्यक्ति थीजिसे एक सीमित पहुँच वाले मंच पर साझा किया गया थाऔर चूँकि वह स्वयं एक हिंदू हैइसलिये उस पर अपने धर्म का अपमान करने के आशय का आरोप नहीं लगाया जा सकता है। 
  • राज्य ने इस याचिका का विरोध करते हुए तर्क दिया कि किसी जानवर को देवता के रूप में सजाना स्वाभाविक रूप से आपत्तिजनक हैऔर अन्वेषण के दौरान याचिकाकर्त्ता द्वारा इस कृत्य को स्वीकार करने से उसके बताए गए आशय के होते हुए भी अपराध की पुष्टि होती है। 
  • प्रथम सूचना रिपोर्ट (FIR) को रद्द करने की मांग वाली याचिका के संबंध में यह मामला पंजाब और हरियाणा उच्च न्यायालय के समक्ष आया। 

न्यायालय की क्या टिप्पणियां थीं? 

  • आशय के अनिवार्य तत्त्व पर:न्यायालय ने माना कि व्यक्तिगत अनुभव से आकारित व्यक्तिगत अभिव्यक्ति को केवल इसलिये अपराधीकरण नहीं किया जा सकता क्योंकि यह दूसरों की संवेदनशीलता के अनुरूप नहीं है। 
  • "पवित्र वस्तु" के अर्थ पर:न्यायालय ने टिप्पणी की कि धारा 298 भारतीय न्याय संहिता के अधीन "वस्तु" शब्द को "पूजा स्थल" के साथ समानार्थक रूप से पढ़ा जाना चाहियेऔर निजी तौर पर प्रयोग की जाने वाली वस्तुएँ जैसे कपड़ामुकुट या आभूषण किसी औपचारिक धार्मिक स्थान या जुलूस के बाहर पवित्र वस्तु के रूप में वर्गीकृत नहीं किये जा सकते हैं। 
  • अपराध के लिए लागू मानक पर: न्यायालय नेअवेक सरकार बनाम पश्चिम बंगाल राज्य के मामलेमें निर्धारित सामुदायिक मानक परीक्षण को लागू किया , और पुराने हिकलिन परीक्षण को लागू करने से इंकार कर दियाजो वस्तुनिष्ठ सामुदायिक मानक के बजाय अतिसंवेदनशीलता पर आधारित था। 
  • सांविधानिक सहिष्णुता पर:न्यायालय ने माना कि सांविधानिक सहिष्णुता को अतिसंवेदनशीलता पर प्राथमिकता मिलनी चाहियेऔर निर्दोष कृत्यों को केवल इसलिये अपवित्रता नहीं माना जाना चाहिये क्योंकि वे व्यक्तिगत भावनाओं को ठेस पहुँचाते हैं। 
  • आपराधिक मनःस्थिति (Mens Rea) की अनुपस्थिति पर:न्यायालय ने माना कि आपराधिक दायित्त्व व्यक्तिपरक अतिसंवेदनशीलता या अपराध की विशिष्ट धारणाओं पर आधारित नहीं हो सकताक्योंकि इसकी अनुमति देने से अभियोजन की सीमा अलग-अलग व्यक्तिगत संवेदनशीलता पर निर्भर हो जाएगी। 
  • दिए गए अनुतोष पर:न्यायालय ने प्रथम सूचना रिपोर्ट (FIR) और उससे संबंधित सभी कार्यवाही को रद्द कर दिया और व्यक्तिगत या राजनीतिक उद्देश्यों के लिये आपराधिक विधियों का व्यर्थ प्रयोग करने के विरुद्ध चेतावनी दी। 

भारतीय न्याय संहिता, 2023 की धारा 298 क्या है? 

भारतीय न्याय संहिता की धारा 298 - किसी वर्ग के धर्म का अपमान करने के आशय से उपासना के स्थान को क्षति करना या अपवित्र करना: 

जो कोई किसी उपासना स्थान को या व्यक्तियों के किसी वर्ग द्वारा पवित्र मानी गई किसी वस्तु को नष्टनुकसानग्रस्त या अपवित्र इस आशय से करेगा कि किसी वर्ग के धर्म का तद्द्वारा अपमान किया जाए या यह संभाव्य जानते हुए करेगा कि व्यक्तियों का कोई वर्ग ऐसे नाशनुकसान या अपवित्र किये जाने को अपने धर्म के प्रति अपमान समझेगावह दोनों में से किसी भाँति के कारावास सेजिसकी अवधि दो वर्ष तक की हो सकेगीया जुर्माने सेया दोनों सेदण्डित किया जाएगा 

वर्गीकरण: 

  • दण्ड: 2 वर्ष तक का कारावासजुर्मानाया दोनों। 
  • संज्ञेय (पुलिस बिना वारण्ट के गिरफ़्तार कर सकती है)  
  • अजमानतीय 
  • किसी भी मजिस्ट्रेटद्वारा विचारणीय