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सिविल कानून

मुवक्किल की अनुमति के बिना अधिवक्ता समझौता नहीं कर सकता

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 02-Jul-2026

कृष्ण कुमार ओझा एवं अन्य बनाम जीतेन्द्र चौधरी और अन्य 

"जब तक मुवक्किल द्वारा स्पष्ट रूप से अधिकृत न किया जाएतब तक एक अधिवक्ता अपने मुवक्किल की ओर से समझौता करने के लिये अधिकृत नहीं है।" 

न्यायमूर्ति संजय करोल और न्यायमूर्ति नोंगमेइकापम कोटिस्वर सिंह 

स्रोत: उच्चतम न्यायालय 

चर्चा में क्यों? 

उच्चतम न्यायालय के न्यायमूर्ति संजय करोल और न्यायमूर्ति नोंगमेइकापम कोटिश्वर सिंह की पीठ नेकृष्णा कुमार ओझा और अन्य बनाम जितेंद्र चौधरी और अन्य (2026)के मामले में विभाजन के वाद में 28 वर्ष पुराने समझौते की डिक्री को अपास्त करने के निर्णय को बरकरार रखायह मानते हुए कि किसी अधिवक्ता द्वारा अपने मुवक्किल की स्पष्ट अनुमति के बिना किया गया समझौता सिविल प्रक्रिया संहिता, 1908 (CPC) के आदेश 23 नियम के अधीन विधि के विपरीत है। 

कृष्णा कुमार ओझा और अन्य बनाम जितेंद्र चौधरी और अन्य (2026) के मामले की पृष्ठभूमि क्या थी? 

  • यह विवाद पैतृक संपत्ति से संबंधित 1989 में दायर किये गए विभाजन के वाद से उत्पन्न हुआ था। 
  • फरवरी 1994 मेंविचारण न्यायालय ने पक्षकारों द्वारा संयुक्त रूप से दायर की गई एक समझौता याचिका के आधार पर एक समझौता डिक्री पारित की। 
  • तत्पश्चात् 1997 में अंतिम डिक्री जारी की गई 
  • लगभग 28 वर्ष बादप्रतिवादियों में से एक के विधिक वारिसों ने समझौते की डिक्री को चुनौती दीयह आरोप लगाते हुए कि उनके पूर्वज ने कभी भी समझौते की याचिका पर हस्ताक्षर नहीं किये थेकिसी भी अधिवक्ता को अपनी ओर से समझौता करने के लिये अधिकृत नहीं किया थाऔर यह कि वकालतनामा और लिखित कथन जिस पर विश्वास किया गया थावह कूटरचित थे। 
  • प्रारंभिक प्रक्रम में विचारण न्यायालय ने इन आरोपों को स्वीकार कर लिया और समझौते की डिक्री को अपास्त कर दिया। 
  • पटना उच्च न्यायालय ने आदेश की पुष्टि कीजिसके बाद अपीलकर्त्ताओं ने उच्चतम न्यायालय का रुख किया। 

न्यायालय की क्या टिप्पणियां थीं? 

  • स्पष्ट अनुमति की आवश्यकता पर:न्यायालय ने पाया कि अधिवक्ताओं से यह अपेक्षा की जाती है कि वे अपने मुवक्किलों के निदेशों का कठोरता से पालन करें और महत्त्वपूर्ण सिविल अधिकारों को प्रभावित करने वाले समझौतों में अपने स्वयं के निर्णय को प्रतिस्थापित नहीं कर सकते। चूँकि इस बात का कोई ठोस प्रमाण नहीं था कि संबंधित प्रतिवादी ने अपने अधिवक्ता को समझौता करने के लिये स्पष्ट रूप से अधिकृत किया थाइसलिये समझौता डिक्री में एक मूलभूत विधिक कमी थी। 
  • अनुमति या अत्यावश्यक परिस्थितियों के अभाव में:न्यायालय ने पाया कि प्रतिवादी संख्या द्वारा अपने अधिवक्ता को अपनी ओर से समझौते पर हस्ताक्षर करने की कोई स्पष्ट अनुमति नहीं दी गई थीऔर न ही अभिलेख में ऐसी कोई अत्यावश्यक परिस्थितियाँ थीं जिनके कारण अधिवक्ता ने स्पष्ट अनुमति लिये बिना कार्य किया हो। इन दोनों के अभाव मेंआदेश 23 नियम सिविल प्रक्रिया संहिता द्वारा अनिवार्य "स्वैच्छिक" तत्त्व स्थापित नहीं किया जा सकाऔर परिणामस्वरूप हुए समझौते को विधि के विपरीत माना गया। 
  • समवर्ती निष्कर्षों पर:न्यायालय ने पटना उच्च न्यायालय और विचारण न्यायालय के समवर्ती निष्कर्षों में हस्तक्षेप करने से इंकार कर दियादोनों ने ही प्रतिवादी संख्या की ओर से अधिवक्ता द्वारा किये गए समझौते को विधि के विपरीत घोषित किया था। 
  • वाद के परिणाम के संबंध में:अपील को खारिज करते हुएन्यायालय ने निदेश दिया कि विभाजन वाद के विवाद्यकों पर पूर्ण विचारण में निर्णय लिया जाएयह स्वीकार करते हुए कि 1989 के वाद को 37 वर्ष बाद विचारण के लिये ले जाना कठिन हैलेकिन यह मानते हुए कि साक्ष्य एकत्र करने और उनका मूल्यांकन करने की उचित प्रक्रिया के बिना पक्षकारों के अधिकारों का निर्णय नहीं किया जा सकता है। 

सिविल प्रक्रिया संहिता के अंतर्गत समझौता डिक्री से संबंधित विधि क्या है? 

सिविल प्रक्रिया संहिता के आदेश 23 नियम 3 – वाद में समझौता: 

  • जहाँ न्यायालय को समाधानप्रद रूप में यह साबित कर दिया जाता है कि वाद पक्षकारों द्वारा लिखित और हस्ताक्षरित किसी विधिपूर्ण करार या समझौते के द्वारा पूर्णतः या भागतः समायोजित किया जा चुका है या जहाँ प्रतिवादी वाद की पूरी विषय-वस्तु के या उसके किसी भाग के संबंध में वादी की तुष्टि कर देता है वहाँ न्यायालय: 
    • ऐसे करारसमझौते या तुष्टि को अभिलिखित किये जाने का आदेश करेगाऔर 
    • जहाँ तक कि वह वाद के पक्षकारों से संबंधित हैचाहे करारसमझौते या तुष्टि की विषय-वस्तु वही हो या न हो जो कि वाद की विषय-वस्तु है वहाँ तक तदनुसार डिक्री पारित करेगा 
  • परंतुक:जहाँ एक पक्षकार द्वारा यह अभिकथन किया जाता है और दूसरे पक्षकार द्वारा यह इंकार किया जाता है कि कोई समायोजन या तुष्टि तय हुई थी वहाँ न्यायालय इस प्रश्न का विनिश्चय करेगा 
    • इस प्रश्न के विनिश्चय के प्रयोजन के लिए किसी स्थगन की मंजूरी तब तक नहीं दी जाएगी जब तक कि न्यायालयऐसे कारणों से जो लेखबद्ध किए जाएंगेऐसा स्थगन मंजूर करना ठीक न समझे 
  • स्पष्टीकरण:कोई ऐसा करार या समझौता जो भारतीय संविदा अधिनियम, 1872 के अधीन शून्य या शून्यकरणीय हैइस नियम के अर्थ में विधिपूर्ण नहीं समझा जाएगा 

आदेश 23 नियम 3सिविल प्रक्रिया संहिता – वाद का वर्जन: 

  • किसी डिक्री अपास्त करने के लिये कोई वाद इस आधार पर नहीं लाया जाएगा कि  वह समझौते जिस पर डिक्री आधारित है विधिपूर्ण नहीं था। 
    • इस समस्या का समाधान उसी न्यायालय के समक्ष किया जा सकता है जिसने समझौता डिक्री पारित की थीन कि किसी नए वाद के माध्यम से।