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आपराधिक कानून

आर्थिक अपराधों को जमानत से वंचित करने के लिये पृथक् श्रेणी के अपराधों के रूप में नहीं माना जा सकता

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 23-Jun-2026

हम्मद इकबाल वानी बनाम जम्मू-कश्मीर केंद्र शासित प्रदेश और अन्य 

"केवल इसलिये कि याचिकाकर्त्ता आर्थिक अपराध में शामिल हैउसे जमानत देने से इंकार करने का पर्याप्त कारण नहीं होगा।" 

न्यायमूर्ति संजय धर 

स्रोत: जम्मू-कश्मीर उच्च न्यायालय 

चर्चा में क्यों? 

जम्मू और कश्मीर और लद्दाख उच्च न्यायालय के न्यायमूर्ति संजय धर की एकल पीठ नेमोहम्मद इकबाल वानी बनाम जम्मू और कश्मीर केंद्र शासित प्रदेश और अन्य (2026)के मामले में भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता, 2023 (BNSS) की धारा 483 के अधीन दायर जमानत याचिका को मंजूर करते हुए कहा कि जमानत से इंकार करने के उद्देश्य से आर्थिक अपराधों को यांत्रिक रूप से एक साथ समूहीकृत नहीं किया जा सकता है और अन्वेषण पूर्ण होने के बाद निरंतर कारावास के लिये आरोप की गंभीरता पर्याप्त औचित्य नहीं है। 

मोहम्मद इकबाल वानी बनाम जम्मू-कश्मीर केंद्र शासित प्रदेश और अन्य (2026) के मामले की पृष्ठभूमि क्या थी? 

  • यह मामला अनंतनाग पुलिस थाने में दर्ज प्रथम सूचना रिपोर्ट (FIR) से उत्पन्न हुआजिसमें परिवाद में आरोप लगाया गया था कि अभियुक्तों ने परिवादकर्त्ता को जंगली लहसुन (लहसुन) की आपूर्ति करने के आश्वासन पर उससे बड़ी रकम ले ली थी। 
  • एक करार के अधीन प्रारंभिक अग्रिम राशि का संदाय किया गयाजिसके बाद कई लाख रुपए की अतिरिक्त किश्तें दी गईंआरोप है कि अभियुक्त ने न तो वचन की गई सामग्री की आपूर्ति की और न ही राशि वापस की। 
  • अन्वेषण के दौरानपुलिस ने साक्षियों के कथन अभिलिखित कियेबैंकिंग रिकॉर्ड एकत्र किये और दस्तावेज़ी सामग्री की परीक्षा कीजिससे कथित तौर पर पता चला कि अभियुक्त व्यक्तियों से जुड़े खातों में बड़ी मात्रा में धनराशि अंतरित की गई थी। 
  • आगे की अन्वेषण में पता चला कि अभियुक्त के पास जंगली लहसुन की खरीद और बिक्री के लिये आवश्यक प्राधिकरण या लाइसेंस नहीं था। 
  • याचिकाकर्त्ता और सह-अभियुक्त के विरुद्ध भारतीय न्याय संहिता, 2023 (BNS) की धारा 61, 111, 318(4) और 351(2) के अधीन अपराधों के लिये आरोप पत्र दायर किया गया थाविचारण न्यायालय द्वारा आरोप विरचित किये गए थे और विचारण प्रारंभ हो गया था। 
  • उच्च न्यायालय के समक्ष याचिकाकर्त्ता ने तर्क दिया कि विवाद एक वाणिज्यिक संव्यवहार से उत्पन्न हुआ था जिसे आपराधिक रंग दिया गया थाकि भारतीय न्याय संहिता की धारा 111 (संगठित अपराध) के तत्त्व निरंतर विधिविरुद्ध क्रियाकलाप के अभाव में आकर्षित नहीं होते हैंऔर उसकी निरंतर निरोध पूर्व-विचारण दण्ड के समान है। 
  • अभियोजन पक्ष ने जमानत का विरोध करते हुए तर्क दिया कि याचिकाकर्त्ता एक संगठित आपराधिक गिरोह का भाग थाआगे का अन्वेषण चल रहा था और साक्षियों को धमकाने की संभावना थी। 

न्यायालय की क्या टिप्पणियां थीं? 

  • जमानत से संबंधित सिद्धांतों पर:न्यायालय ने जमानत से जुड़े स्थापित विधिशास्त्र को दोहरायाजिसमें आरोप की प्रकृतिदण्ड की गंभीरतासाक्ष्यों के साथ छेड़छाड़ की संभावनाअभियुक्त का पूर्ववृत्तविचारण के दौरान उपस्थिति सुनिश्चित करने की संभावना और व्यापक जनहित संबंधी विचार शामिल हैं। 
  • आर्थिक अपराधों को एक श्रेणी के रूप में देखते हुए:सतेंद्र कुमार अंतिल बनाम सीबीआई मामले में उच्चतम न्यायालय के निर्णय पर विश्वास करते हुएन्यायालय ने कहा कि सभी आर्थिक अपराधों को एक ही समूह में वर्गीकृत नहीं किया जा सकता और उस आधार पर यांत्रिक रूप से जमानत से इंकार नहीं किया जा सकताप्रत्येक मामले का मूल्यांकन उसके अपने तथ्योंसांविधिक ढाँचे और आसपास की परिस्थितियों के आधार पर किया जाना चाहिये 
  • आरोप की गंभीरता पर:न्यायालय ने माना कि यद्यपि याचिकाकर्त्ता के विरुद्ध लगाए गए कुछ अपराधों में आजीवन कारावास तक के दण्ड का प्रावधान हैफिर भी जमानत पर कोई सांविधिक प्रतिबंध नहीं हैऔर आरोप पत्र दाखिल किया जा चुका है और विचारण चल रहा हैयह तथ्य छोड़े जाने के पक्ष में है। 
  • धारा 111 भारतीय न्याय संहिता के अधीन विधिविरुद्ध क्रियाकलाप जारी रखने के संबंध में:न्यायालय ने याचिकाकर्त्ता के इस तर्क में प्रथम दृष्टया गुण पाया कि बीस वर्ष से अधिक समय पहले दायर किये गए आरोपपत्र पिछले दस वर्षों के भीतर "विधिविरुद्ध क्रियाकलाप जारी रखने" की सांविधिक आवश्यकता को पूरा नहीं कर सकतीयद्यपि न्यायालय ने इस विवाद्यक पर अंतिम राय देने से परहेज किया क्योंकि यह पृथक् कार्यवाही में लंबित था। 
  • स्वतंत्रता को एक मानक के रूप में मानते हुए:मनीष सिसोदिया बनाम प्रवर्तन निदेशालय और जलालुद्दीन खान बनाम भारत संघ के मामलों में उच्चतम न्यायालय के निर्णयों का हवाला देते हुएन्यायालय ने इस बात पर बल दिया कि स्वतंत्रता ही मानक बनी हुई है और निरोध एक अपवाद हैऔर केवल अपराध की गंभीरता जमानत से इंकार को उचित नहीं ठहरा सकती है। 
  • आगे का अन्वेषण लंबित होने के संबंध में:न्यायालय ने माना कि कथित अपराध में अन्य व्यक्तियों से संबंधित आगे का अन्वेषण लंबित होने को याचिकाकर्त्ता को जमानत देने से इंकार करने का वैध आधार नहीं माना जा सकताजबकि उसकी विनिर्दिष्ट भूमिका के संबंध में अन्वेषण पहले ही पूर्ण हो चुका है। 

भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता की धारा 483 क्या है? 

  • उच्च न्यायालय और सेशन न्यायालय के पास धारा 480 की उपधारा (3) के अधीन निर्दिष्ट अपराधों के लिये आवश्यक शर्तें अधिरोपित करने के अधिकार के साथअभिरक्षा में किसी भी अभियुक्त व्यक्ति को जमानत पर छोड़ने का निदेश देने की विशेष शक्तियां हैं। 
  • इन उच्च न्यायालयों के पास किसी व्यक्ति को जमानत पर छोड़ते समय मजिस्ट्रेट द्वारा पहले से अधिरोपित की गई किसी भी जमानत शर्त को अपास्त करने या संशोधित करने का विवेकाधीन अधिकार है। 
  • सेशन न्यायालय द्वारा विशेष रूप से विचारणीय अपराधों या आजीवन कारावास से दण्डनीय अपराधों के लिये जमानत देने से पहलेउच्च न्यायालय या सेशन न्यायालय को लोक अभियोजक को नोटिस देना होगाजब तक कि वह लिखित रूप में यह अभिलिखित न करे कि ऐसा नोटिस देना अव्यावहारिक है। 
  • भारतीय न्याय संहिता की धारा 65 या धारा 70 की उपधारा (2) के अधीन अपराधों के लियेन्यायालय को जमानत आवेदन प्राप्त होने के पंद्रह दिनों के भीतर लोक अभियोजक को नोटिस देना होगा। 
  • भारतीय न्याय संहिता, 2023 की धारा 65 या धारा 70 की उपधारा (2) के अधीन अपराधों के लिये जमानत सुनवाई के दौरान सूचना देने वाले या उसके अधिकृत प्रतिनिधि की उपस्थिति अनिवार्य है। 
  • इस अध्याय के अंतर्गत पहले जमानत पर छोड़े गए किसी भी व्यक्ति की गिरफ्तारी और अभिरक्षा में भेजने का निदेश देने का अधिकार उच्च न्यायालय और सेशन न्यायालय के पास बना रहेगा। 
  • इस उपबंध के अधीन एक पर्यवेक्षी तंत्र स्थापित किया गया हैजिसके अधीन उच्च न्यायालय अधीनस्थ न्यायालयों द्वारा तय किये गए जमानत मामलों में संशोधन या रद्द करने की शक्तियों के माध्यम से हस्तक्षेप कर सकते हैं। 
  • यह धारा गंभीर अपराधों के लिये विशिष्ट प्रक्रियात्मक सुरक्षा उपाय बनाती हैजिसमें जमानत की कार्यवाही के दौरान अभियोजन पक्ष की सूचना और सूचना देने वाले की उपस्थिति अनिवार्य करनाराज्य के हितों और पीड़ित की चिंताओं का उचित प्रतिनिधित्व सुनिश्चित करना शामिल है। 

आर्थिक अपराध क्या है? 

  • आर्थिक अपराध वे अपराध हैं जो आर्थिक या व्यावसायिक क्रियाकलापों के दौरान किये जाते हैं और जिनसे वित्तीय नुकसान होता है तथा देश की आर्थिक भलाई और वित्तीय स्वास्थ्य पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ता है। 
  • इन अपराधों में सामान्यत: कर चोरीमनी लॉन्ड्रिंगबैंक कपटप्रतिभूति घोटालेकॉर्पोरेट कपटतस्करी और भ्रष्टाचार जैसी धोखाधड़ी वाले क्रियाकलाप शामिल होते हैं जो सार्वजनिक और निजी दोनों वित्तीय हितों को प्रभावित करते हैं। 
  • यद्यपि भारत में ऐसा कोई विनिर्दिष्ट विधान नहीं है जो आर्थिक अपराधों को व्यापक रूप से परिभाषित करता होफिर भी इन्हें अपराधों की एक भिन्न श्रेणी के रूप में माना जाता हैजिन पर विशेष ध्यान देने की आवश्यकता होती हैजैसा कि पहली बार भारत के 47वें विधि आयोग (1972) द्वारा मान्यता दी गई थी। 
  • आर्थिक अपराधों को पारंपरिक अपराधों की तुलना में अधिक गंभीर माना जाता है क्योंकि वे पूरी अर्थव्यवस्था को प्रभावित करते हैंदेश के वित्तीय स्वास्थ्य के लिये गंभीर खतरा उत्पन्न करते हैं और वित्तीय प्रणाली में जनता के विश्वास को हिला देते हैं। 
  • इन अपराधों में प्राय: जटिल संव्यवहारपरिष्कृत तरीके और सार्वजनिक धन की महत्त्वपूर्ण मात्रा शामिल होती हैजो इन्हें नियमित आपराधिक अपराधों से अलग बनाती है और इसके लिये विशेष अन्वेषण और अभियोजन दृष्टिकोण की आवश्यकता होती है।