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सांविधानिक विधि
विधायी संशोधन के बिना विवाह-विच्छेद अधिनियम की अधिकारिता का विस्तार नहीं किया जा सकता है
« »07-Jul-2026
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प्रिंसी एन.वी. बनाम भारत संघ "किसी विधि में शब्द जोड़ना एक विधायी कार्य है।" न्यायमूर्ति बेचु कुरियन थॉमस |
स्रोत: केरल उच्च न्यायालय
चर्चा में क्यों?
केरल उच्च न्यायालय के न्यायमूर्ति बेचू कुरियन थॉमस ने प्रिंसी एन.वी. बनाम भारत संघ (2026) में विवाह-विच्छेद अधिनियम, 1869 की धारा 3(3) में ऐसा कोई अतिरिक्त न्यायिक मंच न्यायिक निर्वचन के माध्यम से नहीं जोड़ा जा सकता, जिसके आधार पर कोई ईसाई पत्नी अपने निवास-स्थान की अधिकारिता वाले न्यायालय में विवाह-विच्छेद की कार्यवाही संस्थित कर सके। न्यायालय ने यह अभिधारित किया कि इस प्रकार का विधिक संशोधन केवल संसद द्वारा विधायी प्रक्रिया के माध्यम से ही किया जा सकता है; न्यायालय अपने व्याख्यात्मक अधिकार का प्रयोग करते हुए ऐसा परिवर्तन नहीं कर सकता।
प्रिंसी एन.वी. बनाम भारत संघ (2026) के मामले की पृष्ठभूमि क्या थी?
- याचिकाकर्त्ता प्रिंसी एन.वी. ने केरल उच्च न्यायालय का रुख किया, जब कल्पेट्टा स्थित कुटुंब न्यायालय ने प्रादेशिक अधिकारिता के अभाव में उनकी तलाक याचिका को खारिज कर दिया।
- याचिकाकर्त्ता कथित तौर पर घरेलू हिंसा का शिकार हुई थी और कासरगोड स्थित अपने ससुराल से भागकर वायनाड में अपने माता-पिता के घर चली गई थी। कासरगोड में ही उनका विवाह संपन्न हुआ था और वह दंपति का अंतिम निवास स्थान भी था।
- विवाह-विच्छेद अधिनियम, 1869 की धारा 3(3) के अधीन वह अपने वर्तमान निवास स्थान पर तलाक की कार्यवाही शुरू नहीं कर सकती थी, यह सुविधा हिंदू विवाह अधिनियम, 1955 और विशेष विवाह अधिनियम, 1954 के अधीन पत्नियों को उपलब्ध है।
- याचिकाकर्त्ता ने तर्क दिया कि यह चूक धर्म और लिंग के आधार पर विभेद के समान है, संविधान के अनुच्छेद 14, 15 और 21 के अधीन समता और गरिमा के उसके अधिकार का उल्लंघन करती है, और न्यायालय से आग्रह किया कि धारा 3(3) की निर्वचन पत्नी के निवास के मंच को शामिल करने के लिये किया जाए।
- भारत सरकार ने इस याचिका का विरोध करते हुए तर्क दिया कि प्रादेशिक अधिकारिता विधि का मामला है, न्यायालय अपने पद से विधि नहीं बना सकता, और संसद ने 2003 के वैवाहिक विधि संशोधनों के दौरान जानबूझकर विवाह-विच्छेद अधिनियम को अपरिवर्तित छोड़ दिया था।
न्यायालय की क्या टिप्पणियां थीं?
- न्यायिक संयम और विधायी कार्य पर: न्यायालय ने माना कि किसी संविधि में शब्द जोड़ना एक विधायी कार्य है जिसे न्यायालयों को करने की अनुमति नहीं है, और पाया कि धारा 3(3) की भाषा स्पष्ट और असंदिग्ध थी, जिससे न्यायिक निर्वचन की कोई गुंजाइश नहीं बची।
- स्पष्ट अर्थ के नियम पर: न्यायालय ने निर्वचन के मूलभूत सिद्धांत को दोहराया कि जहाँ किसी संविधि के शब्द स्पष्ट हों और केवल एक ही अर्थ के लिये उत्तरदायी हों, वहाँ न्यायालयों को उस अर्थ को प्रभावी करना होगा, चाहे इसके परिणाम कुछ भी हों।
- उपलब्ध उपचार के संबंध में: न्यायालय ने पाया कि याचिकाकर्त्ता के पास उपाय उपलब्ध थे, क्योंकि सिविल प्रक्रिया संहिता, 1908 की धारा 24 किसी पक्षकार को एक न्यायालय से दूसरे न्यायालय में मामले के अंतरण की मांग करने की अनुमति देती है, और यदि अंतरिती न्यायालय संतुष्ट हो तो ऐसा अंतरण स्वीकृत किया जा सकता है।
- विधायी अंतर पर: याचिका को खारिज करते हुए, न्यायालय ने वैवाहिक विधि में संरचनात्मक असंतुलन को स्वीकार किया और विधायिका को अंतिम टिप्पणी देते हुए इसे "अजीब" और "दुर्भाग्यपूर्ण" बताया कि विवाह-विच्छेद अधिनियम हिंदू विवाह अधिनियम और विशेष विवाह अधिनियम जैसे अधिक प्रगतिशील वैयक्तिक विधि संविधि के अनुरूप नहीं है।
- अनुतोष और विधायिका को संदर्भ: न्यायालय ने पाया कि पत्नियों को उनके निवास स्थान पर तलाक के लिये आवेदन करने की अनुमति देने वाले प्रावधान का अभाव उचित नहीं था और संसद से संशोधन पर विचार करने का आग्रह किया। रजिस्ट्री को निदेश दिया गया कि वह निर्णय को विधि एवं न्याय मंत्रालय को विचार के लिये अग्रेषित करे। तदनुसार याचिका खारिज कर दी गई।
विवाह-विच्छेद अधिनियम, 1869 क्या है?
- अधिनियम के बारे में:
- यह अधिनियम भारत में ईसाई धर्म का पालन करने वाले व्यक्तियों पर लागू होने वाले विवाह-विच्छेद विधि को निर्धारित करता है, जिसमें अलगाव, विवाह-विच्छेद और पति-पत्नी के अधिकारों जैसे मामले सम्मिलित हैं।
- इसे ब्रिटिश शासन के अधीन अधिनियमित किया गया था और यह 1 अप्रैल 1869 को लागू हुआ था, और तब से इसे निष्पक्षता के आधुनिक मानकों के करीब लाने के लिये संशोधित किया गया है।
- यह भारत भर के ईसाइयों पर लागू होता है (जम्मू और कश्मीर को पहले इससे बाहर रखा गया था)।
- भारत में विभिन्न धार्मिक समुदायों के लिये अलग-अलग विवाह और विवाह-विच्छेद विधि हैं - हिंदुओं के लिये हिंदू विवाह अधिनियम, 1955; मुस्लिमों के लिये मुस्लिम वैयक्तिक विधि; पारसियों के लिये पारसी विवाह और विवाह-विच्छेद अधिनियम, 1936; और अंतरधार्मिक जोड़ों के लिये विशेष विवाह अधिनियम, 1954। ईसाइयों के लिये विवाह-विच्छेद अधिनियम, 1869 लागू होता है।
- इसका मुख्य उद्देश्य विवाह टूटने की स्थिति में न्याय सुनिश्चित करना और पति-पत्नी के अधिकारों की रक्षा करना है।
विवाह-विच्छेद अधिनियम, 1869 की धारा 3(3):
विवाह-विच्छेद अधिनियम, 1869 की धारा 3(3) – वैवाहिक याचिकाओं के लिये प्रादेशिक अधिकारिता:
- यह अधिनियम भारत में ईसाई धर्म मानने वाले व्यक्तियों के बीच विवाह-विच्छेद और वैवाहिक अनुतोष से संबंधित प्रावधानों को नियंत्रित करता है।
- धारा 3(3) के अधीन, वैवाहिक याचिका जिला न्यायालय में प्रस्तुत की जा सकती है जिसकी अधिकारिता में विवाह अनुष्ठित हुआ था, या जिसकी अधिकारिता में पति और पत्नी निवास करते हैं या अंतिम बार एक साथ निवास करते थे।
- हिंदू विवाह अधिनियम, 1955 और विशेष विवाह अधिनियम, 1954 के विपरीत, विवाह-विच्छेद अधिनियम वर्तमान में उस स्थान पर याचिका दायर करने की अनुमति नहीं देता है जहाँ याचिका दायर करने के समय पत्नी पृथक् रहती है।
- पत्नी के वर्तमान निवास स्थान जैसे किसी अन्य मंच को शामिल करने के लिये प्रावधान में विधायी संशोधन की आवश्यकता होगी।
सिविल प्रक्रिया संहिता की धारा 24 क्या है?
सिविल प्रक्रिया संहिता की धारा 24 – अंतरण और प्रत्याहरण की साधारण शक्ति:
- उपधारा (1): किसी पक्षकार के आवेदन पर (उन लोगों को नोटिस और सुनवाई के बाद जो सुनवाई के इच्छुक हैं), या बिना नोटिस के स्वयं ही, उच्च न्यायालय या जिला न्यायालय किसी भी प्रक्रम पर—
(क) अपने समक्ष लंबित किसी वाद, अपील या अन्य कार्यवाही को किसी ऐसे अधीनस्थ न्यायालय को अंतरित कर सकता है जो उस पर विचारण या निपटारा करने में सक्षम हो; या
(ख) किसी अधीनस्थ न्यायालय में लंबित किसी वाद, अपील या अन्य कार्यवाही का प्रत्याहरण कर सकता है, और या तो स्वयं उस का विचारण/निपटा कर सकता है, उसे किसी सक्षम अधीनस्थ न्यायालय को अंतरित कर सकता है, या उसे उस न्यायालय को पुनः अंतरित कर सकता है जहाँ से उसका प्रत्याहरण किया गया था। - उपधारा (2): जहाँ उपधारा (1) के अधीन कोई वाद या कार्यवाही अंतरित या प्रत्याह्रत की गई हो, तो उसके बाद न्यायालय, अंतरण आदेश में दिये गए किसी विशेष निदेश के अधीन रहते हुए, या तो उस पर पुनः विचारण कर सकता है या उस बिंदु से जारी रख सकता है जहाँ से उसे अंतरित या प्रत्याह्रत किया गया था।
- उपधारा (3): इस धारा के प्रयोजनों के लिये —
(क) अतिरिक्त और सहायक न्यायाधीशों के न्यायालय जिला न्यायालय के अधीनस्थ माने जाते हैं;
(ख) "कार्यवाही" में किसी डिक्री या आदेश के निष्पादन की कार्यवाही शामिल है। - उपधारा (4): लघुवाद न्यायालय से अंतरित या प्रत्याहृत किसी वाद का विचारण करने वाला न्यायालय, उस वाद के लिये लघुवाद न्यायालय माना जाएगा।
- उपधारा (5): इस धारा के अंतर्गत किसी वाद या कार्यवाही को उस न्यायालय से भी अंतरित किया जा सकता है जिसे उस पर विचारण करने की अधिकारिता नहीं है।