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आपराधिक कानून

किसी कर्मचारी को आपराधिक मामले की जानकारी न देने के आधार पर बर्खास्त नहीं किया जा सकता

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 06-Jul-2026

ओडिशा राज्य और अन्य बनाम सागरिका परिदा 

"महत्त्वपूर्ण जानकारी को दबाने का कार्य तुच्छ या तकनीकी प्रकृति का नहीं होना चाहिये।" 

मुख्य न्यायाधीश हरीश टंडनन्यायमूर्ति मुराहारी श्री रमन 

स्रोत: उड़ीसा उच्चन्यायालय 

चर्चा में क्यों? 

ओडिशा उच्च न्यायालय की एक खंडपीठजिसमें मुख्य न्यायाधीश हरीश टंडन और न्यायमूर्ति मुरहारी श्री रमन शामिल थेने ओडिशा राज्य और अन्य बनाम सागरिका परिदा (2026) के मामले मेंयह निर्णय दिया कि सत्यापन रोल में सूचना को छिपाना किसी "महत्त्वपूर्ण" तथ्य से संबंधित होना चाहियेऔर किसी कर्मचारी के विरुद्ध दण्डात्मक कार्रवाई तब उचित नहीं है जब उम्मीदवार को आपराधिक मामले की जानकारी न होविशेषत: तब जब मामला मामूली हो या दोषमुक्त होने में समाप्त हो गया हो। 

ओडिशा राज्य और अन्य बनाम सागरिका परिदा (2026) के मामले की पृष्ठभूमि क्या थी? 

  • प्रत्यर्थी को सत्यापन रोल प्रस्तुत करने के बाद एक पद पर नियुक्त किया गया थाजिसमें उसने प्रकटन किया था कि उस पर कभी भी किसी आपराधिक मामले में आरोप नहीं लगाया गया था और न ही वह कभी जेल में रही थी। 
  • बाद में अधिकारियों को पता चला कि प्रत्यर्थी के विरुद्ध तीन आपराधिक मामले दर्ज किए गए थे। इनमें से एक मामले में अगस्त, 2017 को दोषमुक्त कर दिया गया थाजबकि सत्यापन रोल 21 अगस्त, 2017 को प्रस्तुत किया गया था। 
  • पुलिस उपायुक्त (मुख्यालय) ने आदेश पारित करते हुए कहा कि प्रत्यर्थी ने सत्यापन रोल में मिथ्या और गलत कथन किया था। 
  • इस आदेश से असंतुष्ट होकर प्रत्यर्थी ने एक रिट याचिका दायर कीजिसे एकल न्यायाधीश ने स्वीकार कर लिया और आदेश को रद्द करते हुए उसे सभी परिणामी लाभों के साथ बहाल करने का निदेश दिया। 
  • इससे असंतुष्ट होकर अपीलकर्त्ताओं ने उड़ीसा उच्च न्यायालय की खंडपीठ के समक्ष अपील दायर की। 
  • अपीलकर्त्ताओं ने तर्क दिया कि महत्त्वपूर्ण जानकारी को दबाने के मामले में नरमी नहीं बरती जानी चाहियेविशेषत: इसलिये कि प्रत्यर्थी एक अनुशासित संगठन में कार्यरत थाजिसमें उच्च नैतिक चरित्र की आवश्यकता होती हैऔर किसी आपराधिक मामले को जानबूझकर दबाने से ऐसे संगठन पर अधिक प्रभाव पड़ता है। 
  • प्रत्यर्थी ने तर्क दिया कि उसे अपने विरुद्ध दर्ज आपराधिक मामलों की जानकारी नहीं थी और तीनों मामले उसके पक्ष में समाप्त हो चुके थे। उसने दावा किया कि राज्य का यह कथन कि मामले लंबित थेगलत थाहालांकि उसने स्वीकार किया कि सत्यापन रोल प्रस्तुत करने की तिथि तक एक मामला लंबित था और बाद में उसका निपटारा हो गयाजिसमें उसे दोषमुक्त कर दिया गया। 

न्यायालय की क्या टिप्पणियां थीं? 

  • आपराधिक मामलों की स्थिति के संबंध में:न्यायालय ने पाया कि प्रत्यर्थी के विरुद्ध दर्ज तीनों आपराधिक मामले उसके पक्ष में समाप्त हो चुके हैंऔर राज्य का यह दावा कि वे लंबित हैंसही प्रतीत नहीं होता है। 
  • प्रत्यर्थी की जानकारी के संबंध में:न्यायालय ने पाया कि भुवनेश्वर स्थित आयुक्त मुख्यालय के अतिरिक्त DCP, अपराध विभाग की रिपोर्ट प्रत्यर्थी के इस कथन का समर्थन करती है कि उसे मामलों की जानकारी नहीं थी। यह भी ध्यान दिया गया कि एक मामले में उसकी अनुपस्थिति में दोषमुक्त होने का निर्णय अभिलिखित किया गया था।  
  • लागू विधिक मानक पर:न्यायालय ने अवतार सिंह बनाम भारत संघ के मामले पर विश्वास करते हुए कहा कि यद्यपि शील और पूर्ववृत्त का सत्यापन किसी उम्मीदवार की नियोजन के लिये उपयुक्तता का आकलन करने का एक महत्त्वपूर्ण मानदंड हैलेकिन अंतिम निर्णय सभी सुसंगत कारकों को ध्यान में रखते हुए वस्तुनिष्ठ मानकों पर आधारित होना चाहिये 
  • "महत्त्वपूर्ण जानकारी" की प्रकृति पर:न्यायालय ने माना कि "महत्त्वपूर्ण जानकारी" को दबाना तुच्छ या तकनीकी प्रकृति का नहीं होना चाहियेऔर यदि प्रतिवादी को लंबित आपराधिक मामले की जानकारी नहीं थीतो इस तरह के नकारात्मक प्रकटन के लिये सेवा से बर्खास्तगी या निष्कासन जैसे गंभीर दण्डात्मक परिणाम नहीं होने चाहिये 
  • तुच्छ मामलों और जानकारी के अभाव पर:न्यायालय ने पवन कुमार बनाम भारत संघ के मामले पर विश्वास करते हुए यह माना कि जहाँ कोई आपराधिक मामला तुच्छ प्रकृति का है और सत्यापन प्रपत्र जमा करने की तिथि तक ऐसे मामले की जानकारी स्थापित नहीं की जा सकती हैवहाँ नियोक्ता के लिये कर्मचारी को सेवा से हटाकर दण्डित करना उचित नहीं होगा। 
  • अनुतोष प्रदान करने पर:न्यायालय ने तथ्य-जांच प्राधिकरण के इस निष्कर्ष को बरकरार रखा कि सत्यापन रोल प्रस्तुत करते समय प्रत्यर्थी को मामलों के पंजीकरण की जानकारी नहीं थीऔर यह माना कि वह एकल न्यायाधीश द्वारा प्रदान किया गए अनुतोष की हकदार थी।  

सत्यापन रोल में महत्त्वपूर्ण जानकारी को दबाने का मानक क्या है? 

  • शील और पूर्ववृत्त का सत्यापन नियोक्ताओंविशेष रूप से अनुशासित संगठनों द्वाराकिसी उम्मीदवार की नियोजन के लिये उपयुक्तता का आकलन करने के लिये उपयोग किया जाने वाला एक वैध और महत्त्वपूर्ण मानदंड है। 
  • यद्यपिकिसी उम्मीदवार के विरुद्ध प्रतिकूल निर्णय केवल जानकारी छिपाने या गुप्त रखने पर आधारित नहीं हो सकतायह सभी सुसंगत कारकों को ध्यान में रखते हुए वस्तुनिष्ठ मानकों पर आधारित होना चाहिये 
  • जानकारी को दबाने का संबंध "महत्त्वपूर्ण" जानकारी से होना चाहिये - यह तुच्छ या तकनीकी प्रकृति की नहीं होनी चाहिये 
  • यदि किसी उम्मीदवार को सत्यापन प्रपत्र प्रस्तुत करते समय किसी लंबित या बीते हुए आपराधिक मामले की जानकारी नहीं थीतो सद्भावनापूर्वक किया गया नकारात्मक प्रकटन सेवा समाप्ति या निष्कासन को आमंत्रित करने वाला मिथ्या कथन नहीं माना जा सकता है। 
  • ऐसे मामले जो प्रकृति में मामूली होंया जिनका अंततः परिणाम दोषमुक्ति होउम्मीदवार के पक्ष में तब मायने रखते हैं जब यह आकलन किया जा रहा हो कि दमन जानबूझकर किया गया था या महत्त्वपूर्ण था। 

लोक नियोजन में आपराधिक मामले को छिपाने/गुप्त रखने के संबंध में विधिक स्थिति क्या है? 

इस संबंध में कोई एक निश्चित संहिताबद्ध "उपबंध" नहीं है – विधि सेवा नियमोंसत्यापन प्रपत्रों और न्यायिक पूर्व निर्णयों के माध्यम से विकसित हुआ है। प्रमुख तत्त्व: 

1. दायित्त्व का स्रोत 

  • अधिकांश सरकारी भर्ती प्रक्रियाओं में उम्मीदवारों को एक सत्यापन रोल/अटैस्टेशन फॉर्म भरना होता हैजिसमें किसी भी आपराधिक मामलेगिरफ्तारीदोषसिद्धि या लंबित अभियोजन का विवरण देना होता है। 
  • यह आवश्यकता सेवा आचरण नियमों (जैसेकेंद्रीय सिविल सेवा (आचरण) नियम, 1964, और इसी तरह के राज्य नियम) और संबंधित विभाग/संगठन के विशिष्ट भर्ती विनियमों से उत्पन्न होती है। 
  • इस प्रकार की मिथ्या घोषणा या जानकारी छिपाने पर अनुशासनात्मक कार्रवाई की जा सकती हैजिसमेंबर्खास्तगीउम्मीदवारी रद्द करना या नियोजन से इंकार करनाशामिल हैऔर इसे "मिथ्या जानकारी देने" का मामला माना जाएगा। 

2. प्रमुख न्यायिक मानक 

  • अवतार सिंह बनाम भारत संघ (2016) - प्रमुख पूर्व निर्णय है। उच्चतम न्यायालय ने मार्गदर्शक सिद्धांत निर्धारित किये: 
    • किसी आपराधिक मामले से संबंधित महत्त्वपूर्ण तथ्य को छिपाने से उम्मीदवार अयोग्य हो जाता हैलेकिन नियोक्ता को कार्रवाई करने से पहले अपराध की प्रकृतिगंभीरता और परिणाम पर विचार करना चाहिये 
    • यदि मामले का अंत दोषमुक्ति में होता है (तकनीकी आधारों को छोड़कर)तो सामान्यतः इसे उम्मीदवार के विरुद्ध नहीं माना जाना चाहिये 
    • यदि मामला लंबित था और इसका प्रकटन नहीं किया गया थातो नियोक्ता अपराध की प्रकृति पर विचार कर सकता है और उचित दृष्टिकोण अपना सकता है। 
    • किसी मामूली अपराध में दोषसिद्धि/दोषमुक्ति होने के निर्णय को दबानाजिसमें नैतिक पतन शामिल नहीं थानियोजन से इंकार करने का औचित्य नहीं हो सकता। 
    • नियोक्ता को विवेकाधिकार प्राप्त हैलेकिन उसे निष्पक्ष और तर्कसंगत तरीके से कार्य करना चाहियेन कि यांत्रिक रूप से। 
  • पवन कुमार बनाम भारत संघ (2022) - ने दोहराया कि जहाँ मामला तुच्छ है और फॉर्म भरने की तारीख तक उम्मीदवार को मामले की जानकारी नहीं हैवहाँ दण्डात्मक परिणाम (निष्कासन/बर्खास्तगी) उचित नहीं हैं। 
  • पुलिस आयुक्त बनाम राज कुमार (2021) यह माना गया कि महत्त्वपूर्ण जानकारी को दबाना स्वयं किसी विशिष्ट नियम के बिना भी बर्खास्तगी का आधार हो सकता हैक्योंकि यह एकअनुशासित बलके लिये उम्मीदवार की सत्यनिष्ठा और उपयुक्तता पर असर डालता है । 

3. न्यायालय सामान्यत: जिन कारकों पर विचार करते हैं 

  • क्या छुपाया गयातथ्यमहत्त्वपूर्ण था या मामूली? 
  • क्या उम्मीदवार कोफॉर्म भरते समय मामले/कार्यवाही कीवास्तविक जानकारी थी? 
  • अपराध की प्रकृति और गंभीरता (नैतिक पतन बनाम मामूली/तकनीकी अपराध ) । 
  • मामले काअंतिमपरिणाम (दोषमुक्तिउन्मुक्तिदोषसिद्धि)। 
  • यदि प्रकटन किया जातातो क्यासंबंधित नियमों के अधीन उम्मीदवारवास्तव में अयोग्य घोषित हो जाता? 
  • पद की प्रकृतिके आधारपरअनुशासित सेवाओं (पुलिसअर्धसैनिक बलन्यायपालिका) में सामान्य प्रशासनिक पदों की तुलना में अधिक गहन जांच की आवश्यकता होती है।