9 मार्च से शुरू हो रहे हमारे ऑल-इन-वन ज्यूडिशियरी फाउंडेशन कोर्स के साथ अपनी ज्यूडिशियरी की तैयारी को मजबूत बनाएं | यह कोर्स अंग्रेज़ी और हिंदी दोनों माध्यमों में उपलब्ध है।   |   आज ही हमारे ज्यूडिशियरी फाउंडेशन कोर्स में एडमिशन लें और अपनी तैयारी को और बेहतर बनाएँ | हिंदी माध्यम बैच: 9 मार्च, सुबह 8 बजे   |   आज ही एडमिशन लें बिहार APO (प्रिलिम्स + मेन्स) कोर्स में और अपने सपनों को दे नई दिशा | ऑफलाइन एवं ऑनलाइन मोड में उपलब्ध | 12 जनवरी 2026  से कक्षाएँ आरंभ   |   ज्यूडिशियरी की तैयारी अब हिंदी माध्यम में! दृष्टि ज्यूडिशियरी का नया बैच 22 जून 2026 से शुरू | आज ही एडमिशन लें | ऑनलाइन व ऑफलाइन दोनों मोड में उपलब्ध |   |   एडमिशन ओपन: UP APO प्रिलिम्स + मेंस कोर्स 2025, बैच 6th October से   |   ज्यूडिशियरी फाउंडेशन कोर्स (प्रयागराज)   |   अपनी सीट आज ही कन्फर्म करें - UP APO प्रिलिम्स कोर्स 2025, बैच 6th October से







होम / करेंट अफेयर्स

सांविधानिक विधि

अनुच्छेद 226 के अधीन असुविधाजनक न्यायिक मंच और रिट अधिकारिता का सिद्धांत

    «    »
 11-Jun-2026

बख्शीशअहमद बनाम भारत संघ और अन्य 

"जहाँ सांविधानिक उपचार का पालन करने का प्रश्न शामिल है और रिट अधिकारिता का आह्वान अनुच्छेद 226 के खंड (1) से पता लगाया जा सकता हैवहाँ फोरम नॉन कन्वीनियंस का सिद्धांत शायद ही कभी लागू हो सकता है।" 

न्यायमूर्ति दीपांकर दत्ता और न्यायमूर्ति सतीश चंद्र शर्मा 

स्रोत: उच्चतम न्यायालय 

चर्चा में क्यों? 

भारत के उच्चतम न्यायालय के न्यायमूर्ति दीपांकर दत्ता और न्यायमूर्ति सतीश चंद्र शर्मा की खंडपीठ नेबख्शीश अहमद बनाम भारत संघ और अन्य (2026)मामले में यह निर्णय दिया कि संविधान के अनुच्छेद 226 के अंतर्गत कार्यवाही में फोरम नॉन कन्वीनियंस का सिद्धांत सीमित रूप से लागू होता है। न्यायालय ने कहा कि जहाँ अनुच्छेद 226(1) के अंतर्गत अधिकारिता का प्रयोग करते हुए रिट याचिका दायर की जाती है—अर्थात् प्रत्यर्थियों के कार्यालय के स्थान के आधार पर—वहाँ यह सिद्धांत शायद ही कभी उच्च न्यायालय को अधिकारिता का प्रयोग करने से इंकार करने का औचित्य प्रदान करता है। 

  • न्यायालय ने दिल्ली उच्च न्यायालय के उस आदेश को अपास्त कर दिया जिसमें दिल्ली को उपयुक्त क्षेत्र न मानते हुए BSF कांस्टेबल की रिट याचिका पर सुनवाई करने से इंकार कर दिया गया थाऔर याचिका को गुण-दोष के आधार पर विचार के लिये बहाल कर दिया। 

बख्शीश अहमद बनाम भारत संघ और अन्य (2026) के मामले की पृष्ठभूमि क्या थी? 

  • यह मामला सीमा सुरक्षा बल (BSF) के कांस्टेबल बख्शीश अहमद के विरुद्ध अनुशासनात्मक कार्यवाही से उत्पन्न हुआ। 
  • उन्हें सीमा सुरक्षा बल नियम, 1969 और केंद्रीय सिविल सेवा (कदाचार) नियम, 1964 के उल्लंघन के आरोप में कारण बताओ नोटिस जारी किया गया था। 
  • विहित अवधि के भीतर जवाब प्रस्तुत करने में असफल रहने परकमांडेंट द्वारा उन्हें सेवा से बर्खास्त कर दिया गया। 
  • BSF नियमों के नियम 28क के अधीन दायर उनकी सांविधिक याचिका को बाद में BSF, जम्मू स्थित सीमा मुख्यालय के महानिरीक्षक ने खारिज कर दिया। 
  • कांस्टेबल ने दोनों आदेशों को दिल्ली उच्च न्यायालय में चुनौती दी। उच्च न्यायालय ने याचिका पर सुनवाई करने से इंकार कर दियायह मानते हुए कि संबंधित घटनाएँ या तो पश्चिम बंगाल में घटी थींजहाँ बर्खास्तगी का आदेश जारी किया गया थाया जम्मू और कश्मीर मेंजहाँ सांविधिक याचिका खारिज की गई थी। न्यायालय ने निष्कर्ष निकाला कि दिल्ली उपयुक्त न्यायालय नहीं है और याचिका खारिज करते हुए कांस्टेबल को उचित उच्च न्यायालय में अपील करने की अनुमति दी। 
  • कांस्टेबल ने अबरार अली बनाम सी.आई.एस.एफ. के निर्णय पर विश्वास करते हुए इस आदेश को उच्चतम न्यायालय में चुनौती दीजहाँ अनुच्छेद 226 (1) के अधीन दिल्ली उच्च न्यायालय की अधिकारिता को इस आधार पर बरकरार रखा गया था कि CISF मुख्यालय दिल्ली में स्थित है। 

न्यायालय की क्या टिप्पणियां थीं? 

  • अनुच्छेद 226 के अधीन प्रादेशिक अधिकारिता पर:न्यायालय ने माना कि अनुच्छेद 226(1) उच्च न्यायालय को अपनी प्रादेशिक सीमाओं के भीतर स्थित किसी भी प्राधिकारी के विरुद्ध रिट जारी करने का अधिकार देता है। चूँकि भारत संघ और BSF के महानिदेशक - दोनों आवश्यक पक्षकार - के कार्यालय दिल्ली में स्थित थेइसलिये दिल्ली उच्च न्यायालय रिट याचिका पर सुनवाई करने के लिये सक्षम था। वैकल्पिक मंचों के अस्तित्व से इस अधिकारिता पर कोई प्रभाव नहीं पड़ता। 
  • रिट कार्यवाही में फोरम नॉन कन्वीनियंस के सीमित अनुप्रयोग पर:न्यायालय ने माना कि अनुच्छेद 226 से संबंधित रिट अधिकारिता के संदर्भ में फोरम नॉन कन्वीनियंस (असुविधाजनक न्यायिक मंचके सिद्धांत का गलत प्रयोग किया गया है। यह सिद्धांत अधिकारिता रखने वाले न्यायालय को किसी मामले की सुनवाई से इंकार करने की अनुमति देता है यदि कोई अन्य मंच अधिक उपयुक्त होलेकिन सांविधानिक रिट कार्यवाही में इसका अनुप्रयोग दुर्लभ है और इस पर अत्यंत सावधानी से विचार किया जाना चाहिये 
  • अनुच्छेद 226(1) और 226(2) के बीच अंतर के संबंध में:न्यायालय ने स्पष्ट किया कि अनुच्छेद 226(1) प्रत्यर्थियों के कार्यालयों के स्थान के आधार पर अधिकारिता प्रदान करता हैजबकि अनुच्छेद 226(2) उस स्थान के आधार पर अधिकारिता प्रदान करता है जहाँ वाद हेतुक पूर्णतः या आंशिक रूप से उत्पन्न होता है। जहाँ अधिकारिता खंड (1) से निर्धारित होता हैवहाँ फोरम नॉन कन्वीनियंस का सिद्धांत शायद ही लागू होगा। 
  • उत्प्रेषण कार्यवाही में न्याय तक पहुँच के संबंध में:न्यायालय ने पाया कि उत्प्रेषण याचिका दायर करने वाली कार्यवाही मेंसंबंधित अभिलेख सामान्यत: प्रत्यर्थी अधिकारियों के पास उपलब्ध होते हैं और उन्हें आसानी से न्यायालय के समक्ष प्रस्तुत किया जा सकता है। प्रत्यर्थियों के स्थान के आधार पर किसी न्यायालय का चयन करने वाले वादी को उससे विमुख नहीं किया जाना चाहियेक्योंकि ऐसा करने से न्याय तक पहुँच में बाधा उत्पन्न हो सकती हैन कि उसे बढ़ावा मिलेगा। 
  • निर्धारित विधिक सिद्धांतों के आधार पर:न्यायालय ने निम्नलिखित प्रस्तावों का सारांश प्रस्तुत किया: 
    • फोरम नॉन कन्वीनियंस (असुविधाजनक न्यायिक मंचका सिद्धांत सामान्यतः लागू नहीं होता है जब कोई वादी अनुच्छेद 226(1) के अधीन रिट अधिकारिता का आह्वान करता हैजो प्रत्यर्थियों के उच्च न्यायालय की प्रादेशिक सीमाओं के भीतर स्थित होने के आधार पर होता है। 
    • जहाँ अधिकारिता का आधार प्रत्यर्थियों के कार्यालयों का स्थान हैवहाँ समवर्ती अधिकारिता वाले अन्य मंचों का अस्तित्व अधिकारिता का प्रयोग करने से इंकार करने का औचित्य नहीं ठहराता है।  
    • उत्प्रेषण की कार्यवाही मेंप्रत्यर्थियों के कार्यालयों से रिकॉर्ड मंगवाए जा सकते हैं और न्यायालय के समक्ष प्रस्तुत किये जा सकते हैंऐसे मामलों में याचिकाकर्त्ता द्वारा चुने गए मंच के विकल्प को रसद संबंधी विचार रद्द नहीं कर सकते। 
    • ऐसी परिस्थितियों में इस सिद्धांत को लागू करना आत्मघाती होगा और न्याय को आगे बढ़ाने के बजाय न्याय तक पहुँच को बाधित करेगा। 
  • तदनुसारदिल्ली उच्च न्यायालय के निर्णय को अपास्त कर दिया गया और याचिका को गुण-दोष के आधार पर निर्णय के लिये बहाल कर दिया गया। 

फोरम नॉन कन्वीनिएंस (असुविधाजनक न्यायिक मंचका सिद्धांत क्या है? 

  • अर्थ: 
    • फोरम नॉन कन्वीनियंस एक सामान्य विधि का विधिक सिद्धांत है जो किसी न्यायालय को किसी मामले को खारिज करने या स्थगित करने की अनुमति देता है जब उसे लगता है कि मामले की सुनवाई के लिये कोई अन्य मंच अधिक उपयुक्त हैभले ही न्यायालय के पास मामले और पक्षकारों पर अधिकारिता हो। 
    • यह शब्द लैटिन भाषा में "असुविधाजनक मंच" के लिये प्रयोग किया जाता है। 
    • यह निजी अंतरराष्ट्रीय विधि में एक महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाता हैजहाँ न्यायालय प्राय: कई अधिकारिताओं से जुड़े सीमा पार विवादों से निपटता हैं। 
  • ऐतिहासिक उत्पत्ति: 
    • इस सिद्धांत की उत्पत्ति स्कॉटिश विधि में हुई है और बाद में इसे इंग्लैंडसंयुक्त राज्य अमेरिकाकनाडा और ऑस्ट्रेलिया सहित कई देशों में कॉमन लॉ के अधीन अपनाया गया। 
    • अंग्रेजी विधि मेंइसे प्रथम बार स्पिलियाडा मैरीटाइम कॉर्प बनाम कैंसुलेक्स लिमिटेड (1987) में पुष्टि की गई थीजहाँ लॉर्ड गॉफ ने इसके अनुप्रयोग के लिये एक व्यापक ढाँचा प्रदान किया था। 
  • मुख्य बातें— निजी हित के कारक: 
    • पक्षकारों की सुविधा: स्थानयात्रा में सुगमता और वित्तीय विचार। 
    • साक्षियों और साक्ष्यों का स्थान: यदि अधिकांश साक्ष्य या साक्षी किसी विदेशी अधिकारिता में स्थित हैंतो न्यायालय इस सिद्धांत को लागू करने के लिये इच्छुक हो सकता है। 
    • मुकदमेबाजी का खर्च: यदि वर्तमान न्यायालय में मुकदमेबाजी का खर्च काफी अधिक हैतो न्यायालय अधिक किफायती न्यायालय के पक्ष में मामले को खारिज करने का विकल्प चुन सकता है। 
  • मुख्य बातें— जनहित कारक: 
    • न्यायालय पर प्रशासनिक भार: न्यायालय अपने मामलों की सूची में अत्यधिक भार से बचने के लिये किसी मामले को खारिज कर सकते हैंविशेषत: यदि मामले का अधिकारिता से न्यूनतम संबंध हो। 
    • विदेशी विधि का अनुप्रयोग: यदि मामले में विदेशी विधि का अनुप्रयोग शामिल हैतो न्यायालय यह निर्धारित कर सकता है कि उस विधि से परिचित मंच में इसकी सुनवाई करना बेहतर होगा। 
  • पर्याप्त वैकल्पिक मंच: 
    • प्रतिवादी को यह साबित करना होगा कि एक वैकल्पिक मंच मौजूद है जहाँ मामले की उचित सुनवाई हो सकती है - उस मंच के पास पक्षकारों और विषय वस्तु पर अधिकारिता होना चाहिये और उसे वादी को एक पर्याप्त उपचार प्रदान करना चाहिये 
  • वादी की पसंद को महत्त्व: 
    • सामान्यतःन्यायालय वादी द्वारा चुने गए न्यायालय को महत्त्वपूर्ण महत्त्व देते हैंवादी के विदेशी होने पर यह महत्त्व कम हो जाता है। 

भारत के संविधान का अनुच्छेद 226 क्या है? 

  • अनुच्छेद 226 संविधान के भाग के अंतर्गत निहित हैजो उच्च न्यायालय को रिट जारी करने की शक्ति प्रदान करता है। 
  • भारत के संविधान के अनुच्छेद 226(1) मेंकहा गया है कि प्रत्येक उच्च न्यायालय को मौलिक अधिकारों के प्रवर्तन और अन्य प्रयोजनों के लिये किसी व्यक्ति या किसी सरकार को बंदी प्रत्यक्षीकरणपरमादेशप्रतिषेधअधिकार-पृच्छा और उत्प्रेषण और अपील सहित आदेश या रिट जारी करने की शक्ति होगी। 
  • अनुच्छेद 226(2)में कहा गया है कि उच्च न्यायालय को किसी भी व्यक्तिसरकार या प्राधिकारी को रिट या आदेश जारी करने का अधिकार है। 
    • इसकी अधिकारिता के भीतर स्थित या 
    • यदि वाद हेतुक उत्पन्न होने वाली परिस्थितियाँ पूर्णतः या भागत: उसके प्रादेशिक अधिकारिता के भीतर उत्पन्न होती हैंतो वह उसके स्थानीय अधिकारिता से बाहर हो जाती है। 
  • अनुच्छेद 226(3)में कहा गया है कि जब किसी पक्षकार के विरुद्ध उच्च न्यायालय द्वारा व्यादेशस्थगन या अन्य माध्यमों से अंतरिम आदेश पारित किया जाता हैतो वह पक्षकार न्यायालय में ऐसे आदेश को रद्द करने के लिये आवेदन कर सकता है और न्यायालय द्वारा ऐसे आवेदन का निपटारा दो सप्ताह की अवधि के भीतर किया जाना चाहिये 
  • अनुच्छेद 226(4)कहता है कि इस अनुच्छेद द्वारा उच्च न्यायालय को दी गई शक्ति अनुच्छेद 32 के खंड (2) द्वारा उच्चतम न्यायालय को दी गई शक्ति को कम नहीं करेगी। 
  • यह अनुच्छेद सरकार सहित किसी भी व्यक्ति या प्राधिकारी के विरुद्ध जारी किया जा सकता है। 
  • यह मात्र एक सांविधानिक अधिकार हैमौलिक अधिकार नहींऔर आपातकाल के दौरान भी इसे निलंबित नहीं किया जा सकता है। 
  • अनुच्छेद 226 मौलिक अधिकारों के मामले में अनिवार्य प्रकृति का है और जब इसे "किसी अन्य प्रयोजन" के लिये जारी किया जाता है तो विवेकाधीन प्रकृति का होता है। 
  • यह न केवल मौलिक अधिकारों को अपितु अन्य विधिक अधिकारों को भी लागू करता है।