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सांविधानिक विधि
उच्चतम न्यायालय ने निर्वाचक नामावलियों के विशेष गहन पुनरीक्षण (SIR) को निर्वाचन आयोग के सांविधानिक कर्त्तव्य के रूप में वैध एवं न्यायसंगत ठहराया
«29-May-2026
स्रोत: द हिंदू
परिचय
उच्चतम न्यायालय ने निर्वाचक नामावली के विशेष गहन पुनरीक्षण (SIR) को भारत निर्वाचन आयोग (ECI) द्वारा स्वतंत्र और निष्पक्ष निर्वाचन कराने के सांविधानिक दायित्त्व के अनुपालन में की गई प्रक्रिया के रूप में बरकरार रखा है। भारत के मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत और न्यायमूर्ति जॉयमाल्य बागची की पीठ ने कहा कि SIR का स्वतंत्र और निष्पक्ष निर्वाचन के सांविधानिक लक्ष्य से सीधा संबंध है, जो न केवल मतदान की प्रक्रिया पर अपितु निर्वाचक नामावली की सत्यनिष्ठा, सटीकता और शुद्धता पर भी समान रूप से निर्भर करता है।
विशेष गहन पुनरीक्षण (SIR) क्या है?
- विशेष गहन पुनरीक्षण (SIR) निर्वाचन आयोग द्वारा निर्वाचक नामावलियों को व्यापक रूप से अद्यतन एवं शुद्ध करने हेतु संचालित एक व्यापक अभ्यास है ।
- इसमें घर-घर जाकर सत्यापन करना, पात्र मतदाताओं को जोड़ना, मृत, डुप्लिकेट या स्थानांतरित प्रविष्टियों को हटाना और नामांकन की शर्त के रूप में नागरिकता का सत्यापन करना शामिल है।
- बिहार विशेष गहन पुनरीक्षण (Bihar SIR), जो इस वाद-विवाद का विषय था, के अंतर्गत 12 राज्यों एवं संघ राज्य क्षेत्रों के लगभग 51 करोड़ मतदाता सम्मिलित थे, जिनमें पश्चिम बंगाल, तमिलनाडु एवं केरल भी शामिल थे।
- SIR का द्वितीय चरण उस समय भी प्रारंभ कर दिया गया था, जब इस प्रक्रिया की वैधता को चुनौती देने वाली याचिका उच्चतम न्यायालय के समक्ष लंबित थी।
- पिछले साल 30 सितंबर को प्रकाशित बिहार की अंतिम निर्वाचक नामावली में 7.42 करोड़ मतदाता थे, जबकि 24 जून, 2025 को निर्वाचन आयोग द्वारा SIR अधिसूचित किये जाने के समय मतदाताओं की संख्या 7.89 करोड़ थी।
विशेष गहन पुनरीक्षण को चुनौती क्यों दी गई?
- याचिकाकर्त्ताओं ने तर्क दिया कि SIR, निर्वाचक नामावली से विदेशियों को "शुद्ध" करने के नाम पर नागरिकता की जांच करने का एक अप्रत्यक्ष प्रयास था।
- उन्होंने तर्क दिया कि SIR का कोई अनुभवजन्य आधार नहीं था और इसने कठिनाई और मनमाने बहिष्कार के माध्यम से व्यापक पीड़ा का कारण बना।
- याचिकाकर्त्ताओं ने आगे यह तर्क दिया कि SIR ने लोक प्रतिनिधित्व अधिनियम (RP Act) या निर्वाचक रजिस्ट्रीकरण नियम, 1960 का स्थान ले लिया है।
न्यायालय की टिप्पणियां
- उच्चतम न्यायालय ने याचिकाकर्त्ताओं के इस विचार को खारिज कर दिया कि SIR निर्वाचक नामावली संशोधन के बहाने नागरिकता की जांच करने का एक प्रयास था।
- पीठ ने माना कि निर्वाचन आयोग को निर्वाचक नामावली में शामिल करने या बाहर करने के सीमित दायरे में नागरिकता सत्यापित करने का पूरा अधिकार है, और कहा: "नागरिकता निर्वाचक नामावली में नामांकन के लिये एक पूर्व शर्त है। निर्वाचन आयोग, निर्वाचक नामावली तैयार करने या उसमें संशोधन करने के दौरान, नागरिकता से संबंधित प्रश्नों की जांच करने के लिये निस्संदेह सशक्त है।"
- न्यायालय ने SIR के लिये "ठोस औचित्य" पाया, अर्थात् अंतिम गहन संशोधन के बाद से दो दशकों से अधिक का समय बीत जाना, उस अवधि में बड़े पैमाने पर जोड़-घटाव, तीव्र शहरीकरण, प्रवासन और परिणामस्वरूप बार-बार या दोषपूर्ण प्रविष्टियों की संभावना।
- इसमें कहा गया कि निर्वाचक नामावली एक स्थिर दस्तावेज़ नहीं है और जनसंख्या, निवास स्थान और पात्रता में बदलाव के जवाब में इसमें परिवर्तन होना चाहिये।
- न्यायालय ने इस तर्क को खारिज कर दिया कि SIR से लोगों को परेशानी हुई, यह पाते हुए कि कठिनाई और मनमानी बहिष्कार को कम करने के लिये उचित सुरक्षा उपाय मौजूद थे या लागू किये गए थे - जिसमें नागरिकता सत्यापन के लिये आधार को 12वें "संकेतक" दस्तावेज़ के रूप में शामिल करना, बिहार में लगभग 65 लाख बहिष्कृत मतदाताओं की पूरी सूची प्रकाशित करने का निदेश और जमीनी स्तर पर राजनीतिक दलों के बूथ-स्तरीय एजेंटों की सक्रिय सहायता शामिल है।
- अनुच्छेद 324 के अधीन आयोग के पर्यवेक्षी अधिकार को "शक्ति का एक निरंतर स्रोत" बताया गया है, जिसमें लोकतांत्रिक प्रक्रिया की पवित्रता सुनिश्चित करने के लिये चुनावी तंत्र के हर पहलू और चरण को शामिल किया गया है।
जारी किये गए प्रमुख निदेश
- न्यायालय ने निर्वाचन आयोग को निदेश दिया कि वह चार सप्ताह के भीतर उन मतदाताओं के नाम केंद्र को भेजे जो 2003 की निर्वाचक नामावली में शामिल थे लेकिन गैर-नागरिक होने के आधार पर बिहार SIR में उनका नाम हटा दिया गया था, जिससे नागरिकता अधिनियम के अधीन एक सक्षम प्राधिकारी द्वारा उन पर निर्णय लिया जा सके।
- बिहार में रहने वाले वे व्यक्ति जिनके नाम अनुपस्थिति, मृत्यु, दोहराव या स्थानांतरण के आधार पर गलत तरीके से हटा दिये गए हों, उन्हें निर्वाचन आयोग के निर्णय को न्यायालय में चुनौती देने का अधिकार दिया गया था।
- यदि वे अगली विधानसभा या स्थानीय निकाय चुनावों से पहले नागरिक पाए जाते हैं, तो उनके नाम निर्वाचक नामावली में बहाल कर दिये जाएंगे।
भारत के संविधान का अनुच्छेद 324
- संविधान के अनुच्छेद 324 के अधीन निर्वाचक नामावलियों की तैयारी और संसद तथा राज्य विधानमंडलों के सभी निर्वाचनों के संचालन का अधीक्षण, निर्देशन और नियंत्रण निर्वाचन आयोग को सौंपा गया है।
- उच्चतम न्यायालय ने माना कि SIR ने अनुच्छेद 324 के सांविधानिक जनादेश को पुनर्जीवित किया है – अर्थात् चुनाव कराने और उसकी निगरानी करने की निर्वाचन आयोग की शक्ति।
- न्यायालय ने कहा कि अनुच्छेद 324 "शक्ति का एक निरंतर स्रोत" है जो चुनावी तंत्र के हर पहलू को समाहित करता है।
निष्कर्ष
बिहार SIR की सांविधानिकता को बरकरार रखने वाले उच्चतम न्यायालय के निर्णय का देश भर में होने वाले आगामी SIR पर महत्त्वपूर्ण प्रभाव पड़ेगा। नागरिकता सत्यापन को निर्वाचन आयोग का वैध और सांविधानिक रूप से अनिवार्य कार्य मानते हुए, न्यायालय ने निर्वाचक नामावली संशोधन और नागरिकता जांच के बीच स्पष्ट अंतर स्थापित किया है। यह निर्णय अनुच्छेद 324 के अधीन निर्वाचन आयोग की व्यापक पर्यवेक्षी शक्ति की पुष्टि करते हुए, गलत तरीके से अपवर्जित किये गए लोगों की सुरक्षा के लिये प्रक्रियात्मक सुरक्षा उपायों का निदेश देता है - इस प्रकार निर्वाचन निष्पक्षता और व्यक्तिगत अधिकारों के बीच संतुलन स्थापित करता है।