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आपराधिक कानून

किसी महिला के नहाने का वीडियो अपलोड करने की धमकी देना भारतीय दण्ड संहिता की धारा 506 के अधीन आपराधिक अभित्रास माना जाता है

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 25-May-2026

विजयकुमार बनाम तमिलनाडु राज्य 

"किसी महिला के नग्न या अर्ध-नग्न निजी वीडियो को ऑनलाइन प्रकाशित करने की धमकी देनाउसे असतित्व का लांछन की धमकी के समान हैक्योंकि यह उसकी निजतागरिमा और लैंगिक स्वायत्तता का उल्लंघन करता है। 

न्यायमूर्ति संजय करोल और न्यायमूर्ति नोंगमेइकापम कोटिस्वर सिंह 

स्रोत: उच्चतम न्यायालय 

चर्चा में क्यों? 

भारत के उच्चतम न्यायालय की एक खंडपीठजिसमें न्यायमूर्ति संजय करोल और न्यायमूर्ति नोंगमेइकापम कोटिश्वर सिंह शामिल थेनेविजयकुमार बनाम तमिलनाडु राज्य (2026) मामले मेंअपीलकर्त्ता के दण्ड को बरकरार रखा। यह दण्ड भारतीय दण्ड संहिता, 1860 की धारा 506 के भाग 2 (भारतीय न्याय संहिता की धारा 351) के अधीन दिया गया थातथापिन्यायालय ने दण्ड की अवधि को घटाकर उस समय के समान कर दियाजो अपीलकर्त्ता पहले ही अभिरक्षा में बिता चुका था 

  • न्यायालय ने माना कि किसी महिला के निजी स्नान वीडियो को फेसबुक पर अपलोड करने की धमकी देना अपवित्रता का आरोप लगाकर आपराधिक अभित्रास देना हैऔर भारतीय दण्ड संहिता की धारा 506 के अधीन "असतित्वकी अवधारणा को पारंपरिक या पितृसत्तात्मक नैतिक धारणाओं के बजाय गरिमानिजता और लैंगिक स्वायत्तता के सांविधानिक मूल्यों के माध्यम से समझा जाना चाहिये 

विजयकुमार बनाम तमिलनाडु राज्य (2026) के मामले की पृष्ठभूमि क्या थी? 

  • अभियोक्‍त्री ने आरोप लगाया कि अपीलकर्त्ता का उसके साथ प्रेम-संबंध और लैंगिक संबंध था और उसने नहाते समय चुपके से उसकी रिकॉर्डिंग की थी। 
  • इसके बाद अपीलकर्त्ता ने धमकी दी कि यदि वह उससे संपर्क करना जारी रखती है या संबंध बनाए रखने पर बल देती है तो वह वीडियो को फेसबुक पर अपलोड कर देगा। 
  • विचारण न्यायालय ने अपीलकर्त्ता को भारतीय दण्ड संहिता की धारा 376, 493 और 354ग के अधीन अपराधों से दोषमुक्त कर दियालेकिन मौखिक साक्ष्य के माध्यम से स्थापित धमकी के आधार पर उसे भारतीय दण्ड संहिता की धारा 506 के भाग के अधीन दोषी ठहराया। 
  • उच्च न्यायालय ने दोषसिद्धि को बरकरार रखाजिसके परिणामस्वरूप उच्चतम न्यायालय के समक्ष यह अपील दायर की गई है। 
  • न्यायालय के समक्ष मुख्य विवाद्यक यह था कि क्या अभियोजन पक्ष ने भारतीय दण्ड संहिता की धारा 503 के अधीन आपराधिक अभित्रास के अपराध को उचित संदेह से परे साबित कर दिया हैजो भारतीय दण्ड संहिता की धारा 506 के भाग के अधीन दण्डनीय हैभले ही कथित मोबाइल फोन या वीडियो बरामद नहीं हुआ हो। 

न्यायालय की क्या टिप्पणियां थीं? 

  • आरोपों की स्वतंत्र परीक्षा पर:न्यायालय ने माना कि भारतीय दण्ड संहिता की धारा 376, 493 और 354ग के अधीन अपीलकर्त्ता की दोषमुक्ति से भारतीय दण्ड संहिता की धारा 506 के अधीन दोषसिद्धि स्वतः रद्द नहीं हो जाती। प्रत्येक अपराध के भिन्न विधिक तत्त्व होते हैंऔर लैंगिक संबंध का सहमति से होना यह साबित नहीं करता कि बाद में निजी वीडियो को सार्वजनिक करने की धमकी देना वैध था। 
  • "अनैतिकता" के सांविधानिक अर्थ पर:न्यायालय ने माना कि भारतीय दण्ड संहिता की धारा 506 के भाग 2 के अंतर्गत "असतित्व" को केवल पारंपरिक नैतिक धारणाओं के आधार पर नहींअपितु गरिमानिजता और लैंगिक स्वायत्तता के सांविधानिक मूल्यों के माध्यम से समझा जाना चाहिये। किसी महिला के नग्न या अर्धनग्न निजी स्नान वीडियो को सोशल मीडिया पर प्रकाशित करने की धमकी देना उसकी लैंगिक स्वायत्तताशारीरिक निजता और गरिमा पर हमला हैऔर इसलिये यह प्रावधान के अर्थ के अंतर्गत अनैतिकता का आरोप लगाने के समान है। 
  • पीड़ित के दृष्टिकोण से खतरे का आकलन:न्यायालय ने माना कि धमकी को वास्तव में अंजाम दिया जा सकता था या नहींयह निर्णायक नहीं है। महत्त्वपूर्ण यह है कि क्या धमकी दी गई थी और क्या उससे वास्तव में भय उत्पन्न हुआ था। किसी व्यक्ति को ऐसी धमकी से भी आपराधिक रूप से डराया जा सकता है जिसे अंततः अंजाम नहीं दिया जा सकतायदि पीड़ित वास्तव में उसे वास्तविक मानता है और उसका उद्देश्य भय उत्पन्न करना या किसी कार्य या लोप के लिये बाध्य करना था। 
  • डिजिटल साक्ष्य न मिलने पर:न्यायालय ने माना कि मोबाइल फोन या वीडियो न मिलना दोषसिद्धि के लिये निर्णायक नहीं हैबशर्ते विश्वसनीय मौखिक साक्ष्य से खतरे की पुष्टि संदेह से परे हो। अभियोक्‍त्री के परिसाक्ष्य की पुष्टि उसकी बहनों और भाभी ने कीऔर अपीलकर्त्ता ने प्रभावी रूप से इसका खंडन या इसे चुनौती नहीं दी। यद्यपिन्यायालय ने डिजिटल साक्ष्य प्राप्त करने में असफल रहने के लिये अन्वेषण अधिकारी की स्पष्ट रूप से आलोचना कीजो साइबर अपराधों की जांच में उच्च अपेक्षाओं का संकेत देता है। 
  • अंतरंग संबंधों में साक्ष्य अधिनियम की धारा 106 के संबंध में:न्यायालय ने पाया कि भारतीय साक्ष्य अधिनियम की धारा 106 के अंतर्गत "विशेष जानकारी" केवल भौतिक स्थान के भीतर घटित घटनाओं तक सीमित नहीं है। यह अंतरंग संबंधों द्वारा निर्मित निजी पारस्परिक स्थानों तक भी विस्तारित हो सकती है। चूँकि कई सुसंगत घटनाएँ केवल अपीलकर्त्ता और अभियोक्‍त्री के बीच घटित हुईंइसलिये अभियोजन पक्ष द्वारा मूलभूत तथ्यों को स्थापित कर दिये जाने के बाद अपीलकर्त्ता का मात्र इंकार अपर्याप्त था। 

भारतीय न्याय संहिता की धारा 351 क्या है? 

भारतीय न्याय संहिता की धारा 351— आपराधिक अभित्रास 

परिभाषा:किसी अन्य व्यक्ति को उसके शरीरख्याति या संपत्ति (या किसी ऐसे व्यक्ति को जिसमें वह हितबद्ध हो) को क्षति कारित करने की धमकी देनाइस आशय से कि: 

  • उस व्यक्ति को भयभीत किया जाएया 
  • उसे कोई ऐसा कार्य करने के लिये विवश किया जाए जिसे करने के लिये वह विधिक रूप से बाध्य नहीं हैया 
  • उसे कोई ऐसा कार्य न करने के लिये विवश किया जाए जिसे करने का उसे विधिक अधिकार है। 

स्पष्टीकरण:किसी मृत व्यक्ति की ख्याति को क्षति कारित करने की धमकीजिसमें धमकी प्राप्त करने वाला व्यक्ति हितबद्ध होभी इसके अंतर्गत आता है। 

दृष्टांत: ‘A’, ‘B’ को सिविल वाद चलाने से रोकने के लिये उसके घर को जलाने की धमकी देता है — ‘A’ आपराधिक अभित्रास का दोषी है। 

दण्ड: 

श्रेणी 

दण्ड 

साधारण आपराधिक अभित्रास (धारा 351(1)) 

अधिकतम वर्ष का कारावासया जुर्मानाअथवा दोनों 

गंभीर आपराधिक अभित्रास (धारा 351(2)) 

अधिकतम वर्ष का कारावासया जुर्मानाअथवा दोनों 

अनाम धमकी (एस. 351(3)) 

धारा 351(1) के अधीन दण्ड के अतिरिक्त अधिकतम वर्ष का अतिरिक्त कारावास 

गंभीर श्रेणी (धारा 351(2)) में ये धमकियाँ शामिल हैं: 

  • मृत्यु या घोर उपहति कारिता करना  
  • अग्नि द्वारा संपत्ति को नष्ट करना 
  • ऐसा अपराध करना जिसके लिये मृत्युदण्ड आजीवन कारावास या सात वर्ष तक के कारावास का दण्ड हो सकता है 
  • किसी महिला पर असतित्व का लांछन लगाना 

अनाम धमकी (धारा 351(3)):जहाँ धमकी अनाम संसूचना के माध्यम से दी जाती है या अपराधी अपना नाम या पता छुपाता हैवहाँ धारा 351(1) के अधीन मूल दण्ड के अतिरिक्त 2 वर्ष तक का अतिरिक्त दण्ड लागू होता है।