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आपराधिक कानून
सिविल कारावास पति के भरण-पोषण भुगतान के कर्त्तव्य को समाप्त नहीं करता है
«25-Mar-2026
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हसीना खातून बनाम उत्तर प्रदेश राज्य एवं अन्य "केवल भरण-पोषण भुगतान में व्यतिक्रम करने वाले व्यक्ति को सिविल कारावास में भेज देने मात्र से, वह पीड़ित पत्नी को मासिक भरण-पोषण राशि का संदाय करने के दायित्त्व से मुक्त नहीं हो जाता।" न्यायमूर्ति प्रवीण कुमार गिरि |
स्रोत: इलाहाबाद उच्च न्यायालय
चर्चा में क्यों?
इलाहाबाद उच्च न्यायालय के न्यायमूर्ति प्रवीण कुमार गिरि की पीठ ने हसीना खातून बनाम उत्तर प्रदेश राज्य और अन्य (2026) के मामले में यह निर्णय दिया कि घरेलू हिंसा से महिला संरक्षण अधिनियम, 2005 के अधीन भरण-पोषण का संदाय न करने के लिये सिविल कारावास पति के बकाया भुगतान करने के निरंतर दायित्त्व को समाप्त नहीं करता है।
- न्यायालय ने आगे स्पष्ट किया कि धारा 300 दण्ड प्रक्रिया संहिता (भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता की धारा 337) के अधीन दोहरे दण्ड का सिद्धांत घरेलू हिंसा अधिनियम के अधीन कार्यवाही पर पूरी तरह से लागू नहीं होता है।
हसीना खातून बनाम उत्तर प्रदेश राज्य (2026) के मामले की पृष्ठभूमि क्या थी?
- यह याचिका हसीना खातून नामक एक पत्नी द्वारा दायर की गई थी, जिसमें उन्होंने मुरादाबाद के सिविल जज (जूनियर डिवीजन)/फास्ट ट्रैक कोर्ट (महिलाओं के विरुद्ध अपराध) द्वारा जनवरी 2023 में पारित एक आदेश को चुनौती दी थी।
- जुलाई 2019 में, एक मजिस्ट्रेट ने याचिकाकर्त्ता के पति को पत्नी को 4,000 रुपए और उनके विकलांग पुत्र को हर महीने 4,000 रुपए का अंतरिम भरण-पोषण देने का निदेश दिया था।
- पति निरंतर इन भुगतानों को करने में असफल रहा, जिसके कारण बकाया राशि बढ़कर 2,64,000 रुपए हो गई, जिसके चलते पत्नी को निष्पादन याचिका दायर करनी पड़ी।
- पत्नी की याचिका पर वसूली वारण्ट (Recovery Warrant) जारी किया गया तथा पति को 30 अक्टूबर, 2022 को गिरफ्तार कर लिया गया। प्रदत्त राशि जमा करने से उसके इंकार करने पर, न्यायिक मजिस्ट्रेट ने उसे 30 दिनों के लिये सिविल कारावास में भेज दिया।
- अपनी रिहाई के बाद भी पति ने भरण-पोषण की राशि का संदाय नहीं किया। परिणामस्वरूप, पत्नी ने बकाया राशि 2,64,000 रुपए की वसूली के लिये एक नया आवेदन दायर किया।
- सिविल जज (जूनियर डिवीजन)/फास्ट ट्रैक कोर्ट ने इस बाद के आवेदन को यह कहते हुए खारिज कर दिया कि पति पहले ही उन बकाया राशि के संबंध में 30 दिनों की सिविल निरोध काट चुका है, और उसी राशि पर आगे की कार्यवाही को रोकने के लिये धारा 300 दण्ड प्रक्रिया संहिता पर विश्वास किया।
- पति ने इस बात की प्रतिरक्षा करते हुए तर्क दिया कि कारावास का दण्ड पूरा कर लेने के बाद उस पर कोई बकाया नहीं रह गया है, और उसने इस आधार पर दण्ड प्रक्रिया संहिता की धारा 482 के अधीन पत्नी की याचिका की वैधता को भी चुनौती दी कि विवादित आदेश घरेलू हिंसा अधिनियम की धारा 29 के अधीन अपील योग्य है।
न्यायालय की क्या टिप्पणियाँ थीं?
- दोहरे दण्ड के सिद्धांत की अप्रयोज्यता पर, न्यायालय ने प्रारंभ में ही यह माना कि धारा 300 दण्ड प्रक्रिया संहिता, जिसमें दोहरे दण्ड का सिद्धांत निहित है, घरेलू हिंसा अधिनियम के अधीन कार्यवाही पर पूरी तरह से लागू नहीं होता है, क्योंकि ऐसी कार्यवाही के परिणामस्वरूप न तो दोषसिद्धि होती है और न ही दोषमुक्ति।
- पीठ ने टिप्पणी की कि धारा 300 दण्ड प्रक्रिया संहिता का हवाला देते हुए भरण-पोषण पंचाट को लागू करने से इंकार करना न्यायिक विवेक के प्रयोग का अभाव दर्शाता है।
- भरण-पोषण कार्यवाही की प्रकृति पर, न्यायालय ने रीना कुमारी बनाम दिनेश कुमार महतो (2025) में उच्चतम न्यायालय के निर्णय पर विश्वास करते हुए पुष्टि की कि भले ही भरण-पोषण आदेश का पालन न करने पर दण्डात्मक परिणाम होते हैं, लेकिन कार्यवाही स्वयं पारंपरिक अर्थों में आपराधिक कार्यवाही नहीं होती है।
- पति की निरंतर देनदारी के संबंध में, पीठ ने स्पष्ट रूप से कहा कि दोषी पति को सिविल कारागार भेजना अनुपालन लागू करने का एक दण्डात्मक तंत्र है - यह मूल ऋण की मुक्ति या संतुष्टि नहीं है।
- सिविल निरोध की अवधि समाप्त होने के बाद भी, वर्तमान और बकाया दोनों प्रकार के भरण-पोषण का संदाय करने का दायित्त्व बना रहता है।
- उपलब्ध उपचार के संबंध में, न्यायालय ने निदेश दिया कि चूँकि पति पहले ही सिविल निरोध की अवधि बिता चुका है, इसलिये उसी बकाया राशि के लिये आगे सिविल कारावास उचित नहीं होगा।
- इसके बजाय, उचित उपाय पति की संपत्ति की कुर्की करना था, जिसकी राशि का उपयोग बकाया राशि के भुगतान के साथ-साथ विलंबित राशि पर 6% प्रति वर्ष की दर से साधारण बैंक ब्याज के भुगतान के लिये किया जाना था।
भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता की धारा 337 क्या है?
धारा 337, भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता — एक बार दोषसिद्ध ठहराए जाने या दोषमुक्त किये जाने के बाद किसी व्यक्ति पर उसी अपराध के लिये विचारण नहीं चलाया जाएगा।
- मूल नियम: किसी सक्षम न्यायालय द्वारा एक बार दोषसिद्ध ठहराए जाने या दोषमुक्त किये जाने के बाद किसी व्यक्ति पर उसी अपराध के लिये या उन्हीं तथ्यों के आधार पर किसी अन्य अपराध के लिये दोबारा विचारण नहीं चलाया जा सकता, जिस पर मूल विचारण में आरोप लगाया जा सकता था।
अपवाद (जब दूसरा विचारण की अनुमति हो):
- भिन्न अपराध — किसी व्यक्ति पर एक ही संव्यवहार से उत्पन्न होने वाले पृथक्, विशिष्ट अपराध के लिये विचारण चलाया जा सकता है, लेकिन केवल राज्य सरकार की सम्मति से।
- अप्रत्याशित परिणाम — यदि किसी कृत्य के परिणामस्वरूप ऐसे परिणाम होते हैं जो प्रथम बार दोषसिद्धि के समय अज्ञात थे या घटित नहीं हुए थे (उदाहरण के लिये, किसी पीड़ित की बाद में चोटों से मृत्यु हो जाती है), तो अभियुक्त पर उन परिणामों से उत्पन्न होने वाले अधिक गंभीर अपराध के लिये विचारण चलाया जा सकता है।
- अक्षम न्यायालय — यदि मूल न्यायालय के पास किसी विशेष अपराध का विचारण करने की अधिकारिता नहीं थी, तो पहले की दोषसिद्धि या दोषमुक्त होते हुए भी, अभियुक्त पर उस अपराध के लिये किसी सक्षम न्यायालय के समक्ष विचारण चलाया जा सकता है।
- दोषमुक्त किया गया अभियुक्त - धारा 281 भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता के अधीन दोषमुक्त किये गए व्यक्ति पर उसी अपराध के लिये दोबारा विचारण चलाया जा सकता है, किंतु केवल दोषमुक्त करने वाले न्यायालय या उच्च न्यायालय की सहमति से।
किसे दोषमुक्ति नहीं माना जाता:
किसी परिवाद को खारिज करना या अभियुक्त को दोषमुक्त करना इस धारा के प्रयोजन के लिये दोषमुक्ति के समान नहीं है – अर्थात् ऐसे मामलों में दोहरे दण्ड से संरक्षण लागू नहीं होता है।
व्यावृत्ति (Savings):
यह धारा स्पष्ट रूप से सामान्य खण्ड अधिनियम, 1897 की धारा 26 और भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता की धारा 208 के संचालन को संरक्षित करता है, ये दोनों ही ऐसी स्थितियों से संबंधित हैं जहाँ एक ही कार्य कई विधियों के अधीन अपराध बनता है।
दृष्टांत (सरलीकृत):
- ‘A’ को एक सेवक के रूप में चोरी के आरोप से दोषमुक्त कर दिया गया है — उसे उसी चोरी के लिये अथवा उन्हीं तथ्यों के आधार पर साधारण चोरी के लिये पुनः विचारण के लिये प्रस्तुत नहीं किया जा सकता है।
- ‘A’ को घोर उपहति कारित करने का दोषी ठहराया जाता है — यदि बाद में पीड़ित की मृत्यु हो जाती है, तो ‘A’ पर 'आपराधिक मानव-वध' के लिये फिर से विचारण चलाया जा सकता है, क्योंकि पहले विचारण के समय इस जानलेवा परिणाम के बारे में जानकारी नहीं थी।