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सिविल कानून

कब्जे में स्थित वादी के लिये डिक्री का निष्पादन न होने मात्र से घोषणाात्मक डिक्री निष्फल नहीं होती

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 16-Apr-2026

हरि राम बनाम राजस्थान राज्य एवं अन्य 

"अपीलकर्त्ता के पक्ष में दी गई घोषणात्मक डिक्री को केवल इस आधार पर अपास्त नहीं किया जा सकता कि अपीलकर्त्ता ने निष्पादन की मांग नहीं कीक्योंकि ऐसी कोई उपधारणा नहीं है कि डिक्री के पारित होने के पश्चात् कब्जा प्रतिवादियों के पास ही रहा।" 

न्यायमूर्ति संजय कुमार और न्यायमूर्ति के. विनोद चंद्रन 

स्रोत: उच्चतम न्यायालय 

चर्चा में क्यों? 

भारत के उच्चतम न्यायालय के न्यायमूर्ति संजय कुमार और न्यायमूर्ति के. विनोद चंद्रन की पीठ नेहरि राम बनाम राजस्थान राज्य एवं अन्य (2026)के मामले में यह निर्णय दिया कि किसी घोषणात्मक डिक्री का निष्पादन न होना उस डिक्री को विलंबित रूप से चुनौती देने का वैध आधार नहीं हो सकताविशेषकर तब जब वादी-डिक्रीदार डिक्री पारित होने से पहले ही वाद संपत्ति पर कब्जा कर चुका हो। न्यायालय ने राजस्थान उच्च न्यायालय के निर्णय को रद्द कर दिया और 1975 में पारित मूल डिक्री के प्रभाव को बहाल कर दिया। 

हरि राम बनाम राजस्थान राज्य और अन्य (2026) के मामले की पृष्ठभूमि क्या थी? 

  • 16.08.1975 को अपीलकर्त्ता के पक्ष में एक घोषणात्मक डिक्री पारित की गईजिसमें वाद संपत्ति पर उसके स्वामित्व की घोषणा की गई। 
  • प्रत्यर्थियों ने इस निर्णय को चुनौती देते हुए 2006 में अपील दायर की - जो कि 31 वर्षों के एक असाधारण विलंब के बाद हुई। 
  • प्रथम अपीलीय प्राधिकारी ने परिसीमा के आधार पर अपील नामंजूर कर दी। 
  • यद्यपिराजस्व बोर्ड ने मामले को नए सिरे से विचार करने के लिये वापस भेज दियाइस निर्णय को बाद में राजस्थान उच्च न्यायालय ने भी बरकरार रखा। 
  • तत्पश्चात् अपीलकर्त्ता-वादी ने उच्च न्यायालय के आदेश को चुनौती देते हुए उच्चतम न्यायालय का रुख किया। 
  • उच्चतम न्यायालय के समक्षप्रत्यर्थियों ने तर्क दिया कि अपीलकर्त्ता द्वारा डिक्री को निष्पादित करने में विफलता के कारण उन्हें विलंब के होते हुए भी इसे चुनौती देने का अधिकार प्राप्त है। 

न्यायालय की क्या टिप्पणियां थीं? 

न्यायालय ने निम्नलिखित प्रमुख टिप्पणियां कीं: 

आदेश का क्रियान्वयन न होनाआदेश को चुनौती देने का आधार नहीं है: 

  • जहाँ वादी डिक्री पारित होने से पहले ही वाद संपत्ति पर कब्जा रखता हैवहाँ उसके लिये डिक्री के निष्पादन की मांग करना अनिवार्य नहीं है। 
  • यदि वादी पहले से ही कब्जे में है तो स्वामित्व घोषित करने वाले आदेश का निष्पादन अप्रासंगिक है - लागू करने के लिये कुछ भी शेष नहीं रह जाता है। 

प्रतिवादियों के पास निरंतर कब्जे की कोई उपधारणा नहीं है: 

  • ऐसी कोई विधिक उपधारणा नहीं है कि घोषणात्मक डिक्री पारित होने के बाद भी कब्ज़ा प्रतिवादियों के पास ही रहा। 
  • प्रत्यर्थी अपने कब्जे को बरकरार रखने में भी असफल रहे थे। 

31 वर्षों के विलंब को निराधार आधारों पर क्षमा नहीं किया जा सकता: 

  • न्यायालय ने 1975 के डिक्री को चुनौती देने में 31 वर्ष की भारी विलंब को स्वीकार किया। 
  • निष्पादन न होने के संबंध में दिये गए तर्क को "केवल ध्यान में रखे जाने और फिर नामंजूर किये जाने" के रूप में वर्णित किया गया था। 
  • इतने विलंब से निष्पादन का दावा करना अपने आप में समय-बाधित हो जाएगाजिससे प्रत्यर्थियों का तर्क स्वतः ही निष्फल हो जाएगा। 

1975 की डिक्री की बहाली: 

  • अपील मंजूर कर ली गईजिसके परिणामस्वरूप राजस्थान उच्च न्यायालय का आदेश अपास्त कर दिया गया और अपीलकर्त्ता के पक्ष में पारित घोषणात्मक डिक्री को पूर्ण रूप से बहाल कर दिया गया। 

घोषणात्मक डिक्री क्या है? 

विनिर्दिष्ट अनुतोष अधिनियम, 1963 के अधीन घोषणात्मक डिक्री (धारा 34 और 35) 

धारा 34 – प्रास्थिति की या अधिकार की घोषणा: 

  • कोई भी व्यक्ति जिसे विधिक अधिकार या संपत्ति का अधिकार प्राप्त हैवह उस अधिकार से इंकार करने वाले किसी भी व्यक्ति पर वाद कर सकता है। 
  • न्यायालय अपने विवेकानुसार वादी को इस प्रकार हकदार घोषित कर सकता है। 
  • वादी को घोषणा के अलावा और कोई अनुतोष मांगने की आवश्यकता नहीं है। 
  • परंतुक: यदि वादी आगे अनुतोष की मांग कर सकता है किंतु ऐसा करने में विफल रहता है तो कोई घोषणा नहीं की जाएगी। 

अनुतोष प्राप्त करने के लिये आवश्यक शर्तें: 

  • वादी को वाद के समय किसी विधिक हैसियत या संपत्ति के अधिकार का हकदार होना साबित करना होगा। 
  • प्रतिवादी द्वारा वादी के स्वामित्व (Title) का इंकार या उसके इंकार में हित होना आवश्यक है 
  • वादी को अपने हितों के लिये मौजूदा खतरे को साबित करना होगा। 
  • वादी आगे किसी भी प्रकार के अनुतोष का दावा करने की स्थिति में नहीं होना चाहिये 

मुख्य अवधारणाएँ: 

  • विधिक हैसियतविधि द्वारा मान्यता प्राप्त स्थिति। 
  • दावा किया गया अधिकार वाद की तारीख पर मौजूद होना चाहिये 
  • एक आकस्मिक अधिकार घोषणा के अधीन हो सकता है। 

जहाँ वाद ग्राह्य नहीं है : 

  • नकारात्मक घोषणाएँ स्वीकार्य नहीं हैं। 
  • वसीयतकर्त्ता के जीवनकाल के दौरानवसीयत को अमान्य घोषित करना। 
  • उत्तराधिकार प्रमाण पत्र को रद्द करना। 
  • एक ऐसे अधिकार के लिये जिसका अस्तित्व ही नहीं है। 

धारा 35 – घोषणा का प्रभाव : 

  • निम्नलिखित पर बाध्यकारी: वाद के पक्षकारउनके माध्यम से दावा करने वाले व्यक्तिन्यासी और वे जिनके लिये वे न्यासी हैं (यदि घोषणा की तिथि पर अस्तित्व में हैं)।