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आपराधिक कानून
केवल सोशल मीडिया सामग्री का अग्रेषण (फॉरवर्ड करना) भारतीय न्याय संहिता के अद्भीं अपराध नहीं है
«31-Mar-2026
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कोनाथम दिलीप कुमार उर्फ कोनाथम दिलीप रेड्डी और अन्य बनाम तेलंगाना राज्य और अन्य "यह मानते हुए भी कि याचिकाकर्त्ताओं ने ऐसी सामग्री प्रसारित या अग्रेषित की थी, भारतीय न्याय संहिता की धारा 353(1)(ग) और 353(2) के आवश्यक तत्त्व लागू नहीं होते हैं... याचिकाकर्त्ताओं के विरुद्ध कार्यवाही जारी रखना विधि की प्रक्रिया का दुरुपयोग होगा।" न्यायमूर्ति के. सुजाना |
स्रोत: तेलंगाना उच्च न्यायालय
चर्चा में क्यों?
तेलंगाना उच्च न्यायालय के न्यायमूर्ति के. सुजाना ने कोनाथम धिलिप कुमार उर्फ कोनाथम दिलीप रेड्डी और अन्य बनाम तेलंगाना राज्य और अन्य (2026) के मामले में यह निर्णय कि सांप्रदायिक द्वेष भड़काने या लोक शांति भंग करने के किसी भी आशय के बिना सोशल मीडिया सामग्री को अग्रेषित करना या प्रसारित करना भारतीय न्याय संहिता, 2023 (BNS) की धारा 353 की सांविधिक आवश्यकताओं को पूरा नहीं करता है।
- न्यायालय ने आगे कहा कि एक ही घटना के लिए अनेक प्रथम सूचना रिपोर्ट (FIR) दर्ज करना विधि की प्रक्रिया का दुरुपयोग है, और अपने पूर्व के सामान्य आदेश और टी. एंटनी बनाम केरल राज्य (2001) में उच्चतम न्यायालय के पूर्व निर्णय पर विश्वास करते हुए याचिकाकर्त्ताओं के विरुद्ध कार्यवाही को रद्द कर दिया।
कोनाथम धिलिप कुमार उर्फ कोनाथम दिलीप रेड्डी और अन्य बनाम तेलंगाना राज्य और अन्य (2026) मामले की पृष्ठभूमि क्या थी?
- यह याचिका तेलंगाना के नकरेकल पुलिस थाने में याचिकाकर्त्ताओं (जिन्हें अभियुक्त संख्या 1 और 3 के रूप में नामित किया गया है) के विरुद्ध भारतीय न्याय संहिता की धारा 353 के अधीन अपराधों के लिये दर्ज प्रथम सूचना रिपोर्ट (FIR) संख्या 86/2025 से संबंधित है, जो लोक रिष्टि को बढ़ावा देने वाले कथनों से संबंधित है।
- कांग्रेस पार्टी के एक नेता ने आरोप लगाया था कि कुछ यूट्यूब चैनलों और टेलीविजन मीडिया ने एस.एस.सी. तेलुगु बोर्ड परीक्षा के पेपर लीक मामले में अभियुक्त के साथ उन्हें जोड़ने वाली मिथ्या समाचार प्रसारित किये।
- यह अभिकथित किया गया था कि याचिकाकर्त्ताओं ने अन्य लोगों के साथ मिलकर सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म पर ऐसी सामग्री को आगे बढ़ाया, जिससे उनकी ख्याति, राजनीतिक करियर और मानसिक पीड़ा को नुकसान पहुँचा।
- याचिकाकर्त्ताओं ने तर्क दिया कि उन्हें राजनीतिक प्रतिद्वंद्विता के कारण मिथ्या फंसाया गया था और भारतीय न्याय संहिता प्रावधानों के अधीन एक आवश्यक तत्त्व - समुदायों के बीच दुश्मनी भड़काने का कोई दुराशय (Mens Rea) का आशय – विद्यमान नहीं था।
- उन्होंने आगे बताया कि इसी घटना के लिये कई प्रथम सूचना रिपोर्ट (FIR) दर्ज की गई थीं, और न्यायालय ने संबंधित याचिकाओं में समान रूप से आरोपित व्यक्तियों के विरुद्ध कार्यवाही पहले ही रद्द कर दी थी।
- राज्य ने याचिका का विरोध करते हुए कहा कि अभियुक्त ने परिवादकर्त्ता की ख्याति को नुकसान कारित करने के आशय से जानबूझकर मिथ्या समाचार फैलाया था और अन्वेषण में आपत्तिजनक सोशल मीडिया पोस्ट सामने आए हैं।
न्यायालय की क्या टिप्पणियां थीं?
- न्यायालय ने माना कि आरोपों को प्रत्यक्ष स्वीकार करने पर भी, याचिकाकर्त्ताओं के विरुद्ध भारतीय न्याय संहिता की धारा 353(1)(ग) और धारा 353(2) के सांविधिक तत्त्व साबित नहीं होते। सांप्रदायिक द्वेष भड़काने या लोक शांति भंग करने के किसी आशय के बिना, केवल सोशल मीडिया पर सामग्री अग्रेषित करना इस प्रावधान की आवश्यकताओं को पूरा नहीं करता है।
- न्यायालय ने संबंधित आपराधिक याचिकाओं में दिनांक 09.09.2025 के अपने पूर्व के संयुक्त आदेश पर विश्वास किया, जिसमें उसने यह माना था कि इसी तरह की सोशल मीडिया पोस्टों में सांप्रदायिक घृणा भड़काने का कोई आशय प्रकट नहीं होता है। वर्तमान मामले को उस निर्णय के दायरे में पाते हुए, न्यायालय ने कहा कि कार्यवाही जारी रखना अनुचित होगा और विधि का दुरुपयोग होगा।
- न्यायालय ने टी.टी. एंटनी बनाम केरल राज्य के मामले का हवाला देते हुए फिर से दोहराया कि एक ही घटना के लिये कई प्रथम सूचना रिपोर्ट (FIR) दर्ज करना स्वयं प्रक्रिया का दुरुपयोग है। तदनुसार, आपराधिक याचिका मंजूर कर ली गई और प्रथम सूचना रिपोर्ट (FIR) रद्द कर दी गई।
भारतीय न्याय संहिता की धारा 353 क्या है?
भारतीय न्याय संहिता की धारा 353 – लोक रिष्टिकारक वक्तव्य:
- धारा 353(1) के अधीन ऐसे कथन, मिथ्या जानकारी, जनश्रुति या रिपोर्ट (इलेक्ट्रॉनिक माध्यमों सहित) बनाना, प्रकाशित करना या प्रसारित करना दण्डनीय है जो:
- इससे सैन्यकर्मी विद्रोह कर सकते हैं या कर्त्तव्य की अवहेलना कर सकते हैं; या
- इससे जनता में भय या संत्रास उत्पन्न हो सकता है जिससे राज्य या लोक शांति के विरुद्ध अपराध हो सकते हैं; या
- इससे एक वर्ग/समुदाय को दूसरे वर्ग/समुदाय के विरुद्ध अपराध करने के लिये उद्दीप्त किया जा सकता है।
- धारा 353(2) विशेष रूप से उन कथनों या रिपोर्टों को लक्षित करती है जिनमें मिथ्या जानकारी, जनश्रुति या चिंताजनक समाचार (इलेक्ट्रॉनिक माध्यमों सहित) सम्मिलित हैं जो किसी भी आधार पर विभिन्न धार्मिक, नस्लीय, भाषाई, क्षेत्रीय समूहों, जातियों या समुदायों के बीच दुश्मनी, घृणा या दुर्भावना की भावना उत्पन्न करते हैं या बढ़ावा देते हैं।
- धारा 353(3) उपधारा (2) के अधीन अपराध धार्मिक पूजा या धार्मिक कर्म के दौरान किये जाने पर वर्धित दण्ड का उपबंध करती है (पाँच वर्ष तक कारावास और जुर्माना)।
- दण्ड : सामान्यतः तीन वर्ष तक कारावास, या जुर्माना, या दोनों (उपधारा 3 के सिवाय)।
- अपवाद : यदि व्यक्ति के पास यह विश्वास करने के लिये उचित आधार थे कि कथन सत्य था और उसने विद्वेषपूर्ण बिना सद्भावना से कार्य किया, तो कोई अपराध नहीं है।