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सांविधानिक विधि
क्रीमी लेयर का अवधारण करने के लिये केवल माता-पिता की आय ही सुसंगत है
«07-Apr-2026
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श्रीमती सुनीता यादव बनाम मध्य प्रदेश राज्य "किसी अभ्यर्थी के क्रीमी लेयर का दर्जा अवधारित करते समय, केवल उसके माता-पिता की आय को ही देखा जाना आवश्यक है। उसके पति (जो श्रेणी-I अधिकारी नहीं है) की आय और/या उसकी स्वयं की आय इस प्रयोजन के लिये सुसंगत नहीं है।" न्यायमूर्ति आशीष श्रोती |
स्रोत: मध्य प्रदेश उच्च न्यायालय, ग्वालियर पीठ
चर्चा में क्यों?
मध्य प्रदेश उच्च न्यायालय (ग्वालियर पीठ) के न्यायमूर्ति आशीष श्रोती ने श्रीमती सुनीता यादव बनाम मध्य प्रदेश राज्य (2026) के मामले में यह निर्णय दिया कि अन्य पिछड़ा वर्ग (OBC) के अभ्यर्थी के क्रीमी लेयर का दर्जा अवधारित करते समय केवल अभ्यर्थी के माता-पिता की आय पर ही विचार किया जाना चाहिये। अभ्यर्थी की स्वयं की आय और उसके पति की आय, जब तक कि वह श्रेणी-I का अधिकारी न हो, इस अवधारण के लिये पूरी तरह अप्रासंगिक है।
- न्यायालय ने निजी प्रत्यर्थी को दिये गए OBC आरक्षण को बरकरार रखा - जिन्हें सहायक प्रोफेसर (विधि) के रूप में नियुक्त किया गया था - यह मानते हुए कि वह क्रीमी लेयर में नहीं आती हैं, और उनकी नियुक्ति को चुनौती देने वाली याचिका को खारिज कर दिया।
श्रीमती सुनीता यादव बनाम मध्य प्रदेश राज्य (2026) के मामले की पृष्ठभूमि क्या थी?
- याचिकाकर्त्ता, जो MPPSC की अभ्यर्थी हैं, ने OBC (महिला) श्रेणी के अधीन सहायक प्रोफेसर (विधि) के पद पर प्रत्यर्थी संख्या 3 की नियुक्ति को चुनौती देते हुए मध्य प्रदेश उच्च न्यायालय का रुख किया और प्रार्थना की कि उन्हें उक्त पद पर नियुक्त करने का निदेश दिया जाए।
- चयन सूची में प्रत्यर्थी संख्या 3 को क्रमांक 34 पर रखा गया था जबकि याचिकाकर्त्ता को क्रमांक 35 पर रखा गया था। तदनुसार, विवादित आदेश के माध्यम से प्रत्यर्थी संख्या 3 को नियुक्ति दी गई थी।
- याचिकाकर्त्ता के अधिवक्ता ने तर्क दिया कि प्रत्यर्थी संख्या 3, यद्यपि OBC श्रेणी से संबंधित है, क्रीमी लेयर में आती है और इसलिये आरक्षण का लाभ पाने की हकदार नहीं है। यह तर्क इस तथ्य पर आधारित था कि उनके पति को प्रथम वर्ग के सिविल न्यायाधीश के रूप में नियुक्त किया गया था, और वह स्वयं अतिथि संकाय के रूप में प्रति माह ₹30,000 कमा रही थीं, जिससे उनकी संयुक्त पारिवारिक आय प्रति वर्ष ₹12 लाख से अधिक हो जाती है।
- इसके अतिरिक्त यह तर्क दिया गया कि प्रत्यर्थी संख्या 3 ने OBC श्रेणी का लाभ गलत तरीके से दावा किया था।
- प्रत्यर्थी संख्या 3 के अधिवक्ता ने यह तर्क दिया कि क्रीमी लेयर का दर्जा अवधारित करने के लिये, लागू दिशानिर्देशों के अधीन केवल माता-पिता की आय का आकलन किया जाता है, और न तो अभ्यर्थी की अपनी आय और न ही उसके पति की आय इस अवधारण के लिये सुसंगत है।
न्यायालय की क्या टिप्पणियां थीं?
- न्यायालय ने इंदिरा साहनी बनाम भारत संघ (1992) के ऐतिहासिक निर्णय पर विश्वास करते हुए दोहराया कि क्रीमी लेयर की अवधारणा यह सुनिश्चित करने के लिये विद्यमान है कि आरक्षण का लाभ उन लोगों को न मिले जो अब सामाजिक या आर्थिक रूप से पिछड़े नहीं हैं । अयोग्य अभ्यर्थियों को ऐसे लाभ देना सांविधानिक प्रावधान की भावना का उल्लंघन होगा।
- न्यायालय ने क्रीमी लेयर को अपवर्जित करने के पीछे के उद्देश्य पर बल देते हुए कहा: "क्रीमी लेयर को अपवर्जित करने का उद्देश्य यह सुनिश्चित करना है कि OBC के भीतर सामाजिक रूप से उन्नत वर्ग वास्तव में पिछड़े वर्गों के लिये बने लाभों का दुरुपयोग न करें। इसलिये भारत सरकार और राज्य सरकार द्वारा परिपत्रों के रूप में दिशानिर्देश जारी किये जाते हैं जिससे यह सुनिश्चित किया जा सके कि आरक्षण के इच्छित लाभ पिछड़े वर्गों के वास्तव में योग्य अभ्यर्थियों तक पहुँचे।"
- विभिन्न निर्णयों और लागू सरकारी दिशानिर्देशों की जांच करने के बाद, न्यायालय ने क्रीमी लेयर अवधारण के लिये निम्नलिखित स्थापित सिद्धांतों को दोहराया:
- किसी अभ्यर्थी के क्रीमी लेयर स्टेटस का अवधारित करते समय केवल माता-पिता की आय पर ही विचार किया जाता है।
- अभ्यर्थी की स्वयं की आय सुसंगत नहीं है।
- पति की आय पर तभी विचार किया जा सकता है जब अभ्यर्थी का विवाह श्रेणी-I के अधिकारी से हुआ हो।
- यदि किसी अभ्यर्थी के माता-पिता दोनों द्वितीय श्रेणी के अधिकारी हैं, तो उसे OBC आरक्षण से अपवर्जित किया जाता है।
- यदि किसी अभ्यर्थी के पिता द्वितीय श्रेणी के अधिकारी हैं और 40 वर्ष की आयु से प्रथम श्रेणी-I के अधिकारी के पद पर पदोन्नत हो जाते हैं, तो ऐसे अभ्यर्थी को इस प्रतियोगिता से अपवर्जित कर दिया जाता है।
- न्यायालय ने आगे कहा कि ये दिशानिर्देश संपूर्ण नहीं हैं।
- इन सिद्धांतों को तथ्यों पर लागू करते हुए, न्यायालय ने यह माना कि प्रत्यर्थी के पति, यद्यपि एक सिविल न्यायाधीश थे, क्रीमी लेयर अवधारण के उद्देश्य से प्रथम श्रेणी-I के अधिकारी नहीं थे, इसलिये उनकी आय को ध्यान में नहीं रखा जा सकता था। इसी प्रकार, अतिथि संकाय के रूप में प्र्तायार्थी की स्वयं की आय भी अप्रासंगिक थी।
- तदनुसार, न्यायालय ने माना कि प्रत्यर्थी संख्या 3 क्रीमी लेयर में नहीं आता है और उसे OBC आरक्षण का लाभ देना उचित था। याचिका खारिज कर दी गई।
क्रीमी लेयर की अवधारणा क्या है और इसे कैसे परिभाषित और लागू किया जाता है?
परिभाषा एवं उद्देश्य:
- क्रीमी लेयर की अवधारणा एक सीमा निर्धारित करती है जिसके भीतर OBC आरक्षण के लाभ लागू होते हैं।
- इसका उद्देश्य OBC श्रेणी के अपेक्षाकृत धनी व्यक्तियों को आरक्षण के लाभ से वंचित करना है।
- आरक्षण का लाभ वास्तव में वंचित लोगों तक पहुँचे, यह सुनिश्चित करने के लिये उच्चतम न्यायालय द्वारा इंदिरा साहनी मामले (1992) में इस अवधारणा को पेश किया गया था।
आय संबंधी मापदंड :
- वर्तमान में क्रीमी लेयर हेतु वार्षिक आय की सीमा ₹8 लाख निर्धारित है।
- यह सीमा वेतन एवं कृषि आय के अतिरिक्त अन्य स्रोतों से प्राप्त आय पर लागू होती है।
- इस आय-सीमा का प्रत्येक तीन वर्ष में पुनरीक्षण किया जाना अपेक्षित है, तथापि इसका अंतिम संशोधन वर्ष 2017 में किया गया था।
अन्य मापदंड:
- सरकारी के आश्रितों के संदर्भ में, क्रीमी लेयर का अवधारण केवल आय के आधार पर न होकर, उनके माता-पिता के पद (rank) के आधार पर किया जाता है।
- सांविधानिक पदों पर कार्यरत माता-पिता, सीधे भर्ती किये गए क’ (Group-A) अधिकारियों, या दोनों माता-पिता के समूह ‘ख’ (Group-B) सेवाओं में कार्यरत बालकों को क्रीमी लेयर के अंतर्गत रखा जाता है।
- इसी प्रकार, उच्च पदस्थ सैन्य अधिकारियों (कर्नल अथवा समकक्ष एवं उससे उच्च) के आश्रितों को भी क्रीमी लेयर में सम्मिलित किया जाता है।