9 मार्च से शुरू हो रहे हमारे ऑल-इन-वन ज्यूडिशियरी फाउंडेशन कोर्स के साथ अपनी ज्यूडिशियरी की तैयारी को मजबूत बनाएं | यह कोर्स अंग्रेज़ी और हिंदी दोनों माध्यमों में उपलब्ध है।   |   आज ही हमारे ज्यूडिशियरी फाउंडेशन कोर्स में एडमिशन लें और अपनी तैयारी को और बेहतर बनाएँ | हिंदी माध्यम बैच: 9 मार्च, सुबह 8 बजे   |   आज ही एडमिशन लें बिहार APO (प्रिलिम्स + मेन्स) कोर्स में और अपने सपनों को दे नई दिशा | ऑफलाइन एवं ऑनलाइन मोड में उपलब्ध | 12 जनवरी 2026  से कक्षाएँ आरंभ   |   एडमिशन ओपन: UP APO प्रिलिम्स + मेंस कोर्स 2025, बैच 6th October से   |   ज्यूडिशियरी फाउंडेशन कोर्स (प्रयागराज)   |   अपनी सीट आज ही कन्फर्म करें - UP APO प्रिलिम्स कोर्स 2025, बैच 6th October से










होम / करेंट अफेयर्स

आपराधिक कानून

दण्ड प्रक्रिया संहिता की धारा 197 के अंतर्गत संरक्षण

    «
 10-Apr-2026

"यदि कोई लोक सेवक अपने आधिकारिक कर्तव्यों का निर्वहन करते समय अपनी शक्तियों का दुरुपयोग भी करता हैतो दण्ड प्रक्रिया संहिता की धारा 197 लागू होगी। इसका उद्देश्य उन्हें बेईमान तत्वों द्वारा किसी भी प्रकार के उत्पीड़न से बचाना है।" 

न्यायमूर्ति एम.ए. चौधरी 

स्रोत: जम्मू और कश्मीर और लद्दाख उच्च न्यायालय 

चर्चा में क्यों? 

जम्मू-कश्मीर और लद्दाख उच्च न्यायालय के न्यायमूर्ति एम.ए. चौधरी ने राजेश्वर सिंह बनाम राज्य एवं अन्य (2026)के मामले में यह निर्णय दिया किदण्ड प्रक्रिया संहिता, 1973 की धारा 197 (अब भारतीय न्याय  संहिता की धारा 218) केअधीन प्राप्त संरक्षणलोक सेवकों को उन मामलों में भी प्राप्त होता है जहां उन्होंने अपनी शक्तियों का दुरुपयोग किया होबशर्ते कि परिवाद किये गए कृत्यों का आधिकारिक कर्तव्य निर्वहन से उचित संबंध हो। न्यायालय ने मजिस्ट्रेट द्वारा पारित संज्ञान आदेश और विचारण न्यायालय के विवादित आदेश को रद्द करते हुए स्पष्ट किया कि वैध सरकारी स्वीकृति प्राप्त होने पर अभियोजन आगे बढ़ाया जा सकता है। 

राजेश्वर सिंह बनाम राज्य और अन्य (2026) के मामले की पृष्ठभूमि क्या थी? 

  • याचिकाकर्ता आर.एस.पुरा के पूर्व उप-सम्भागीय पुलिस अधिकारी (Sub-Divisional Police Officer - SDPO) (एसडीपीओथेजिन्होंने अपने विरुद्ध कार्यवाही को रद्द करने की मांग करते हुए जम्मू-कश्मीर दण्ड प्रक्रिया संहिता की धारा 561-क (धारा 482 दण्ड प्रक्रिया संहिता/धारा 528 भारतीय न्याय संहिता के अनुरूप) के अधीन एक याचिका दायर की थी। 
  • मई 2005 मेंजब याचिकाकर्ता एसडीपीओ के पद पर तैनात थेतब इंदु रानी रहस्यमय परिस्थितियों में मृत पाई गईं। धारा 174 दण्ड प्रक्रिया संहिता के अधीन जांच कार्यवाही शुरू की गई। 
  • परिवादी सतीश कुमार को पूछताछ के लिये पुलिस स्टेशन बुलाया गया और दो घंटे बाद छोड़ दिया गया। इसके बाद कुलवंत सिंह मनहास और रामेश्वर सिंह मनहास के विरुद्ध धारा 302 दण्ड प्रक्रिया संहिता और धारा 4/25 शस्त्र अधिनियम के अधीन प्रथम सूचना रिपोर्ट (एफआईआर) दर्ज की गईजिन्हें बाद में दोषी ठहराया गया। 
  • परिवादी ने आरोप लगाया कि उसे 10 मई से जून, 2005 तक अवैध रूप से अभिरक्षा में रखा गयाविभिन्न पुलिस थानों में घुमाया गया औरयाचिकाकर्ता और अन्य पुलिस अधिकारियों के इशारे पर उसेथर्ड-डिग्री की यातना दी गई। 
  • जम्मू के मुख्य न्यायिक मजिस्ट्रेट केसमक्ष एक आपराधिक परिवाद दर्ज किया गयाजिन्होंने धारा 342, 330 और 34 दण्ड प्रक्रिया संहिता के अधीन संज्ञान लिया और मामले को सेशन न्यायालय को भेज दिया। 
  • मामले की सुनवाई के दौरानयाचिकाकर्ता ने धारा 197 दण्ड प्रक्रिया संहिता के अधीन संरक्षण का दावा करते हुए एक आवेदन दायर कियाजिसे विचारण न्यायालय ने इस आधार पर खारिज कर दिया कि कथित कृत्यों का उसके आधिकारिक कर्तव्य से कोई उचित संबंध नहीं था। 
  • याचिकाकर्ता ने इस अस्वीकृति को उच्च न्यायालय में चुनौती दी। 

न्यायालय की क्या टिप्पणियाँ थीं? 

  • न्यायालय ने धारा 197 दण्ड प्रक्रिया संहिता पर विधिक स्थिति का विश्लेषण किया और यह माना कि "आधिकारिक कर्तव्य"अभिव्यक्तिएक पद के कारण उत्पन्न होने वाले कर्तव्य को दर्शाती हैऔर परिवाद किये गए कृत्यों और एक लोक सेवक के कर्तव्यों के बीच एकउचित संबंधयह निर्धारित करता है कि संरक्षण लागू होता है या नहीं - भले ही वे कृत्य अधिकार से अधिक हों। 
  • न्यायालय ने स्पष्टीकरण के लिये एक उदाहरण प्रस्तुत किया: 
  • यदि कोईपुलिस उपाधीक्षकभागने का प्रयास कर रहे कैदी की पिटाई करता हैतो उसेसंरक्षण का अधिकारहोगाक्योंकि भागने से रोकना आधिकारिक कर्तव्य से जुड़ा है - भले ही अत्यधिक बल का प्रयोग किया गया हो। 
  • बिना किसी कारण के किसी राहगीर की पिटाई करने वाले पुलिस अधिकारी कोऐसेसंरक्षण का अधिकारनहींहोगाक्योंकि इसका आधिकारिक कर्तव्य से कोई संबंध नहीं है। 
  • इन सिद्धांतों को तथ्यों पर लागू करते हुएन्यायालय ने माना कि याचिकाकर्ता - एकराजपत्रित पर्यवेक्षी पुलिस अधिकारी (एसडीपीओ)के रूप में - पर परिवादी को अवैध अभिरक्षा में रखने और उसे यातना देने के द्वारा अपने अधिकार का दुरुपयोग करने का आरोप है। याचिकाकर्ता के स्वयं के इस कथन के बावजूद कि परिवादी को उसी दिन छोड़ दिया गया थाअवैध अभिरक्षा और यातना के आरोपों को एक पर्यवेक्षी अधिकारी के रूप में उनके आधिकारिक कर्तव्यों से अलग नहीं किया जा सकता। 
  • न्यायालय ने माना कि कथित कृत्यउनके आधिकारिक कर्तव्य से इस प्रकार अविभाज्य रूप से जुड़े हुए थेया कम से कम उसका स्वरूप धारण करते थेकि धारा 197 दण्ड प्रक्रिया संहिता का सुरक्षात्मक आवरण लागू होता है। 
  • तदनुसारन्यायालयनेयाचिका को स्वीकार कर लियासंज्ञान आदेश और याचिकाकर्ता के संबंध में विवादित विचारण न्यायालय के आदेश को रद्द कर दियाऔर स्पष्ट किया कि अभियोजन के लिये वैध स्वीकृति प्राप्त होने पर मजिस्ट्रेट संज्ञान पर पुनर्विचार करने के लिये स्वतंत्र होगा।

भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता की धारा 218 क्या है? 

धारा 218 - न्यायाधीशों और लोक सेवकों का अभियोजन 

संरक्षण का दायरा: 

  • यह नियम न्यायाधीशोंमजिस्ट्रेटों और उन लोक सेवकों पर लागू होता है जिन्हें सरकारी मंजूरी के बिना पद से हटाया नहीं जा सकता। 
  • यह संरक्षण उन अपराधों को कवर करता है जो आधिकारिक कर्तव्य के निर्वहन में कार्य करते समय या कार्य करने का दावा करते समय किये गए प्रतीत होते हैं। 
  • न्यायालय पूर्व अनुमति के बिना ऐसे अपराधों का संज्ञान नहीं ले सकते। 

प्रतिबंध संबंधी आवश्यकताएँ: 

  • संघ के मामलों से संबंधित कार्य करने वाले व्यक्तियों के लिये केंद्र सरकार की स्वीकृति आवश्यक है। 
  • राज्य के मामलों से संबंधित कार्यों में कार्यरत व्यक्तियों के लिये राज्य सरकार की स्वीकृति आवश्यक है। 
  • राष्ट्रपति शासन (अनुच्छेद 356) के दौरानराज्य कर्मचारियों के लिये भी केंद्र सरकार की स्वीकृति आवश्यक थी। 

प्रतिबंध संबंधी निर्णय के लिये समय सीमा: 

  • सरकार को स्वीकृति अनुरोध प्राप्त होने के 120 दिनों के भीतर उस पर निर्णय लेना होगा। 
  • यदि 120 दिनों के भीतर कोई निर्णय नहीं लिया जाता हैतो स्वतः ही मंजूरी दे दी गई मानी जाएगी। 

अपवाद - किसी प्रतिबंध की आवश्यकता नहीं: 

  • भारतीय न्याय संहिता, 2023 की विशिष्ट धाराओं के अंतर्गत अपराधों के लिये: धारा 197, 198, 63, 66, 68, 70, 73, 74, 75, 76, 77, 141, या 351। 
  • लोकपाल एवं लोकायुक्त अधिनियम, 2013 के अंतर्गत भी अपवाद प्रदान किया गया है। 

सशस्त्र बलों की सुरक्षा: 

  • सशस्त्र बलों के सदस्यों के लिये केंद्र सरकार की पूर्व स्वीकृति के बिना किसी भी मामले पर संज्ञान नहीं लिया जा सकता है। 
  • राज्य सरकार अधिसूचना के माध्यम से सार्वजनिक व्यवस्था बनाए रखने वाले बलों को यह संरक्षण प्रदान कर सकती है। 
  • राष्ट्रपति शासन के दौरानराज्य बलों के लिये भी केंद्र सरकार की मंजूरी आवश्यक थी। 

अभियोजन नियंत्रण: 

  • केंद्र/राज्य सरकार यह तय कर सकती है कि अभियोजन कौन चलाएगा। 
  • सरकार अभियोजन की विधि और अभियोजित किये जाने वाले विशिष्ट अपराधों को निर्दिष्ट कर सकती है। 
  • सरकार उस न्यायालय को नामित कर सकती है जहां अभियोजन चलेगा।