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सिविल कानून

माध्यस्थम् का स्थान बनाम स्थल

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 17-Apr-2026

जम्मू-कश्मीर आर्थिक पुनर्निर्माण एजेंसी बनाम रश बिल्डर्स इंडिया प्राइवेट लिमिटेड 

"एक बार माध्यस्थम् का स्थान तय हो जाने परस्पष्ट करार द्वारा परिवर्तन किये जाने तक वह अपरिवर्तनीय रहता है। केवल इस तथ्य से कि माध्यस्थम् की कार्यवाही किसी विशेष स्थान पर संचालित की जाती है या पंचाट दिया जाता हैउस स्थान के न्यायालयों को अधिकारिता प्राप्त नहीं हो जातीयदि वह स्थान निर्धारित स्थान से भिन्न हो।"  

न्यायमूर्ति पी.एस. नरसिम्हा और न्यायमूर्ति आलोक आराधे 

स्रोत: उच्चतम न्यायालय 

चर्चा में क्यों? 

उच्चतम न्यायालय के न्यायमूर्ति पी.एस. नरसिम्हा और न्यायमूर्ति आलोक आराधे की पीठ नेजम्मू-कश्मीर आर्थिक पुनर्निर्माण एजेंसी बनाम रश बिल्डर्स इंडिया प्राइवेट लिमिटेड (2026)के मामले में यह निर्णय दिया कि माध्यस्थम् का न्यायिक स्थानएक बार पक्षकारों के करार द्वारा नामित किये जाने के बादअपरिवर्तनीय रहता है और यह विशेष रूप से निर्धारित करता है कि किस न्यायालय के पास पर्यवेक्षी अधिकारिता है - भले ही माध्यस्थम् की कार्यवाही वास्तव में कहीं भी आयोजित की गई हो या पंचाट कहीं भी दिया गया हो।  

  • न्यायालय ने जम्मू-कश्मीर और लद्दाख उच्च न्यायालय के उस आदेश को अपास्त कर दियाजिसमें अपीलकर्त्ता की धारा 34 की याचिका को इस गलत आधार पर वापस कर दिया गया था कि माध्यस्थम् की कार्यवाही और पंचाट नई दिल्ली में हुआ था 

जम्मू-कश्मीर आर्थिक पुनर्निर्माण एजेंसी बनाम रश बिल्डर्स इंडिया प्राइवेट लिमिटेड (2026) के मामले की पृष्ठभूमि क्या थी? 

  • जम्मू-कश्मीर में सड़क परियोजनाओं के निर्माण के लिये प्रत्यर्थी को दिये गए कार्य आदेश के संबंध में अपीलकर्त्ता (जम्मू-कश्मीर आर्थिक पुनर्निर्माण एजेंसी) और प्रत्यर्थी (रैश बिल्डर्स इंडिया प्राइवेट लिमिटेड) के बीच विवाद उत्पन्न हो गया। 
  • दोनों पक्षकारों ने आपसी सहमति से अपने करार में श्रीनगर को माध्यस्थम् स्थल के रूप में नामित किया था।  
  • इसके होते हुए भीसुविधा के कारणों से माध्यस्थम् अधिकरण ने नई दिल्ली में कार्यवाही की और माध्यस्थम् का पंचाट भी नई दिल्ली में ही सुनाया गया। 
  • अपीलकर्त्ता ने माध्यस्थम् और सुलह अधिनियम, 1996 की धारा 34 के अधीन जम्मू-कश्मीर और लद्दाख उच्च न्यायालय में पंचाट को चुनौती देने के लिये एक याचिका दायर की। 
  • उच्च न्यायालय ने याचिका लौटाते हुए अपीलकर्त्ता को नई दिल्ली के न्यायालयों में जाने का निदेश दियायह तर्क देते हुए कि चूँकि कार्यवाही वहीं संचालित की गई थी और पंचाट वहीं पारित किया गया थाइसलिये दिल्ली के न्यायालयों का अधिकारिता है। 
  • तत्पश्चात् अपीलकर्त्ता ने इस आदेश को उच्चतम न्यायालय में चुनौती दी। 

न्यायालय की क्या टिप्पणियां थीं? 

न्यायालय ने निम्नलिखित प्रमुख टिप्पणियां कीं: 

अधिकारिता स्थान द्वारा निर्धारित होती हैस्थल द्वारा नहीं: 

  • माध्यस्थम् का स्थान पक्षकारों के आपसी करार द्वारा अवधारित किया जाता हैन कि पंचाट में किसी आकस्मिक उल्लेख द्वारा या सुविधा के लिये सुनवाई आयोजित किये गए स्थान द्वारा। 
  • एक बार स्थान निर्धारित हो जाने के बादकेवल उसी स्थान पर स्थित न्यायालयों के पास माध्यस्थम् कार्यवाही पर अनन्य पर्यवेक्षी अधिकारिता होती हैजिसमें धारा 34 के अधीन पंचाट को चुनौती देने की अधिकारिता भी शामिल है। 

स्थान एक अनन्य अधिकारिता खंड के रूप में कार्य करता है: 

  • न्यायालय का स्थान का निर्धारण एक अनन्य अधिकारिता खंड के समान कार्य करता हैजो अन्य सभी न्यायालयों को अपवर्जित रखता है – यहाँ तक ​​कि उन न्यायालयों को भी जहाँ वाद-हेतुक उत्पन्न हुआ हो या जहाँ सुनवाई हुई हो। 
  • यदि उच्च न्यायालय का दृष्टिकोण बरकरार रखा जाता हैतो न्यायिक स्थान की अवधारणा निरर्थक हो जाएगी और सुनवाई या पंचाट पर हस्ताक्षर करने के स्थान को अधिकारिता निर्धारित करने की अनुमति देकर अनिश्चितता उत्पन्न होगी। 

स्थल महज एक भौगोलिक सुविधा है: 

  • यह स्थान मात्र सुनवाईसाक्षियों की पूछताछ या बैठकों के आयोजन की सुविधा के लिये चुना गया एक स्थान है। यह स्वतः ही अधिकारिता प्रदान नहीं करता या निर्धारित स्थान को नहीं बदलता। 
  • माध्यस्थम् अधिकरण माध्यस्थम् के न्यायिक स्थान को प्रभावित किये बिनामाध्यस्थम् के स्थान के अलावा अन्य स्थानों पर भी कार्यवाही करने के लिये स्वतंत्र है। 

स्थान की अपरिवर्तनीयता: 

  • एक बार स्थान तय हो जाने परजब तक कि पक्षकारों के बीच किसी नए करार द्वारा स्पष्ट रूप से परिवर्तन न किया जाएवह अपरिवर्तनीय रहती है। वर्तमान मामले में ऐसा कोई परिवर्तन नहीं हुआ है। 

अपीलकर्त्ता की धारा 34 याचिका की बहाली: 

  • उच्चतम न्यायालय ने उच्च न्यायालय के विवादित आदेश को अपास्त कर दिया और धारा 34 के अधीन दायर याचिका को श्रीनगर स्थित जम्मू-कश्मीर और लद्दाख उच्च न्यायालय के समक्ष बहाल कर दियायह मानते हुए कि उच्च न्यायालय ही सक्षम अधिकारिता वाला न्यायालय है। 

माध्यस्थम् के स्थान (Seat) और स्थल (Venue) में क्या अंतर है? 

माध्यस्थम् का स्थान — अर्थ और महत्त्व: 

माध्यस्थम् का स्थान माध्यस्थम् के न्यायिक घर या विधिक स्थान को संदर्भित करता है। यह निर्धारित करता है: 

  • माध्यस्थम् प्रक्रिया को नियंत्रित करने वाकी न्यायिक विधि (प्रक्रियात्मक विधि); और 
  • न्यायालय के पास माध्यस्थम् पर अनन्य पर्यवेक्षी नियंत्रण हैजिसमें धारा 34 (पंचाट को चुनौती)धारा 9 (अंतरिम अनुतोष) और धारा 11 (मध्यस्थ की नियुक्ति) की कार्यवाही पर अधिकारिता शामिल है। 

माध्यस्थम् का स्थल — अर्थ और महत्व: 

  • सुनवाई या बैठक आयोजित करने के लिये सुविधा के अनुसार चुना गया स्थान मात्र भौतिक या भौगोलिक स्थान होता है। इसकी अधिकारिता पर कोई प्रभाव नहीं पड़ता और न ही इससे न्यायिक स्थान में कोई परिवर्तन होता है। 

उच्चतम न्यायालय द्वारा संक्षेप में बताए गए सिद्धांत: 

न्यायालय ने मार्गदर्शक सिद्धांतों को संक्षेप में इस प्रकार बताया: 

(i) यह स्थान माध्यस्थम् का न्यायिक केंद्र है और न्यायिक विधि तथा पर्यवेक्षी न्यायालय का अवधारण करता है। 

(ii) माध्यस्थम् संबंधी सभी कार्यवाहीजिनमें पंचाट को चुनौती देना भी शामिल हैपर संबंधित न्यायालयों का अनन्य अधिकारिता होती है। यह अनन्य अधिकारिता संविदात्मक अधिकारिता खंड की तरह कार्य करता है।  

(iii) स्थल एक भौगोलिक सुविधा है और इससे कोई अधिकारिता प्राप्त नहीं होती। अधिकरण स्थान को प्रभावित किये बिना कहीं भी कार्यवाही कर सकता है। 

(iv) केवल इस तथ्य से कि पंचाट दिया गया है या कार्यवाही किसी विशेष स्थान पर आयोजित की गई हैउस स्थान के न्यायालयों की अधिकारिता स्थानांतरित नहीं हो जातीयदि वह स्थान निर्दिष्ट स्थान से भिन्न है। 

(v) जहाँ स्थान स्पष्ट रूप से निर्दिष्ट नहीं हैवहाँ न्यायालय निम्नलिखित सिद्धांतों का अनुप्रयोग करते हैं: (a) निकटतम और सबसे घनिष्ठ संबंध परीक्षण (Naviera Amazonica सिद्धांत); और (b) शाशुआ सिद्धांत (Shashoua Principle), जहाँ करार और आसपास की परिस्थितियाँ ऐसा आशय दर्शाती हैंवहाँ स्थल को स्थान के रूप में माना जाता है।   

(vi) सर्वोपरि कारक माध्यस्थम् करार से ज्ञात पक्षकारों का आशय है। एक बार व्यक्त हो जाने पर—चाहे स्पष्ट रूप से या आवश्यक निहितार्थ द्वारा—उस आशय को पूर्ण प्रभाव दिया जाना चाहिये 

माध्यस्थम् और सुलह अधिनियम, 1996 की धारा 34 क्या है? 

धारा 34 — मध्यस्थता पंचाटों को अपास्त करना 

कौन आवेदन कर सकता है और कैसे: 

  • केवल व्यथित पक्षकार ही मध्यस्थता पंचाट को अपास्त करने के लिये न्यायालय में आवेदन कर सकता है। 
  • आवेदन के साथ दूसरे पक्षकार को पूर्व सूचना और अनुपालन की पुष्टि करने वाला एक शपथपत्र संलग्न होना चाहिये 

पक्षकार-आधारित पंचाट को अपास्त करने के आधार: 

  • एक पक्षकार असमर्थता के कारण अनुपस्थित था। 
  • लागू विधि के अधीन माध्यस्थम् करार अमान्य था।  
  • मध्यस्थ की नियुक्ति या कार्यवाही की उचित सूचना नहीं दी गई थीया संबंधित पक्षकार अपना मामला प्रस्तुत करने में असमर्थ था। 
  • यह पंचाट माध्यस्थम् के दायरे से बाहर के विवादों से संबंधित है (केवल इसके अतिरिक्त वाले भाग को ही अपास्त किया जा सकता है)।  
  • अधिकरण की संरचना या प्रक्रिया सहमति के अनुसार या विधि द्वारा आवश्यक रूप से नहीं थी। 

अपास्त करने के आधार (न्यायालय का स्वयं का निर्णय): 

  • विषयवस्तु विधि के अधीन मध्यस्थता योग्य नहीं है। 
  • यह पंचाट भारत की लोक नीति के विपरीत है – अर्थात् यह कपट/भ्रष्टाचार से प्राप्त किया गया थाभारतीय विधि की मूलभूत नीति का उल्लंघन करता हैया नैतिकता या न्याय की बुनियादी अवधारणाओं के विपरीत है। 
  • घरेलू (गैर-अंतर्राष्ट्रीय वाणिज्यिक) मध्यस्थताओं के लिये अतिरिक्त रूप से: पंचाट में स्पष्ट रूप से दिखाई देने वाली पेटेंट अवैधता - न कि केवल विधि का गलत अनुप्रयोग या साक्ष्य का पुनर्मूल्यांकन। 

परिसीमा: 

  • पंचाट प्राप्त होने के 3 महीनेके भीतर (या धारा 33 के अधीन सुधार अनुरोध के निपटान के बाद) आवेदन दाखिल किया जाना चाहिये 
  • पर्याप्त हेतुक बताए जाने पर न्यायालय 30 दिनों कीअतिरिक्त विलंब को क्षमा कर सकता है - इससे अधिक की अवधि नहीं बढ़ाई जा सकती। 

अन्य प्रावधान: 

  • न्यायालय अधिकरण को कार्यवाही फिर से शुरू करने और दोष को दूर करने की अनुमति देने के लिये कार्यवाही स्थगित कर सकता है। 
  • दूसरे पक्षकार को नोटिस दिये जाने के 1 वर्षके भीतर आवेदन का निपटारा किया जाना चाहिये