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आपराधिक कानून

केवल बोर्ड प्रस्ताव पर हस्ताक्षर करना निदेशक के अभियोजन के लिये पर्याप्त नहीं है।

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 09-Apr-2026

"बोर्ड प्रस्ताव पर हस्ताक्षर करने से यह साबित नहीं होता कि कोई निदेशक कंपनी के दिन-प्रतिदिन के मामलों का प्रभारी था।" 

न्यायमूर्ति संजय करोल और न्यायमूर्ति ऑगस्टीन जॉर्ज मसीह 

चर्चा में क्यों? 

सरोज पांडे बनाम राष्ट्रीय राजधानी क्षेत्र दिल्ली (2026) के मामलेमें उच्चतम न्यायालय नेफैसला सुनाया कि केवल बोर्ड प्रस्ताव पर हस्ताक्षर करने से यह साबित नहीं होता कि कोई निदेशक कंपनी के दिन-प्रतिदिन के मामलों का प्रभारी था। 

  • तदनुसारन्यायालय नेपरक्राम्य लिखत अधिनियम, 1881 (एनआई एक्ट) की धारा 138 और 142के अधीन एक निदेशक के विरुद्ध प्रारंभ की गई आपराधिक कार्यवाही को रद्द कर दिया और धारा 141 परक्राम्य लिखत अधिनियम के अधीन प्रतिनिधिक दायित्व तय करने की सख्त आवश्यकताओं को दोहराया। 

सरोज पांडे बनाम राष्ट्रीय राजधानी क्षेत्र दिल्ली (2026) के मामले की पृष्ठभूमि क्या थी? 

यह मामला एक कंपनी से जुड़े चेक के अनादरण के विवाद से उत्पन्न हुआ था: 

  • कंपनी ने लोहे और इस्पात के भुगतान के लिये तीन चेक जारी किये 
  • चेक निम्नलिखित कारणों से अस्वीकृत हो गए: 
  • हस्ताक्षर मेल नहीं खा रहे हैं। 
  • चेकों में बदलाव। 
  • एक विधिक नोटिस जारी किया गयाजिसके बाद निम्नलिखित कार्रवाई की गई: 
  • परक्राम्य लिखत अधिनियम की धारा 138 और 142 के अधीन परिवाद दर्ज किया गया 
  • कंपनी और उसके निदेशकों को तलब किया जाए। 

न्यायालयों के समक्ष कार्यवाही: 

  • मजिस्ट्रेट ने निदेशक (अपीलकर्ता) के विरुद्ध समन जारी किया। 
  • पुनरीक्षण न्यायालय ने हस्तक्षेप करने से इंकार कर दिया। 
  • उच्च न्यायालय ने कार्यवाही को बरकरार रखते हुए तर्क दिया कि: 
  • बोर्ड प्रस्ताव पर हस्ताक्षर करना कंपनी के मामलों में भागीदारी दर्शाता है। 

इसके बाद निदेशक ने उच्चतम न्यायालय का रुख किया। 

न्यायालय की क्या टिप्पणियाँ थीं? 

उच्चतम न्यायालय ने निम्नलिखित प्रमुख टिप्पणियाँ कीं: 

  1. विशिष्टअभिकथनों की आवश्यकता (धारा 141, परक्राम्य लिखत अधिनियम): 
    • किसी निदेशक को अभियोजित करने के लियेयह विशेष रूप से प्रस्तुत किया जाना चाहिये कि: 
    • वह व्यक्तिप्रभारीथा और 
    • संबंधित समय पर व्यवसाय के संचालन के लिये उत्तरदायी 
    • केवल निदेशक के रूप में नामित होना ही पर्याप्त नहीं है। 
  2. बोर्ड प्रस्ताव पर मात्र हस्ताक्षर करना अपर्याप्त है:
    • बोर्ड का प्रस्ताव सामान्यतः निम्नलिखित से संबंधित होता है: 
    • नीतिगत निर्णय 
    • रणनीतिक मामले 
    • प्रमुख कॉर्पोरेट कार्रवाइयां 
    • इसका यह अर्थ नहीं है: 
    • दैनिक संव्यवहार का ज्ञान 
    • नियमित व्यावसायिक कार्यों में भागीदारी 
    • इसलियेऐसे प्रस्ताव पर हस्ताक्षर करने से स्वतः ही आपराधिक दायित्व उत्पन्न नहीं हो जाता। 
  3. धारा482, दण्ड प्रक्रिया संहिता/पुनरीक्षण के बाद अंतर्निहित शक्तियां वर्जित नहीं होतीं: 
    • उच्च न्यायालय ने यह मानने में गलती की, कि: 
    • पुनरीक्षण याचिका दायर करने से दण्ड प्रक्रिया संहिता की धारा 482 के अधीन याचिका दायर करने पर रोक लग जाती है। 
    • उच्चतम न्यायालय ने स्पष्ट किया: 
    • अंतर्निहित शक्तियां उपलब्ध रहेंगी। 
    • न्याय के गलत निर्णय को रोकने के लिये इसका प्रयोग किया जा सकता है। 

अंतिम परिणाम: 

  • उच्चतम न्यायालय ने अपील स्वीकार कर ली। 
  • निदेशक के विरुद्ध आपराधिक कार्यवाही रद्द कर दी गई। 
  • यह स्पष्ट किया गया कि: 
  • ये टिप्पणियां केवल अपीलकर्ता पर लागू होती हैं। 
  • अन्य आरोपियों के विरुद्ध कार्यवाही जारी रह सकती है। 

परक्राम्य लिखत अधिनियम की धारा 138 और धारा 142 क्या हैं? 

धारा 138 - अपराध के तत्व: 

बारे में: 

  • धारा 138 अपर्याप्त धनराशि या वह उस रकम से अधिक है जिसका बैंक के साथ किए गए करार द्वारा उस खाते में से संदाय करने का ठहराव किया गया हैचेक के अनादरण को वैधानिक अपराध बनाती है। 
  • इस धारा के अंतर्गत अपराध गठित करने के लिये जिन आवश्यक तत्वों का पूरा होना आवश्यक हैवे निम्नलिखित हैं: 
  • प्राथमिक आवश्यकता:किसी व्यक्ति द्वारा किसी बैंक में अपने खाते से किसी अन्य व्यक्ति को धन के भुगतान के लिये जारी किया गया चेक अपर्याप्त धनराशि या निर्धारित ओवरड्राफ्ट सीमा से अधिक होने के कारण बैंक द्वारा अवैतनिक लौटाया जाना चाहिये 

प्रावधान के अंतर्गत तीन अनिवार्य शर्तें: 

  • चेक जारी होने की तारीख से छह महीने के भीतर या उसकी वैधता अवधि के भीतरजो भी पहले होबैंक में प्रस्तुत किया जाना चाहिये 
  • चेक के भुगतान न होने की सूचना बैंक से प्राप्त होने के तीस दिनों के भीतर भुगतान प्राप्तकर्ता या विधिवत धारक को चेक जारीकर्ता को लिखित मांग नोटिस जारी करना होगा। 
  • चेक जारी करने वाले व्यक्ति को मांग नोटिस प्राप्त होने के पंद्रह दिनों के भीतर चेक की राशि का भुगतान करने में विफल रहना चाहिये 
  • दण्डात्मक उपबंध:इन शर्तों के पूरा होने परचेक जारी करने वाला व्यक्ति एक अपराध करता है जिसके लिये दो वर्ष तक का कारावासया चेक की राशि के दोगुने तक का जुर्मानाया दोनों हो सकते हैं। 
  • दायरा परिसीमा:धारा की व्याख्या में स्पष्ट किये गए अनुसार ऋण या दायित्व विधिक रूप से लागू करने योग्य होना चाहिये 

धारा 142 - संज्ञान के लिये प्रक्रियात्मक आवश्यकताएँ: 

  • धारा 142 धारा 138 के अंतर्गत अपराधों का संज्ञान लेने के लिये अनिवार्य प्रक्रियात्मक ढांचा निर्धारित करती है: 
  • परिवाद आधारित अधिकारिता:न्यायालय केवल चेक पाने वाले या धारक द्वारा सम्यक अनुक्रम में किये गए लिखित परिवाद पर ही संज्ञान ले सकते हैं। 
  • परिसीमा अवधि:धारा 138 के परंतुक के खंड (ग) के अधीन उत्पन्न होने वाले कारण के एक महीने के भीतर परिवाद किया जाना चाहियेजिसका अर्थ है पंद्रह दिन की सूचना अवधि की समाप्ति से एक महीने के भीतर। 
  • क्षमा प्रावधान:धारा 142(ख) का परंतुक न्यायालयों को निर्धारित एक महीने की अवधि के बाद दायर किये गए परिवादों का संज्ञान लेने का अधिकार देता हैबशर्ते परिवादी न्यायालय को विलंब के लिये पर्याप्त कारण से संतुष्ट कर दे। 
  • न्यायालयीय पदानुक्रम:केवल महानगर मजिस्ट्रेट या प्रथम वर्ग न्यायिक मजिस्ट्रेटों को ही ऐसे अपराधों की सुनवाई करने का अधिकार है। 
  • क्षेत्रीय अधिकारिता:धारा 142(2) में निर्दिष्ट है कि अपराध की सुनवाई केवल उन न्यायालयों द्वारा की जाएगी जिनके अधिकार क्षेत्र में या तो पाने वाले की बैंक शाखा (खाते के माध्यम से संग्रह के लिये) या ऊपरवाल की बैंक शाखा (प्रत्यक्ष प्रस्तुति के लिये) स्थित है।