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सांविधानिक विधि
सांविधिक प्राधिकरण विलंब के माध्यम से अपीलीय आदेशों को निष्प्रभावी नहीं कर सकते
« »28-Mar-2026
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श्री समीर रंजन बनाम अगरतला नगर निगम और अन्य "सांविधिक प्राधिकरण बाध्यकारी अपीलीय निदेशों को लागू करने के लिये कर्तव्यबद्ध हैं और लंबे समय तक निष्क्रियता के माध्यम से ऐसे दायित्त्वों से बच नहीं सकते हैं।" मुख्य न्यायाधीश एम.एस. रामचंद्र राव और न्यायमूर्ति बिस्वजीत पालित |
स्रोत: त्रिपुरा उच्च न्यायालय
चर्चा में क्यों?
त्रिपुरा उच्च न्यायालय की एक खंडपीठ, जिसमें मुख्य न्यायाधीश एम.एस. रामचंद्र राव और न्यायमूर्ति बिस्वजीत पालित शामिल थे, ने श्री समीर रंजन बनाम अगरतला नगर निगम और अन्य (2026) के मामले में एक रिट अपील को मंजूर करते हुए अगरतला नगर निगम को 2018 में पारित एक बाध्यकारी अपीलीय आदेश को लागू करने का निदेश देते हुए एक परमादेश रिट जारी की।
- न्यायालय ने माना कि सांविधिक प्राधिकारी लंबे समय तक निष्क्रियता के माध्यम से अपीलीय निदेशों के अनुपालन से बच नहीं सकते हैं और अनुच्छेद 226 के अधीन रिट अधिकारिता सांविधिक कर्त्तव्यों के पालन को बाध्य करने के लिये बनाए रखने योग्य है, विशेष रूप से जहाँ अपीलकर्त्ता ने पहले ही संविधि के अधीन प्रदान किये गए उपचार को समाप्त कर दिया है।
श्री समीर रंजन बनाम अगरतला नगर निगम और अन्य (2026) के मामले की पृष्ठभूमि क्या थी?
- अगरतला निवासी याचिकाकर्त्ता ने आरोप लगाया कि उसके पड़ोसी ने अगरतला नगर निगम से आवश्यक अनुमति प्राप्त किये बिना बहुमंजिला इमारत का निर्माण किया है। 2015 से कई परिवाद दर्ज होते हुए भी, नगर निगम अधिकारियों ने कोई ठोस कार्रवाई नहीं की।
- त्रिपुरा नगर पालिका अधिनियम, 1994 के अधीन एक नोटिस जारी किया गया था, जिसके बाद अगस्त 2015 में एक ध्वस्तीकरण आदेश जारी किया गया था जिसमें अधिनियम की धारा 133 और 135 के अधीन निर्माण के अनधिकृत हिस्सों को ध्वस्त करने का निदेश दिया गया था - ये प्रावधान प्राधिकरण को अवैध निर्माणों को ध्वस्त करने और अवैध भवन निर्माण क्रियाकलाप को रोकने का आदेश देने के लिये सशक्त बनाते हैं।
- आदेश के बाद भी कई वर्षों तक कोई निरीक्षण नहीं किया गया। अपीलकर्त्ता ने अपीलीय प्राधिकारी के आदेश को लागू करने की मांग करते हुए उच्च न्यायालय में एक रिट याचिका दायर की। एकल न्यायाधीश ने इस आधार पर याचिका खारिज कर दी कि अपीलकर्त्ता के पास सिविल न्यायालय में एक प्रभावी वैकल्पिक उपचार उपलब्ध था। इससे व्यथित होकर अपीलकर्त्ता ने खंडपीठ के समक्ष एक रिट अपील दायर की।
न्यायालय की क्या टिप्पणियां थीं?
- वैकल्पिक उपचार के संबंध में: खंडपीठ ने माना कि चूँकि अपीलकर्त्ता त्रिपुरा नगर पालिका अधिनियम, 1994 के अधीन सांविधिक उपचार का लाभ पहले ही उठा चुका था, इसलिये एकल न्यायाधीश के लिये उसे सिविल न्यायालय में पुनर्निर्देशित करना उचित नहीं था। सांविधिक प्रक्रिया का उपयोग करने के बाद, प्रभावी वैकल्पिक उपचार की आपत्ति का कोई महत्त्व नहीं रह जाता।
- परमादेश याचिका पर: न्यायालय ने दोहराया कि अनुच्छेद 226 के अंतर्गत रिट याचिका सांविधिक कर्त्तव्यों के अनुपालन को सुनिश्चित करने के लिये पोषणीय है। जहाँ लोक प्राधिकरण बाध्यकारी निदेशों पर कार्रवाई करने में विफल रहते हैं, वहाँ अनुपालन सुनिश्चित करने के लिये परमादेश याचिका जारी की जा सकती है। यदि किसी सांविधिक तंत्र का प्रयोग किया गया है और अपीलीय निदेश जारी किया गया है, तो अंतर्निहित विवाद का सिविल स्वरूप इस उपचार को बाधित नहीं करता है।
- प्रशासनिक निष्क्रियता पर: न्यायालय ने कहा कि अपील आदेश पारित होने के बाद से आठ वर्ष बीत चुके हैं, और अपीलकर्त्ता के बार-बार अनुरोध के होते हुए भी कोई निरीक्षण नहीं किया गया है। प्रत्यर्थियों द्वारा इस विफलता के लिये कोई ठोस स्पष्टीकरण नहीं दिया गया, जिससे उनकी निष्क्रियता पूरी तरह से अनुचित हो जाती है।
सांविधिक निकाय क्या हैं?
बारे में:
- सांविधिक निकाय विधायिका द्वारा स्थापित असांविधानिक संस्थाएँ हैं जिनका उद्देश्य विशिष्ट शासन संबंधी आवश्यकताओं और नियामक आवश्यकताओं को पूरा करना है।
परिभाषा एवं स्थापना:
- भारत में सांविधिक निकाय असांविधानिक निकाय हैं, क्योंकि उनका उल्लेख संविधान में नहीं है।
- इन निकायों की स्थापना संसद के अधिनियम या राज्य विधानमंडलों के अधिनियम के माध्यम से की जाती है, जिससे उन्हें शासन में महत्त्वपूर्ण भूमिकाएँ प्राप्त होती हैं।
- इन्हें 'सांविधिक' इसलिये कहा जाता है क्योंकि इनकी शक्तियां संविधान से नहीं अपितु विधायिका द्वारा पारित विधियों से प्राप्त होती हैं।
उद्देश्य एवं कार्य:
- विनिर्दिष्ट उद्देश्यों की पूर्ति करने, विशेष विवाद्यकों का समाधान करने और विभिन्न क्षेत्रों को विनियमित करने के लिये सांविधिक निकायों का गठन किया जाता है।
- इनकी स्थापना शिक्षा, वित्त, स्वास्थ्य सेवा, उद्योग और सामाजिक कल्याण जैसे विशिष्ट क्षेत्रों में शासन और प्रशासन की विकसित होती आवश्यकताओं को दर्शाती है।
शक्तियां और अधिकार:
सांविधिक निकायों को राज्य या देश की ओर से कुछ विधियों को लागू करने, विधि पारित करने और निर्णय लेने का अधिकार प्राप्त है। उनकी शक्तियों में निम्नलिखित शामिल हैं:
- विधायी कार्यान्वयन: वे संसद या राज्य विधानमंडलों के विशिष्ट अधिनियमों को लागू और प्रवर्तित करते हैं।
- नियामक प्राधिकरण: ये प्राधिकरण अपनी अधिकारिता के अंतर्गत विशिष्ट क्षेत्रों या क्रियाकलापों को विनियमित और उनकी निगरानी करते हैं।
- नियम बनाने की शक्तियां: कई सांविधिक निकाय मूल अधिनियम के ढाँचे के भीतर नियम और विनियम बना सकते हैं।
- निर्णय लेने का अधिकार: वे अपने-अपने क्षेत्रों में प्रशासनिक और अर्ध-न्यायिक निर्णय लेते हैं।
सांविधिक निकायों की विशेषताएँ:
- विधायी उत्पत्ति: संविधान द्वारा नहीं अपितु संसद या राज्य विधानमंडल के अधिनियम द्वारा निर्मित।
- विशिष्ट जनादेश: स्पष्ट रूप से परिभाषित उद्देश्यों और कार्यों के साथ विशिष्ट प्रयोजनों के लिये स्थापित।
- क्षेत्रीय फोकस: सामान्यत: विशिष्ट क्षेत्रों के भीतर काम करते हैं या विशिष्ट मुद्दों का समाधान करते हैं।
- लचीली संरचना: इनकी संरचना, शक्तियां और कार्य मूल विधि में संशोधन करके बदले जा सकते हैं।
- जवाबदेही: इन्हें बनाने वाली विधायिका के प्रति जवाबदेह और संसदीय या विधायी निगरानी के अधीन।