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सांविधानिक विधि
राज्य दिव्यांगता की सीमाओं पर ‘मनमानी सीमा’ नहीं लगा सकता
«25-Mar-2026
स्रोत: द हिंदू
परिचय
उच्चतम न्यायालय ने यह स्पष्ट किया है कि राज्य किसी भी प्रकार की दिव्यांगता की ऊपरी सीमा तय नहीं कर सकता है, जिसके अधीन विशेष आवश्यकता वाले अभ्यर्थियों को नौकरियों से वंचित किया जा सके, जबकि वे अन्यथा अपने आधिकारिक दायित्त्व को निभाने में सक्षम हों।
न्यायमूर्ति विक्रम नाथ और संदीप मेहता की पीठ ने निर्णय दिया कि दिव्यांगजन अधिकार अधिनियम, 2016 में केवल आरक्षण पात्रता के लिये आधार सीमा या न्यूनतम पात्रता निर्धारित की गई है। अधिनियम 2016 के किसी भी प्रावधान में यह संकेत नहीं दिया गया है कि किसी विशेष पद के लिये अभ्यर्थी की उपयुक्तता का आकलन करते समय कोई ऊपरी सीमा निर्धारित की जा सकती है।
विवाद क्या था?
- न्यायालय, बाएं कंधे के जोड़ के विच्छेदन के कारण 90% स्थायी रूप से चलने-फिरने में असमर्थता से पीड़ित एक अधिवक्ता द्वारा दायर अपील की सुनवाई कर रहा था।
- तथापि उसने हिमाचल प्रदेश लोक सेवा आयोग द्वारा सहायक जिला अटॉर्नी के पद के लिये आयोजित लिखित परीक्षा में उच्च अंक प्राप्त किये, लेकिन उनकी अभ्यर्थिता इस आधार पर खारिज कर दी गई कि उसकी दिव्यांगता का प्रतिशत नौकरी के लिये विज्ञापित 60% की ऊपरी सीमा से अधिक था।
- राज्य उच्च न्यायालय ने उनकी याचिका खारिज कर दी थी, जिसके कारण अधिवक्ता को उच्चतम न्यायालय में अपील करनी पड़ी, जिसने दो सप्ताह के भीतर उन्हें पद पर नियुक्त करने का आदेश दिया।
- शीर्ष न्यायालय ने 60% दिव्यांगता की ऊपरी सीमा निर्धारित करने में कोई बोधगम्य या तर्कसंगत मानदंड नहीं पाया, यह देखते हुए कि अभ्यर्थी ने अपनी दिव्यांगता के होते हुए भी 15 वर्षों तक एक विधि पेशेवर के रूप में कुशलतापूर्वक कार्य किया था।
'युक्तियुक्त समायोजन सिद्धांत' (Reasonable Accommodation Principle) सिद्धांत क्या है?
- उच्चतम न्यायालय ने ने ‘युक्तियुक्त समायोजन के सिद्धांत’ का आह्वान किया, जिसके अनुसार दिव्यांग व्यक्तियों को उनकी दिव्यांगता से उत्पन्न बाधाओं का प्रभावी रूप से सामना करने हेतु आवश्यक समायोजन/व्यवस्थाएँ प्रदान की जानी चाहिये।
- इस सिद्धांत के अनुसार, नियोक्ताओं - जिनमें राज्य भी सम्मिलित है - को किसी दिव्यांग व्यक्ति को पद के कर्त्तव्यों को पूरा करने में सक्षम बनाने के लिये आवश्यक संशोधन करने होंगे, न कि कार्यात्मक क्षमता के व्यक्तिगत मूल्यांकन के विकल्प के रूप में व्यापक प्रतिशत सीमा पर निर्भर रहना होगा।
- " दिव्यांगता की यह ऊपरी सीमा उचित समायोजन के सिद्धांत की घोर अनदेखी करते हुए निर्धारित की गई है, और इसलिये इसे विधि की दृष्टि से मान्य नहीं किया जा सकता है।" - न्यायमूर्ति संदीप मेहता, भारत के उच्चतम न्यायालय।
- न्यायालय द्वारा इस सिद्धांत का आह्वान एक महत्त्वपूर्ण सैद्धांतिक विकास को दर्शाता है, जो यह संकेत देता है कि राज्य के नियोक्ता लोक नियोजन के लिये किसी अभ्यर्थी की उपयुक्तता का आकलन करते समय मनमानी दिव्यांगता सीमा पर विश्वास नहीं कर सकते हैं।
दिव्यांगजन अधिकार अधिनियम, 2016 क्या है?
- दिव्यांगजन अधिकार अधिनियम, 2016 भारत में दिव्यांग व्यक्तियों को प्रदत्त अधिकारों, पात्रताओं तथा संरक्षणों को विनियमित करने वाला प्रमुख विधि-विधान है । इस अधिनियम ने पूर्ववर्ती दिव्यांगजन (समान अवसर, अधिकारों का संरक्षण और पूर्ण भागीदारी) अधिनियम, 1995 को प्रतिस्थापित किया तथा दिव्यांगता की परिभाषा और राज्य पर अधिरोपित दायित्त्वों के क्षेत्र का विस्तार किया।
- विधानमंडल ने 2016 के अधिनियम के माध्यम से केवल समावेशन की एक सीमा निर्धारित करने का आशय किया था - विशेष रूप से 40% को मानक दिव्यांगता स्थिति के लिये अर्हता प्राप्त करने की न्यूनतम आवश्यकता के रूप में नामित किया था। तदनुसार, अधिनियम इस सीमा को पूरा करने वाले व्यक्तियों के लिये सरकारी नियोजन और शैक्षणिक संस्थानों में आरक्षण अनिवार्य करता है।
- उच्चतम न्यायालय ने अब स्पष्ट किया है कि यह अधिनियम राज्य को एक मनमानी "सीमा" निर्धारित करने का अधिकार नहीं देता है जो उच्च स्तर की दिव्यांगता वाले लोगों को बाहर कर दे, बशर्ते कि वे युक्तियुक्त समायोजन के माध्यम से भूमिका की कार्यात्मक आवश्यकताओं को पूरा करने में सक्षम हों।
निष्कर्ष
उच्चतम न्यायालय के निर्णय ने सांविधानिक दृष्टि से स्पष्ट रेखा खींच दी है: यद्यपि दिव्यांगजन अधिकार अधिनियम, 2016 दिव्यांगता आधारित आरक्षण के लिये न्यूनतम सीमा निर्धारित करता है, लेकिन यह राज्य को मनमानी सीमा लगाने का अधिकार नहीं देता जिससे अन्यथा योग्य अभ्यर्थी अयोग्य हो जाएं। यह निर्णय युक्तियुक्त समायोजन के सिद्धांत को सुदृढ़ करता है और इस बात की पुष्टि करता है कि वर्षों के सिद्ध व्यावसायिक अनुभव को दिव्यांगता प्रतिशत सीमा के यांत्रिक अनुप्रयोग के विरुद्ध महत्त्व दिया जाना चाहिये। इस निर्णय का विभिन्न पदों के लिये दिव्यांगता की ऊपरी सीमा निर्धारित करने वाले राज्यों में लोक भर्ती प्रक्रियाओं पर व्यापक प्रभाव पड़ने की संभावना है।