होम / एडिटोरियल
सांविधानिक विधि
कार्यपालिका का असीमित कार्यकाल वाला पद
«06-Apr-2026
स्रोत: द हिंदू
परिचय
हाल ही में, नरेंद्र मोदी ने भारत में निर्वाचित सरकार के प्रमुख के रूप में 8,931 दिन पूरे किये - जिसमें गुजरात के मुख्यमंत्री के रूप में तेरह वर्ष से अधिक का कार्यकाल और प्रधानमंत्री के रूप में निरंतर तीन कार्यकाल शामिल हैं। इस उपलब्धि ने पवन कुमार चामलिंग के रिकॉर्ड को तोड़ दिया, जिन्होंने सिक्किम के मुख्यमंत्री के रूप में 8,930 दिन सेवा की थी।
- यह अवसर एक सांविधानिक प्रश्न उठाता है जिसका न तो सत्ताधारी दल के भीतर से दी गई बधाई और न ही इसके आलोचकों की ओर से व्यक्त की गई चिंता पर्याप्त रूप से समाधान करती है: भारत का संविधान इस बात पर कोई सीमा क्यों नहीं लगाता कि कोई एक व्यक्ति वास्तविक कार्यकारी शक्ति का प्रयोग करने वाले पद पर कितने समय तक रह सकता है?
संविधान सभा का तर्क
- संविधान सभा के तर्क को बी.आर. अंबेडकर ने 4 नवंबर, 1948 को प्ररूप संविधान प्रस्तुत करते हुए अपने भाषण में स्पष्ट किया था। अंबेडकर ने जवाबदेही के दो रूपों के बीच अंतर बताया था: पहला, प्रश्नों, अविश्वास प्रस्तावों और स्थगन प्रस्तावों के माध्यम से उपलब्ध "दैनिक उत्तरदायित्त्व मूल्यांकन"; और दूसरा, निश्चित अवधि के चुनावों द्वारा प्रदान किया जाने वाला "आवधिक मूल्यांकन"।
- उन्होंने तर्क दिया कि दैनिक मूल्यांकन कहीं अधिक प्रभावी था।
- कार्यकाल की कोई सीमा आवश्यक नहीं थी क्योंकि विधायिका का विश्वास मत एक निरंतर नियंत्रण के रूप में कार्य करता था।
- इस प्रकार संविधान सभा ने प्रधानमंत्री को जवाबदेह ठहराने के प्राथमिक साधनों के रूप में प्रश्न, स्थगन प्रस्ताव और अविश्वास प्रस्ताव की परिकल्पना की, और निश्चित अवधि के चुनावों ने स्पष्ट कार्यकाल सीमाओं के एक कुशल विकल्प के रूप में उस नियंत्रण को मजबूत किया।
दसवीं अनुसूची ने क्या विघटित किया?
- बावनवें संशोधन (1985) ने दसवीं अनुसूची को शामिल किया, जिसके अंतर्गत किसी भी विधायक/सांसद द्वारा दल के व्हिप के विरुद्ध मतदान करने पर उसकी अयोग्यता का प्रावधान किया गया।
- किहोटो होलोहान बनाम ज़ाचिलहू (1992) के मामले में उच्चतम न्यायालय ने चुनावी जनादेश की अखंडता की रक्षा के उपाय के रूप में इसकी सांविधानिकता को बरकरार रखा।
- लेकिन दसवीं अनुसूची ने विधायिका और कार्यपालिका के बीच के उस संबंध को मौलिक रूप से बदल दिया जिस पर अंबेडकर निर्भर थे।
- दलबदल विरोधी व्यवस्था के अधीन, सत्ताधारी दल का कोई भी सदस्य जो विश्वास प्रस्ताव पर सरकार के विरुद्ध मतदान करता है, उसे अयोग्य घोषित किया जा सकता है।
- जब भी सत्ताधारी पार्टी के पास बहुमत होता है, अविश्वास प्रस्ताव निरर्थक हो जाता है।
- भारत में ब्रिटिश प्रणाली की तरह सुरक्षा तंत्र भी काम नहीं करता। भारतीय राजनीतिक दलों में नेतृत्व परिवर्तन के लिये कोई संस्थागत व्यवस्था नहीं है।
- दल-बदल विरोधी विधि विधायकों को पार्टी के प्रति वफादारी से बांध देता है; पार्टी के भीतर लोकतंत्र की कमी पार्टी को उसके नेता के प्रति वफादारी से बांध देती है। इस प्रकार दल-बदल विरोधी कानून ने संविधान निर्माताओं द्वारा परिकल्पित नियंत्रण प्रणाली को ही बदल दिया।
तुलनात्मक साक्ष्य
- टॉम गिन्सबर्ग, जेम्स मेल्टन और ज़ैकरी एल्किंस ने कार्यकारी कार्यकाल की सीमा से बचने के अपने अध्ययन में दिखाया कि कई क्षेत्रों के नेताओं ने सांविधानिक संशोधन, प्रतिस्थापन या न्यायिक निर्वचन के माध्यम से अपने कार्यकाल को बढ़ाने की कोशिश की है।
- गिन्सबर्ग और अजीज हक ने आगे तर्क दिया कि लोकतांत्रिक पतन अक्सर अचानक सत्तावादी विघटन की तुलना में संस्थागत क्षय के क्रमिक रूप से होता है।
- भारत को कार्यकाल सीमा समाप्त करने की आवश्यकता नहीं पड़ी क्योंकि यहाँ कभी कार्यकाल सीमा थी ही नहीं। प्रश्न यह है कि क्या औपचारिक प्रतिबंध की अनुपस्थिति, संसदीय जवाबदेही के कमजोर होने के साथ मिलकर, वही संरचनात्मक जोखिम उत्पन्न करती है जिन्हें रोकने के लिये अन्य देशों में कार्यकाल सीमाएँ बनाई गई हैं।
राष्ट्रपति पद की विडंबना
- भारत में राष्ट्रपति के तीसरे कार्यकाल के विरुद्ध एक परंपरा विकसित हो गई है, तथापि राष्ट्रपति पद काफी हद तक औपचारिक होता है।
- कोई भी राष्ट्रपति दो कार्यकाल से अधिक समय तक सेवा नहीं कर पाया है। यह अपेक्षा आइवर जेनिंग्स द्वारा लिखित 'द लॉ एंड द कॉन्स्टिट्यूशन' (1959) में सांविधानिक अभिसमय के लिये निर्धारित तीन-भाग वाले परीक्षण को संतुष्ट करती है: पूर्व निर्णय विद्यमान हैं, संबंधित पक्षकारों का मानना था कि वे एक नियम से बंधे हुए हैं, और उस नियम का कोई औचित्य है।
- जिस पद के पास वास्तविक कार्यकारी शक्ति नहीं होती, वह परंपराओं से बंधा होता है। वहीं, जिस पद के पास लगभग सारी कार्यकारी शक्ति होती है, वह केवल मतदाताओं के आवधिक निर्णय से बंधा होता है—और दलबदल विरोधी कानून अन्य जवाबदेही तंत्रों को काफी हद तक निष्क्रिय कर देता है।
प्रतिवाद और उसकी सीमाएँ
- सबसे मजबूत प्रतिवाद यह है कि मतदाताओं ने निरंतर तीन बार मोदी के कार्यकाल का समर्थन किया है, और कार्यकाल की सीमा उनकी व्यक्त की गई पसंद को दरकिनार कर देगी।
- यह आपत्ति गंभीर है: कार्यकाल सीमा वास्तव में लोकतंत्र विरोधी है। लेकिन यह उस आधार पर टिकी है जिस पर अंबेडकर विश्वास करते थे - कि आवधिक चुनाव, संसदीय जवाबदेही के साथ मिलकर, कार्यकारी शक्ति को अनुशासित करने के लिये पर्याप्त हैं।
- यदि दसवीं अनुसूची द्वारा जवाबदेही की संरचना में बाधा उत्पन्न हुई है, तो चुनावों को अधिक जिम्मेदारी उठानी होगी।
- चुनाव, चाहे कितने भी स्वतंत्र क्यों न हों, लंबे समय तक सत्ता में बने रहने के फायदों पर एक कमजोर रोक हैं: नियामक निकायों, निर्वाचन आयोग और उच्च न्यायपालिका में नियुक्तियों पर नियंत्रण; सूचना के माहौल को आकार देने की क्षमता; और कई चक्रों में चुनावी लाभ के लिये नीति को समायोजित करने की क्षमता।
- यदि दसवीं अनुसूची के कारण संसदीय जवाबदेही संरचनात्मक रूप से कमजोर हो जाती है, तो चुनावों की जिम्मेदारी और भी बढ़ जाती है।
क्या किया जा सकता है?
- अधिक स्वाभाविक सुधार यह होगा कि उस तंत्र को पुनर्स्थापित किया जाए, जिस पर संविधान निर्माताओं ने भरोसा किया था। विश्वास प्रस्तावों पर मतदान को दसवीं अनुसूची के अधीन अयोग्यता के प्रावधान से अपवर्जित किये जाने से विधायकों/सांसदों को अपने पदों को गंवाए बिना सरकार को हटाने का अवसर प्राप्त होगा।
- एक अधिक महत्वाकांक्षी संभावना यह है कि सांविधानिक संशोधन के माध्यम से प्रधानमंत्री अथवा मुख्यमंत्री के लगातार कार्यकालों पर सीमा निर्धारित की जाए, जबकि एक अंतराल के पश्चात पुनः पद ग्रहण करने की अनुमति दी जा सकती है।
- ज्योति बसु, नवीन पटनायक और पिनारयी विजयन जैसे नेताओं के लंबे कार्यकाल को देखते हुए, राज्य स्तरीय आयाम भी उतना ही महत्त्वपूर्ण है।
निष्कर्ष
8,931 दिनों का यह मील का पत्थर इस बात पर ध्यान आकर्षित करता है कि क्या भारत की संसदीय प्रणाली में संविधान निर्माताओं द्वारा भरोसा किये गए स्व-सुधार की क्षमता अभी भी बरकरार है। भारत बड़े लोकतंत्रों में इस मायने में अनोखा है कि यहाँ प्रधानमंत्री के कार्यकाल की कोई औपचारिक सीमा नहीं है—एक ऐसा अंतर जिसे संविधान सभा ने मजबूत विधायी जवाबदेही को देखते हुए अनावश्यक माना था। दसवीं अनुसूची ने तब से उस जवाबदेही को खोखला कर दिया है। चाहे इसका समाधान संसदीय नियंत्रण बहाल करने, औपचारिक कार्यकाल सीमा लागू करने या दोनों में निहित हो, औपचारिक रूप से सीमित राष्ट्रपति पद और प्रभावी रूप से असीमित प्रधानमंत्री पद के बीच सांविधानिक विषमता अब केवल सैद्धांतिक चिंता का विषय नहीं है। यह एक संरचनात्मक प्रश्न है जिसे 8,931 दिनों का यह मील का पत्थर टालना असंभव बना देता है।