होम / लैंगिक अपराधों से बालकों का संरक्षण अधिनियम (POCSO)
आपराधिक कानून
निपुण सक्सेना बनाम भारत सरकार गृह मंत्रालय (2018)
«02-Feb-2026
परिचय
यह ऐतिहासिक निर्णय आपराधिक न्याय के सबसे महत्त्वपूर्ण विवाद्यकों में से एक को संबोधित करता है – बलात्संग के वयस्क पीड़ितों और लैंगिक शोषण से पीड़ित बालकों की पहचान की सुरक्षा कैसे की जाए जिससे उन्हें अनावश्यक उपहास, सामाजिक बहिष्कार और उत्पीड़न का सामना न करना पड़े।
- यह निर्णय न्यायमूर्ति दीपक गुप्ता और न्यायमूर्ति मदन बी. लोकुर की दो-न्यायाधीशों की पीठ ने 11 दिसंबर, 2018 को दिया था।
तथ्य
- उच्चतम न्यायालय के समक्ष दायर याचिकाओं में लैंगिक अपराध के मामलों में पीड़ितों के संरक्षण से संबंधित मूलभूत प्रश्न उठाए गए हैं।
- न्यायालय ने इस कठोर वास्तविकता पर ध्यान दिया कि लैंगिक अपराधों के पीड़ितों, विशेष रूप से बलात्संग पीड़ितों के साथ अक्सर अपराधियों की तुलना में बुरा व्यवहार किया जाता है।
- भारतीय दण्ड संहिता की धारा 228क और दण्ड प्रक्रिया संहिता की धारा 327 के अधीन विद्यमान विधिक उपबंधों के होते हुए भी, पीड़ितों को सामाजिक बहिष्कार, पुलिस और न्यायालयों द्वारा पक्षद्रोही पूछताछ और मीडिया और अन्य स्रोतों द्वारा उनकी पहचान के अनधिकृत प्रकटीकरण का सामना करना पड़ा।
- न्यायालय ने उन विभिन्न मामलों की परीक्षा की जहाँ विधिक प्रतिबंधों के होते हुए भी पीड़ितों की पहचान उजागर हुई - जिनमें ऐसे मामले भी सम्मिलित हैं जहाँ पीड़ितों की पहचान राज्य बोर्ड परीक्षाओं में शीर्ष स्थान प्राप्त करने जैसे विवरणों के माध्यम से, या धुंधले चेहरों वाले फुटेज के माध्यम से की गई थी, लेकिन जिसमें नातेदार और स्थान स्पष्ट रूप से दिखाई दे रहे थे।
सम्मिलित विवाद्यक
उच्चतम न्यायालय द्वारा जिन प्रमुख विवाद्यकों की परीक्षा की गई, वे थे:
- भारतीय दण्ड संहिता के अधीन बलात्कार के वयस्क पीड़ितों की पहचान की सुरक्षा कैसे की जानी चाहिये?
- लैंगिक अपराधों से बालकों का संरक्षण अधिनियम के अधीन पीड़ित बालकों की पहचान की सुरक्षा कैसे की जानी चाहिये?
- विधि के अधीन "पहचान का प्रकटीकरण" किसे माना जाता है?
- पीड़ितों की पहचान की सुरक्षा में पुलिस, न्यायालयों और मीडिया का क्या उत्तरदायित्त्व हैं?
- किन परिस्थितियों में, यदि कोई हो, तो पीड़ित की पहचान का प्रकटन किया जा सकता है?
- पीड़ित प्रतिकर और बाल-अनुकूल न्यायालयों की स्थापना के लिये किन प्रक्रियाओं का पालन किया जाना चाहिये?
न्यायालय की टिप्पणियां
- न्यायालय ने पाया कि लैंगिक अपराधों के पीड़ितों को गंभीर सामाजिक बहिष्कार का सामना करना पड़ता है और अक्सर समाज द्वारा उन्हें "अछूत" की तरह माना जाता है। भारतीय दण्ड संहिता की धारा 228क और दण्ड प्रक्रिया संहिता की धारा 327 के अधीन विद्यमान विधिक ढाँचा ठीक से लागू नहीं किया जा रहा था, जिसके कारण स्पष्ट न्यायिक दिशा-निर्देशों की आवश्यकता थी।
- न्यायालय ने माना कि "पहचान का प्रकटन" का अर्थ केवल पीड़ित का नाम प्रकाशित करना ही नहीं है, अपितु कोई भी प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष जानकारी है जिससे पीड़ित की पहचान उजागर हो सकती है। इसमें स्थान सहित परीक्षा परिणाम, नातेदारों या आस-पड़ोस को दर्शाने वाले फुटेज, या छोटे समुदायों में गाँवों के नाम जैसी जानकारी सम्मिलित है।
- पुलिस और अन्वेषण अभिकरण के लिये, न्यायालय ने निदेश दिया कि प्रथम सचना रिपोर्ट (FIR) की प्रतियाँ सार्वजनिक नहीं की जाएंगी और न ही RTI के अधीन प्रकटन किया जाएगा। पीड़ितों के नाम वाले दस्तावेज़ सीलबंद लिफाफों में रखे जाने चाहिये और जहाँ संभव हो छद्म नामों का प्रयोग किया जाना चाहिये। पीड़ित की जानकारी प्राप्त करने वाले सभी अधिकारियों को कठोर गोपनीयता बनाए रखनी चाहिये।
- अपवादों के संदर्भ में, वयस्क पीड़ित स्वेच्छया से लिखित रूप में प्रकटीकरण की अनुमति दे सकते हैं। तथापि, मृत पीड़ितों या विकृत-चित्त पीड़ितों के मामले में, न्यायालय ने "विरोध के प्रतीक" बनाने के लिये प्रकटीकरण के तर्कों को दृढ़ता से नामंजूर कर दिया, यह देखते हुए कि "निर्भया" घटना पहचान प्रकट किये बिना ही प्रभावी हो गई थी। ऐसे किसी भी प्रकटीकरण के लिये सेशन न्यायाधीश की स्वीकृति आवश्यक है और यह वास्तव में पीड़िता के हित में होना चाहिये।
- न्यायालय ने मीडिया की उत्तरदायित्त्व को स्पष्ट किया—मामलों की सूची जारी होने की सूचना देना तो अनुमत है, किंतु न्यायालय की कार्यवाही, पीड़ितों के कथनों या बंद कमरे में हुए विचारण के साक्ष्यों का प्रकटन करना प्रतिषिद्ध है। मीडिया को मामलों को सनसनीखेज बनाने या पीड़ितों के साक्षात्कार लेने से बचना चाहिये।
- लैंगिक अपराधों से बालकों का संरक्षण अधिनियम (POCSO) के अधीन बाल पीड़ितों के लिये, न्यायालय ने माना कि संरक्षण और भी कठोर है। लैंगिक अपराधों से बालकों का संरक्षण अधिनियम की धारा 23 नाम, पता, स्कूल या पड़ोस सहित किसी भी पहचान संबंधी जानकारी को प्रतिबंधित करती है। यहाँ तक कि मृत बाल पीड़ितों को भी निजता और पहचान का संरक्षण प्राप्त है। जानकारी का प्रकटन केवल विशेष न्यायालयों द्वारा असाधारण परिस्थितियों में ही किया जा सकता है जो बच्चे के हित में हो।
- अंत में, न्यायालय ने निदेश दिया कि प्रत्येक जिले में एक वर्ष के भीतर "वन-स्टॉप सेंटर" स्थापित किये जाएं, जिनमें पुलिस थाने, चिकित्सा सुविधाएँ, परामर्श सेवाएँ और बालकों के अनुकूल न्यायालय कक्षों को नियमित न्यायालय परिसरों से पृथक्, पीड़ित-अनुकूल वातावरण में एकीकृत किया जाए।
निष्कर्ष
यह व्यापक निर्णय इस सिद्धांत को स्थापित करता है कि लैंगिक अपराध पीड़िताओं की पहचान का संरक्षण न्याय की मूलभूत शर्त है। न्यायालय ने स्पष्ट रूप से यह घोषित किया कि “पहचान” में वह प्रत्येक जानकारी सम्मिलित है जो प्रत्यक्ष अथवा अप्रत्यक्ष रूप से पीड़िता की पहचान को उद्घाटित कर सकती है।
इस निर्णय के अधीन सभी संबंधित पक्षकारों पर कठोर अधिरोपित किये गए हैं: पुलिस को सीलबंद अभिलेख रखने होंगे और छद्म नामों का प्रयोग करना होगा; न्यायालयों को इन-कैमरा (बंद कक्ष) में विचारण करना होगा; मीडिया को पहचान उजागर करने वाली जानकारी दिये बिना जिम्मेदारी से रिपोर्टिंग करनी होगी; और सभी अधिकारियों को गोपनीयता बनाए रखनी होगी। विद्यमान प्रावधानों के अधीन उल्लंघन करने पर आपराधिक दायित्त्व उत्पन्न होगा।
वन-स्टॉप सेंटरों तथा बाल-अनुकूल न्यायालयों की स्थापना का निदेश देकर न्यायालय ने यह मान्यता प्रदान की कि पीड़िता की गरिमा का संरक्षण केवल विधिक निषेध तक सीमित नहीं, अपितु ऐसी संस्थागत संरचना की मांग करता है जो संपूर्ण न्याय प्रक्रिया के दौरान पीड़िताओं के प्रति संवेदनशीलता सुनिश्चित करे। यह ऐतिहासिक निर्णय इस दिशा में एक महत्त्वपूर्ण प्रगति का प्रतीक है कि पीड़िताएँ सामाजिक बहिष्कार के भय से मुक्त होकर न्याय की खोज कर सकें तथा उनकी पुनर्वास एवं समाज में पुनःएकीकरण को सर्वोपरी महत्त्व दिया जाए।।