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आपराधिक कानून
अग्रिम अन्वेषण के लिये न्यायालय की अनुमति आवश्यक है
« »05-Feb-2026
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प्रमोद कुमार और अन्य बनाम उत्तर प्रदेश राज्य और अन्य "किसी मामले में अग्रिम अन्वेषण का निदेश देने की शक्ति पूरी तरह से संबंधित मजिस्ट्रेट/न्यायालय के विवेक पर निर्भर करती है। पुलिस/अन्वेषण अभिकरण स्वयं अग्रिम अन्वेषण का आदेश नहीं दे सकती।" न्यायमूर्ति राजेश बिंदल और विजय बिश्नोई |
स्रोत: उच्चतम न्यायालय
चर्चा में क्यों?
प्रमोद कुमार और अन्य बनाम उत्तर प्रदेश राज्य और अन्य (2026) के मामले में न्यायमूर्ति राजेश बिंदल और विजय बिश्नोई की पीठ ने निर्णय दिया कि पुलिस अंतिम रिपोर्ट दाखिल करने के पश्चात् स्वेच्छा से (एकतरफा रूप से) अग्रिम अन्वेषण नहीं कर सकती है, और धारा 173(8) दण्ड प्रक्रिया संहिता/धारा 193(9) भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता के अधीन अग्रिम अन्वेषण करने से पहले न्यायालय की अनुमति प्राप्त करना अनिवार्य है।
प्रमोद कुमार और अन्य बनाम उत्तर प्रदेश राज्य और अन्य (2026) मामले की पृष्ठभूमि क्या थी?
- 2013 में, उत्तर प्रदेश के फिरोजाबाद में सामूहिक बलात्कार की एक प्रथम सूचना रिपोर्ट (FIR) दर्ज की गई थी।
- अन्वेषण के पश्चात्, पुलिस ने मई 2014 में क्लोजर रिपोर्ट प्रस्तुत की।
- परिवादकर्त्ता के उपस्थित न होने या इसके विरुद्ध विरोध न करने के पश्चात् मजिस्ट्रेट ने सितंबर 2015 में क्लोजर रिपोर्ट को स्वीकार कर लिया।
- लगभग चार वर्ष पश्चात्, राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग (NHRC) में एक परिवाद के आधार पर, राज्य और पुलिस अधिकारियों ने जून 2019 और अप्रैल 2021 में धारा 173(8) दण्ड प्रक्रिया संहिता के अधीन एकतरफा "अग्रिम अन्वेषण" का आदेश दिया।
- इस अग्रिम अन्वेषण के परिणामस्वरूप न्यायालय की अनुमति के बिना ही अभियुक्तों से DNA नमूने एकत्र किये गए।
- अपीलकर्त्ताओं ने इलाहाबाद उच्च न्यायालय (लखनऊ पीठ) के समक्ष इन कार्यकारी आदेशों को चुनौती दी, यह तर्क देते हुए कि मामले के न्यायिक समापन के बाद पुलिस एकतरफा रूप से अग्रिम अन्वेषण का आदेश नहीं दे सकती।
- उच्च न्यायालय ने याचिका को यह देखते हुए खारिज कर दिया कि पीड़िता ने विरोध याचिका दायर की थी और डीएनए परीक्षण का उद्देश्य वास्तविक आरोपी की पहचान करना था।
- यद्यपि, रिकॉर्ड से पता चला कि अभियोक्ता ने प्रारंभिक प्रक्रम में, जब क्लोजर रिपोर्ट स्वीकार की गई थी, कोई विरोध याचिका दायर नहीं की थी।
- उच्च न्यायालय के आदेश से असंतुष्ट होकर, अभियुक्तों ने उच्चतम न्यायालय का रुख किया।
न्यायालय के समक्ष विवाद्यक:
- मुख्य विवाद्यक यह था कि क्या धारा 173(2) दण्ड प्रक्रिया संहिता के अधीन अंतिम रिपोर्ट प्रस्तुत करने के पश्चात्, पुलिस/अन्वेषण अभिकरण संबंधित मजिस्ट्रेट/न्यायालय की अनुमति प्राप्त किये बिना धारा 173(8) दण्ड प्रक्रिया संहिता के अधीन अग्रिम अन्वेषण कर सकती है।
न्यायालय की क्या टिप्पणियां थीं?
- उच्चतम न्यायालय ने इस विवाद्यक का जवाब नकारात्मक में दिया और इलाहाबाद उच्च न्यायालय के विवादित आदेश को अपास्त कर दिया।
- न्यायमूर्ति विजय बिश्नोई द्वारा लिखित निर्णय में कहा गया है कि अग्रिम अन्वेषण का निदेश देने की शक्ति पूरी तरह से संबंधित मजिस्ट्रेट/न्यायालय के विवेक पर निर्भर करती है।
- न्यायालय ने निर्णय दिया कि यदि पुलिस/अन्वेषण अभिकरण का मानना है कि संपूर्ण तथ्यों और सच्चाई का पता लगाने के लिये अग्रिम अन्वेषण आवश्यक है, तो वे मजिस्ट्रेट/न्यायालय के समक्ष उचित आवेदन दाखिल करने के लिये बाध्य हैं।
- न्यायालय ने इस बात पर बल दिया कि अन्वेषण अभिकरण स्वयं अग्रिम अन्वेषण का आदेश नहीं दे सकतीं।
- एक बार जब अन्वेषण अभिकरण द्वारा ऐसा आवेदन दायर किया जाता है, तो मजिस्ट्रेट/न्यायालय अन्वेषण अभिकरण द्वारा प्रदर्शित तथ्यों, परिस्थितियों और कारणों पर विचार करते हुए अपने न्यायिक विवेक का प्रयोग करेगा जिससे यह तय किया जा सके कि धारा 173(8) दण्ड प्रक्रिया संहिता के अधीन अग्रिम अन्वेषण का आदेश दिया जाना चाहिये या नहीं।
- न्यायालय ने विनय त्यागी बनाम इरशाद अली (2013) पर विश्वास किया, जहाँ यह माना गया कि यद्यपि धारा 173 (8) दण्ड प्रक्रिया संहिता में न्यायालय की अनुमति से अग्रिम अन्वेषण करने की कोई विशिष्ट आवश्यकता नहीं है, इस आवश्यकता को प्रावधानों में एक आवश्यक निहितार्थ के रूप में पढ़ा जाना चाहिये।
- न्यायालय ने कहा कि अन्वेषण अभिकरण ने न्यायालय से अनुमति लेने को एक विधिक प्रक्रिया के रूप में समझा और अपनाया है।
- न्यायालय ने पीथमबरन बनाम केरल राज्य और अन्य (2023) मामले पर भी विश्वास किया, जिसमें जिला पुलिस प्रमुख ने अग्रिम अन्वेषण का आदेश दिया था, जिसे यह कहते हुए रद्द कर दिया गया था कि अग्रिम अन्वेषण का आदेश देने की शक्ति या तो संबंधित मजिस्ट्रेट या उच्च न्यायालय के पास होती है, न कि किसी अन्वेषण अभिकरण के पास।
- उच्चतम न्यायालय ने पुलिस अधिकारियों द्वारा न्यायालय की अनुमति लिये बिना जारी किये गए अग्रिम अन्वेषण के आदेशों को रद्द कर दिया।
अग्रिम अन्वेषण क्या है?
- दण्ड प्रक्रिया संहिता की धारा 173 (8) में अग्रिम अन्वेषण का उपबंध है।
- यह उपबंध धारा 173(2) के अधीन पुलिस रिपोर्ट (आरोप पत्र) मजिस्ट्रेट को सौंपे जाने के पश्चात् भी अपराध के अग्रिम अन्वेषण की अनुमति देता है।
- यदि अग्रिम अन्वेषण के दौरान पुलिस थाने के भारसाधक अधिकारी को मौखिक या दस्तावेज़ी रूप में कोई नया साक्ष्य प्राप्त होता है, तो उसे मजिस्ट्रेट को एक अनुपूरक रिपोर्ट प्रस्तुत करनी होगी।
- अनुपूरक रिपोर्ट विहित प्ररूप में होनी चाहिये, जो मूल आरोप पत्र के समान हो।
- धारा 173 की उपधारा (2) से (6) में निहित प्रक्रियात्मक नियम, जहाँ तक लागू हो, इन अनुपूरक रिपोर्टों पर भी लागू होंगे।
- यह उपबंध सुनिश्चित करता है कि अन्वेषण खुला और लचीला बनी रहे , जिससे न्याय सुनिश्चित करने के लिये अतिरिक्त तथ्यों का पता लगाया जा सके।
- यह उपबंध अब भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता, 2023 (BNSS) की धारा 193 (9) के अधीन प्रदान किया गया है।
- भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता की धारा 193 (9) में एक परंतुक भी जोड़ा गया है जो दण्ड प्रक्रिया संहिता की धारा 173 (8) में नहीं था:
- इस परंतुक में कहा गया है कि:
- विचारण के दौरान अग्रिम अन्वेषण मामले का विचारण करने वाले न्यायालय की अनुमति से किया जा सकता है, और इसे नब्बे दिनों की अवधि के भीतर पूरा किया जाएगा, जिसे न्यायालय की अनुमति से बढ़ाया जा सकता है।
- इस परंतुक में कहा गया है कि:
अग्रिम अन्वेषण पर ऐतिहासिक निर्णय क्या है?
- विनुभाई हरिभाई मालवीय और अन्य बनाम गुजरात राज्य और अन्य, (2019):
- न्यायालय ने इस विचार की आलोचना की कि एक बार प्रक्रिया जारी होने या अभियुक्त के न्यायालय के समक्ष पेश होने के पश्चात् अग्रिम अन्वेषण का आदेश देने की मजिस्ट्रेट की शक्ति समाप्त हो जाती है।
- इस निर्णय में यह स्पष्ट किया गया कि आपराधिक विचारण तभी प्रारंभ होता है जब आरोप विरचित हो जाते हैं, न कि केवल संज्ञान लेने के पश्चात्।
- न्यायालय ने इस बात पर बल दिया कि संविधान के अनुच्छेद 21 के अधीन निष्पक्ष और न्यायपूर्ण अन्वेषण की आवश्यकता है, जिसके लिये अग्रिम अन्वेषण की आवश्यकता हो सकती है।
- इसमें कहा गया है कि पुलिस के पास धारा 173(8) दण्ड प्रक्रिया संहिता के अधीन मजिस्ट्रेट की अनुमति के अधीन, विचाराण के प्रक्रम तक अग्रिम अन्वेष करने की शक्ति बरकरार है।
- यह विचार कि मजिस्ट्रेट का पर्यवेक्षी अधिकारिता विचारण से पूर्व की कार्यवाही के बीच में ही समाप्त हो जाती है, उसे न्याय का मज़ाक बताया गया।
- मजिस्ट्रेट की शक्तियां धारा 156(1), 156(3), 2(ज), और 173(8) दण्ड प्रक्रिया संहिता से प्राप्त होती हैं, और ये सभी पूर्व-विचारण प्रक्रमों में उपलब्ध होती हैं।
- न्यायालय ने इस बात की पुष्टि की कि मजिस्ट्रेट मामले के तथ्यों के आधार पर स्वतः संज्ञान लेते हुए भी अग्रिम अन्वेषण का आदेश दे सकता है।
- इसमें इस बात पर बल दिया गया कि सच्चाई का पता लगाना और न्याय सुनिश्चित करना (जिसमें दोषियों की पहचान करना और निर्दोषों की रक्षा करना सम्मिलित है) विलंब से बचने से कहीं अधिक महत्त्वपूर्ण है।