होम / लैंगिक अपराधों से बालकों का संरक्षण अधिनियम (POCSO)
आपराधिक कानून
अलख आलोक श्रीवास्तव बनाम भारत संघ एवं अन्य (2018)
«03-Feb-2026
परिचय
यह एक ऐतिहासिक निर्णय है जिसमें उच्चतम न्यायालय ने भारत भर के बाल-अनुकूल न्यायालय में लैंगिक अपराधों से बालकों का संरक्षण मामलों के त्वरित विचारण और निगरानी के लिये व्यापक निदेश जारी किये हैं।
- यह निर्णय पूर्व मुख्य न्यायाधीश दीपक मिश्रा, न्यायमूर्ति ए.एम. खानविलकर और न्यायमूर्ति डी.वाई. चंद्रचूड़ की तीन सदस्यीय पीठ ने दिया।
तथ्य
- रिट याचिका में लैंगिक अपराधों से बालकों का संरक्षण अधिनियम के कार्यान्वयन से संबंधित दो महत्त्वपूर्ण विवाद्यक सामने आए थे।
- प्रथम विवाद्यक आठ महीने की एक बच्ची के इलाज से संबंधित था, जो लैंगिक अपराधों से बालकों का संरक्षण अधिनियम के अधीन अपराध की शिकार हो गई थी।
- द्वितीय विवाद्यक में बाल-अनुकूल न्यायालयों में लैंगिक अपराधों से बालकों का संरक्षण अधिनियम के अधीन विचारणों के त्वरित विचारण और निगरानी के बारे में थी।
- इस याचिका ने भारत के विभिन्न राज्यों में लंबित लैंगिक अपराधों से बालकों का संरक्षण मामलों की चिंताजनक स्थिति को उजागर किया।
- उदाहरण के लिये, उत्तर प्रदेश में लगभग 30,884 मामले और मध्य प्रदेश में 10,117 मामले लंबित थे।
- इनमें से कई मामले साक्ष्य के प्रक्रम में एक वर्ष से अधिक समय तक लंबित रहे, जिससे विधान का उद्देश्य ही असफल हो गया।
- याचिकाकर्त्ता स्वयं उपस्थित हुए और उन्होंने लैंगिक अपराधों से बालकों का संरक्षण अधिनियम के अधीन मामलों के संवेदनशीलतापूर्ण निपटान और शीघ्र निपटान की आवश्यकता पर प्रकाश डाला।
- न्यायालय ने पीड़ित बच्चे के लिये उचित चिकित्सा उपचार सुनिश्चित करने के लिये तत्काल कदम उठाए।
- AIIMS से डॉक्टरों की एक टीम को कलावती सरन चिल्ड्रेन हॉस्पिटल में बच्चे की परीक्षा के लिये भेजा गया था।
- दिल्ली राज्य विधि सेवा प्राधिकरण को चिकित्सा दल के साथ जाने और सभी आवश्यक सहायता सुनिश्चित करने का निदेश दिया गया था।
- दिल्ली पीड़ित प्रतिकर योजना, 2015 के अधीन पीड़ित को 75,000 रुपए का अंतरिम प्रतिकर दिया गया।
- बच्चे को बेहतर इलाज के लिये AIIMS में भर्ती कराया गया और उसकी आवश्यक सर्जरी की गई।
सम्मिलित विवाद्यक
- क्या भारत भर में लैंगिक अपराधों से बालकों का संरक्षण अधिनियम के अधीन मामलों की त्वरित विचारण और निगरानी सुनिश्चित करने के लिये उचित निदेश जारी किये जाने चाहिये?
- क्या लैंगिक अपराधों से बालकों का संरक्षण अधिनियम के अंतर्गत गठित विशेष न्यायालय विधायी आशय के अनुरूप प्रभावी ढंग से कार्य कर रहे हैं?
न्यायालय की टिप्पणियां
- न्यायालय ने इस बात पर बल दिया कि लैंगिक अपराधों से बालकों का संरक्षण अधिनियम बालकों को लैंगिक अपराधों से बचाने के लिये अधिनियमित किया गया एक लिंग-तटस्थ विधान है।
- संविधान के अनुच्छेद 15(3) को ध्यान में रखते हुए यह विधान लागू किया गया था, जो राज्य को बालकों के लिये विशेष प्रावधान करने का अधिकार देता है।
- संविधान के अनुच्छेद 39(च) में उपबंधित किया गया है कि राज्य यह सुनिश्चित करेगा कि बालकों को स्वतंत्रता और गरिमा के साथ स्वस्थ तरीके से विकसित होने के अवसर दिये जाएं।
- न्यायालय ने कहा कि लैंगिक अपराधों से बालकों का संरक्षण अधिनियम के उद्देश्यों और कारणों का विवरण बाल शोषण को कम करने और बालकों को लैंगिक उत्पीड़न, लैंगिक शोषण और अश्लील साहित्य से बचाने पर केंद्रित है।
- न्यायालय ने कहा कि न्यायिक प्रक्रिया के सभी प्रक्रमो में बच्चे के निजता और गोपनीयता के अधिकार की रक्षा और सम्मान किया जाना चाहिये।
- लैंगिक अपराधों से बालकों का संरक्षण अधिनियम की धारा 28 के अधीन त्वरित विचारण सुनिश्चित करने के लिये प्रत्येक जिले में एक सेशन न्यायालय को विशेष न्यायालय के रूप में नामित करना अनिवार्य है।
- धारा 32 में प्रत्येक विशेष न्यायालय के लिये एक विशेष लोक अभियोजक की नियुक्ति का उपबंध है, जो केवल लैंगिक अपराधों से बालकों का संरक्षण अधिनियम के अधीन मामलों का संचालन करेगा।
- धारा 33 विचारण प्रक्रम में विभिन्न सुरक्षा उपाय प्रदान करती है, जिनमें बाल-अनुकूल वातावरण, विश्वसनीय व्यक्तियों की उपस्थिति और बच्चे की गरिमा का संरक्षण सम्मिलित है।
- न्यायालय ने विशेष रूप से धारा 35 पर बल दिया, जिसमें संज्ञान लेने के तीस दिनों के भीतर साक्ष्य अभिलिखित करना और एक वर्ष के भीतर विचारण को पूरा करना अनिवार्य है।
- धारा 36 यह सुनिश्चित करती है कि साक्ष्य अभिलिखित करते समय बालक को अभियुक्त के संपर्क में न लाया जाए, तथापि अभियुक्त को कथन सुनने में सक्षम होना चाहिये।
- धारा 37 में बंद कमरे में और बच्चे के माता-पिता या उसके द्वारा विश्वसनीय व्यक्तियों की उपस्थिति में विचारण का उपबंध है।
- न्यायालय ने इस टिप्पणी का हवाला दिया कि "बालक ही मनुष्य का पिता होता है" और प्रारंभिक वर्षों में उसका अच्छी तरह से पालन-पोषण किया जाना चाहिये।
- न्यायालय ने स्वीकार किया कि जबकि धारा 35(2) में "यथासंभव" शब्दों का प्रयोग किया गया है, अधिनियम की भावना समयबद्ध विचारण के कठोर अनुपालन की अपेक्षा करते हैं।
- न्यायालय ने विधान और उसके वास्तविक क्रियान्वयन के बीच के अंतर को पाटने के लिये व्यापक निदेश जारी किये।
जारी किये गए निदेश:
उच्चतम न्यायालय ने निम्नलिखित बाध्यकारी निदेश जारी किये:
- उच्च न्यायालय यह सुनिश्चित करेगा कि लैंगिक अपराधों से बालकों का संरक्षण अधिनियम के अंतर्गत आने वाले मामलों का विचारण और निपटारा विशेष न्यायालयों द्वारा किया जाए, जिनके पीठासीन अधिकारी बाल संरक्षण और मनोवैज्ञानिक प्रतिक्रिया के प्रति संवेदनशील हों।
- यदि पहले से स्थापित नहीं हैं तो अधिनियम के अधीन परिकल्पित विशेष न्यायालयों की स्थापना की जाएगी और उन्हें लैंगिक अपराधों से बालकों का संरक्षण मामलों से निपटने का उत्तरदायित्त्व सौंपा जाएगा।
- विशेष न्यायालयों को निदेश जारी किये जाने चाहिये कि वे अनावश्यक स्थगन न देकर और लैंगिक अपराधों से बालकों का संरक्षण अधिनियम में विहित प्रक्रिया का पालन करते हुए मामलों का त्वरित विचारण करें।
- उच्च न्यायालयों के मुख्य न्यायाधीश लैंगिक अपराधों से बालकों का संरक्षण अधिनियम के अधीन विचारणों की प्रगति को विनियमित और निगरानी करने के लिये तीन न्यायाधीशों की एक समिति का गठन करेंगे।
- जिन उच्च न्यायालयों में तीन न्यायाधीश उपलब्ध नहीं हैं, वहाँ एक न्यायाधीश की समिति का गठन किया जाएगा।
- राज्यों के पुलिस महानिदेशक या समकक्ष रैंक के अधिकारी उचित अन्वेषण सुनिश्चित करने और निर्धारित तिथियों पर साक्षियों को पेश करने के लिये एक विशेष कार्य बल का गठन करेंगे।
- लैंगिक अपराधों से बालकों का संरक्षण अधिनियम के प्रावधानों को ध्यान में रखते हुए, उच्च न्यायालयों द्वारा विशेष न्यायालयों में बाल-अनुकूल वातावरण प्रदान करने के लिये पर्याप्त कदम उठाए जाएंगे।
निष्कर्ष
इस ऐतिहासिक निर्णय में उच्चतम न्यायालय ने पूरे भारत में लंबित लैंगिक अपराधों से बालकों का संरक्षण (POCSO) मामलों की गंभीर चिंता को स्वीकार करते हुए उनके शीघ्र निपटान के लिये व्यापक निदेश जारी किये। न्यायालय ने इस बात पर बल दिया कि लैंगिक अपराधों से बालकों का संरक्षण अधिनियम के विधायी आशय और उद्देश्य को जमीनी स्तर पर वास्तविक कार्यान्वयन के माध्यम से साकार किया जाना चाहिये। इन निदेशों में प्रत्येक उच्च न्यायालय में न्यायाधीश समितियों के माध्यम से सर्वोच्च न्यायिक स्तर पर निगरानी सुनिश्चित की गई है। यह निर्णय इस बात को पुष्ट करता है कि बालकों का लैंगिक शोषण और दुर्व्यवहार जघन्य अपराध हैं जिनका प्रभावी और त्वरित समाधान आवश्यक है।