आज ही एडमिशन लें बिहार APO (प्रिलिम्स + मेन्स) कोर्स में और अपने सपनों को दे नई दिशा | ऑफलाइन एवं ऑनलाइन मोड में उपलब्ध | 12 जनवरी 2026  से कक्षाएँ आरंभ   |   एडमिशन ओपन: UP APO प्रिलिम्स + मेंस कोर्स 2025, बैच 6th October से   |   ज्यूडिशियरी फाउंडेशन कोर्स (प्रयागराज)   |   अपनी सीट आज ही कन्फर्म करें - UP APO प्रिलिम्स कोर्स 2025, बैच 6th October से










होम / करेंट अफेयर्स

पारिवारिक कानून

दांपत्य अधिकारों का प्रत्यास्थापन

    «    »
 02-Feb-2026

जितेंद्र आजाद बनाम मीना गुप्ता 

"पत्नी की रूढ़िवादी अवधारणा तथा उससे यह अपेक्षा कि वह अपने पति की इच्छाओं के अधीन स्वयं को समर्पित करेमहिलाओं में शिक्षा एवं उच्च साक्षरता के प्रसार तथा संविधान द्वारा महिलाओं को समान अधिकारों की मान्यता के परिणामस्वरूप एक क्रांतिकारी परिवर्तन से गुजर चुकी है।" 

न्यायमूर्ति सुजीत नारायण प्रसाद और अरुण कुमार राय 

स्रोत: झारखंड उच्च न्यायालय 

चर्चा में क्यों? 

न्यायमूर्ति सुजीत नारायण प्रसाद और अरुण कुमार राय की खंडपीठ नेजितेंद्र आजाद बनाम मीना गुप्ता (2026)के मामले मेंहिंदू विवाह अधिनियम, 1955 की धारा के अधीन दांपत्य अधिकारों का प्रत्यास्थापन के लिये अपनी याचिका की अस्वीकृति के विरुद्ध पति द्वारा दायर कुटंब न्यायालय अधिनियम की धारा 19 के अधीन पहली अपील को खारिज कर दियायह मानते हुए कि पत्नी का दूसरे शहर में नियोजन के उद्देश्य से पत्नी का पृथक् निवास युक्तियुक्त कारण है। 

जितेंद्र आजाद बनाम मीना गुप्ता (2026) मामले की पृष्ठभूमि क्या थी? 

  • अपीलकर्त्ता-पति और प्रत्यर्थी-पत्नी का विवाह 12 मार्च 2018 को संपन्न हुआ था। 
  • विवाह के समय पत्नी एक निजी स्कूल में शिक्षिका के रूप में कार्यरत थीजबकि पति एक अस्पताल में दैनिक वेतनभोगी चिकित्सा कर्मचारी के रूप में कार्यरत था। 
  • विवाह के पश्चात् दोनों पक्षकार केवल दो से तीन दिन ही साथ रहे और उसके बाद पृथक् रहने लगे क्योंकि उनके कार्यस्थल अलग-अलग शहरों में थे। 
  • तत्पश्चात् दोनों पक्षकारों के बीच मतभेद उत्पन्न हो गए। 
  • पति ने अभिकथित किया कि पत्नी नेउसे बिना बताए वैवाहिक घर छोड़ दिया, अपने गहने और सामान ले गईइस बात पर बल दिया कि उसे "घर जमाई" बनकर रहना चाहिये और उससे तलाक के कागजात तैयार करने को कहा। 
  • पति ने दांपत्य अधिकारों के प्रत्यास्थापन की मांग करते हुए हिंदू विवाह अधिनियम की धारा के अधीन एक याचिका दायर की। 
  • पत्नी ने कहा कि तथापि वह वैवाहिक जीवन जारी रखने को तैयार हैपरंतु वह अपनी नौकरी छोड़ने को तैयार नहीं है। 
  • पत्नी ने अभिकथित किया कि उसके पति और उसके परिवार ने एक अतिरिक्त व्यवसाय के लिये स्कॉर्पियो गाड़ी खरीदने के लिये 10 लाख रुपये की मांग कीऔर उसके इंकार करने पर विवाद उत्पन्न हो गया। 
  • कार्यवाही के दौरान यह बात सामने आई कि पति संविदा के आधार पर प्रति माह 10,000 रुपए कमा रहा थाजबकि पत्नी सरकारी शिक्षिका के रूप में प्रति माह लगभग 60,000 रुपए कमा रही थी।  
  • कुटुंब न्यायालय ने पति की दांपत्य अधिकारों का प्रत्यास्थापन की याचिका खारिज कर दीजिसके बाद पति ने उच्च न्यायालय में अपील दायर की। 

न्यायालय की क्या टिप्पणियां थीं? 

दांपत्य अधिकारों का प्रत्यास्थापन के लिये शर्तें: 

  • न्यायालय ने दोहराया कि हिंदू विवाह अधिनियम की धारा के अधीन दांपत्य अधिकारों का प्रत्यास्थापन का आदेश केवल तभी दिया जा सकता है जब: 

(i) प्रत्यर्थी याचिकाकर्त्ता के साहचर्य से अपने आप को पृथक् कर लिया है । 

(ii) ऐसा पृथक्करण किसी भी युक्तियुक्त प्रतिहेतु अथवा विधिसंगत बहाने के बिना किया गया है । 

(iii) उक्त अनुतोष प्रदान किये जाने से इंकार करने हेतु कोई अन्य विधिक आधार विद्यमान नहीं है । 

(iv) न्यायालय याचिका में दिये गए कथनों की सत्यता से संतुष्ट है। 

हिंदू पत्नी की अवधारणा में क्रांतिकारी परिवर्तन: 

  • न्यायालय ने माना कि हिंदू पत्नी की धर्मपत्नीअर्धांगिनीभार्या या अनुगामिनी के रूप में रूढ़िवादी अवधारणा - जिससे यह अपेक्षा की जाती है कि वह सदैव अपने पति के साथ उसके शरीर के एक अंग के रूप में रहे - शिक्षामहिलाओं की साक्षरतासमान अधिकारों की सांविधानिक मान्यता और लिंग भेद के उन्मूलन के साथ एक "क्रांतिकारी परिवर्तन" से गुज़री है। 
  • अब पत्नी वैवाहिक जीवन में पति के समान दर्जा और समान अधिकारों वाली भागीदार है। 

वैवाहिक दंपत्तियों के समान अधिकार: 

  • न्यायालय ने यह माना कि कोई भी पति या पत्नी दूसरे पर श्रेष्ठ या बेहतर अधिकार का दावा नहीं कर सकता। जहाँ दोनों पति-पत्नी कार्यरत हैं या अपनी पसंद के पेशे में लगे हुए हैंवहाँ उनके वैवाहिक जीवन का स्वरूप उनके संबंधित नियोजनों की आवश्यकताओं के अनुसार निर्धारित होना चाहिये 
  • न्यायालय ने इस धारणा को खारिज कर दिया कि पति को यह पूर्ण अधिकार है कि वह पत्नी पर यह दबाव डाले कि वह अपनी नौकरी छोड़ दे और केवल वैवाहिक दायित्त्व को पूरा करने के लिये उसके साथ आश्रित के रूप में रहे। 

तर्कसंगतता की कसौटी: 

  • न्यायालय ने यह अवधारित करने के लिये "तर्कसंगतता" की कसौटी लागू की कि किस पक्षकार ने संयुक्त जीवन के प्रति अनुचित दृष्टिकोण अपनाया। 
  • चूँकि पति-पत्नी दोनों अलग-अलग शहरों में कार्यरत थे और उनमें से कोई भी अपनी नौकरी नहीं छोड़ सकता थाइसलिये पत्नी द्वारा अपने वैवाहिक जीवन को समायोजित करते हुए अपनी नौकरी जारी रखने पर बल देना पूरी तरह से अनुचित नहीं माना गया। 

पत्नी का आर्थिक स्वतंत्रता का अधिकार और पृथक्करण के वैध कारण: 

  • न्यायालय ने पत्नी के आर्थिक रूप से आत्मनिर्भर होनेपेशेवर लक्ष्यों को प्राप्त करने और एक कामकाजी पेशेवर के रूप में समाज में योगदान देने के अधिकार को मान्यता दी। 
  • इसमें इस बात पर बल दिया गया कि दांपत्य अधिकारों का प्रत्यास्थापन दोनों पति-पत्नी का संयुक्त उत्तरदायित्त्व है कि वे अपने रिश्ते को बनाए रखने के लिये एक व्यावहारिक रास्ता खोजेंन कि केवल पत्नी चुपचाप पति का अनुसरण करे। 
  • धन और वाहन की मांग के साक्ष्य और इस तथ्य को ध्यान में रखते हुए कि दोनों पक्ष अलग-अलग शहरों में काम करते थेन्यायालय ने माना कि पत्नी के पास पृथक् निवास के वैध और पर्याप्त कारण थे और पति की अपील को खारिज कर दिया। 

दांपत्य अधिकारों का प्रत्यास्थापन क्या है? 

बारे में: 

  • दांपत्य अधिकारों का प्रत्यास्थापन अभिव्यक्ति का अर्थ है उन दांपत्य अधिकारों का प्रत्यास्थापन जिनका आनंद पक्षकारों ने पहले उठाया था।  
  • हिंदू विवाह अधिनियम, 1955 (HMA) की धारा 9के अधीन दांपत्य अधिकारों का प्रत्यास्थापन को उपबंधित किया गया है 
  • धारा का उद्देश्य विवाह संस्था की पवित्रता और वैधता की रक्षा करना है। 
  • जब कि पति या पत्नी ने अपने को दूसरे के साहचर्य से किसी युक्तियुक्त प्रतिहेतु के बिना प्रत्याहृत कर लिया हो तब व्यचित पक्षकार दांपत्य अधिकारों के प्रत्यास्थापन के लिये जिला न्यायालय में अर्जी द्वारा आवेदन कर सकेगा 
  • सबूत का भार उस व्यक्ति पर होता है जिसने दूसरे व्यक्ति के साहचर्य से स्वयं को प्रत्याहृत किया हैयह साबित करने के लिये कि प्रत्याहृत होने का कोई युक्तियुक्त प्रतिहेतु था। 

धारा के अधीन अनुतोष प्राप्त करने के लिये आवश्यक शर्तें: 

  • दोनों पक्षकारों का विधिक रूप से एक दूसरे से विवाहित होना आवश्यक है। 
  • किसी एक पक्षकार द्वारा दूसरे पक्षकार के साहचर्य से स्वयं को प्रत्याहृत कर लिया गया हो 
  • ऐसा पृथक्करण वैध एवं युक्तियुक्त प्रतिहेतु के अभाव में किया गया हो । 
  • इस बात को साबित करना होगा कि डिक्री को खारिज करने का कोई विधिक औचित्य नहीं हैजिससे न्यायालय संतुष्ट हो सके। 

दांपत्य अधिकारों का प्रत्यास्थापन के लिये आवेदन कहाँ दाखिल करें: 

हिंदू विवाह अधिनियम के अधीन दायर की गई प्रत्येक याचिका मूल सिविल अधिकारिता के कुटुंब न्यायालय में दायर की जानी चाहिये जहाँ: 

  • विवाह का संस्कार संपन्न हुआ हो । 
  • प्रत्यर्थी निवास करता है। 
  • विवाह के पश्चात् पक्षकारों ने अंतिम बार साथ निवास किया हो 
  • यदि याचिकाकर्त्ता पत्नी हैतो उस स्थान पर जहाँ वह याचिका दायर किये जाने की तिथि को निवासरत हो 

दांपत्य अधिकारों का प्रत्यास्थापन का प्रभाव: 

  • यदि दांपत्य अधिकारों का प्रत्यास्थापन का आदेश पारित हो जाता हैतो प्रत्यर्थी के लिये वादी के साथ पुनः सहवास प्रारंभ करना अनिवार्य हो जाता है । 
  • यदि डिक्री की तिथि से एक वर्ष के भीतर इसका पालन नहीं किया जाता हैतो किसी भी पक्षकार को विवाह विच्छेद की मांग करने का अधिकार प्राप्त हो जाता है । 

विधिक निर्णय 

  • सरोज रानी बनाम सुदर्शन कुमार चड्ढा (1984)के मामले में, उच्चतम न्यायालय ने हिंदू विवाह अधिनियम की धारा की सांविधानिक वैधता को बरकरार रखा क्योंकि यह धारा किसी भी मौलिक अधिकार का उल्लंघन नहीं करती है।