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आपराधिक कानून
वसूली और गिरफ्तारी वारण्ट का एक साथ जारी किया जाना अवैध है
«02-Feb-2026
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मोहम्मद शहजाद बनाम उत्तर प्रदेश राज्य और 2 अन्य "भरण–पोषण आदेशों के प्रवर्तन के प्रति न्यायालयों के अत्यधिक उत्साह के कारण किसी व्यक्ति की व्यक्तिगत गरिमा एवं व्यक्तिगत स्वतंत्रता का अतिक्रमण नहीं किया जा सकता, भले ही न्यायालय इस निष्कर्ष पर पहुँच जाए कि न्यायालय के आदेश के अनुसरण में भरण–पोषण की बकाया राशि का जानबूझकर भुगतान नहीं किया गया है।" न्यायमूर्ति राजीव लोचन शुक्ला |
स्रोत: इलाहाबाद उच्च न्यायालय
चर्चा में क्यों?
इलाहाबाद उच्च न्यायालय के न्यायमूर्ति राजीव लोचन शुक्ला ने मोहम्मद शहजाद बनाम उत्तर प्रदेश राज्य और 2 अन्य (2026) के मामले में अलीगढ़ कुटुंब न्यायालय के अतिरिक्त प्रधान न्यायाधीश के उस आदेश को अपास्त कर दिया, जिसमें भरण-पोषण बकाया की वसूली के लिये याचिकाकर्त्ता के विरुद्ध एक साथ वसूली और गिरफ्तारी वारण्ट जारी किये गए थे, और इस नियमित प्रथा को अवैध और अमानवीय घोषित किया।
मोहम्मद शहजाद बनाम उत्तर प्रदेश राज्य और 2 अन्य (2026) मामले की पृष्ठभूमि क्या थी?
- मोहम्मद शहजाद ने कुटुंब न्यायालय के आदेश को चुनौती देते हुए भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता की धारा 528 के अधीन याचिका दायर की थी।
- अलीगढ़ स्थित कुटुंब न्यायालय के अतिरिक्त प्रधान न्यायाधीश ने भरण-पोषण की बकाया राशि की वसूली के लिये याचिकाकर्त्ता के विरुद्ध एक साथ वसूली और गिरफ्तारी वारण्ट जारी किये थे।
- याचिकाकर्त्ता के अधिवक्ता ने तर्क दिया कि भरण-पोषण आदेशों को लागू किया जाना चाहिये, लेकिन प्रक्रिया राजनेश बनाम नेहा और अन्य (2021) में उच्चतम न्यायालय के निर्णय के अनुसार विशिष्ट सांविधिक प्रावधानों का उल्लंघन नहीं कर सकती है।
- राज्य की ओर से पेश हुए अतिरिक्त सरकारी अधिवक्ता (AGA) ने स्वीकार किया कि धारा 125(3) और 128 दण्ड प्रक्रिया संहिता के अधीन विहित प्रक्रिया का पालन किये बिना भरण-पोषण के बकाया की वसूली के लिये कोई गिरफ्तारी वारण्ट जारी नहीं किया जा सकता है।
- तथापि, अतिरिक्त सरकारी अधिवक्ता ने यह तर्क दिया कि आवेदक ने पहले भी उच्च न्यायालय द्वारा निदेशित संदाय किश्तों का संदाय करने में व्यतिक्रम किया था।
- न्यायालय ने कहा कि उसके सामने ऐसे अनेक मामले आए हैं जहाँ कुटुंब न्यायालयों ने वसूली वारण्ट के साथ-साथ गिरफ्तारी वारण्ट भी जारी किये हैं, और कुछ मामलों में तो अजमानतीय वारण्ट भी जारी किये हैं, जिनमें व्यतिकारियों को अभियुक्त व्यक्तियों के रूप में माना गया है।
न्यायालय की क्या टिप्पणियां थीं?
- पीठ ने टिप्पणी की कि भरण-पोषण का संदाय करने के लिये उत्तरदायी व्यक्ति को अपराध करने वाले व्यक्ति के रूप में नहीं माना जाना चाहिये, और भरण-पोषण आदेश को लागू करने के लिये न्यायालयों द्वारा ऐसे व्यक्ति की गरिमा और स्वतंत्रता को कुचला नहीं जा सकता है।
- न्यायमूर्ति शुक्ला ने दण्ड प्रक्रिया संहिता की धारा 125(3) और धारा 421 का हवाला देते हुए कहा कि भरण-पोषण के बकाया की वसूली जुर्माना उद्गृहीत करने से किया जा सकता है।
- न्यायालय ने स्पष्ट किया कि धारा 421 दण्ड प्रक्रिया संहिता की अधीन, जुर्माना उद्गृहीत के लिये वारण्ट को चल संपत्ति की कुर्की और विक्रय द्वारा या कलेक्टर को भू-राजस्व के बकाया के रूप में राशि वसूल करने के लिये अधिकृत करके निष्पादित किया जाता है।
- न्यायालय ने इस बात पर बल दिया कि धारा 421 का परंतुक उपबंधित करता है कि "अपराधी की गिरफ्तारी या कारावास द्वारा ऐसा कोई वारण्ट निष्पादित नहीं किया जाएगा।"
- पीठ ने कहा कि वारण्ट के निष्पादन के बाद शेष राशि या बकाया जमा करने में असफल रहने पर ही कारावास का दण्ड दिया जा सकता है।
- न्यायालय ने कहा कि धारा 125(3) दण्ड प्रक्रिया संहिता स्पष्ट रूप से इंगित करती है कि जुर्माना उद्गृहीत करने के लिये निर्धारित तरीके से भरण-पोषण के बकाया की वसूली के लिये पहले प्रयास किये जाने चाहिये, और केवल तभी जब वारण्ट निष्पादित नहीं किया जाता है या भागत: रूप से निष्पादित किया जाता है तो न्यायालय व्यक्ति को कारावास का दण्ड दे सकता है।
- न्यायालय ने टिप्पणी की कि "वसूली और गिरफ्तारी का वारण्ट एक साथ जारी करना दण्ड प्रक्रिया संहिता के अंतर्गत परिकल्पित नहीं है। यहाँ तक कि उच्चतम न्यायालय द्वारा दिये गए निदेशों में भी ऐसी किसी प्रथा का उल्लेख नहीं है।"
- न्यायालय ने इस तर्क पर भी विचार किया कि भरण-पोषण आदेशों को सिविल प्रक्रिया संहिता के अधीन कठोरता से धन संबंधी आदेशों के रूप में निष्पादित किया जाना चाहिये, विशेष रूप से धारा 51, 55, 58 और 60 को आदेश 21 के साथ पढ़ा जाना चाहिये।
- न्यायालय ने स्पष्ट किया कि जबकि कुटुंब न्यायालय अधिनियम, 1984, कुटुंब न्यायालयों को अपनी प्रक्रिया विहित करने की अनुमति देता है, अधिनियम की धारा 18(2) स्पष्ट रूप से उपबंधित करती है कि दण्ड प्रक्रिया संहिता के अध्याय 9 (जिसमें धारा 125 सम्मिलित है) के अधीन पारित आदेश को दण्ड प्रक्रिया संहिता द्वारा विहित रीति से निष्पादित किया जाएगा।
- न्यायालय ने यह माना कि सिविल प्रक्रिया संहिता के उपबंध केवल वेतन पर लागू होते हैं और डिक्री के निष्पादन से संबंधित संपूर्ण अध्याय को लागू नहीं किया जा सकता है, क्योंकि भरण-पोषण आदेशों के प्रवर्तन में दण्ड प्रक्रिया संहिता व्यापक है।
- न्यायालय ने निदेश दिया कि गिरफ्तारी वारण्ट के साथ वसूली वारण्ट जारी करने की प्रथा को बंद किया जाना चाहिये।
- परिणामस्वरूप, आवेदन मंजूर कर लिया गया, विवादित आदेश अपास्त कर दिया गया और मामले को अपर प्रधान न्यायाधीश, कुटुंब न्यायालय, न्यायालय संख्या 2, अलीगढ़ को वापस भेज दिया गया जिससे वे सांविधिक प्रावधानों के अनुसार ही आवेदन पर निर्णय लें।
वारण्ट क्या है और इसके प्रकार क्या हैं?
बारे में:
वारण्ट एक लिखित दस्तावेज़ होता है जो न्यायाधीश या मजिस्ट्रेट द्वारा राज्य की ओर से जारी किया जाता है और जो किसी व्यक्ति की गिरफ्तारी और निरोध या किसी व्यक्ति की संपत्ति की तलाशी और अधिग्रहण को अधिकृत करता है।
वारण्ट के प्रकार:
गिरफ्तारी वारण्ट:
|
विवरण |
दण्ड प्रक्रिया संहिता की धारा |
भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता की धारा |
निष्पादन की प्रक्रिया |
|
गिरफ्तारी वारण्ट |
70 |
72 |
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साक्षी को पेश करने के लिये वारण्ट |
81 |
83 |
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तलाशी वारण्ट:
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विवरण |
दण्ड प्रक्रिया संहिता की धारा |
भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता की धारा |
निष्पादन की प्रक्रिया |
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विशिष्ट अपराध की सूचना पर तलाशी हेतु वारण्ट |
93 |
94 |
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संदिग्ध जमा-स्थान की तलाशी हेतु वारण्ट |
94 |
95 |
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कुर्की वारण्ट:
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विवरण |
दण्ड प्रक्रिया संहिता की धारा |
भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता की धारा |
निष्पादन की प्रक्रिया |
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साक्षियों की उपस्थिति को बाध्य करने के लिये कुर्की का आदेश |
83 |
85 |
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अभियुक्त की उपस्थिति सुनिश्चित करने हेतु कुर्की आदेश |
83 |
85 |
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जिला मजिस्ट्रेट/कलेक्टर द्वारा कुर्की का प्राधिकार |
83 |
85 |
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भूमि विवादों में कुर्की वारण्ट |
146 |
148 |
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कुर्की एवं विक्रय द्वारा जुर्माना वसूलने का वारण्ट |
421 |
458 |
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जुर्माने की वसूली हेतु वारण्ट |
421(ख) |
458(ख) |
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भरण–पोषण के प्रवर्तन हेतु कुर्की एवं विक्रय का वारण्ट |
125 |
144 |
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प्रतिबद्धता वारण्ट:
|
विवरण |
दण्ड प्रक्रिया संहिता की धारा |
भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता की धारा |
निष्पादन की प्रक्रिया |
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शांति बनाए रखने हेतु जमानत न देने पर प्रतिबद्धता |
122 |
141 |
|
|
सदाचार हेतु जमानत न देने पर प्रतिबद्धता |
122 |
141 |
|
|
जमानत न देने पर कारावास से उन्मोचन |
122, 123 |
141, 142 |
|
|
अंतरिम अभिरक्षा हेतु प्रतिबद्धता |
— |
— |
|
|
कारावास या जुर्माने के दण्डादेश पर प्रतिबद्धता |
248, 255 |
267, 274 |
|
|
सभी प्रतिबद्धता वारण्ट से संलग्न प्रपत्र |
248, 255 |
267, 274 |
|
|
अंतरिम अभिरक्षा हेतु वारण्ट |
309 |
344 |
|
|
मृत्युदण्डादेश के अधीन प्रतिबद्धता |
366 |
405 |
|
|
मृत्युदण्ड का निष्पादन |
414 |
453 |
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दण्ड परिवर्तन के पश्चात् वारण्ट |
386 |
425 |
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जुर्माने सहित अवमानना में प्रतिबद्धता |
404 |
443 |
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उत्तर देने/दस्तावेज़ प्रस्तुत करने से इंकार करने वाले साक्षी की प्रतिबद्धता |
349 |
389 |
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भरण–पोषण वारण्ट:
|
विवरण |
दण्ड प्रक्रिया संहिता की धारा |
भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता की धारा |
निष्पादन की प्रक्रिया |
|
भरण–पोषण का संदाय न करने पर कारावास |
125 |
144 |
व्यतिक्रम की स्थिति में एक माह तक का निरोध। |
रिहाई/अपीलीय वारण्ट:
|
विवरण |
दण्ड प्रक्रिया संहिता की धारा |
भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता की धारा |
|
अपील पर छोड़ देना |
386 |
425 |
|
अपील में दण्ड में संशोधन |
386 |
425 |
|
सेशन न्यायाधीश द्वारा जमानत पर छोड़ देना |
389, 397 |
428, 437 |
जुर्माना/प्रतिकर वसूली वारण्ट:
|
विवरण |
दण्ड प्रक्रिया संहिता की धारा |
भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता की धारा |
|
प्रतिकर का संदाय न करने पर कारावास |
250 |
269 |