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वाणिज्यिक विधि

कूटरचना के आरोप के कारण विवाद माध्यस्थम् योग्य नहीं रह जाता है

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 03-Feb-2026

राजिया बेगम बनाम बरनाली मुखर्जी (2025) 

"जब किसी माध्यस्थम् करार को ही कूटरचित या मनगढ़ंत होने का आरोप लगाया जाता हैतो विवाद केवल संविदात्मक नहीं रह जाते हैं और माध्यस्थम् अधिकारिता के मूल पर ही प्रहार करते हैं।" 

न्यायमूर्ति पी.एस. नरसिम्हा और आलोक आराधे 

स्रोत: उच्चतम न्यायालय 

चर्चा में क्यों? 

राजिया बेगम बनाम बरनाली मुखर्जी (2025)के मामले में न्यायमूर्ति पी.एस. नरसिम्हा और आलोक अराधे की पीठ नेटिप्पणी की कि पक्षकारों को माध्यस्थम् के लिये बाध्य नहीं किया जा सकता है जब माध्यस्थम् खण्ड वाली संविदा के अस्तित्व पर जाली होने का आरोप लगाया जाता हैक्योंकि ऐसे विवाद माध्यस्थम् योग्य नहीं रह जाते हैं।  

राजिया बेगम बनाम बरनाली मुखर्जी (2025) मामले की पृष्ठभूमि क्या थी? 

  • यह विवाद परिवार द्वारा संचालित आभूषण कंपनी, M/s RDDHI Gold से उत्पन्न हुआजिसमें मूल रूप से तीन भागीदार थे। 
  • अपीलकर्त्ता ने दावा किया कि 2007 के स्वीकृति और सेवानिवृत्ति विलेख ने उन्हें भागीदार के रूप में शामिल कियाअन्य भागीदारों को सेवानिवृत्त किया और इसमें एक माध्यस्थम् खण्ड सम्मिलित था।  
  • प्रत्यर्थी ने दस्तावेज़ के अस्तित्व से इंकार करते हुए आरोप लगाया कि यह कूटरचित था। 
  • इस कारबार को 2011 में एक निजी कंपनी द्वारा अधिग्रहित कर लिया गया था। 
  • यह विवाद 2016 में तब उत्पन्न हुआ जब अपीलकर्त्ता ने पहली बार इस दस्तावेज़ पर विश्वास किया। 
  • अपीलों का यह समूह उच्च न्यायालय के परस्पर विरोधी निर्णयों से उत्पन्न हुआ - एक कार्यवाही में इसने माध्यस्थम् अधिनियम की धारा के अधीन विवाद को माध्यस्थम् के लिये संदर्भित किया थातथापि दूसरी कार्यवाही में उच्च न्यायालय ने अधिनियम की धारा 11(6) के अधीन मध्यस्थ नियुक्त करने से इंकार करके संदर्भित करने से मना कर दिया।  
  • मुख्य विवाद्यक यह था कि क्या माध्यस्थम् को तब भी लागू किया जा सकता है जब माध्यस्थम् खण्ड वाले दस्तावेज़ पर ही विवाद हो। 
  • अपीलकर्त्ता मूल स्वीकृति विलेख या उसकी प्रमाणित प्रति प्रस्तुत करने में असफल रहाजिससे विलेख का अस्तित्व ही विवादित हो गया। 

न्यायालय की क्या टिप्पणियां थीं? 

  • न्यायालय ने यह माना कि जिन मामलों में माध्यस्थम् खण्ड या करार के अस्तित्वहीन होने के संबंध में अभिवचन किया जाता हैवह कपट का गंभीर आरोप माना जाएगा और करार की विषयवस्तु को गैर-माध्यस्थम् योग्य बना देगा।  
  • न्यायालय ने यह पाया कि जब माध्यस्थम् करार के संबंध में कपट का आरोप लगाया जाता हैतो ऐसे विवाद कोसामान्यत: माध्यस्थम् के दायरे से बाहर का विवाद माना जाताहैऔर न्यायालय इसे अधिकारिता संबंधी विवाद्यक के रूप में परीक्षा करेगा 
  • न्यायालय ने कहा कि माध्यस्थम् खण्ड वाली संविदा के अस्तित्व से संबंधित कपट के आरोपों का निर्णय पहले सिविल न्यायालय द्वारा किया जाना चाहिये 
  • न्यायमूर्ति आराधे ने टिप्पणी की कि जहाँ माध्यस्थम् करार को ही कूटरचित या मनगढ़ंत होने का आरोप लगाया जाता हैवहाँ विवाद केवल संविदात्मक नहीं रह जाता है और माध्यस्थम् अधिकारिता के मूल पर ही प्रहार करता है। 
  • न्यायालय ने कहा कि इस प्रकार का विवाद उन विवादों की श्रेणी में आता है जिन्हें सामान्यत:गैर- माध्यस्थम् योग्य माना जाता है। 
  • चूँकि अपीलकर्त्ता मूल स्वीकृति विलेख या उसकी प्रमाणित प्रति प्रस्तुत करने में असफल रहाइसलिये विलेख के अस्तित्व पर ही विवाद उत्पन्न हो गयाजिससे माध्यस्थम् खण्ड निरर्थक और अर्थहीन हो गया। 
  • न्यायालय ने पाया कि कपट के आरोप गंभीर थे और प्रत्यर्थी अधिनियम की धारा 8(2) के अधीन आवश्यक मूल स्वीकृति विलेख या उसकी प्रमाणित प्रति प्रस्तुत करने में असफल रहा था। 
  • न्यायालय नेअय्यासामी बनाम ए. परमासिवम (2016)औरएविटेल पोस्ट स्टूडियोज़ लिमिटेड बनाम HSBC PI होल्डिंग्स (2021सहित स्थापित पूर्व निर्णयों पर विश्वास किया। 
  • न्यायालय ने स्पष्ट किया कि मात्र कपट के आरोप के आधार पर पक्षकारों के बीच माध्यस्थम् करार को अकृत नहीं किया जा सकता हैकिंतु जहाँ न्यायालय को कपट के गंभीर आरोप मिलते हैं जो आपराधिक अपराध का मामला बनाते हैं या जहाँ आरोप इतने जटिल हैं कि भारी मात्रा में साक्ष्य की आवश्यकता होती हैवहाँ न्यायालय माध्यस्थम् करार को रद्द कर सकता है। 
  • परिणामस्वरूपन्यायालय ने धारा के अधीन सिविल वाद को माध्यस्थम् के लिये भेजने वाले उच्च न्यायालय के आदेश को रद्द कर दिया। 
  • न्यायालय नेधारा 11 के अधीन माध्यस्थम् नियुक्त करने से इंकार को चुनौती देने वाली संबंधित अपील को खारिज कर दिया। 

विवादों की गैर- माध्यस्थम् क्या है? 

  • माध्यस्थम् न होने से तात्पर्य उन विवादों से है जिनका समाधान माध्यस्थम् के माध्यम से नहीं किया जा सकता है और जिनका निर्णय न्यायालयों या अन्य न्यायिक मंचों द्वारा किया जाना चाहिये 
  • विवाद तब गैर-मध्यस्थता योग्य रह जाते जब उनमें लोक नीतिसांविधिक अधिकार या ऐसे प्रश्न सम्मिलित हों जिनके लिये न्यायिक निर्णय की आवश्यकता हो। 
  • माध्यस्थम् की अधिकारिता सम्मति पर आधारित होती हैऔर जहाँ कपट के गंभीर आरोपों के माध्यम से सम्मति (माध्यस्थम् करार) के अस्तित्व पर ही विवाद होता हैतो विवाद माध्यस्थम् के दायरे से बाहर हो जाता है। 

माध्यस्थम् और सुलह अधिनियम, 1996 की धारा 11 क्या है? 

  • मध्यस्थों की राष्ट्रीयता: 
    • किसी भी राष्ट्रीयता का कोई भी व्यक्ति मध्यस्थ हो सकता हैजब तक कि पक्षकार अन्यथा सहमत न हों। 
    • नियुक्ति प्रक्रिया: 
    • पक्षकार उपधारा (6) के अधीन मध्यस्थों की नियुक्ति के लिये एक प्रक्रिया पर सहमत होने के लिये स्वतंत्र हैं। 
    • किसी करार के अभाव मेंतीन मध्यस्थों वाले अधिकरण के लियेप्रत्येक पक्षकार एक मध्यस्थ नियुक्त करता हैऔर नियुक्त किये गए दो मध्यस्थ तीसरे (अध्यक्ष) मध्यस्थ का चयन करते हैं। 
  • मध्यस्थता संस्थानों की भूमिका: 
    • उच्चतम न्यायालय और उच्च न्यायालय मध्यस्थों की नियुक्ति के लिये श्रेणीबद्ध मध्यस्थता संस्थानों को नामित कर सकते हैं। 
    • श्रेणीबद्ध संस्थानों के अभाव वाली अधिकारिता मेंउच्च न्यायालय के मुख्य न्यायाधीश मध्यस्थों का एक पैनल नियुक्त कर सकते हैं। 
    • इन मध्यस्थों को मध्यस्थता संस्था माना जाता है और वे चौथी अनुसूची में निर्दिष्ट फीस के हकदार हैं। 
  • असफलता की स्थिति में नियुक्ति: 
    • यदि कोई पक्षकार अनुरोध प्राप्त होने के 30 दिनों के भीतर मध्यस्थ नियुक्त करने में असफल रहता हैया यदि नियुक्त किये गए दो मध्यस्थ 30 दिनों के भीतर तीसरे मध्यस्थ पर सहमत नहीं हो पाते हैंतो नियुक्ति नामित मध्यस्थता संस्था द्वारा की जाती है। 
    • अंतर्राष्ट्रीय वाणिज्यिक मध्यस्थता के लियेउच्चतम न्यायालय संस्था का निर्धारण करता हैअन्य मध्यस्थताओं के लियेउच्च न्यायालय ऐसा करता है। 
  • एकमात्र मध्यस्थ की नियुक्ति: 
    • यदि पक्षकार 30 दिनों के भीतर एकमात्र मध्यस्थ पर सहमत होने में असफल रहते हैंतो नियुक्ति उपधारा (4) के अनुसार की जाती है। 
  • सहमत प्रक्रिया के अनुसार कार्य करने में विफलता: 
    • यदि कोई पक्षकारनियुक्त मध्यस्थया कोई नामित व्यक्ति/संस्था सहमत प्रक्रिया के अधीन अपना कार्य करने में असफल रहता हैतो न्यायालय द्वारा नामित मध्यस्थ संस्था नियुक्ति करती है। 
  • प्रकटीकरण संबंधी आवश्यकताएँ: 
    • मध्यस्थ नियुक्त करने से पहलेमध्यस्थ संस्था को धारा 12(1) के अनुसार भावी मध्यस्थ से लिखित प्रकटीकरण प्राप्त करना होगा। 
    • संस्था को पक्षकारों के बीच हुए करार और प्रकटीकरण की सामग्री द्वारा आवश्यक किसी भी योग्यता पर विचार करना चाहिये 
  • अंतर्राष्ट्रीय वाणिज्यिक माध्यस्थम्: 
    • अंतर्राष्ट्रीय वाणिज्यिक माध्यस्थम् में एकल या तृतीय मध्यस्थ की नियुक्ति के लियेनामित संस्था पक्षकारों से भिन्न राष्ट्रीयता वाले मध्यस्थ की नियुक्ति कर सकती है। 
  • एकाधिक नियुक्ति अनुरोध: 
    • यदि विभिन्न संस्थानों को एक से अधिक अनुरोध भेजे जाते हैंतो पहला अनुरोध प्राप्त करने वाला संस्थान नियुक्ति करने के लिये सक्षम होगा। 
  • नियुक्ति की समय सीमा: 
    • मध्यस्थता संस्था को विपक्षी पक्षकार को नोटिस देने के 30 दिनों के भीतर नियुक्ति के आवेदन का निपटारा करना होगा। 
  • फीस अवधारण: 
    • मध्यस्थता संस्था चौथी अनुसूची में दी गई दरों के अधीनमध्यस्थता अधिकरण की फीस और संदाय के तरीके का अवधारण करती है। 
    • यह अंतरराष्ट्रीय वाणिज्यिक माध्यस्थम् पर लागू नहीं होता है या उन मामलों पर लागू नहीं होता है जहाँ पक्षकारों ने मध्यस्थ संस्था के नियमों के अनुसार फीस अवधारण पर सहमति व्यक्त की हो।  
  • न्यायिक शक्ति का गैर-प्रतिनिधित्व: 
    • उच्चतम न्यायालय या उच्च न्यायालय द्वारा किसी व्यक्ति या संस्था को नामित करना न्यायिक शक्ति का प्रत्यायोजन नहीं माना जाता है।