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सिविल कानून

स्टेम सेल थेरेपी और ऑटिज्म: आशा, वैज्ञानिक सटीकता और रोगी संरक्षण के बीच संतुलन

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 31-Jan-2026

स्रोत:द हिंदू 

परिचय 

31 जनवरी, 2026 कोउच्चतम न्यायालय ने एक ऐतिहासिक निर्णय दिया जिसमें अनुमोदित और निगरानी वाले नैदानिक ​​परीक्षणों या अनुसंधान सेटिंग्स के बाहर ऑटिज्म स्पेक्ट्रम डिसऑर्डर (ASD) के लिये एक नैदानिक ​​सेवा के रूप में स्टेम सेल थेरेपी पर प्रतिबंध लगा दिया गया। 

  • न्यायमूर्ति आई.बीपारदीवाला और आर. महादेवन की पीठ ने केंद्र सरकार की इस बात के लिए कड़ी आलोचना की कि वह उन क्लीनिकों के विरुद्ध कार्यवाही करने में विफल रही है जो बिना साबित हुए उपचार प्रदान करते हैंजिसके कारण माता-पिता और संरक्षक काफी वित्तीय लागत पर प्रायोगिक तरीकों का सहारा लेते हैंजिससे कमजोर बच्चे खतरे में पड़ जाते हैं।   

न्यायालय की टिप्पणियां और पृष्ठभूमि क्या थीं? 

उच्चतम न्यायालय का निर्णय: 

  • पीठ ने निर्णय दिया कि ऑटिज्म स्पेक्ट्रम डिसऑर्डर (ASD) के मामलों में स्टेम कोशिकाओं का चिकित्सीय उपयोगजो इलाज के रूप में प्रभावशीलता या संभावित दुष्परिणामों के बारे में अनिश्चित वैज्ञानिक ज्ञान या साक्ष्य पर आधारित हैडॉक्टरों द्वारा अपने रोगियों के प्रति निभाए जाने वाले "उचित देखरेख मानक" को पूरा करने में असफल रहता है।  
  • न्यायालय ने वैज्ञानिक प्रमाणिकता में एक महत्त्वपूर्ण कमी पर बल देते हुए कहा: "ऑटिज्म स्पेक्ट्रम डिसऑर्डर में स्टेम कोशिकाओं के चिकित्सीय उपयोग की प्रभावकारिता और सुरक्षा पर स्थापित वैज्ञानिक प्रमाणों की कमी है। परिणामस्वरूपडॉक्टरों के पास अपने मरीजों को देने के लिये पर्याप्त जानकारी नहीं है।" 
  • इस निर्णय में स्पष्ट किया गया कि माता-पितासंरक्षक और देखरेख करने वाले यह मांग नहीं कर सकते कि स्टेम-सेल थेरेपी को नैदानिक ​​सेवा के रूप में दिया जाए। यद्यपि सहमति रोगी की स्वायत्तता के लिये आवश्यक हैलेकिन इसे "किसी ऐसी नैदानिक ​​प्रक्रिया के लिये स्वयं को बाध्य करने के अधिकार के रूप में प्रयोग नहीं किया जा सकता जो वैज्ञानिक रूप से अप्रमाणितनैतिक रूप से अस्वीकार्य और उचित चिकित्सा पद्धति की सीमाओं से बाहर हो।" 
  • महत्त्वपूर्ण रूप सेन्यायालय ने निर्णय दिया कि रोगियों से प्राप्त सहमति भी वैध नहीं होगी क्योंकि यह पर्याप्त जानकारी के प्रकटीकरण की पूर्व शर्त को पूरा नहीं कर सकती। "सहमति का अर्थ है सूचित प्राधिकरणजो उपचार की प्रकृतिप्रक्रियाउद्देश्यलाभप्रभावविकल्पमहत्त्वपूर्ण जोखिम और उपचार से इंकार करने के प्रतिकूल परिणामों के पर्याप्त प्रकटीकरण पर आधारित हो।" 
  • न्यायालय ने सरकार को देश भर में स्टेम सेल अनुसंधान की निगरानी के लिये एक समर्पित नियामक प्राधिकरण गठित करने का निदेश दिया। 

मामले की पृष्ठभूमि:   

यह निर्णय देश भर के क्लीनिकों में ऑटिज्म स्पेक्ट्रम डिसऑर्डर (ASD) के उपचार के लिये स्टेम सेल थेरेपी के अंधाधुंध प्रचारनुस्खे और प्रशासन के बारे में चिंता जताने वाली कई याचिकाओं के आधार पर आया है। याचिकाकर्त्ताओं ने तर्क दिया कि यद्यपि स्टेम सेल थेरेपी अभी प्रायोगिक चरण में हैफिर भी इसे ऑटिज्म स्पेक्ट्रम डिसऑर्डर के 'उपचारऔर 'इलाजके रूप में प्रचारित किया जा रहा है। उन्होंने कहा कि ऑटिज्म स्पेक्ट्रम डिसऑर्डर से पीड़ित लोग और उनके देखरेखकर्त्ता "चमत्कारी इलाज" की उम्मीद में स्टेम सेल थेरेपी देने वाले केंद्रों पर पूरा विश्वास करते हैं। याचिकाओं में आगे तर्क दिया गया कि सरकार द्वारा ऐसी थेरेपी की अनुमति देने में चूक हुई हैजो नए ड्रग्स और क्लिनिकल परीक्षण नियम, 2019 का उल्लंघन है। 

2019 के नए औषधि एवं नैदानिक ​​परीक्षण नियम क्या हैं? 

बारे में: 

  • ये नियम भारत में नैदानिक ​​परीक्षणों और नई दवाओं के विनियमन के लिये एक व्यापक ढाँचा प्रदान करते हैंजो औषधि और सौंदर्य प्रसाधन नियमों के अधीन पहले के प्रावधानों का स्थान लेते हैं। 

मुख्य प्रावधान: 

  • क्लिनिकल ट्रायल रजिस्ट्री-इंडिया (CTRI) में क्लिनिकल ट्रायल्स का अनिवार्य रजिस्ट्रीकरण 
  • सभी नैदानिक ​​अनुसंधानों के लिये नैतिकता समिति की मंजूरी अनिवार्य है। 
  • सूचित सहमति की प्रक्रियाजिसमें विस्तृत प्रकटीकरण की अनिवार्यता शामिल हैजैसे कि परीक्षण की प्रकृति एवं उद्देश्यसम्मिलित प्रक्रियाएँयथोचित रूप से पूर्वानुमेय जोखिम एवं लाभउपलब्ध वैकल्पिक उपचारगोपनीयता संबंधी प्रावधानबिना किसी दण्ड के परीक्षण से हटने का अधिकारतथा परीक्षण से संबंधित क्षति के लिये उपलब्ध प्रतिकर 
  • नैदानिक परीक्षण से संबंधित क्षति के लिये प्रतिकर के प्रावधान 
  • केंद्रीय औषधि मानक नियंत्रण संगठन (CDSCO) द्वारा निगरानी। 
  • बच्चों सहित संवेदनशील आबादी के लिये विशेष सुरक्षा उपाय।  

विनियामक प्राधिकरण: 

  • केंद्रीय औषधि मानक नियंत्रण संगठन (CDSCO):स्वास्थ्य और परिवार कल्याण मंत्रालय के अधीन भारत में दवाओं और नैदानिक ​​परीक्षणों के लिये प्रमुख विनियामक निकाय।     
  • भारत के औषधि महानियंत्रक (DCGI): CDSCO के प्रमुखजिनके पास नैदानिक ​​परीक्षणों और नई दवाओं को मंजूरी देने का अधिकार है। 
  • संस्थागत नैतिकता समितियाँ (IECs):सभी नैदानिक ​​अनुसंधान संस्थानों के लिये परीक्षणों की समीक्षा और निगरानी करना आवश्यक है। 

ऑटिज्म स्पेक्ट्रम डिसऑर्डर (ACD) क्या है? 

बारे में: 

  • ऑटिज्म स्पेक्ट्रम डिसऑर्डर मस्तिष्क में भिन्नताओं के कारण होने वाली एक विकासात्मक अक्षमता हैजो सामाजिक संचारअंतःक्रिया और व्यवहार के तरीकों को प्रभावित करती है। लक्षणों के प्रकार और गंभीरता में व्यापक भिन्नता के कारण इसे "स्पेक्ट्रम" विकार कहा जाता है।

प्रचलन: 

  • अध्ययनों से पता चलता है कि भारत में लगभग 100 बच्चों में से 1 बच्चा ऑटिज्म स्पेक्ट्रम डिसऑर्डर से प्रभावित हैतथापि जागरूकता और नैदानिक ​​सेवाओं तक पहुँच के कारण निदान दर में काफी भिन्नता है। 

वर्तमान में स्थापित उपचार:  

  • साक्ष्य-आधारित हस्तक्षेपों में व्यवहार संबंधी चिकित्सा (अनुप्रयुक्त व्यवहार विश्लेषण)वाक् और भाषा चिकित्साव्यावसायिक चिकित्साशैक्षिक हस्तक्षेप और कुछ मामलों मेंसहवर्ती अवस्थाओं के उपचार हेतु औषधीय उपचार सम्मिलित हैं।  

स्टेम सेल थेरेपी अभी भी प्रायोगिक क्यों है: 

  • विभिन्न क्लीनिकों के दावों के बावजूदऐसा कोई स्थापित वैज्ञानिक साक्ष्य नहीं है जो यह दर्शाता हो कि स्टेम सेल थेरेपी ऑटिज्म स्पेक्ट्रम डिसऑर्डर (ASD) का प्रभावी ढंग से इलाज करती है। विश्व भर के अधिकांश वैज्ञानिक निकाय ऐसे उपचारों को प्रायोगिक मानते हैं और अनुशंसा करते हैं कि इन्हें केवल सुनियोजित और निगरानी वाले नैदानिक ​​परीक्षणों के अंतर्गत ही आजमाया जाना चाहिये 

स्टेम सेल थेरेपी क्या है? 

  • स्टेम सेल थेरेपीजिसे पुनर्योजी चिकित्सा के रूप में भी जाना जाता हैस्टेम कोशिकाओं या उनके व्युत्पन्न पदार्थों का उपयोग करके रोगग्रस्तनिष्क्रिय या क्षतिग्रस्त ऊतकों की मरम्मत प्रतिक्रिया को बढ़ावा देती है। 
  • स्टेम कोशिकाओं को फिर किसी व्यक्ति में प्रत्यारोपित किया जा सकता है। उदाहरण के लियेमुंबई के एक नवजात शिशु को करोड़ स्टेम कोशिकाएँ इंजेक्ट की गईं और धीरे-धीरे उसके फेफड़े ठीक होने लगे। इस मामले मेंडॉक्टरों ने प्रायोगिक तौर पर मेसेनकाइमल स्टेम-सेल थेरेपी (ये वयस्क स्टेम कोशिकाएँ होती हैं और भ्रूण स्टेम कोशिकाओं से भिन्न होती हैं) का उपयोग किया। 

स्टेम कोशिकाएँ 

  • स्टेम कोशिकाएँ शरीर की कच्ची सामग्री होती हैं - वे कोशिकाएँ जिनसे विशिष्ट कार्यों वाली अन्य सभी कोशिकाएँ उत्पन्न होती हैं। 
  • शरीर या प्रयोगशाला में कुछ विशेष परिस्थितियों मेंस्टेम कोशिकाएँ विभाजित होकर और अधिक कोशिकाएँ बनाती हैं जिन्हें पुत्री कोशिकाएँ (daughter cells) कहा जाता है। 
  • ये पुत्री कोशिकाएँ या तो नई स्टेम कोशिकाएँ बन जाती हैं (स्वयं-नवीकरण) या अधिक विशिष्ट कार्य वाली विशिष्ट कोशिकाएँ बन जाती हैं (विभेदन)जैसे रक्त कोशिकाएँमस्तिष्क कोशिकाएँहृदय पेशी कोशिकाएँ या अस्थि कोशिकाएँ।     
  • शरीर की किसी अन्य कोशिका में नए प्रकार की कोशिकाओं को उत्पन्न करने की प्राकृतिक क्षमता नहीं होती है।                   

निष्कर्ष 

जनवरी 2026 में उच्चतम न्यायालय का निर्णय चिकित्सीय नवाचाररोगी संरक्षण और नियामक निगरानी के बीच एक महत्त्वपूर्ण हस्तक्षेप का प्रतिनिधित्व करता है। अनुमोदित नैदानिक ​​परीक्षणों के बाहर ऑटिज्म स्पेक्ट्रम डिसऑर्डर के लिये स्टेम सेल थेरेपी पर प्रतिबंध लगाकरन्यायालय ने कमजोर परिवारों के अनियंत्रित व्यावसायिक शोषण पर वैज्ञानिक सटीकता और रोगी सुरक्षा को प्राथमिकता दी है।          

इस निर्णय में आधुनिक चिकित्सा पद्धति के एक मूलभूत विरोधाभास को स्वीकार किया गया है: संभावित रूप से लाभकारी उपचारों की खोज की इच्छा और अप्रमाणित हस्तक्षेपों से रोगियों की सुरक्षा की अनिवार्यता के बीच संतुलन बनाए रखना आवश्यक है। यद्यपि ऑटिज्म स्पेक्ट्रम डिसऑर्डर (ASD) से पीड़ित अपने बच्चों की सहायता करने के लिये माता-पिता की व्याकुलता समझ में आती हैन्यायालय ने सही निष्कर्ष निकाला कि ऐसी भावनात्मक कमजोरी बच्चों को वैज्ञानिक रूप से अप्रमाणित प्रक्रियाओं के अधीन करने का औचित्य नहीं ठहरा सकती।