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करेंट अफेयर्स और संग्रह

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आपराधिक कानून

केवल प्रकटीकरण संबंधी कथन ही दोषसिद्धि के लिये पर्याप्त नहीं हैं

 17-Jan-2026

तुलासरेड्डी उर्फ मुदकप्पा एवं अन्य बनाम कर्नाटक राज्य और अन्य 

"साक्ष्य अधिनियम की धारा 27 के अधीन किये गए तथाकथित संस्वीकृति कथनों और कथित साक्ष्यों के आधार पर ही दोषसिद्धि को बरकरार नहीं रखा जा सकताविशेषत: जब परिस्थितिजन्य साक्ष्यों की श्रृंखला अधूरी हो।" 

न्यायमूर्ति संजय करोल और विपुल एम. पंचोली 

स्रोत: उच्चतम न्यायालय 

चर्चा में क्यों? 

तुलसारेड्डी उर्फ मुदकप्पा और अन्य बनाम कर्नाटक राज्य और अन्य (2025)के मामले में न्यायमूर्ति संजय करोल और विपुल एम. पंचोली की पीठ नेहत्या के दोषसिद्धि को अपास्त कर दियायह मानते हुए कि भारतीय साक्ष्य अधिनियम, 1872 (IEA) की धारा 27 के अधीन प्रकटीकरण कथनदोषसिद्धि का एकमात्र आधार नहीं हो सकते हैंजब अभियोजन पक्ष द्वारा परिस्थितिजन्य साक्ष्यों की पूरी श्रृंखला स्थापित नहीं की गई हो। 

तुलासारेड्डी उर्फ मुदकप्पा और अन्य बनाम कर्नाटक राज्य और अन्य (2025) मामले की पृष्ठभूमि क्या थी? 

  • इस मामले में एक कथित हत्या का मामला शामिल थाजिसमें अभियोजन पक्ष पूरी तरह से परिस्थितिजन्य साक्ष्यों पर निर्भर था। 
  • मुख्य साक्ष्य में साक्ष्य अधिनियम की धारा 27 के अधीन किये गए प्रकटीकरण कथनउन कथनों के आधार पर शव की बरामदगी और हेतुअंतिम बार देखे जाने के साक्ष्य और षड्यंत्र सहित आसपास की परिस्थितियाँ सम्मिलित थीं। 
  • विचारण न्यायालय ने सबूतों की परीक्षा की और अभियुक्तों को दोषमुक्त कर दिया। 
  • ट्रायल कोर्ट ने माना कि परिस्थितियों की श्रृंखला अधूरी थी और बरामदगी औरखुलासे के बयान दोषसिद्धि के लिए अपर्याप्त थे। 
  • विचारण न्यायालय ने पाया कि प्रमुख साक्षीविशेष रूप से एकमात्र "अंतिम बार देखे गए" साक्षी (PW-5), अविश्वसनीय थे। 
  • विचारण न्यायालय ने चिकित्सकीय साक्ष्यों और अभियोजन पक्ष द्वारा प्रस्तुत घटनाक्रम के बीच विसंगतियों को भी नोट किया।  
  • कर्नाटक उच्च न्यायालय ने विचारण न्यायालय के दोषमुक्त करने के आदेश को पलट दिया। 
  • उच्च न्यायालय ने धारा 27 के अधीन किये गए प्रकटीकरण और शव की बरामदगी को अभियुक्त को अपराध से जोड़ने वाली निर्णायक कड़ियों के रूप में मानातथापि परिस्थितियों की पूरी तरह से स्थापित श्रृंखला का अभाव था। 
  • उच्च न्यायालय द्वारा दोषमुक्ति के निर्णय को पलटने से असंतुष्ट होकरअभियुक्तों ने उच्चतम न्यायालय में अपील की। 

न्यायालय की क्या टिप्पणियां थीं? 

  • न्यायालय ने निर्णय दिया किकेवल प्रकटीकरण के कथनों के आधार पर दोषसिद्धि नहीं हो सकती जब तक कि परिस्थितिजन्य साक्ष्यों की श्रृंखला पूरी न हो जाए। 
  • पीठ ने टिप्पणी की कि "केवल अभियुक्त के तथाकथित संस्वीकृति कथन और मृत शरीर की बरामदगी पर विश्वास करने के आधार परजो कि विधिवत रूप से साबित नहीं हुआ हैदोषसिद्धि अभिलिखित नहीं की जा सकती।" 
  • न्यायालय ने पाया कि एकमात्र प्रत्यक्षदर्शी PW-5 को विश्वसनीय नहीं माना जा सकता। 
  • न्यायालय ने माना कि उच्च न्यायालय ने धारा 27 के अधीन प्रकटीकरण कथनों के आधार पर ही विचारण न्यायालय के दोषमुक्ति के निर्णय को पलटने में त्रुटी की। 
  • न्यायालय ने पाया कि उच्च न्यायालय इस बात की ठीक से परीक्षा करने में असफल रहा कि क्या अभियोजन पक्ष अपीलकर्त्ताओं के अपराध से संबंध स्थापित करने के लिये परिस्थितियों की पूरी श्रृंखला को पूरा करने में सफल रहा। 
  • न्यायालय ने इस स्थापित सिद्धांत को लागू किया कि "यदि अभिलेख पर विद्यमान साक्ष्यों के आधार पर दो उचित निष्कर्ष संभव हैंतो अपीलीय न्यायालय को विचारण न्यायालय द्वारा अभिलिखित किये गए दोषमुक्ति के निष्कर्षों को नहीं परिवर्तित करना चाहिये।" 
  • न्यायालय ने आगे कहा कि "यदि लिया गया दृष्टिकोण एक संभावित दृष्टिकोण हैतो अपीलीय न्यायालय इस आधार पर दोषमुक्त करने के आदेश को रद्द नहीं कर सकता कि कोई अन्य दृष्टिकोण भी संभव था।" 
  • उच्चतम न्यायालय ने विचारण न्यायालय के अपीलकर्त्ताओं को दोषमुक्त करने के निर्णय को बहाल कर दियायह मानते हुए कि दोषसिद्धि मुख्य रूप से तथाकथित संस्वीकृत कथनों और संदिग्ध साक्ष्यों पर आधारित थीन कि परिस्थितिजन्य साक्ष्यों को नियंत्रित करने वाले स्थापित सिद्धांतों को पूरा करने पर। 
  • अपीलेंमंजूर कर ली गईंऔर दोषसिद्धि को अपास्त कर दिया गया। 

प्रकटीकरण विवरण क्या हैं? 

परिचय: 

  • यह प्रकटीकरण विवरणभारतीय साक्ष्य अधिनिनियम (IEA) की धारा 27 के अधीन उपबंधित किया गया है। 
  • यह धारा पश्चात्वर्ती घटनाओं द्वारा पुष्टि के सिद्धांतपर आधारित है - एक तथ्य वास्तव में दी गई जानकारी के परिणामस्वरूप खोजा जाता हैजिसके परिणामस्वरूप एक भौतिक वस्तु की बरामदगी होती है। 

भारतीय साक्ष्य अधिनिनियम की धारा 27:  

  • यह अन्य उपबंधों के प्रति एक परंतुक के रूप में कार्य करता है 
  • किसी अपराध के अभियुक्त व्यक्ति से प्राप्त जानकारी के आधार पर ही तथ्य का पता लगाया जाना चाहिये 
  • अभियुक्त को पुलिस की अभिरक्षा में होना चाहिये 
  • इस प्रकार खोजे गए तथ्य से संबंधित जितनी भी जानकारी स्पष्ट रूप से उपलब्ध होउसे साबित किया जा सकता है। 
  • यह इस बात से अप्रभावित है कि कथन संस्वीकृति के समान है या नहीं। 
  • पुलुकुरी कोट्टाया बनाम सम्राट (1947)के मामले मेंसर जॉन ब्यूमोंट ने माना कि धारा 27 केवल भारतीय साक्ष्य अधिनियम की धारा 26 का परंतुक है। 
  • तथापिहाल ही मेंजाफरूद्दीन बनाम केरल राज्य (2022)के मामले में उच्चतम न्यायालय ने निर्णय दिया है कि धारा 27 पूर्ववर्ती धाराओंविशेष रूप से धारा 25 और धारा 26 का अपवाद है। 

भारतीय साक्ष्य अधिनियम की धारा 27 को लागू करने के लिये आवश्यक शर्तें: 

  • यह बात पेरुमल राजा उर्फ ​​पेरुमल बनाम राज्यपुलिस निरीक्षक द्वारा प्रतिनिधित्व (2023)के मामले में निर्धारित की गई थी, जहाँ न्यायालय ने निम्नलिखित निर्णय दिया: 
    • सर्वप्रथमतथ्यों की खोज होनी चाहिये। ये तथ्य अभियुक्त व्यक्ति से प्राप्त जानकारी के आधार पर सुसंगत होनी चाहिये 
    • दूसराइस तरह के तथ्य की खोज का साक्षी के तौर पर कथन करना आवश्यक है। इसका अर्थ यह है कि यह तथ्य पहले से ही पुलिस को ज्ञात नहीं होना चाहिये 
    • तीसरासूचना प्राप्त होने के समय अभियुक्त पुलिस की अभिरक्षा में होना चाहिये 
    • अंत मेंकेवल उतनी ही जानकारी ग्राह्य है जो इस प्रकार खोजे गए तथ्य से स्पष्ट रूप से संबंधित हो।  
    • इस खोजे गए तथ्य में निम्नलिखित बातें सम्मिलित होंगी: 
      • वह "स्थान" जहाँ से वस्तु की बरामदगी की गई हो 
      • स स्थान अथवा वस्तु के संबंध में अभियुक्त का ज्ञान 

भारतीय साक्ष्य अधिनियम, 2023 का कौन सा उपबंध प्रकटीकरण विवरण प्रदान करता है? 

  • यह भारतीय साक्ष्य अधिनियम, 2023 (BSA) कीधारा 23 (2) के परंतुक के रूप में के रूप में निहित है । 
  • धारा 23 (2) यह उपबंधित करती है 
    • किसी व्यक्ति द्वारा पुलिस अधिकारी की अभिरक्षा में रहते हुए किया गया कोई भी संस्वीकृति कथनजब तक वह किसी मजिस्ट्रेट की तात्कालिक उपस्थिति में न किया गया होउसके विरुद्ध साबित नहीं किया जाएगा। 
    • परंतु यह किजब किसी अपराध के अभियुक्त सेजो पुलिस अधिकारी की अभिरक्षा में होप्राप्त सूचना के परिणामस्वरूप किसी तथ्य की खोज होने का साक्ष्य दिया जाता हैतो उस सूचना का उतना भाग—चाहे वह संस्वीकृति की प्रकृति का हो अथवा नहीं—जो उस खोजे गए तथ्य से विशिष्ट रूप से संबंधित होसाबित किया जा सकेगा।  

भारतीय साक्ष्य अधिनियम की धारा 27 से संबंधित महत्त्वपूर्ण विधिक मामले कौन से हैं? 

  • मोहम्मद इनायतुल्लाह बनाम महाराष्ट्र राज्य (1976): 
    • यह प्रतिपादित किया गया कि धारा 27 को लागू करने हेतु प्रथम एवं अनिवार्य शर्त यह है कि किसी तथ्य की खोज हुई होजो अभियुक्त से प्राप्त सूचना के परिणामस्वरूप एक सुसंगत तथ्य हो 
    • दूसरी शर्त यह है कि ऐसे तथ्य की खोज के संबंध में साक्ष्य प्रस्तुत किया जाना चाहियेजो तथ्य पहले से पुलिस के ज्ञान में होवह इस शर्त को पूरा नहीं करता। 
    • तीसरी शर्त यह है कि सूचना प्राप्त किए जाने के समय अभियुक्त पुलिस की अभिरक्षा में होना चाहिये 
    • अंततःकेवल वही सूचना ग्राह्य होगीजो खोजे गए तथ्य से विशिष्ट रूप से संबंधित हो और जिसके परिणामस्वरूप किसी भौतिक वस्तु की बरामदगी हुई हो।  
  • पेरुमल राजा उर्फ पेरुमल बनाम राज्यपुलिस निरीक्षक द्वारा प्रतिनिधित्व (2024): 
    • धारा 27 को लागू करने के लिये आवश्यक शर्तें निम्नलिखित हैं: 
      • प्रथमतथ्यों की खोज होनी चाहिये। ये तथ्य अभियुक्त व्यक्ति से प्राप्त जानकारी के आधार पर सुसंगत होने चाहिये 
      • द्वितीयऐसे तथ्य की खोज के संबंध में साक्ष्य दिया जाना चाहिएअर्थात् वह तथ्य पूर्व से पुलिस को ज्ञात नहीं होना चाहिये 
      • तृतीयसूचना प्राप्त किए जाने के समय अभियुक्त पुलिस अभिरक्षा में होना चाहिये 
      • अंत मेंकेवल उतनी ही सूचना ग्राह्य होगीजो खोजे गए तथ्य से विशिष्ट रूप से संबंधित हो 
  • दिल्ली एन.सी.टी. राज्य बनाम नवजोत संधू उर्फ ​​अफसान गुरु (2005): 
    • उच्चतम न्यायालय ने यह प्रतिपादित किया कि भारतीय साक्ष्य अधिनियम की धारा 27 के अर्थ में “खोजा गया तथ्य” कोई ठोस एवं मूर्त तथ्य होना चाहियेजिससे अभियुक्त द्वारा दी गई सूचना का प्रत्यक्ष एवं स्पष्ट संबंध हो।  

सिविल कानून

जहाँ स्वामित्व विवादित है, वहाँ आज्ञापक व्यादेश पोषणीय नहीं है

 17-Jan-2026

संजय पालीवाल और अन्य बनाम भारत हेवी इलेक्ट्रिकल्स लिमिटेड 

"स्वामित्व की घोषणा और कब्जे की वसूली के लिये उपचारों की खोज किये बिना केवल अनिवार्य व्यादेश की मांग करने वाला वाद नहीं चलाया जा सकता हैविशेषत: जब वादी के संपत्ति पर स्वामित्व को लेकर विवाद हो।" 

न्यायमूर्ति अरविंद कुमार और एन. कोटिस्वर सिंह   

स्रोत: उच्चतम न्यायालय 

चर्चा में क्यों? 

संजय पालीवाल और अन्य बनाम भारत हेवी इलेक्ट्रिकल लिमिटेड (2026)के मामले में न्यायमूर्ति अरविंद कुमार और एन. कोटिश्वर सिंह की पीठ नेउत्तराखंड उच्च न्यायालय के उस निर्णय को बरकरार रखा जिसमें अनिवार्य व्यादेश के लिये दायर वाद को खारिज कर दिया गया थाजहाँ वादी के संपत्ति पर स्वामित्व को लेकर विवाद था। 

संजय पालीवाल और अन्य बनाम भारत हेवी इलेक्ट्रिकल लिमिटेड (2026) मामले की पृष्ठभूमि क्या थी? 

  • अपीलकर्त्ताओं नेभारत हेवी इलेक्ट्रिकल लिमिटेड (BHEL) के विरुद्धआज्ञापक व्यादेश की मांग करते हुए एक वाद दायर किया। 
  • इस वाद में अपीलकर्त्ताओं की भूमि पर कथित तौर पर भारत हेवी इलेक्ट्रिकल लिमिटेड (BHEL) द्वारा निर्मित सीमा दीवार को ध्वस्त करने की मांग की गई थी। 
  • अपीलकर्त्ताओं के अनुसारदीवार ने उनकी संपत्ति से सार्वजनिक सड़क तक उनकी पहुँच को बाधित कर दिया था।  
  • विचारण न्यायालय ने वादी के पक्ष में वाद सुनाया औरदीवार को हटाने काआज्ञापक व्यादेश जारी किया। 
  • प्रथम अपीलीय न्यायालय ने भी वादियों के पक्ष में निर्णय दिया 
  • यद्यपिउत्तराखंड उच्च न्यायालय ने दूसरी अपील में इन निष्कर्षों को पलट दिया और वाद को खारिज कर दिया। 
  • उच्च न्यायालय ने निर्णय दिया किविनिर्दिष्ट अनुतोष अधिनियम, 1963 की धारा 41(ज) के अधीन वाद वर्जित था, क्योंकि अधिक प्रभावी उपचार उपलब्ध था। 
  • उच्च न्यायालय ने कहा कि ऐसी परिस्थितियों में कब्जे के लिये वाद दायर करना ही उचित उपचार होगा। 
  • इस निर्णय को अपीलकर्त्ताओं द्वारा उच्चतम न्यायालय में चुनौती दी गई थी। 

न्यायालय की क्या टिप्पणियां थीं? 

  • उच्चतम न्यायालय ने विनिर्दिष्ट अनुतोष अधिनियम, 1963 की धारा 41(के उच्च न्यायालय के निर्वचन और उसके अनुप्रयोग का समर्थन किया। 
  • न्यायालय ने पाया कि वर्तमान मामले में संपत्ति के स्वामित्वकब्जे और पहचान को लेकर गंभीर विवाद विद्यमान हैं। 
  • जब प्रतिवादी कथित तौर पर वादी द्वारा दावा की गई भूमि पर कोई ढाँचा खड़ा करता हैतो यह अतिचार और बेदखली के समान होता है। 
  • अतिचार और बेदखली के लिये सबसे प्रभावी उपचारकब्जे की वसूली के लिये वाद दायर करना है। 
  • न्यायालय ने कहा कि यदि वादी के पास वैध स्वामित्व भी होतब भी विवादित संपत्ति पर निर्माण होने की स्थिति मेंउचित उपचार कब्जे के लिये वाद दायर करना और उसके परिणामस्वरूप व्यादेश जैसा अनुतोष प्राप्त करना है। 
  • न्यायालय ने माना किकेवल व्यादेश के लिये वाद दायर करना उचित विधिक उपचार नहीं था। 
  • विवादित संपत्ति पर कब्जे को लेकर अनिश्चितता के होते हुए भी वादी कब्जे के अनुतोष की मांग करने में असफल रहे। 
  • इसलियेसाधारण व्यादेश का वादपोषणीय नहीं था और विनिर्दिष्ट अनुतोष अधिनियम, 1963 की धारा 41(ज) के अधीन इसे सही ढंग से वर्जित कर दिया गया था। 
  • न्यायालय ने निर्णय दिया कि जब वादी के वाद संपत्ति पर स्वामित्व को लेकर विवाद होतो कब्जे का दावा करने और स्वामित्व की घोषणा की मांग करने के बजाय आज्ञापक व्यादेश की मांग करते हुए साधारण वाद दायर करना अनुमेय नहीं है।  
  • उच्चतम न्यायालय ने अपील खारिज करते हुए उच्च न्यायालय के निर्णय को बरकरार रखा। 

आज्ञापक व्यादेश क्या है? 

विधिक उपबंध और आवश्यकताएँ: 

  • विनिर्दिष्ट अनुतोष अधिनियम, 1963 की धारा 39 न्यायालयों को बाध्यता के भंग के निवारण और आवश्यक कार्यों के पालन को बाध्य करने के लिये आज्ञापक व्यादेश जारी करने का अधिकार देती हैजो न्यायालय के विवेक के अधीन है। 
  • इस उपबंध के अधीन एक स्पष्टविनिर्दिष्ट और विधिक रूप से बाध्यकारी दायित्त्व का अस्तित्व आवश्यक हैजिसके भंग को न्यायिक हस्तक्षेप के माध्यम से रोका जाना है। 
  • बाध्यता का वास्तविक भंग या भंग की युक्तियुक्त आशंका होनी चाहियेऔर जिन कार्यों के पालन की मांग की जा रही हैवे न्यायालय द्वारा लागू किये जाने योग्य होने चाहिये 
  • आवश्यक शर्तें: 
  • ऐसे कृत्यों का पालनपरिवाद किये गए भंग के निवारण के लिये आवश्यक होना चाहियेऔरजिन कृत्यों को बाध्य किया जाना है और बाध्यता के भंग के निवारण के बीच प्रत्यक्ष संबंध होना चाहिये।                                                
  • आज्ञापक व्यादेश एक असाधारण उपचार हैजो केवल तभी प्रदान किया जाता है जब सामान्य विधिक उपचार अपर्याप्त साबित होते हैंऔर वादी को सभी पूर्व शर्तों के अनुपालन को प्रदर्शित करना होगा।                
  • न्यायालय स्थापित न्यायसंगत सिद्धांतों के आधार पर विवेक का प्रयोग करता हैजिसमें सुविधा का संतुलनअपूरणीय क्षति और क्षतिपूर्ति की पर्याप्तता सम्मिलित हैजिससे यह अधिकार का मामला नहीं रह जाता अपितु न्यायिक मूल्यांकन और न्यायसंगत विचारों पर निर्भर करता है।  

विनिर्दिष्ट अनुतोष अधिनियम, 1963 की धारा 41(ज) क्या है? 

  • विनिर्दिष्ट अनुतोष अधिनियम, 1963 की धारा 41(ज) न्यायालयों को व्यादेश देने से वर्जित करती है जब वादी के लिये अधिक प्रभावी विधिक उपचार उपलब्ध हो। 
  • यह उपबंध सुनिश्चित करता है कि पक्षकार अपने परिवादों के लिये सबसे उपयुक्त और प्रभावी समाधान तलाशें। 
  • जब कब्जे या घोषणा के वादों जैसे वैकल्पिक उपचार सरल या अधिक उपयुक्त समाधान प्रदान करते हैंतो न्यायालय व्यादेश अनुतोष देने से इंकार कर देंगे।